बेहद प्रासंगिक नाटक सुखिया मर गया भूख सेके पूर्ण नाट्यालेख को हमरंग पर प्रकाशित करने का उद्देश्य  देश भर के नाट्यकर्मियों को इस नाटक की सहज उपलब्धता है | बावजूद इसके मंचन से पूर्व लेखकीय अनुमति लेना नैतिक जिम्मेदारी समझें | नाटक को हमरंग पर प्रकाशन हेतु प्रदान करने के लिए हमरंगपरिवार राजेश कुमारका आभारी है संपादक  

सुखिया मर गया भूख से 

राजेश कुमार

राजेश कुमार

पूर्वार्द्ध

[सुखीराम की पत्नी और बच्चों के समवेत् चीत्कार से अंधेरे की उदासी टूटती है। चीत्कार रूलाई में तब्दील हो जाती है जिसमें धीरे-धीरे बिरादरी वाले भी शामिल जाते हैं। सब सामूहिक रूप से लय में मातमपुर्सी कर रहे है | शाम की बीमार पीली परछाई सुखीराम के आंगन में धीरे-धीरे उतरने लगती है… मंच केन्द्र में जिस पर सुखीराम का पार्थिव शरीर सफेद चादर से ढ़ंका हुआ है। ]
ग्रामीण – (मातम गान)
सब कुनबा खाय पछाड़
कि सुखिया मरे मरे
हां सुखिया मरे मरे
हाय सुखिया मरे मरे
अजी सुखिया टपक गए…

मंहगाई की मार ने उनपे
ऐसो कीन्हो वार
बीस दिनों ते भूखे रहिकें
लुरक गए सरकार
हां सुखिया मरे मरे
हाय सुखिया मरे मरे
अजी सुखिया टपक गए…

सरकारी कर्जा में डूबे
लियो पम्प कूं लोन
सबने मिलिकै यौ लतियाये
किश्त चुकावे कौन
हां सुखिया मरे मरे
हाय सुखिया मरे मरे
अजी सुखिया टपक गए…

[नीली रोशनी खाट पर आने लगती है.. खाट पर बिछे सफेद चादर के अंदर से सुखीराम धीरे-धीरे निकलता है मानो शरीर से उसका प्राण निकल कर बाहर आ रहा हो। गांववालों के लिए वह अदृश्य है पर दर्शकों के लिए प्रकट। सुखीराम की काया दुबली-पतली है। शरीर हड्डियों का ढांचा भर है। बदन पर तार-तार हुआ बनियान और घुटनों तक चढ़ी हुई सफेद धोती है। लंबी जम्हाई भरते हुए उठता है। ]
सुखीराम – (ऊपर की ओर देखते हुए) जय हो यमराज महाराज, कब आओगे इस दुखिया के प्रान हरने ? पहले तो प्रान छूटा      नहीं कि सटक से सटकने के लिए धमक पड़ते थे। आज भैंसा गाड़ी पंचर हो गयी का? या सोमरस पीकर मेनका बाई का                    नाच देखने में ओझरा गये ? मिट्टी की तो गत बन ही रही है, प्रान का तो माठा ना बनाओ। (खाट पर से उठते हुए)                    बदन कसमसाने लगा है। खटिया पर लेटे-लेटे अंग पिराय रहा है। (गांव वालों को रोता देखकर) बुक्का फाड़कर रोते                   रहोगे या लहास को फूंकोगे भी। अरे लहास को ज्यादा देर लटका के नहीं रखना चाहिए। सड़ी गरमी है। कीड़े पड़ जायेंगे               तब उठाओगे क्या? देखो, मक्खियां भी भिनभिनाने लगी हैं। ससुरे मच्छड़ तो मरने के बाद भी नहीं छोड़ रहे, भखोसे                   जा रहे हैं। तुमसे पहले कहीं मच्छड़ ही न उठा ले जाए। (हाथ से मुंह पर मारता है) हरामजादा, बहुत देर से काटे जा                    रहा था। (उकडूं बैठ जाता है) चींटा-माटा सब घुसे जा रहे हैं।(उठकर गांव वालों के बीच घूमते हुए) जब तक जिंदा था,                    एक कुकुर भी मूतने नहीं आता था। जब भूख से टपक गये तो पूरा गांव ऐसे उमड़ा पड़ा है जैसे सैलाब आ गया हो …
[पार्श्व में पीपल का पेड़ है, आत्महत्या से मरे हुए किसानों के तीन भूत उतरकर सुखीराम के पास आते हैं। ]
(मृतक किसानों को देखकर) क्यों भइया, तुमलोग यमराज के आदमी हो का ?
मृतक किसान 1 — नहीं, हम भी तुम्हारी तरह यमराज का इंतजार कर रहे हैं।
सुखीराम — कौन हो तुमलोग ?
मृतक किसान — ( समवेत स्वर में ) आत्महत्या से मरे हुए किसान हैं।
सुखीराम — अरे! यहां तो मरने के बाद भी ठेला-ठेली है। पता नहीं मेरा नम्बर कब आये ?
मृतक किसान 2 — तुम कैसे मरे ?
सुखीराम ः मैं मरा नहीं हूं, मुझे भूख ने मारा है।
मृतक किसान 3 कैसे ?
सुखीराम ः उस दिन पता नहीं किस मनहूस का मुंह देखा था कि रंगिया से जा टकराया। फेंकुआ की दुकान पर चाह पिलाकर                         सरकार द्वारा पम्पसेट खरीदने और कर्जा में पचास प्रतिशत छूट की बात करने लगा। मती मारी गयी थी भइया                       कि उसकी चिकनी-चिपुड़ी बातों में आ गया। जमीन दिखाकर करजा ले लिया। ब्लॉक द्वारा पम्पसेट की फ्री                             बोरिंग करवाकर खेती-किसानी में जुट गया। छूट के बाद भी पम्पसेट बारह हजार का था और करजा भी उतने                          का ही। आॅफिस के साहब और रंगिया ने छूट की रकम पहले ही हड़प लिया।
मृतक किसान 3 हमारे साथ भी यही हुआ था।
सुखीराम ः शुरू-शुरू में किश्त भरने में कुछ पता नहीं चला… लेकिन साल भर के अंदर लगने लगा, कर्ज का पानी जितना                           उलीछो उतना भरे जा रहा है।
मृतक किसान 1 गिरहस्ती के कारण मैं भी कभी-कभार किश्त नहीं भर पाता था।
सुखीराम ः छोड़ दिया भरना, जो होगा देखा जायेगा।
मृतक किसान 2 फिर क्या हुआ ?
सुखीराम ः साल दो साल तक देखने क्या, कोई झांकने तक न आया। हम भी निश्िंचत हो गये। एक दिन क्या देखते हैं कि                       आर सी आ गया।
मृतक किसान 3 थाना-कचहरी से तो भूत भी भागता है।
सुखीराम ः मैं डर गया। जेहल गया तो मान-मरजादा का क्या होगा ? भाग कर रंगिया के पास जा पहुंचा।
मृतक किसान 3 क्या बताया उसने ?
सुखीराम ः उ दललवा तो उनसे भी दो हाथ आगे था।
मृतक किसान 1 फिर क्या किये ?
सुखीराम ः डर के मारे जो जमीन थी, सब बेच दिया। लेकिन करजा कुछ रह ही गया। (मृतक किसान से ) ला एगो बीड़ी ला।                          (कोई जवाब न मिलने पर मुड़ता है, हंसने लगता है ) हमारा दिमाग भी ठस्से हो गया है। भूत भी भला बीड़ी पीता                       है।
मृतक किसान 1 उसके बाद क्या हुआ ?
सुखीराम ः भइया एक जून का खाना जुटाना भी भारी पड़ने लगा।
मृतक किसान 2 हर किसान की यही कहानी है।
सुखीराम ः परसों घर में कुछ नहीं था। खाने के लिए बच्चे अपनी महतारी से पिले पड़े थे। ऊ खाना कहां से लाती ?                                        खिसियाकर बच्चों को ही पीट रही थी। जब बरदाश्त नहीं हुआ तो आंगन में आकर बैठ गया। वहां काफी पुराना                            गांठदार बबूल का पेड है। पेड की तरफ देखकर सोचने लगा, अब हमारे पास कोई विकल्प नहीं बचा है, एक ही                            रास्ता है…
मृतक किसान 3 यही तो हमलाेंगो ने किया।
मृतक किसान 2 गमछा बांध कर पेड से लटक गये ।
मृतक किसान 1 रोज का चिक- चिक एक बार में खतम।
सुखीराम ः तभी बटेसरा आ गया…
मृतक किसान 2 क्या किया उसने ?
सुखीराम ः अपने साथ ले गया। गांव के बाहर सड़क पर माटी भरने का काम चल रहा था। रंगिया को ठेका मिला हुआ था। बड़ी                      हील-हुज्जत के बाद ससुरा काम देने के लिए तैयार हुआ।
मृतक किसान 1 ऊपर से एहसान और जताया होगा।
सुखीराम ः उस दिन सुबह से ही लू चल रही थी। दोपहर होते-होते तो आग बरसने लगी। रह-रह कर प्यास लग रही थी। बार-                        बार पानी पीने जाने पर रंगिया गरियाने लगता था। जब रहा न गया तो कुएं से एक बाल्टी पानी खींचकर पेड़ के                         नीचे लाया। पीकर उठने लगा तो उठा न जा रहा था। मन अकबकाने लगा। लेट गया पर पेट में हूक सी उठ रही                           थी। उल्टी आ गयी। अंदर का सारा पानी बाहर। ऐसा लग रहा था मानो हाथ-पांव ठंडा हो रहा हो। सिर चकराने                           लगा। आंखों के सामने अंधियारा छाने लगा। चक्कर खाकर गिर पड़ा। हमको तो होशे नहीं रहा कि कब हमको                           टांग-टूंगकर घर लाये। आंखें खोलने की कोशिश कर रहा था पर खुल ही नहीं रहा था। सब धुंधला-धुंधला नजर                           आ रहा था। बोलना चाह रहा था पर बोल नहीं पा रहा था। धुंधलका बढ़ता ही जा रहा था। अंधेरे में अजीब-अजीब                         सी शक्ल नजर आ रही थी। डरावनी आवाजें सुनाई पड़ रही थी। दबे पांव मौत मेरे करीब सरक रही थी। उसकी                          आहट साफ सुनाई पड़ रही थी। खटिया पर से उठकर भागना चाहा पर उठ ही नहीं पा रहा था, जैसे किसी ने                                 हाथ-पांव बांध दिये हो…
मृतक किसान ः फिर ?
सुखीराम ः फिर क्या भइया, भूख ने घप्प से प्रान दबोच लिया। (मृतक किसानों की ओर देखकर) मर कर भूत बन गया।
[नेपथ्य में तेज आवाज होने लगती है। ]
मृतक किसान 1 ये आवाज कैसी है ?
मृतक किसान 2 यमराज महाराज की सवारी तो नहीं पधार रही है !
सुखीराम ः चल भइया, जल्दी से अपनी जगह पर लमलेट हो जाए, नहीं तो कफन के अंदर गायब देखकर यमराज महाराज                         लौट न जाए।
[सुखीराम भागकर खाट पर चढ़ कर कफन के अन्दर घुस जाता है। मृतक किसान भी पीपल के पेड़ पर चढ़ जाते हैं। 
धीरे – धीरे फेड आउट… 
फोन के घनघनाने की आवाज के साथ मंच अग्र में क्रॉस लाइट आता है जिससे सुखीराम का आँगन का दृष्य धुंधलके में चला जाता है। मंच अग्र के दांये हिस्से में एक ब्लॉक पर फोन रखा हुआ दिखता है। 
डीएम का अर्दली जो सफेद पैंट, शर्ट और लाल टोपी में है, विंग्स से निकल कर आता है। ] 
अर्दली ः ये यमराज के आने का अलार्म है।(ब्लॉक के चारों तरफ चक्कर काटते हुए ) सूबे के अफसर अगर फुस्स भी कर दे तो पहचान जाता हूं। बिल्डर-कॉन्ट्रेक्टर और प्रापर्टी डीलरों की तो बात न करिये, उनके फोन तो सूंघते ही जान जाता हूं।                  लेकिन यह आम नहीं… खास-खासमखास लग रहा है … (डरते-डरते रिसीवर उठाता है लेकिन कान से सटाते उछल                 पड़ता है) बाप रे! ऐसे झटका दे रहा है मानों कहीं बिजली गिरी हो ! बात कम हड़का ज्यादा रहा है। साक्षात् यमराज                    लग रहा है। सर जी को ढूंढ रहा है…लगता है उनके दिन पूरे हो गये… (इधर-उधर ढूढ़ते हुए) कहां हैं सर जी ऽ ऽ …
[मंच अग्र के बायें कोने में टॉप लाल स्पॉट आता है जिसमें डीएम कमोड पर बैठा अखबार पढ़ता नजर आता है। लम्बा गाउन पहन रखा है। कब्जियत का पुराना मरीज है जिसकी पीड़ा चेहरे पर साफ देखी जा सकती है। ]
(बाथरूम की तरफ नजर पड़ते) लगता है बड़े घर में आराम फरमा रहे हैं। (हौले से दरवाजा नॉक करने का मूकाभिनय) सर जी, आपका फोन ऽ ऽ …
डीएम ः कह दो नहीं है।
अर्दली ः कोई अर्जेन्ट कॉल है सर जी।
डीएम ः इससे अर्जेन्ट कॉल और क्या हो सकती है। (चेहरे पर तनाव सघन होता जाता है) तुम्हें इतना भी पता नहीं कि साहब                  लोग इस समय क्या करते हैं ?
अर्दली ः कहा था कि साहब पूजा कर रहे हैं।
डीएम ः तो क्या प्रसाद लेने आया है ?
अर्दली ः कह रहा है खाना और पाखाना यही काम रह गया है तुमलोगाें का।
डीएम ः (गुस्से से खड़ा हो जाता है) अरे आदमी है या पाजामा ! आदमी खायेगा तो पाखाना नहीं जायेगा ?
अर्दली ः सर जी, केवल कान लगा दीजिए …
डीएम ः अभी नाक भी नहीं लगा सकता! (धम्म से कमोड पर बैठ जाता है।)
अर्दली ः (फोन की तरफ मुखातिब होकर) एक ये जनाब है जो ऐसे चिंघाड़ रहे हैं मानो रिसीवर फाड़ कर प्रकट हो जायेंगे।                       (बाथरूम की तरफ देखकर) दूसरे ये जनाब हैं जो भले अपना प्रेशर न बढ़ा सके पर दूसरों का जरूर बढ़ा देंगे। (पेट                        पकड़कर) बल्कि बढ़ा दिया… (दरवाजा नॉक करते हुए) सर जी ऽ ऽ… जल्दी निकलिये वरना आगे से गीली, पीछे                       से पीली हो जायेगी। (जोर से दरवाजा पीटने लगता है) प्रेशर बढ़ रहा है … (और जोर से) निकल जाएगी …                                 (बरदाश्त के बाहर हो जाता है तो धक्का देकर अंदर घुस जाता है।)
डीएम ः (घबड़ाकर खड़ा हो जाता है) ये क्या बदतमीजी है ! (जल्दी से अखबार के पन्नों से अपने को ढ़कने की कोशिश करने                  लगता है।)
अर्दली ः (मुंह दूसरी तरफ करके अदब के साथ फोन बढ़ा देता है) आपका फोन ऽ ऽ …
डीएम ः (फोन लेकर अर्दली के पिछवाड़े पर लात मारता है) हटा, ये सावन की घटा! (अर्दली बाथरूम के बाहर जा फेंकाता है।)
अर्दली ः (गिरे-गिरे) पिता जी ठीक ही कहते थे, अफसर के अगाड़ी और गदहे के पिछाड़ी कभी नहीं रहना चाहिए।
डीएम ः (रिसीवर को कान से लगा कर) तब से तुम्हारी सूई लैट्रिन पर ही अटकी हुई है। हां-हां, मैं लैट्रिन से बोल रहा हूं, तुम्हें                    झड़झड़ी क्यों हो रही है ? मेरी मरजी मैं दस बार नहीं, सौ बार लैट्रिन जाऊं। लैट्रिन में खाऊं… लैट्रिन में सोऊं… लैट्रिन में हनीमून मनाऊं… तुम क्यों झंड हो रहे हो ? तुम भी लैट्रिन में पड़े रहो, कोई मना कर रहा है ? तमीज से बात करो, अबे-तबे किसे किये जा रहे हो ? औना-पौना समझ रखा है ? बोल नहीं रहे हैं तो दाना-पानी लेकर चढ़े जा रहे हो। ये फुस्स-फुस्स क्या कर रहे हो ? खाना नहीं खाया है क्या ?… सचिव… कौन सचिव … मुख्य सचिव… राजधानी से… सीएम हाउस से… (जैसे रिसीवर में करंट उतर गया हो, कांपने लगता है। फोन को संभालने की कोशिश करता है पर संभाल नहीं पाता है। हाथ से उछल जाता है लेकिन गिरने के पहले अर्दली लपक कर पकड़ लेता है।)
अर्दली ः (फोन बढ़ाते हुए) सर जी …
डीएम ः (पीछे खिसकते हुए) मेरा नहीं तेरा …
अर्दली ः क्यों मजाक कर रहे हैं, मेरी सात पुश्तों में भी किसी को सचिव का फोन नहीं आया है… (फोन वापस डीएम की तरफ उछाल देता है।)
डीएम ः (पकड़ते हुए) तू तो जानता है, मुख्य सचिव से बात करने में मेरी कितनी फटती है। मेरी तरफ से तू ही बात कर ले। (फोन वापस अर्दली की गोद में रख देता है।)
अर्दली ः हमको क्यों मरवाने पर तुले हैं ? (डर के मारे कांपने लगता है। फोन जमीन पर रख देता है।)
डीएम ः (प्यार से गले में हाथ डालते हुए) फोटो थोड़े छपता है फोन में। मेरी तरफ से तू ही बात कर ले।
अर्दली ः बच्चे यतीम हो जायेंगे सर जी …
डीएम ः और तुम्हारी मेम साहब बेवा हो जायेगी, इसकी फिक्र नहीं ?
अर्दली ः मेरी मजबूरियों को समझने की कोशिश कीजिए।
डीएम ः चल, तुम्हारे सारे पुअर एसीआर को गुड… वेरी गुड… एक्सीलेंट किया। (दर्शकों से) आखिर कुत्तों का भी एक दिन आता है।
अर्दली ः आप मुझे कमजोर कर रहे हैं … (धीरे-धीरे फोन की तरफ बढ़ने लगता है।)
डीएम ः चल, दो साल के तुम्हारे रूके इन्क्रीमेंट एक साथ दिया।
अर्दली ः (उल्टे पांव वापस आते हुए) और प्रोमोशन ?
डीएम ः (स्वयं से) मरने वाले की अंतिम इच्छा तो पूरी करनी ही पड़ती है … (प्रकट) तू भी क्या याद करेगा, दिया ऽ ऽ …
अर्दली ः (बात करने के लिए हिम्मत जुटाने की मुद्राएं बनाता है। आवाज बदल कर बात करना प्रारंभ करता है) सर… मौसम बड़ा बेईमान है इसलिए आवाज थोड़ी बैठ गयी है। अर्दली नहीं … डीएम संत नगर बोल रहा हूं। हां, फोन तो अर्दली ने ही उठाया था। दरअसल साथ रहने से उसकी आवाज भी मेरे जैसी ही हो गयी है। डांटा है सर, हड़काया भी है कि अपना स्टाइल बदलो। लेकिन फोर्थ क्लास वाले कितने हरामी होते हैं, आप तो जानते ही हैं। (पॉज) सारी सर, आपकी आवाज पहचान नहीं सका और अंजाने में गुस्ताखी कर गया। दरअसल जब से हमारा टोल नम्बर पेपर में पब्लिश हुआ है, लोगों को जैसे फोन करने के सिवा कोई काम ही नहीं रह गया है। गली में कोई कुत्ता भी मर जाए तो यहीं फोन खड़ाखड़ा देते हैंं। किसी का कच्छा-बनियान चोरी हो जाए तो थाने से पहले हमें रिपोर्ट करते हैं। सॉरी सर, अगर कन्फ्यूजन में आपको… आपकी मां-बहन को… रामायण की दो-चार पंक्तियां सुना दिया हो तो धूल समझ कर झाड़ दीजिएगा। मैं आपके पास पर्सनली माफी मांगने आऊंगा सर ! … जी सर, मैं डीएम संत नगर ही बोल रहा हूं। आपको बार-बार लघुशंका… मेरा मतलब शंका क्यों हो रही है कि अर्दली बोल रहा है। अर्दली तो डर के मारे … (डीएम को ढूंढने लगता है। डीएम कमोड के पीछे छिप जाता है) लैट्रिन में घुसा पड़ा है।… जमाना बदल गया है सर … कभी डीएम अर्दली बन जाता है तो अर्दली डीएम। (चौंक कर) कौन मर गया सर! आपका बहनोई! बड़ा अफसोस हुआ सर… ऐसा लग रहा है, आपका नहीं हम सबका बहनोई मर गया है। पूरे सूबे का बहनोई मर गया है … (पॉज) क्या कह रहे हैं सर ! … मेरा बहनोई मर गया है… भूख से … आपको कोई गलतफहमी हो गयी है, वह दारू से मरा होगा। हजार बार कहा कि जीजू दारू मत पी… मत पी और पी तो मुर्गा-शुर्गा के साथ पी। हाजमोला से पीयेगा तो मरेगा ही। क्या नाम बताया सर… सुखीराम।… ये नया बहनोई कहां से आ टपका ?
[डीएम लपक कर अर्दली के हाथ से रिसीवर ले लेता है। ]
डीएम ः भूख से मर गया ! … भूख से भला कैसे मर सकता है ? … हां-हां… डीएम संत नगर ही बोल रहा हूं। आॅरजनल आवाज तो यही है, मौसम के चक्कर में कभी-कभार बिगड़ जाती है… सर… सर… सर ऽ ऽ …
[डीएम का दिल बैठता जा रहा है। आंखों के सामने अंधेरा छाता जा रहा है। हिस्टिरयक ढंग से ‘सर-सर…’ करता जा रहा है। पार्श्व से तेज संगीत बजता रहता है। डीएम मूर्छा की स्थिति में जाने लगता है। कमोड पर से नीचे गिर पड़ता है। अर्दली सम्भालने के लिए दौड़ता है लेकिन उसके पहले ही डांट से चिहुंक कर खड़ा हो जाता है पानी लाओ…
[अर्दली अंदर से गिलास में पानी लाता है। डीएम बाथरूम से बाहर आ जाता है। पीते-पीते पैर लड़खड़ाने लगता है। अर्दली बैठने के लिए ब्लॉक लाता है। ]
पंखा झेलो… पंखा. [अर्दली पंखा करने लगता है। ]
पीछे वाली जेब में दवा होगी …
[अर्दली बड़ी मुश्किल से निकालकर मुंह में ठूंस देता है। ]
(छाती पकड़कर) हाय मेरा दिल ऽ ऽ … (अर्दली से) एहसान फरामोश अंदर से ब्रान्डी तो ले आ ऽ ऽ …
[अर्दली बगल वाले कमरे से ट्रे में बोतल और गिलास लेकर आता है। एक पैग बनाकर देता है। डीएम फौरन गले के नीचे उतार लेता है। लगातार तीन-चार पैग पीने के बाद नशा जब घोड़े पर सवार होता है तो ऐंठकर खड़ा हो जाता है। फोन सेट अर्दली की तरफ उछाल देता है। अर्दली पेशेवर क्रिकेट खिलाड़ी की तरह डाइव मार कर कैच कर लेता है। ]
कॉल टू एसडीएम कंजड़गंज इमीडियटली।
[अर्दली मशीन की तरह खटाखट नंबर डायल करता है। ]
अर्दली ः मे आई टाक टू…
डीएम ः अंग्रेजी बाद में छांटना, फोन इधर ला। (अर्दली के हाथ से जबरन फोन ले लेता है) अजीब हाल है, जिसे देखो बाथरूम में घुसा पड़ा है। (पॉज) क्याें शर्मा… शर्मा होकर शर्माता है ? पता है, तुम्हारे ब्लॉक में कौन मर गया है ?… मैं क्या पूछ रहा हूं, तुम क्या जवाब दे रहे हो ?… नहीं जानते, तो जानते क्या हो ? राजधानी में बैठा सीएम उसे जान रहा है। सुखीराम ऐसे-वैसे नहीं, भूख से मरा है। एंड फॉर योर काइन्ड इन्फार्मेशन… कोई अगर भूख से मर जाए तो पता है वहां के अधिकारी के साथ क्या किया जाता है ?
अर्दली ः (बोतल में बची शराब का एक घूंट मार कर, ब्लॉक पर ठेका बजाते हुए) मार दिया जाए कि छोड़ दिया जाए…
डीएम ः जानते हो, क्या सलूक किया जाता है ?
अर्दली ः (एक घूंट और मार कर) अच्छी तरह से उसकी बजायी जाती है।
डीएम ः उसके बाद …
अर्दली ः (कुछ घूंट और मार कर) जमकर छांटी जाती है।
डीएम ः और उसके बाद …
अर्दली ः (सारी शराब हलक के अंदर उतारकर) इत्मीनान् से तोड़ी जाती है।
डीएम ः क्योंकि प्रेस कांफ्रेंस में सीएम साहब ने मोटा-मोटा कह दिया है, किसी को भूख से मरने नहीं दिया जाएगा। गरीबी रेखा से ऊपर वालों को एपीएल और नीचे वालों को बीपीएल कार्ड मुहय्या कराने के बाद भी भूख से मरने की सूचना मिली तो…
अर्दली ः डीएम की खैर नहीं।
डीएम ः (घूर कर देखता है ) उन्होंने चेताया है कि प्रदेश में किसी भी गरीब का भूख से मरना बरदाश्त नहीं किया जाएगा।
अर्दली ः वहां का अधिकारी सीधे जिम्मेदार होगा।
डीएम ः (बात करते-करते अर्दली को मारने के लिए दौड़ता है, वह भाग खड़ा होता है) वे कह रहे हैं जब बीपीएल कार्ड से राशन बांट रहे हैं… रहने के लिए मुफ्त इंदिरा आवास दे रहे हैं… नरेगा में रोजगार दे रहे हैं … तो भूख से कैसे मर गया? (अर्दली को लात मारता है) सीएम साहब रिपोर्ट मांग रहे हैं। कल तक किसी भी सूरत में पहुंच जाना चाहिए। वरना न तुम बचोगे…
अर्दली ः (कमोड के पीछे से सर उठाकर) न डीएम साहब।
दोनो ः (आमने – सामने आकर) सब के सब टंगेंगे।
[शार्प फेड आउट। फेड इन।

बिरादरी वाले बांस की टिकटी बना रहे हैं। टिकटी के पैर की तरफ एक हांडी रखी हुई है जिसमें से लोहबान का धुआं निकल रहा है। दरवाजे के पास घर की औरतें खड़ी हैंं।
बिरादरी वाले सुखिया के शरीर को खाट पर से उठाकर टिकटी पर लिटाते हैं। औरतें दहाड़ मारने लगती हैं। सिरहाने के पास जलती हुई अगरबत्ती का बंडल मिट्टी के लौंदे में खोंस देते हैं। हॉल के दरवाजे की तरफ से दरोगा अपने सिपाहियों के साथ प्रवेश करता है। सीढ़ियों से चढ़कर मंच के अगले हिस्से में आ जाता है। तुंदियल है, शर्ट के सारे बटन खुले हैं। अंदर का बनियान और जनेऊ दिख रहा है। गले में लाल अंगोछा है। बाल छोटे, खूंटे जैसा। हाथ में दारू की बोतल है, थोड़ी सी बची हुई है। जैसा वह है वैसा ही उसके जवान भी। बेडौल, ढीले और लापरवाह।
गले से लटक रहा मोबाइल स्पेशल रिंगटोन के साथ बजने लगता है। ]
दरोगा ः अब कौन आ गया मराने ? (नंबर देखता है) मर गये ! इ तो एसडीएम साहब का नम्बर है। (गले से मोबाइल निकालने लगता है लेकिन इतना घबड़ा जाता है कि निकल ही नहीं पा रहा है) जल्दी फोन नहीं उठा तो मां-बहन की एक कर देगा। (मोबाइल की रिबन गले में उलझ जाती है) तुमलोग तमाशा देख रहे हो, निकालते क्यों नहीं ? (सिपाही जितना सुलझाना चाहते हैं, उतना और उलझ जाता है) अर्रे फांसी दे दोगे क्या ? (सबों को ठेलकर सर को नचाने लगता है। मोबाइल उछलकर दूर जा गिरता है। झपट कर उठाते हुए) जय हिंद सर ! सो नहीं रहे थे सर, टट्टी पर बैठा था।… आइंदा ऐसी गलती नहीं होगी।… हम रात से ही पेट्रालिंग पर हैं… इलाके का चप्पा-चप्पा छान मारा है। केवल एक गांव रह गया है। खबर मिली है वहां कोई मरा है। हम मौके पर पहुंच गये हैं। तफ्तीश करके रिपोर्ट करते हैं…
[फोन कट जाता है। दरोगा की हालत खराब हो गयी है। पसीने से तर-बतर। शर्ट से मुंह पोंछता है। ]
सिपाही 1 ः इ फोनवा तो जी का जंजाल है।
दरोगा ः सरकारी फोन गले की ऐसी हड्डी है कि लुगाई के साथ लगे रहो तब्ब भी बगुले की तरह ध्यान फोनवे पर अटका रहता है। चौबीसों घंटे आॅन रखने का सरकारी आर्डर है।
सिपाही 2 ः अफसर लोगों को खूब मजा है।
दरोगा ः कुछ करना-धरना तो होता है नहीं, बैठे ठाले आर्डर पेलते रहते हैं। फरमान जारी कर दिया कि सुखीराम का पता लगाओ। अरे सुखीराम कोई वीआईपी है जिसके मरते हल्ला हो जाए। मिनट-मिनट पर फोन आ रहा है, पता लगा… पता लगा… (खीझकर) घुइयां पता लगा! (बची-खुची दारू अंदर उतार कर) अपने तो मास्टरनी के साथ लगे होंगे, दूसरों को अंगुल किये रहते हैं।
सिपाही 3 ः यहां तो काम की कोई इज्जते नहीं है।
सिपाही 2 ः तेल लगाने वालों के मजे हैं।
सिपाही 3 ः अच्छा हो जाता है तो नाम लेने के लिए सबसे आगे रहते हैं और कुछ गलत हो गया तो छांटने के लिए सबसे पहले हमारा ही पिछवाड़ा ढूंढते हैं।
सिपाही 1 ः जैसे ऊपर वालों की कोई जिम्मेदारी ही न हो।
दरोगा ः है न जिम्म्ेदारी, नोट पीटने की। (खाली बोतल फेंकते हुए) हमारी तो किसी तरह कट गयी भइया। तुमलोगों की तो पूरी सर्विस पड़ी है। एक बात गिरह बांध लो। नौकरी सलामत रखनी है तो बने रहो लुल्ल, सैलरी पाओ फूल्ल।
सिपाही 1 ः सबको दुखिया करके मरा सुखिया !
दरोगा ः पता लगाओ नहीं तो आज सारी दरोगई घुस जाएगी। (औरतों के रोने की आवाज सुनकर झल्ला जाता है) अरे चुप कराओ इन डाकनियों को ! रो-रोकर दिमाग का मठ्ठर किये हुए हैं। (सिपाही 2 से) जल्दी से पूछ-पाछकर बला काटो।
सिपाही 2 ः (आवाज देकर) ऐ, घर के किसी आदमी को भेजो।
सिपाही 3 ः (कोई रिस्पॉन्स न देखकर) नहीं है तो जनाना को भेजो।
[दरवाजे पर खड़ी औरतों में से एक निकलकर डरते हुए आती है। ]
दरोगा ः (बिरादरी वालों से) सर पर क्या सवार हो ? चलो, उधर जाकर बैठो। (बिरादरी वाले जाने लगते हैं) जा कहां रहे हो, कुर्सी क्या तेरा बाप लायेगा ? (उनमें से एक अंदर से प्लास्टिक की कुर्सी लाकर रख देता है। उस पर बैठते हुए) पांडे। सिगरेट की डब्बी बढ़ाना।
[दरोगा बनियान उठाकर दोनों हाथ से तोंद खखोरने लगता है। औरत पास आकर खड़ी हो जाती है। ]
बैठ जा। (सिपाही 2 से) चल जादव, लग जा अपने काम पर।
[औरत जमीन पर बैठ जाती है। साड़ी के पल्लू से चेहरा थोड़ा ढ़के रखती है। ]
क्या हुआ सिगरेट का ?… तुमलोगों के पास कुछ रहती भी है ? हराम की चाभने की आदत पड़ गयी है। बीड़ी तो होगी या वो भी नहीं है ? (औरत को अश्लील ढं़ग से घूरते हुए) कभी-कभी टेस्ट बदलने में मजा आता है।
[सिपाही 1 सकुचाते हुए बीड़ी पेश करता है। दरोगा मुंह में लगाता है। सिपाही 3 झट से माचिश जलाकर सुलगाता है। एक लंबा कश खींचकर ढे़र सारा धुआं औरत की तरफ छोड़ता है। औरत अपना चेहरा दूसरी तरफ घूमा लेती है। दरोगा अंगड़ाई लेते हुए असभ्य ढं़ग से द्विअर्थी गाना गाते हुए पैर फैलाकर कुर्सी के पीछे ओलर जाता है। ]
का रे जादव, खाली अंखिया सेंकता रहेगा या काम भी करेगा सरकारी ?
[सिपाही 2 औरत के करीब खिसक जाता है। ]
सिपाही 2 ः परनाम भउजी। (जवाब न मिलने पर तनिक और सरकते हुए) तोहार का नाम हअ ?
औरत ः (सकुचाते हुए) इमरती देवी।
दरोगा ः तभी कहे इतनी रसभरी कैसे है ?
सिपाही 2 ः तोहार बाउजी को मिठाई खाने का बहुत शौक होगा इसलिए अइसन नाम रखा होगा। फिर तो तोहार और बहिनयन के नाम जलेबी देवी… बरफी देवी … मलाई देवी…
दरोगा ः खाली बकचोदी करता है।
सिपाही 2 ः चीनी की बीमारी है पर मिठाई का नाम सुनते लार टपकने लगता है…
दरोगा ः तेरे बाप का फोन आता ही होगा।
सिपाही 2 ः (मुड़कर) असली पोइंट पर आ रहे हैं सर।
दरोगा ः कब आयेगा जब एसडीएम साहब एमसी- बीसी कर देंगे तब?
सिपाही 2 ः (जिधर चेहरा खुला है उधर खिसकते हुए) तुम्हारा आदमी मरा है ?
दरोगा ः ककहरा क्या पूछ रहा है, सीधे खसम का नाम पूछ।
इमरती ः (मुंह पर से पल्लू हटाते हुए) सुखीराम।
[नाम सुनना था कि दरोगा बेहोश हो जाता है। कुर्सी से गिरने को होता है कि सिपाही मिलकर किसी तरह थामते हैं। सिपाही 3 जूता निकाल कर संूंघाता है। दरोगा झट से खड़ा हो जाता है। ]
दरोगा ः कैसे मरा सुखीराम ?
इमरती ः भूख से।
[इस बार दरोगा के साथ-साथ सिपाही भी बेहोश हो जाते हैं।
दरोगा के गले में झूलता मोबाइल स्पेशल रिंगटोन के साथ बज पड़ता है। इमरती उठकर उनके पास आती है। बड़ी मुश्किल से गर्दन से मोबाइल निकाल पाती है। ]
इरमती ः हलो ऽ ऽ … कौन बोल रहा है ? … एसडीएम साहब। … किससे बात करनी है ?… दरोगा जी तो बेहोश पड़े हैं।… पता नहीं क्यों बात-बात पर उन्हें दांती लग रहा है।… सिपाही लोग का भी वही हाल है।… हम सुखिया के मेहरारू बोल रहे हैं … इमरती देवी … हां, सुखीराम कल मरा… भूख से … हलो … हलो ऽ ऽ… ( मोबाइल को उलट-पलट कर देखने लगती है) का हो गया… कोई आवाजे नहीं आ रही है।… मोबाइल तो ठीके लग रहा है… यहां तो अजीबे चक्कर है, जो भूख का नाम सुन रहा है, पट्ट हो जा रहा है…
[मोबाइल दरोगा के गले में डालकर इमरती लौटने लगती है कि सब एक साथ उछलकर खड़े हो जाते हैं। ]
दरोगा ः (पीछे से इमरती का पल्लू खींचते हुए) कहां भागी जा रही है छिनाल? (इमरती देवी सकपका जाती है। दरोगा उसकी तरफ बढ़ता है) सच-सच बता।
इमरती ः एकै बात कितनी बार पूछेंगे ?
दरोगा ः (गुस्से से डंडा हवा में लहराते हुए) सौ बार पूछूंगा। तुझे कोई एतराज ?
सिपाही 1 ः जल्दी बता, कैसे मरा ?
सिपाही 2 ः बुखार, कालाजार से ?
सिपाही 3 ः पेचिश, बदहजमी या महामारी से ?
दरोगा ः सच-सच बता।
इमरती ः साहब, आपसे झूठ थोड़े न बोलूंगी।
दरोगा ः बोलकर अपना ही नुकसान करेगी।
इमरती ः मैं मजाक नहीं कर रही हूं।
सिपाही 2 ः मन करे तो कर ले, देवर-भौजाई का रिश्ता जो ठहरा!
इमरती ः विस्वास काहे नहीं होता हमारी बात पर।
दरोगा ः मरने की बड़ी खुजली हो रही थी। (जेब से पुडि़या निकाल कर रगड़ने लगता है।)
सिपाही 1 ः हमको बताता, खुजली मिटा देते।
दरोगा ः कुंए में कूदकर मरता, कोई रोकने जा रहा था। डूबना रास नहीं आ रहा था तो कोई सस्ता और भरोसेमंद नुस्खा आजमा लेता। कीटनाशक तो आजकल हर किसान के घर मिल जाता है। (होंठ के नीचे तम्बाकू दाब लेता है।)
सिपाही 3 ः लेकिन पता नहीं किस ससुरे ने इन्हें भूख से मरने का आइडिया दे दिया है।
दरोगा ः कोई आॅफर चल रहा था कि भूख से मरने पर सीधे बैकुंठ धाम पहुंच जायेगा।
सिपाही 1 ः सर, मुझे कोई और ही मामला नजर आ रहा है।
सिपाही 3 ः किसी ने जहर तो नहीं खिला दिया ?
दरोगा ः (इमरती के पास जाकर) क्यों री, किसी से लगी तो नहीं है ?
इमरती ः (छिटक कर जाने लगती है।)
दरोगा ः (पीछे-पीछे जाते हुए) अपने यार के साथ मिलकर मार तो नहीं दिया ?
इमरती ः (बैठकर सुबकने लगती है।)
दरोगा ः (घुटने के बल आकर धीमे से) चल मान लिया तू सती-सावितरी है, पर इ कैसे मान ले कि सुखिया छिनरा नहीं था ?
इमरती ः वे उस तरह के आदमी नहीं थे।
दरोगा ः (अश्लील ढंग से मुस्कराते हुए) फिर किस तरह के थे… (बोलते-बोलते उसके शरीर से जान-बूझकर सट जाता है।)
इमरती ः (खड़ी हो जाती है।)
दरोगा ः बता न … (हाथ पकड़ लेता है।)
इमरती ः (कलाई छुड़ाने लगती है। दरोगा मसले जा रहा है) हाथ छोडो़ हमार। (सिपाही हंस पड़ते हैं।)
दरोगा ः (जेब से कागज निकाल कर) इस पंच फैसले पर अंगूठा लगा। किसी से कहना नहीं कि सुखिया भूख से मरा है। अगर दस्तख्त नहीं करेगी तो मजबूरी में चालान करना पड़ेगा और जिला हेड क्वार्टर पर जाकर क्या होगा, समझती है ?
इमरती ः (जवाब नहीं देती है।)
दरोगा ः लाश का पोस्टमार्टम होगा। पोस्टमार्टम तो समझती होगी ?
सिपाही 1 ः चीरफाड़।
सिपाही 2 ः लाश वैसे ही सड़ रही है, चीरफाड़ हुई तो और दुर्गत हो जायेगी।
दरोगा ः (इमरती से) भलाई इसी में है कि पंचनामे पर अंगूठा लगा दे। (बिरादरी वालों की तरफ मुड़कर) तुमलोगों से गलत काम थोड़े करवाऊंगा।
[सिपाही 2 इमरती के अंगूठा पर स्याही लगाकर कागज पर ठप्पा लगाने को होता है कि गांव के कुछ युवक आ जाते हैं। इमरती भाग कर औरतों के समूह में चली जाती है। ]
युवक 1 ः लाश यहां से नहीं उठेगी।
दरोगा ः तुमलोग यहां क्या कर रहे हो, चलो फूटो-रास्ता लो।
युवक 2 ः वह भूख से मरा है।
दरोगा ः जिनका काम है उन्हें करने दो। ये बखत तुम्हारी पढ़ाई का है। इसकी हत्या हुई है, इससे दूर रहो।
युवक 3 ः भूख से मरना भी दरअसल हत्या ही है।
युवक 1 ः और हत्यारे को हम हरगिज माफ नहीं करेंगे।
दरोगा ः माफ तो हम भी नहीं करेंगे अगर यह हत्या का मामला
बना… लाश का चालान करना पड़ा… और उसके बाद मर्डर में शामिल लोगों के नाम लिखना पड़ा…
युवक 2 ः ये गीदड़ भमकी किसी और को देना।
युवक 1 ः कौन है इसकी मौत का जिम्मेदार, जवाब देना होगा।
दरोगा ः लाश उठने दो फिर जैसा जवाब चाहोगे दे दिया जायेगा।
सब युवक ः जब तक डीएम साब नहीं आयेंगे, लाश उठने नहीं देंगे।
दरोगा ः प्यार से समझा रहा हूं तो समझ में नहीं आ रहा है? डंडे की भाषा समझाऊं क्या ? तुमलोगों की सारी रिपोर्ट मेरे पास है। जहां बैठकबाजी लगती है, सब खबर है। (बिरादरी वालों की तरफ मुड़कर) अगर अत्येंष्टि के लिए पैसे की जरूरत हो तो मुझसे ले जाओ। लेकिन ये बवाल जल्दी काटो। इसमें तुम्हारा ही फायदा है | [बिरादरी वाले उठाने के लिए बढ़ते हैं कि युवक नारे लगाने लगते हैं। ]
सब युवक ः सुखिया मर गया भूख से, बदला लेंगे जोर से!
[दरोगा टेम्पर लूज कर जाता है। सामने खड़े युवक का गलफर पकड़ लेता है। ]
सब युवक ः घेटे दबा देंगे स्साले ऽ ऽ …
[युवक अपने को छुड़ाने के लिए दरोगा को धक्का देता है। ]
सब युवक ः पुलिस बल वापस जाओ, वापस जाओ-वापस जाओ ऽ ऽ…
[दरोगा रिवाल्वर निकालकर लहराने लगता है। ]
दरोगा ः लाश पर राजनीति करते हो ?
[युवक नारे लगाने लगते हैं। ]
सब युवक ः पुलिस की गुंडगर्दी नहीं चलेगी, नहीं चलेगी-नहीं चलेगी ऽ ऽ…
[दरोगा ताव में फायर कर देता है। ]
दरोगा ः गूं निकाल दो स्सालों की!
[आर्डर मिलना था कि सिपाही लाठी लेकर पिल पड़ते हैं। युवक ढे़ला-पत्थर चलाने लगते हैं। दरोगा रिवाल्वर लेकर दौड़ता है। सिपाहियों का मनोबल और बढ़ जाता है। वे युवकों को दूर तक दौड़ा लेते हैं। यह सब देखकर बिरादरी वाले डर के मारे आहिस्ते से पीछे के रास्ते से बाहर निकल जाते हैं।
मंच पर केवल दरोगा और लाठी भांजते सिपाही रह जाते हैं। लाठी भांजते-भांजते एक लाठी अर्थी पर पड़ जाती है। जैसे किसी बर्रैये ने काट खाया हो, अर्थी के अंदर लेटा सुखीराम पड़पड़ाते हुए उठता है और मंच पर लंगड़ाते हुए चक्कर काटने लगता है। ]
सुखीराम ः हाय-हाय-हाय दइया मार डाला रे ऽ ऽ … हाय-हाय-हाय टांग तोड़ डाला रे ऽ ऽ … माथा फोड़ डाला रे ऽ ऽ … अरे हरामियों जीते जी तो जीने न दिया, कम से कम ठीक से मरने तो दो। गरीबों पर कहर बरपाने वालों तेरा करम फूटे… तेरा अंग-अंग गले… कोई इधर गिरे तो कोई उधर ऽ ऽ …
[सुखीराम घूम-घूम कर लय में पीड़ा व्यक्त करते रहता है। ]
दरोगा ः भाग गये स्साले दुम दबा के!
[सुखीराम दर्द से और बिलबिला पड़ता है।)
सुखीराम ः कहां है नरकेश्वर ? मरने वालों के साथ इसी तरह सलूक किया जाता है ? अपने तो रम्भा-उर्वशी-मेनका के साथ एैश कर रहे होंगे । हम जरा सा लेटे हैं तो डंडे पिलवा रहे हैं। हाय-हाय-हाय, अच्छी जगह नाय मारो ऽ ऽ …
[दरोगा अर्थी के पास जाता है। ]
दरोगा ः सारी मुसीबत की जड़ इ मुरदा है। जब तक यहां रहेगा, कंटा काटता रहेगा। उठाओ स्साले को, लादो जीप में। नहर किनारे पेट्रोल डालकर फूंक-फांक देते हैं।
[सुखीराम अर्थी के ऊपर बैठ जाता है। ]
सुखीराम ः जब तक यमराज महाराज आकर फैसला नहीं कर देते, हाथ न लगाना।
[दरोगा रूल से अर्थी को कोंचता है। ]
दरोगा ः न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी।
[सुखीराम गुर्राता है। ]
सुखीराम ः स्साले डंडा करता है!
[दरोगा एक-दो रूल तड़ातड़ जड़ देता है। ]
दरोगा ः बहुत खून पिया है स्साले ने !
[सुखीराम तमतमा कर खड़ा हो जाता है। ]
सुखीराम ः हे ऽ ऽ … मेरे अंदर के भूत को न जगा ऽ ऽ …
[दरोगा सिपाहियों की तरफ मुड़ता है। ]
दरोगा ः तुमलोगों को क्या न्योता देना होगा ?
[सिपाही सकुचा रहे हैं। ]
सिपाही 1 ः मुझे डर लगा रहा है।
दरोगा ः हम हैं तो डर किस बात का ?
सिपाही 2 ः लोग कहते हैं जो भूख से मरता है, वह भूत बन जाता है।
दरोगा ः हमसे बड़का भूत कौन है रे ?
[सिपाही सहमते हुए अर्थी की तरफ बढ़ते हैं। ]
सिपाही 2 ः मेरी तो बहुत फट रही है।
दरोगा ः भूत की मां की… (ताव में दरोगा खुद उठाने लगता है।)
सुखीराम ः आंख ऽ ऽ …(सुखीराम झट से पैर उस तरफ भिड़ा देता है।)
दरोगा ः (उठ नहीं पाने पर दरोगा झुंझला पड़ता है )तुमलोग क्या मेहमानी में आये हो ?
[हड़बड़ा कर तीनों सिपाही उठाने में जुट जाते हैं। ]
सिपाही 1 ः लाश है कि टस से मस्स नहीं हो रही है।
[सब जोर लगाते हैं। ]
दरोगा ः (हुंकार भरते हुए) राम नाम सत् है।
सब ः (अरथी उठाते हुए) मुरदा स्साला ठस्स है!
[नगाड़ा बजने लगता है। सुखीराम खड़ा होकर नाचने लगता है। नाचने के दौरान जिस कोने में जाता है, भार से ओलार होने लगता है। जिधर ओलार होता है उधर के सिपाही हल्ला मचाने लगते हैं। दूसरी तरफ के सिपाही जोर लगाकर अर्थी को ऊपर उठाते हैं तो सुखीराम उछलकर दूसरी तरफ चला जाता है। सुखीराम के उछल-कूद से अर्थी कभी एक तरफ दबती है तो कभी दूसरी तरफ। धमा-चौकड़ी में संतुलन बिगड़ जाता है। अर्थी लड़खड़ाकर जहां से उठी थी, पुनः वहीं आकर गिर पड़ती है। सुखीराम कमर पकड़कर चिल्लाने लगता है। दरोगा गुस्से से आग बबूला होकर जूता निकाल कर सिपाही 1 को मारने दौड़ता है। ]
दरोगा ः भूतनी के ऽ ऽ …
[मार के डर से सिपाही 1 भागता है तो अर्थी पर बैठा सुखीराम उसके पिछवाड़े पर लात मारता है। ]
सुखीराम ः भागता कहां है छुछुन्दर ?
[सिपाही 1 सामने खड़े सिपाही 2 से जा टकराता है। सिपाही 2 इतना भयाक्रांत है कि आंखें बंदकर लाठी भांजने लगता है। सिपाही 3 को लाठी लगती है, वह बजरंग बली का उद्घोष करते हुए लाठी भांजना शुरू कर देता है। दरोगा को लाठी लगती है, वह हवाई फायर करने लगता है। एक-दूसरे की लाठी से चोटिल होकर जमीन पर धाराशायी हो जाते हैं। सिपाही 1 घुटने के बल रेंगते हुए दरोगा के पास आता है। ]
सिपाही 1 ः हुजूर, अगर भूत सामने आ जाए तो क्या करेंगे ?
दरोगा ः (दर्द से बिलबिलाते हुए) अब सामने से आ जाए या पीछे
से… जो करेगा वह तो भूत ही करेगा।
सब सिपाही ः भूत पिचाश निकट नहीं आवे, महावीर जब नाम सुनावे ऽ ऽ …
[सभी ‘हनुमान चालीसा’ का जोर-जोर से पाठ करते हुए रेंगते-दबे पांव सरकते हुए मंच के बाहर जाने लगते हैं।
उनके पीछे-पीछे सुखीराम हाथ में ड़ंडा लिय हुए आता है। ]
सुखीराम ः स्साले चले थे हमें उठाने, खुदे लम्लेट हो गये। (दर्षकों से) लेटे-लेटे हमको तो बड़े जोरों की … (छोटी ऊंगुली उठाकर इशारा करते हुए) वो लगी है। हल्का होके आते हैं फिर देखते हैं कि दरोगा जी मेरे मरने की रिपोर्ट जब एसडीएम साब को देते हैं तो क्या एक्शन लेते हैं ?
[कहकर तेज कदमों से पार्ष्व दरवाजे की तरफ भागता है, मानों धोती न गीली हो जाए। अंधेरा मंच अग्र के मध्य में एक स्पॉट आता है जिसके प्रकाश वृत में एसडीएम कुर्सी पर बैठा दिखता है। टकला है, सिर पर गिने-चुने 8-10 डाई किये हुए चंद लटे है जिसे सहेजकर एक तरफ इस तरह रखा गया है कि बालों की पूर्ण मौजूदगी का आभास दे सके। एसडीएम के सामने छोटी सी एक टेवल है जिस पर शराब की एक बोतल और ग्लास रखी हुई है। नशे में है, अपने से बड़बड़ायें जा रहा है। ]
एसडीएम ः रिपोर्ट देकर दरोगा ऐसे फिरंंट हुआ, जैसे गदहे के सिर से सींग। अपने तो कांस्टबल बेला के बगल में पड़ा घोडे बेचकर सो रहा होगा पर हमारी नीद की वाट लगा गया। पूरी बोतल खत्म होने को है पर नीद का कहीं अता-पता नहीं। दूध में नीबू की तरफ सुखिया ने फाड दिया है। जरा सी झपकी आती है कि सामने मुँह बाये खड़ा हो जाता है। इधर देखों तो सुखिया, उधर देखो तो सुखिया। आखें बन्द करो तो सुखिया, खोलो तो सुखिया, हर तरफ सुखिया ही सुखिया …। पहली बार देख रहा हूँ, आदमी मरने के बाद इतना खतरनाक हो जाता है। (ग्लास में शराब उडेलकर हलक में उतारते हुए) मंजु रानी का सहारा था, वो भी दगा दे गयी। चार बार कहलवा चुका हूँ लेकिन अब तक नही आयी। (नशा चढ़ने लगता है) कब आओगी रानी ? सब्र का पैमाना छलकने लगा है। (शेर) सागरे लव गुलाबी के खातिर, मेरे अरमां भी कम न थे। सिर्फ तू ने न परदा उठाया, मरने वालों में हम क्या न थे।(शेर पढ़ते पढ़ते अपनी शर्ट उतारने लगता है) मन तो करता है लात मार दू नौकरी को, लेकिन तुम तो जानती हो बिना पावर के अफसर की हालत खजैले कुत्ते से भी बदतर हो जाती है। (शर्ट उतार कर बनियान पर आ जाता है) सरकारी नौकरी का नशा ही कुछ और होता है, उसके सामने ये शराब क्या चीज है। सारा तहसील कमर के बल झुका रहता है। एक तुम ही हो जो धेले बराबर भी नहीं समझती हो। बात-बात पर अनुशासन का पाठ पढ़ाती हो, कभी तो अनुशासन का नाड़ा ढीला करो रानी। (अष्लील ढंग से हंसते हुए पैट खोलकर पाटले वाले अन्डरवियर पर आ जाता है। शेर पढते हुए) आज की रात बडी शोख बडी नटखट है, आज तो तेरे बिना नींद नहीं आयेगी। (सिसकी भरते हुए) ऐसी तिरछी चितवन से ना देखो रानी, तड़प और भी बढ़ जाती है। (शेर को बेढ़ंगे ढ़ंग से पढ़ते हुए) आओ बैठे मेरे पहलू में पनाह लो, मेरे जलते हुए ओठों को कुछ ठंडक दो।
[कुर्सी के पीछे धुआँ उठता है और उसके धुंध के बीच सुखी राम उभरता है। ]
(नशे से पलकें भारी होने लगती है) दूर क्यों हो, पास आ जाओ।
[सुखी राम एसडीएम की तरफ बढ़ने लगता है। ]
और पास …
[सुखी राम और करीब आ जाता है। ]
तुम्हें शर्म आती है तो लो, अपनी आँखे बन्द कर लेता हूँ …
[सुखी राम पास आकर खडा हो जाता है। ]
बड़ी देर से अरजी लगा रखी है एक किस दे दो…
[सुखी राम भागना चाहता है कि एसडीएम दबोच लेता है, बाहों में भर लेता है। अपना भद्दा काला होंठ निकाल कर चूमना चाहता है कि आंखें खुल जाती है। सुखिया का चेहरा देखकर एसडीएम चीख पडता है। कुर्सी से उठकर भागना चाहता है पर जैसे पांव पत्थर की तरह जड़वत हो गये है। अपनी जगह से हिल नही पाते हैं। लगता है पैर उठ ही नहीं पा रहे हो। कुर्सी पर दोनों पैर रख कर केवल चिल्लाता रहता है। ]
कौन है, कौन है ऽऽ…
[मंच अग्र के दांये तरफ से बीडीओ, डाक्टर, बैंक मैनेजर, मास्टरनी, प्रधान और कोटेदार भागते हुए आते हैं। ]
सब ः क्या हो गया सर ?
एसडीएम ः जो नहीं होना था, वो हो गया।
बीडीओ ः कोई बात नहीं, सपने में ये सब होते रहता है।
एसडीएम ः इसी बात का तो रोना है।
मास्टरनी ः कौन था सपने में ?
एसडीएम ः भू… भू … भू ऽऽ…
बैंक मैनेजर ः क्या कर दिया भूत ने ?
एसडीएम ः मैंने कुछ नही किया, मैंने कुछ नहीं किया…
डाक्टर ः आपकी तबीयत ठीक नहीं लग रही है।
एसडीएम ः अब कोई नहीं बचेगा… किसी न किसी पर गाज गिरेगी …
कोई न कोई बेमौत मारा जायेगा…
बीडीओ ः सुनामी आ रहा है क्या ?
एसडीएम ः एक बुरी खबर आयी है।
मास्टरनी ः भुतिया खबर तो नहीं ?
एसडीएम ः डीएम साहब आ रहे हैं…
सब ः कब आ रहे हैं ?
एसडीएम ः कल ।
बीडीओ ः पिछले हफ्ते ही तो दौरा करके गये हैं।
डाक्टर ः वार्ड की एक एक बेड उठा कर चेक कर गये हैं।
बैंक मैनेजर ः लोन की सारी फाइलें खंगाल गये हैं।
मास्टरनी ः खुद मिड डे मील टेस्ट कर गये हैं।
प्रधान ः ये कोई तरीका नहीं हुआ की जब मन किया मुंह उठाकर चल दिये।
कोटदार ः आखिर चरने का भी एक टाइम होता है।
बैंक मैनेजर ः और एक लिमिट भी।
एसडीएम ः तुम लोग जो समझ रहे हो वो बात नहीं है।
बीडीओ ः तो और क्या है ? कमीशन के अलावा उन्हें कुछ सूझता भी है ? इस बार सीएम फंड के नाम पर दो परसेंट और उगाह कर ले गये। कोई देखता है के ऊपर पहुंचाते भी हैं या अपनी जेब के हवाले कर देते हैं।
एसडीएम ः मेरी बात तो सुनो …
बीडीओ ः लगता है और चढ़ावा चढ़ाने का फरमान आया है।
प्रधान ः मेरे बस का अब और नहीं है।
कोटेदार ः घर फूंक तमाशा नहीं देखना है।
एसडीएम ः पूरी बात सुनते नहीं, बस अपना राग अलापे जा रहे हो।
कोटेदार ः अब क्या सुनना रह गया है ?
एसडीएम ः डीएम साहब तहसील के दौरे पर नहीं आ रहे हैं।
बीडीओ ः तो क्या विधायक जी के पोते की छठी में आ रहे है ?
एसडीएम ः वे भिखारी पुर आ रहे हैं।
मास्टरनी ः फिर इतना हाय-तौबा करने की क्या जरूरत है ?
एसडीएम ः सुखीराम उसी गांव का है।
प्रधान ः हमारी सेहत पर क्या फर्क पड़ता है ?
एसडीएम ः डीएम साहब उसी को देखने आ रहे हैं।
कोटेदार ः अहो भाग्य सुखीराम के!
एसडीएम ः और दुर्भाग्य हमारे कि सुखीराम भूख से मरा है।
मास्टरनी ः गरीबो के प्रति आप कुछ ज्यादा ही इमो’kuy हो जाते हैं।
डॉक्टर ः गरीब-गुरबा भूख से नही मरेंगे तो क्या हार्टफेल होने से मरेंगे ? गरीब को गरीब रोग ही लगते हैं, सुगर-बीपी जैसे राज रोग थोडे लगेंगे।
एसडीएम ः तुमलोग भूख से मौत की गंभीरता नहीं समझ रहे हो।
डीएम साहब बहुत सीरियस है। और उनके ऊपर वाले इतने की
मौत की जिम्मेदारी सीधे ग्रांम पंचायत पर डालने की सोच रहे हैं।
प्रधान ः पंचायत को गरीब की जोरू समझ रखा है ?
कोटेदार ः या गांव भर की भौजाई ?
प्रधान ः अच्छी तरह से जान लीजिए, योजनाएं हमारे घर में नहीं चल
रही है।
कोटेदार ः न अकेले हम खा रहे हैं मलाई।
प्रधान ः चपरासी से लेकर मंत्री तक कोई नहीं बचा है।
कोटेदार ः सब चाभ रहे हैं तो जवाबदेह भी सब लोग होंगेे।
प्रधान ः जो कह रहे हैं जिम्मेदारी पंचायत की होगी, उससे पूछता हूं | पंचायत क्या अपनी मरवा कर सालों को देगा?
कोटेदार ः मेरी गर्दन नापी जायेगी तो मैं चुप नहीं रहूंगा।
प्रधान ः मेरे मुंह में भी दही नहीं जमा हैं।
एसडीएम ः आपलोग अपना बीपी न बढाइए। राज काज जैसा चल रहा है वैसा ही चलेगा। अभी हम लोगों को ये सोचना है कि संकट की इस घड़ी से कैसे उबरा जाय।
बीडीओ ः मेरा तो सुझाव है कि इस सच को एक सिरे से ही नकार दिया जाय।
मास्टरनी ः लाइन को काटने – छांटने के बजाए कोई दूसरी बड़ी लाइन खींच दी जाए।
बैंक मैनेजर ः आप तो जानते ही है कागज पर घोड़े दौड़ाने में हम कितने . माहिर है।
एसडीएम ः मनरेगा में कितनी लीद टपकाये है, पता है।
बीडीओ ः इस बार एक बूंद भी नहीं टपकने देंगे, इसकी गारंटी देते हैं।
प्रधान ः इस सफाई से काम करेंगे कि सुखिया क्या सुखिया का बाप भी आकर कहेगा कि भूख से मरा तो कोई विश्वास नहीं करेगा।
कोटेदार ः बल्कि जूते निकालकर दस जूते मारेगा।
मास्टरनी ः और गिनेगा एक।
बीडीओ ः कहेगा शिकारपुर का समझ रखा है ?
एसडीएम ः लेकिन घोड़े दौड़ाओगे कब, जब डीएम साहब दाना चुग जायेंगे तब ?
प्रधान ः उसकी नौबत नहीं आयेगी ।
बीडीओ ः आज रात हम सारा दाना चुग जायेंगे।
मास्टरनी ः मैं भी चलूंगी ।
एसडीएम ः तुम वहां क्या करोगी ? मास्टरनी ः मैंने आज तक भूख से मरा आदमी नही देखा है।
बीडीओ ः (एसडीएम से) हमलोग जाने की तैयारी करते हैं।
[सब चले जाते हैं। ]
मास्टरनी ः मैं भी तैयार होकर आती हूँ।
एसडीएम ः तुम कहाँ जा रही हो, इधर तो आओ।
मास्टरनी ः मैं नहीं आती, आप बड़े वो है।
एसडीएम ः वो क्या ?
मास्टरनी ः आप मना क्याें कर रहे थे जाने से। जाइये आपसे बात नहीं करती।
एसडीएम ः इस तरह बेदर्द, जालिम न बनो मंजुरानी।
मास्टरनी ः सबों के सामने इस तरह डांटा न कीजिए कह देती हूँ।
एसडीएम ः अब और न तड़पाओ, मेरी बाहों में समा जाओ…
मास्टरनी ः जाकर सुखिया की बाहों में क्यों नही समा जाते, जिसका नाम लेकर
कल से मरे जा रहे हो।
एसडीएम ः बीबी बच्चों को राजधानी में सेटल कर इस तहसील में
अकेला तुम्हारे लिए ही तो पड़ा हूं। तुम्हीं तो हो जिसे
देखकर इस ढ़लती उमर में सारे बदन में सनसनाहट सी
होने लगती है। यों कहे बासी कढ़ी में उबाल आ जाता
है।
मास्टरनी ः तो सुखिया सौत से छौंक क्यों नहीं लगवा लेते ?
एसडीएम ः बार-बार सुखिया का नाम ले कर जले पर नमक न छिड़को, रानी। ससुरा ऐसा जोंक है कि मरने के बाद भी नही छोड़ रहा है। (मंच पर इधर-उधर घूमते हुए) छोडो ये मनहूस बातें, आओ जरा रोमांटिक हो जाए। देखो शमां कितना सुहाना है, कितनी हसी ये वादी है। आओं खो जाये इस फिजां में। भूल जाये सारे गम कि याद न रहे कोई सुखिया और न कोई दुखिया। यहीं जन्नत है, यहीं जुस्तजू है… जो है सो यही हैं…यही हैं …
[एसडीएम मास्टरनी को बांहों में लेकर संगीत की लय पर थिरकने लगता है। नाचते-नाचते मास्टरनी , इठलाती , शरमाती कमरे के अन्दर आने का इशारा करती हुुई विंग्स की तरफ चली जाती है।
एसडीएम अपनी धुन में नाचे जा रहा है।
धुआं का गुब्बार उठता है और उसमें से सुखी राम प्रकट होता है। सुखीराम को मास्टरनी समझकर एसडीएम उसके संग झूम-झूम कर नाचने लगता है कि अचानक सुखी राम पर नजर पड़ती है। एसडीएम चीखना चाहता है पर चीख नहीं निकल पा रही है। बांहों में पड़े एसडीएम को सुखी राम छोड़ देता है। एसडीएम जमीन पर गिर पड़ता है। गिरते ही जल्दी से उठता है और घुटनों के बल रेंगता हुआ तेजी से बाहर की तरफ भागता है।
संगीत रूका हुआ है। मंच पर अकेला सुखीराम है।
अचानक तेज संगीत बजने लगता है, सुखीराम उसकी धुन पर नाचने लगता है। उसी क्रम में अंधेरा …]

(मध्यांतर)

उत्तरार्द्ध

[रात का समय है। अर्थी पर स्पॉट है। मंच पार्श्व की तरफ से एसडीएम, बीडीओ, बैंक मैनेजर, डॉक्टर, मास्टरनी, प्रधान और कोटेदार बंद दरवाजे को हौले से ठेलकर घर के अंदर दाखिल होते हैं। सबों ने आंखों पर काला चश्मा लगा रखा है जो रात की नीली रोशनी में रहस्यमय लग रहा है।
आहट सुनकर सुखीराम कफन के अंदर से मुंह निकाल कर झांकने लगता है।
एसडीएम के हाथ में टार्च है। आगे-आगे चल रहा है ,बाकी पीछे-पीछे। ]
एसडीएम ः घर तो भायं-भायं कर रहा है।
बीडीओ ः सुखिया के बदले दुखिया के घर में तो नहीं घुस आये।
सुखीराम ः (अर्थी पर से उठते हुए) सही ठिकाने पर आये हैं, महाराज। इस टुटही झोपड़ियां में आपके चरण पड़ गये, हम तो धन्न-धन्न हो गये।
मास्टरनी ः घर वाले नहीं दिख रहे ?
सुखीराम ः दरोगा जी के डर से घर छोड़कर भाग गये। लेकिन एक बात समझ में नहीं आ रही कि आपके आने का रास्ता तो ऊपर से है… गली की तरफ से क्यों चले आ रहे हैं ? अच्छा, दरवाजे पर भैंंसा गाड़ी बांधने के लिए गली में उतर गये होंगे। या फिर ऐसा तो नहीं कि आपकी भी पुलिस से फटती है?
[सभी घर में फैलकर निरीक्षण करने लगते हैं। ]
डॉक्टर ः लाइन क्लियर है। सारा काम हम कर लेंगे और किसी को हवा तक न लगेगी।
सुखीराम ः ई टटेरी के लिए यमदूतों की इतनी बड़ी फौज लाने की क्या जरूरत थी ?
प्रधान ः गारंटी है, इस हुलिया में कोई माई का लाल हमें पहचान नहीं सकता।
सुखीराम ः कोई कह नहीं सकता कि आपलोग प्रान लेने वाले हैंं। बल्कि जिस तरह दबे पांव दाखिल हुए हैं, चोर-उचक्का- अटैची चोर समझेगा।
[मास्टरनी अंधेरे में इधर-उधर घूम रही है। ]
मास्टरनी ः मुझे तो बड़ा डर लग रहा है।
एसडीएम ः कहा था न, क्वार्टर में आराम करो। तुम तो समझ रही थी कि तुम्हारी सौतन से मिलने जा रहा है, पीछे-पीछे दौड़े चली आई।
कोटेदार ः (इधर-उधर देखकर) मुरदा नहीं दिख रहा ?
सुखीराम ः आंख है कि बटन! तेरे बाजू में ही तो पड़ा है।
कोटेदार ः (नजर पड़ते कोटेदार डर के मारे उछल पड़ता है) बाप रे!
[मास्टरनी से टकरा जाता है। मास्टरनी गिरने को होती है कि सुखीराम झट से बांहों में सम्भाल लेता है। ]
मास्टरनी ः हाऊ रोमांटिक ! कौन हो तुम ?
सुखीराम ः पहचान कौन ?
मास्टरनी ः नॉटी कहीं का! अंधेरे का फायदा उठाना चाहते हो ?
सुखीराम ः (कान में धीमे से फुसफुसाते हुए) मैं भूत हूं।
मास्टरनी ः तुम्हारी सब शैतानी समझती हूं।
सुखीराम ः भूत ऽ ऽ…
मास्टरनी ः डराते हो ?
सुखीराम ः मैं वास्तव में भूत हूं।
मास्टरनी ः यानी तुम वो नहीं हो ?
सुखीराम ः मरने के बाद आदमी जो बन जाता है वो हूं अ ऽ ऽ…
मास्टरनी ः भू… भू… भूत ऽ ऽ…
[मास्टरनी सुखीराम की बांहों से उछलकर मंच पर भागने लगती है। सुखीराम पीछे-पीछे दौड़ता है। ]
सुखीराम ः मैडम जी सुनिए तो… मैं उस तरह का भूत नहीं हूं, मैं भूख से मरे हुए आदमी का भूत हूं। गरीब भूत हूं जिससे कोई नहीं डरता। भूत तो होते हैं जमींदार-ठेकेदार-थानेदार के। जीते जी इतने डरावने होते हैं तो मरने के बाद क्या शक्ल हो जाती होगी। देख ले तो मूत निकल जाए। और कहीं मुंह फाड़ ले, आंख तरेर ले तो खड़े-खड़े लीद कर दे।
[एसडीएम मास्टरनी को पकड़ता है। ]
एसडीएम ः अंधेरे में दौड़ क्यों लगा रही हो ?
मास्टरनी ः मेरे पीछे भूत पड़ा है।
एसडीएम ः मैं तुझे भूत नजर आता हूं ?
[प्रधान एसडीएम के पास आता है। ]
प्रधान ः बोरी ढ़ोते-ढ़ोते हमारी तो कमर टूटी जा रही है। जल्दी बताइये कहां रखे ?
बीडीओ ः इतना सारा क्या-क्या ले आए ?
प्रधान ः गेहूं और चावल है।
सुखीराम ः अरे ये लेने नहीं, कुछ देने आये हैं!
कोटेदार ः रास्ते भर कुत्ते दौड़ाते रहे हैंं।
बैंक मैनेजर ः इसमें क्या है ?
कोटेदार ः दाल, चीनी, नमक, तेल…
सुखीराम ः नाहक इन पर शक किया !
एसडीएम ः बोरियों को ऐसी जगह रख दो कि कल जब डीएम साहब आयें तो मुरदे से पहले बोरी पर नजर पड़े।
कोटेदार ः दरवाजे पर टांग देते हैं।
एसडीएम ः दरवाजा छोटा है, डीएम साब के सर से टकरा जायेगा।
सुखीराम ः बात तो पते की कर रहा है।
प्रधान ः आंगन में रख दे ?
बीडीओ ः वहां तो सुखीराम की लाश रखी है।
बैंक मैनेजर ः लाश के ऊपर रख दो, दूर से ही डीएम साहब को नजर आ जायेगा।
बीडीओ ः मुझे यह आइडिया जम नहीं रहा है।
प्रधान ः मुझे तो इसमें कोई खामी नजर नहीं आ रही है।
एसडीएम ः मेरे ख्याल से कहीं और रखा जाए।
सुखीराम ः तुमलोगों की चिंता मैं हल किये देता हूं। (बोरी उठाकर बरामदे पर रख देता है।)
प्रधान ः (बोरी पर नजर पड़ते) बरामदे पर किसने रख दिया?
कोटेदार ः हटाओ वहां से ?
एसडीएम ः रख दिया तो रख दिया, अब हटाने की जरूरत नहीं है।
सुखीराम ः (मास्टरनी के हाथ से टिफन लेकर अर्थी पर बैठ जाता है) कितने दिनों के बाद खाना देख रहा हूं… (टिफन खोलकर खाने लगता है। खाते-खाते रोने लगता है) काश, ये खाना दो दिन पहले लाये होते।
मास्टरनी ः मेरा टिफन कहां है ? (इधर-उधर देखने लगती है। अर्थी पर नजर पड़ते) किसी ने डराने के लिए वहां रख दिया होगा। (सुखीराम के हाथ से टिफन छीनते हुए) मुझे इस तरह का मजाक जरा भी पसंद नहीं।
[कोटेदार एक कटोरे में आटा भरकर लाश के पास आता है। ]
कोटेदार ः जीते जी तो खा न सका, मरने के बाद भकोस ले। लेकिन खबरदार जो फिर कहा, मरा है भूख से…
[एक मुठ्ठी आटा सुखीराम के मुंह में ठूंस देता है। एक क्षण के लिए तो सुखीराम शांत रहता है, अचानक फूंक मारता है। आटा गुब्बार की तरह मंच पर फैल जाता है। ]
डॉक्टर ः ये आंधी कहां से आ गयी!
[बीडीओ भागते हुए एसडीएम के पास आता है। ]
बीडीओ ः सर, जरा टार्च दीजिएगा।
एसडीएम ः (देते हुए) क्या हुआ ?
बीडीओ ः (इधर-उधर टार्च मारते हुए) जमीन वाली कागज कहीं गिर गयी?
एसडीएम ः कौन सी जमीन ?
बीडीओ ः सुखीराम को भूमिहीन बनाकर बारह बिस्वा जमीन का पट्टा उसके नाम कर दिया था। चलते-चलते इंदिरा आवास भी आवंटित कर दिया था। (अर्थी के चारों तरफ ढूंढने लगता है।)
प्रधान ः उड़ कर अंदर तो नहीं चला गया।
[बीडीओ कफन के अंदर हाथ डालकर ढूंढ़ने लगता है। सुखीराम हड़बड़ा जाता है। ]
सुखीराम ः ये क्या कर रहे हो ? लाज-शर्म है कि नहीं ? या सब घोल कर पी गये ? एक इज्जत ही तो लेकर जा रहा हूं, उसकी भी मइयो करने पर तुले हो ? कुछ तो रहम करो। भगवान के लिए शरम करो। अरे कहां हाथ लगा रहे हो ? इज्जत के साथ मत खेलो भाई। गुदगुदी हो रही है।
बेशरम… हाथ हटा…
[गुदगुदी होने के कारण हंसने लगता है। हंसते-हंसते लोट-पोट हो जाता है। बुरा हाल हो जाता है। जमीन पर लोटने लगता है। ]
मास्टरनी ः (जोर से आवाज देते हुए) मिल गयी !
बीडीओ ः (भाग कर मास्टरनी के पास जाते हुए) कहां थी ?
मास्टरनी ः दीवाल के पास पड़ी थी।
बीडीओ ः याद आया… जब घर में घुसा था … इतना डर गया था कि पेशाब आ गयी। रोकना मुश्किल हो रहा था, बाहर जाना खतरे से खाली न था… इसलिए कोने में जाकर हल्कान हो लिया। उसी समय गिरी होगी।
मास्टरनी ः मरदाना लोगों की यही बुरी आदत है, जरा भी जगह का ख्याल नहीं करते।
एसडीएम ः आइंदा जगह का ख्याल गम्भीरता से रखें। (बैंक मैनेजर से) आपकी जेब से क्या झांक रहा है ?
बैंक मैनेजर ः (ऊपर वाली जेब से निकाल कर) ये सुखीराम का पासबुक है।
प्रधान ः उसका तो किसी बैंक में एकाउंट ही नहीं था।
बैंक मैनेजर ः खुलने में कितनी देर लगती है। लगे हाथ बीस हजार रूपया भी जमा कर दिया।
एसडीएम ः कहां से लाये इतने रूपये ?
बैंक मैनेजर ः घबड़ाइये नहीं, किसी को अपनी जेब से नहीं भरना है। नरेगा में मुसहरों के जॉब कार्ड पर अधिक दिन काम करना दिखाकर वो रूपये इस खाते में डाल दिया है।
एसडीएम ः किसान क्रेडिट कार्ड भी लाये हो ?
बैंक मैनेजर ः उसे कैसे भूल सकता हूं।
प्रधान ः साहब जी, आपलोगों जितना सम्पन्न आदमी तो नहीं हूं पर चावल-दाल के अलावा एक छोटी सी सौगात और लाया हूं।
एसडीएम ः पेश किया जाए।
प्रधान ः (प्रस्तुत करते हुए) सुखिया के नाम से एक बीपीएल कार्ड बनवा दिया है।
कोटेदार ः (झट से रजिस्टर पेश करते हुए) और राशन के रजिस्टर में दिखा दिया है कि सुखीराम हर महीने दस किलो गेहूं, दस किलो चावल, दो किलो दाल और पांच लीटर कैरोसिन तेल ले जाया करता था।
एसडीएम ः और कोई तो नहीं रह गया देने के लिए ?
मास्टरनी ः मैं उसके बच्चों के लिए मिड डे मील की स्पेशल खिचड़ी लायी हूं।
बीडीओ ः देख लिया है, छिपकली तो नहीं पड़ी है। (सब हंसने लगते हैं।)
डॉक्टर ः मैं सुखीराम का दिल बहलाने के लिए टी वी लाया हूं।
प्रधान ः बिजली कौन लायेगा ?
डॉक्टर ः साथ में एक मोबाइल भी। नरक से बातें किया करेगा।
एसडीएम ः एंड लास्ट बट नॉट लिस्ट। (जेब से एक बोतल निकाल कर) यह इंगलिश मेरी तरफ से…
[बोतल की ढक्कन खोलकर शराब अर्थी पर टपकाता है। सुखीराम मुंह निकाल कर चुल्लू से पीने लगता है। चुल्लू से मन नहीं भरता है तब एसडीएम के हाथ से बोतल लेकर खुद पीने लगता है। एक ही सांस में पूरी बोतल गले के नीचे उतार लेता है। फिर बोतल का ढक्कन बंद कर वापस एसडीएम के हाथ में थमा देता है। खेत की तरफ कुत्तों के जोर-जोर से भौंकने की आवाज होती है। ]
बीडीओ ः लगता है गांव वाले जग गये!
[पार्श्व अंधेरे में ढे़र सारे लोगों की धुंधली आकृतियां दिखाई देती है। ]
एसडीएम ः हम पकड़े जायेंगे।
[प्रधान दरवाजे के पास जाकर देखने लगता है। ]
प्रधान ः ये गांव के किसान हैं।
कोटेदार ः ये रात भर घर में रहते हैं और सुबह होते रिकवरी एजेंटों के डर से गांव छोड़कर जंगल में छिप जाते हैं।
डॉक्टर ः लगता है पूरा गांव चला जा रहा है …
कोटेदार ः गांव में कोई ऐसा आदमी नहीं है जो कर्जदार न हो।
बीडीओ ः हमलोगों को अब यहां से खिसक लेना चाहिए, नहीं तो बना-बनाया खेल बिगड़ जायेगा।
एसडीएम ः कुछ रह तो नहीं गया ?
बैंक मैनेजर ः एक कमी रह गयी है।
सब ः कौन सी !
बैंक मैनेजर ः मुरदे के ढ़ाचे को देखकर कोई भी कह देगा कि महीनों से खाना नसीब नहीं हुआ है।
डॉक्टर ः डॉन्ट वॉरी, इसका इलाज है मेरे पास।
बैंक मैंनेजर ः मुरदे को मोटा करने का!
डॉक्टर ः कहीं से एक कीप ढूंढ कर लाओ।
[कोटेदार अंदर से एक बड़ी कीप लेकर आता है। ]
डॉक्टर ः मुरदे के मुंह में ठूंस दो।
[सुखीराम के मुंह में कीप ठूंस देता है। ]
डॉक्टर ः चना लाये हो ?
कोटेदार ः बोरी में दस किलो चना है।
डॉक्टर ः भाग कर लाओ।
[कोटेदार पार्श्व से टीन का एक कनस्तर उठाकर लाता है। ]
डॉक्टर ः मुंह में उड़ेल दो।
[कोटेदार कीप में उड़ेलने लगता है। ]
कोटेदार ः भरने को तो नाम ही नहीं ले रहा है… स्साले का पेट है कि नाद!
डॉक्टर ः थोड़ी जगह छोड़ देना।
कोटेदार ः कनस्तर खाली हो गया।
डॉक्टर ः जल्दी से पानी लेकर आओ। (कोटेदार बाल्टी उठाकर लाता है) पिलाओ। (पानी उड़ेलने लगता है।)
कोटेदार ः पेट फूलने लगा है …
डॉक्टर ः बस्स…
कोटेदार ः थोड़ा सा रह गया है। (बचा-खुचा सारा पानी उड़ेल देता है) अब लग रहा है, भूख से नहीं… खाते-खाते मरा है।
डॉक्टर ः चलो, आ जाओ।
कोटेदार ः डॉक्टर साहब, पेट तो फूलता ही जा रहा है…
डॉक्टर ः हटो वहां से।
कोटेदार ः तंबू की तरह तनता जा रहा है…
डाक्टर ः दूर हटो ऽ ऽ …
कोटोदार ः फटा… फटा… फटा ऽ ऽ …
[सुखीराम के पेट में गैस बनने लगता है। पेट फूलता जा रहा है। अचानक जोरों की आवाज के साथ गैस निकलती है। आवाज इतने जोरों की है कि सब डर जाते हैंं। इधर-उधर भागने लगते हैं। मंच का चक्कर काटते हुए बाहर निकल जाते हैं। कुत्ते गलियों में भौंकते रहते हैं।
अंधेरा…
सरकारी वाहनों के सायरन की आवाज के साथ डीएम प्रवेश करता है। पीछे-पीछे एसडीएम, बीडीओ, बैंक मैनेजर, डॉक्टर, मास्टरनी, प्रधान और कोटेदार। बगल में फाइल-रजिस्टर दाबे। दरोगा और सिपाही कानून व्यवस्था बहाल करने में लगे हुए हैं। अर्दली डीएम के पीछे छतरी ताने चल रहा है।
अफसरों को देखकर घर के अंदर से औरते बच्चों सहित रोते-बिलखते हुए निकलती है। धारा 144 लागू होने तथा पुलिस की धड़-पकड़ से गांव का युवा तबका दूसरी जगह चले गये हैं। कुछेक बूढ़े-बीमार लोग रह गये हैं।
इमरती सुखीराम की लाश से चिपककर विलाप करती है। सुखीराम उठकर बैठ जाता है। डीएम सफारी सूट में है। आंखों पर काला चश्मा और हाथ में मोबाइल। रह-रहकर मोबाइल पर कॉल आते रहता है। ]
डीएम ः (पास जाकर) सुखीराम के निधन का हमें बहुत दुख है। (कॉल एटेंड करने के साथ-साथ) हम ईश्वर से दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं। (इमरती देवी सिसकती रहती है) जो होना था, हो गया। अब चुप हो जाओ।
[इमरती हाथ जोड़कर अरज करती है। ]
इमरती ः सरकार, अब आपका ही सहारा है। कोई नहीं रहा हमारा देखने वाला।
डीएम ः तुम्हारे पास कौन सा कार्ड है ?
इमरती ः (चुप)
सुखीराम ः कवनो कारड ना है सरकार।
डीएम ः एपीएल-बीपीएल कोई तो होगा ?
इमरती ः (कुछ समझ में नहीं आता है।)
सुखीराम ः हम झूठ थोड़े बोलेंगे।
डीएम ः कोई नहीं है ?
इमरती ः (केवल मुंह देखती रहती है।)
सुखीराम ः कोई नहीं है सरकार।
डीएम ः क्यों नहीं है ?
सुखीराम ः इ त बीडीओ साहब से पूछो।
इमरती ः हमार मरद तो कहत-कहत थक गया पर किसी ने बना के नहीं दिया। बनाया होता तो भूखों मरने की नौबत न आती। मरने की कोई उमर नहीं थी, कभी कोई बीमारी नहीं रही। सरकार, कर्जा उनको खाय गया। अब हम का करी? इ लरिकन के पेट कहां से भरिबै। (फूट-फूट कर रोने लगती है।)
डीएम ः (एसडीएम से) शर्मा जी, इस गांव में कितने कार्ड बांटे गये हैं ? (कॉल आ जाता है तो बात करने में लग जाता है।)
एसडीएम ः सर, इस तहसील में चार हजार कार्ड आवंटित किये गये हैं जिसमें सबसे ज्यादा भिखारीपुर गांव में बांटे गये हैं। तीन सौ एपीएल और दो सौ पच्चीस बीपीएल।
सुखीराम ः (डीएम को मोबाइल पर बातें करते देख दूसरे कान में ऊंची आवाज में बोलते हुए) एगो लाल कारड हमको भी बनवा दीजिए सरकार।
डीएम ः (चौंककर उछलते हुए) पीछे से कौन बोल रहा है ?
[गांव वालों की जमात से कोई बोलता है। ]
ग्रामीण 1 ः हुजूर, कारड के बंटवारे में बड़ी धांधली हुई है।
डीएम ः जो कहना है, सामने आकर कहो।
[एक बुजुर्ग निकल कर आता है। ]
ग्रामीण 1 ः जिनके यहां रसोई गैस, रंगीन टी वी और दोपहिया वाहन है… उनको भी गरीबी रेखा से नीचे कर दिया है।
सुखीराम ः (मोबाइल पर बात कर रहे डीएम के सामने आकर) पइसा से कारड बेचा गया है।
डीएम ः (झल्ला कर ग्रामीणों की तरफ मुड़कर) बहरा नहीं हूं।
ग्रामीण 2 ः खुल्लम-खुल्ला जात का खेल खेला गया है।
डीएम ः (एसडीएम से) शर्मा जी, आपलोग कुछ देखते-वेखते नहीं हैं ?
सुखीराम ः इन्हीं की शह पर तो हुआ है।
डीएम ः (ग्रामीणों से) किसी से कम्पलेन किया था ?
ग्रामीण 1 ः कई बार शिकायती प्रार्थना पत्र दिया।
ग्रामीण 2 ः कोई नहीं सुनता,कहां जाए हम ?
ग्रामीण 3 ः हमारी दरख्वास्त है हुजूर, दुबारा सर्वे किया जाए।
डीएम ः (एसडीएम की तरफ मुड़कर) शर्मा जी, आवंटन की फाइल दिखाइए।
एसडीएम ः (कान के पास मुंह ले जाकर) सर… विधायक जी की संस्तुति से ही कार्ड वितरित किये गये हैं। (सुखीराम भी कान लगाकर सुनने लगता है। एसडीएम फाइल खोलकर दिखाते हुए) जिन नामों को लेकर हल्ला कर रहे है, विधायक जी के खास आदमी है। (सुखीराम फाइल लेकर देखने लगता है।)
डीएम ः अगर कम्पलेन सीएम आॅफिस तक पहुंच गया तो विधायक जी हो या मंत्री जी… कोई नहीं बच पायेगा। इस मामले में सीएम साहब बहुत स्ट्रिक्ट हैं। वे कोई भी ऐसा लूप-होल छोड़ना नहीं चाहते जिससे केन्द्र सरकार उन पर चड्डी काट सके।
बीडीओ ः (सुखीराम के हाथ से फाइल लेकर डीएम के सामने पेश करते हुए) देखिए सर, सुखीराम के नाम पर कई सालों से बीपीएल कार्ड एलॉटेड है।
सुखीराम ः (फाइल छीनकर दूर फेंक देता है) कद्दू एलॉटेड है !
ग्रामीण 1 ः गांव का कोई भी आदमी इस पर विश्वास नहीं करेगा।
डीएम ः (झल्लाकर ग्रामीणों से) विल यू प्लीज शट अप! मुझे अपना काम करने दोगे या नहीं ? तुम्हें जो कहना था, कह दिया न! या और कुछ कहना है ? नहीं तो बाहर जाकर बैठो। (दरोगा ग्रामीण लोगों को ठेलकर बाहर ले जाता है । बीडीओ से) सोचो, जब गांव का एक भी आदमी यह मानने को तैयार नहीं कि सुखीराम के पास कोई कार्ड था तो राजधानी में बैठा सीएम यह कैसे मान लेगा कि इस प्रदेश में एक भी आदमी भूख से मरा है ?
एसडीएम ः हमारे पास अकाट्य प्रमाण है सर।
डीएम ः शो मी आॅल दिज पेपर।
एसडीएम ः (इमरती से) साहब को कार्ड दिखाओ।
सुखीराम ः कार्ड नहीं कटहल!
बीडीओ ः अंदर से लेकर आओ।
इमरती ः आपको हमारी बात पर विश्वास नहीं तो खुदे जाकर देख लीजिए। सारे बर्तन ढ़नढ़ना रहे हैं। तीन दिनों से चूल्हा नहीं जला है। धुआं नहीं उठा है घर से…
एसडीएम ः (बीडीओ से) प्रधान जी को लेकर अंदर जाइए।
[दोनों अंदर जाते हैं। ]
डीएम ः (एसडीएम से) बाहर चैनल वाला बैठा होगा, अंदर भेजो ।
[बीडीओ बक्से से कागज निकाल कर तेज कदमों से लौटता है। ]
बीडीओ ः (चिल्लाते हुए) मिल गया! बक्से में कपड़े के नीचे रखा हुआ था।
[सुखीराम भाग कर बक्से के अन्दर घुस जाता है। ]
सुखीराम ः (बक्से में से सर निकालकर) ये तो चमत्कार हो गया!
[चैनल वाले दौड़ते हुए आते हैं। ]
डीएम ः मीडिया को दिखाओ।
[बीडीओ कार्ड को हाथ में लेकर कैमरे के सामने करता है। ]
इमरती ः हम तो रोजे बक्सा खोलकर देखते थे, हमको तो आज तक नही दिखा।
सुखीराम ः अरी भागवान, ये जादू जानते हैं जादू!
कोटेदार ः (रजिस्टर खोलकर डीएम के सामने पेश करते हुए) देखिए सर, इस महीने का राशन सुखीराम ने दो दिन पहले ही उठाया था। यहां उसका अगूंठा भी लगा है।
सुखीराम ः गिलि गिलि गिलि गिलि फू ऽ ऽ …
इमरती ः जवन किरिया खाने को कहेंगे, खाने को तैयार हैं पर इ बात हम ना पतियायेंगे।
कोटेदार ः राशन का जो आटा इधर-उधर फैला हुआ है उसको देखकर तो काई अंधरा भी पतिया जायेगा। (झुककर जमीन पर से आटा उठाकर मीडिया को दिखाता है।)
सुखीराम ः (अरथी पर बैठकर) मान गये उस्ताद!
प्रधान ः (आंगन में घूमते हुए) इसको देखकर तो यही लगता है कि इस घर में बच्चे मिट्टी में नहीं, आटा में खेलते हैं। अरथी के अगल-बगल इतना आटा है मानो मुरदे को जल से नहीं, आटा से नहलाया गया है। (एक मुठ्ठी आटा सुखीराम के मुंह पर पोत देता है।)
सुखीराम ः (एक तमाचा प्रधान के गाल पर जड़ देता है ) लेकिन जादू से पेट नहीं भरता । ( प्रधान को कुछ समझ में नहीं आता है। भकुआया हुआ इधर-उधर देखता रहता है।)
कोटेदार ः (बरामदे पर से आवाज देते हुए) देखिए-देखिए, यहां अनाज की कितनी बोरियां पड़ी हैं… (मीडिया वाले दौड़कर उधर जाते हैं) … बोरी में गेहूं है … चावल है … और दाल भी है… (सबों को एक कोने की तरफ ले जाते हुए) इधर आइए, रसोई घर का नजारा देखिए…
सुखीराम ः (राशन का डिब्बा उठाकर, बजाते हुए) डब्बे खाली पड़े हैं…
कोटेदार ः (सुखीराम के हाथ से लेकर अंदर से मुठ्ठी भर चावल निकाल कर दिखाते हुए) भरे पड़े हैं।
प्रधान ः (बोतल उठाकर) बोतल में तेल…
सुखीराम ः (बोतल लेकर पलटता है) नहीं है… (लेकिन तेल गिरता है।)
कोटेदार ः कटोरे में दाल… चना… चबेना…
[सुखीराम को चक्कर आने लगता है। इमरती डीएम के पास जाकर गिड़गिड़ाने लगती है। ]
इमरती ः विश्वास कीजिए, हमको कुछ पता नहीं इ सब का हो रहा है?
[अन्दर से रिपोर्टर निकलकर आता है। उसके हाथ में कुछ कागजात हैं। ]
रिपोर्टर ः तब तो तुम्हें यह भी पता नहीं होगा कि सुखीराम का बैंक में कोई खाता भी है ?
सुखीराम ः आप कह रहे हैं तो जरूरे होगा।
[इमरती इंकार में सिर हिलाती है। ]
रिपोर्टर ः उसमें बीस हजार रूपये भी हैें ?
[इमरती दुबारा इंकार में सिर हिलाती है। ]
सुखीराम ः बड़ा उपकार किया!
बीडीओ ः चलो मान लेते हैं सुखीराम ने ये सब नहीं बताया… लेकिन ये तो बताया होगा कि तुम्हारे पास 20 बिस्वा जमीन है।
प्रधान ः ऊपर वाला देता है तो छप्पड़ फाड़ कर देता है।
सुखीराम ः और लेता है तो…
एसडीएम ः इंदिरा आवास का नाम सुना है ?
इमरती ः सोनिया गांधी की सास थी इन्निरा गांधी।
मास्टरनी ः सास-बहू के बारे में खूब पता रहता है।
बैंक मैनेजर ः सब सीरियल का असर है।
डीएम ः या तो यह एक नम्बर की चालाक औरत है या हम सब आले दर्जे के बेवकूफ जो इसकी बेसिर पैर की बातों पर भरोसा किये जा रहे हैं।
बीडीओ ः ऐसी औरतों को मैं बहुत अच्छी तरह से जानता हूं जो पैसे ऐंठने के लिए ऐसे स्वांग रचती है।
इमरती ः इ स्वांग ना है मालिक।
डीएम ः तो क्या है ? टसुएं बहा रही है कि बच्चों ने दो दिनों से खाना नहीं खाया है… (टिफन उठाकर) और बच्चे यहां मिड डे मील की खिचड़ी खींच रहे हैं… (जमीन पर पड़ी मोबाइल उठाकर) घर में दाना नहीं, अम्मा चली भुनाने ? मोबाइल मेन्टेन किया जा रहा है। (मिनरल वाटर बोतल को पैर से ठोकर मारते हुए) जो कहते हैं देश में गरीबी है, आकर देखें अपने माननीय गरीब दास को। (दारू की बोतल पर नजर पड़ती है) महाशय, इसका भी शौक फरमाते हैं। (इमरती के पास जाकर) जानती हो, सरकार की आंखों में धूल झोंकने का क्या मतलब होता है ?
एसडीएम ः एफ आई आर … जेल …
इमरती ः (हाथ जोड़कर) हमको जेहल मत भेजिए सरकार… (बच्चों को लेकर डीएम के पैरों पर लेट जाती है) हमें जीते जी न मारिए साहब। हमारे छोटे-छोटे बच्चे हैं। इन पर तरस खाइए।
डीएम ः (पास जाकर धीमे से) इसलिए कहता हूं, पति मर गया अब बेकार में तमाशा मत खड़ा कर। यहां आंसू बहाने वाले कम, राजनीति करने वाले ज्यादा होते हैं।
बीडीओ ः बहुत हो गया ये रोना-धोना।
प्रधान ः चुप हो जाओ।
सुखीराम ः अजीब हाल है, इनको रोने पर भी एतराज है।
प्रधान ः (रोना जारी देखकर) सुनाई नहीं देता ?
सुखीराम ः कोई बंदिश है ?
कोटेदार ः चुप होती है कि…
सुखीराम ः (झुंझला जाता है) नहीं तो क्या उखाड़ लोगे ?
एसडीएम ः कार्ड कैंसिल करके दूसरे के नाम कर दिया जायेगा।
[हठात् इमरती चुप हो जाती है। सुखीराम तिलमिलाकर एक कोने में बैठ जाता है। सर ठोंकने लगता है। ]
डीएम ः (मीडिया के सामने आकर) मीडिया के माध्यम से यह बतलाना चाहता हूं कि सुखीराम के परिजनों को आकस्मिक सहायता के रूप में जिला प्रशासन की तरफ से दस हजार रूपया नगद सहायता प्रदान किया जा रहा है…
[डीएम जेब से लिफाफा निकालकर इमरती के हाथ में थमा देता है। ]
अभी-अभी पता चला है कि सुखीराम भूमिधर किसान भी था, अतः किसान होने के नाते दुर्घटना बीमा से एक लाख रूपये का मुआवजा भी दिलाने की घोषणा करता हूं…
[एसडीएम, बीडीओ, बैंक मैनेजर, डॉक्टर, प्रधान, मास्टरनी और कोटेदार ताली बजाते हैं। दरोगा और सिपाही भी। मास्टरनी इमरती को ताली बजाने का इशारा करती है। इमरती इशारा समझ नहीं पाती है। मास्टरनी कान में फुसफुसाती है तो बजाने लगती है। सुखीराम दौड़कर आता है और इमरती का हाथ पकड़ लेता है। ]
(डॉक्टर की तरफ मुड़कर) इससे पहले कि गांव के लफंगे कोई नया बखेड़ा खड़ा कर दे, बॉडी को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाओ। दर्जन भर बच्चे पैदा कर लेते हैं, पालन-पोषण नहीं कर पाते हैं तो आत्महत्या करके सरकार को बदनाम करते हैं।(रिपोर्टर से) और शुक्ला जी, आपका क्या प्रोग्राम है ?
रिपोर्टर ः एकाध शॉट लेना रह गया है सर।
डीएम ः मिलते हुए जाइयेगा।
रिपोर्टर ः इट्स माय प्लेजर सर।
[सरकारी वाहन का सायरन जोर-जोर से बजने लगता है। डीएम दल-बल के साथ प्रस्थान कर जाता है। ]
रिपोर्टर ः (कैमरामैन से) सैंडी, फटाफट सुखिया के कुछ क्लोजअप शॉट ले ले।
कैमरामैन ः दुनिया भर के मीडिया वाले लक्मै फैशन शो कवर कर रहे हैं, हम यहां मुरदे की तस्वीर लेने में मरे जा रहे हैं। (गांव वालों से) चचा, जरा मुरदे के मुंह पर से कफन हटाना।
[ग्रामीण 1 सुखीराम के चेहरे पर से कपड़ा हटाता है। ]
(कैमरा जूम करते हुए) लोग मॉडलों के चिकने-चिकने टांग देखेंगे कि यह सड़ा-गला चेहरा।
रिपोर्टर ः हम तो टीआरपी के गुलाम है इसलिए तो किसानों की आत्महत्या पर राखी सावंत का चुंबन भारी पड़ता है।
[कैमरामैन सुखीराम का चेहरा शूट करना चाहता है कि सुखीराम उठकर बैठ जाता है। जल्दी-जल्दी जुल्फें संवारने लगता है। ]
सुखीराम ः तनिक चूल तो संवार लेने दो।
[कैमरा के सामने सुखीराम तरह-तरह की हस्यास्पद मुद्राएं बनाता है। ]
रिपोर्टर ः बच्चों के भी कुछ विजुवल्स ले लो।
[कैमरामैन बच्चों की तरफ बढ़ने लगता है। वे अपनी मां के साथ एक-दूसरे से सटे हुए बैठे हैं। कैमरामैन शूट करने लगता है कि रिपोर्टर टोक देता है। ]
यार, नंगे बदन में इनकी कंगाली कुछ ज्यादा नजर आ रही है…
कैमरामैन ः तभी तो मजा आयेगा।
रिपोर्टर ः प्रोवर्टी शूड नॉट वी ग्लोराफाईड।
कैमरामैन ः बच्चे लोग, कपड़े पहन के आओ।
बच्चे ः घर में कपड़े नहीं है।
[रिपोर्टर बैग में से अपनी टी शर्ट निकालकर उनकी तरफ फेंकता है। उन पर मेकडोनाल्ड व केएफसी के विज्ञापन प्रिंटेड है। टी शर्ट बड़े व बेमेल है, फिर भी बच्चे पहन लेते हैं। कैमरामैन शूट करते-करते रुक जाता है। ]
रिपोर्टर ः अब क्या हुआ ?
कैमरामैन ः बच्चे ऐसे बैठे हैं मानों उनके नहीं किसी दूसरे के बाप मरे हों।
रिपोर्टर ः व्हॉट डू यू वॉन्ट ?
कैमरामैन ः आई वॉन्ट सच ए रीयल एंड हटर्ली एक्शप्रैशन कि देखने वालों का कलेजा फटकर हाथों में आ जाए। चेहरे पर भूख, उदासी और निराशा के ऐसे गहरे भाव हो कि लगे ये नहीं, पूरा देश यतीम हो गया हो…
रिपोर्टर ः बेटे, भूख लगी है ?
बच्चे ः दो दिन से कुछ नहीं खाया है।
रिपोर्टर ः (बैग से ब्रान्डेड चॉकलेट का बड़ा पैकेट निकाल कर) चॉकलेट खाओगे ? लो खाओ और जरा मन लगाकर, रोकर दिखाओ।
[बच्चे चॉकलेट पर टूट पड़ते हैं। आपस में छीना-झपटी से लड़ने भी लगते हैं। जिसके हाथ जो आता है मुंह में ठूंस लेते हैं। ]
कैमरामैन ः (बच्चों से) चलो, अब शुरू हो जाओ।
[बच्चे यांत्रिक ढंग से रोना शुरू कर देते हैं।]
रिपोर्टर ः कैमरे की तरफ देखकर… जोर से…
[बच्चे जोर से रोने का अभिनय करने लगते हैं। वे रो कम, चीख ज्यादा रहे हैं।]
कैमरामैन ः रोने का भाव लाओ।
बच्चे ः अंकल, भाव क्या होता है ?
कैमरामैन ः ब्लडी एक्सप्रैशन! एक्सप्रैशन ऽ ऽ …
[बच्चे एक-दूसरे का मुंह देखने लगते हैं।]
रिपोर्टर ः फील करो… फील करो कि तुम्हारा एकलौता बाप मर गया है… भूख से तड़प-तड़प कर मर गया है।… आज तुम्हारा बाप मरा है… कल तुम्हारी मां मरेगी… उसके बाद एक-एक करके तुम्हारे सभी भाई… बहन…
[बच्चे रोने की पुरजोर नकल करते हैं। ]
कम आॅन!… कम आॅन!… सिर पटक-पटक कर रोओ… छाती पर मुक्के मार-मार कर… एक-दूसरे के गले लगकर… जार-जार…
[जैसा बताते हैं, बच्चे करते जाते हैं। ]
कैमरामैन ः (माथा पकड़ लेता है) शिट्ट !
रिपोर्टर ः व्हॉट हैपन्ड।
कैमरामैन ः बास्टर्ड, रो कम… हंस ज्यादा रहे हैं।
[रिपोर्टर बच्चों के करीब जाता है। घूरने लगता है। बच्चे चुप हो जाते हैं। अचानक रिपोर्टर एक बच्चे के गाल पर थप्पड़ जड़ देता है। बच्चा भोंकार मारकर रोने लगता है। डरकर दूसरे भी रोने लगते हैं। ]
रिपोर्टर ः टेक दिस शॉट… हरी अप… फास्ट… व्हॉट ए मारवल्स शॉट… एक्सलेंट… माइन्ड ब्लोइंग…
[बच्चों को रोता देखकर इमरती भी रो पड़ती है। अंकवार में भर लेती है। रिपोर्टर बच्चों के शरीर पर से जबरदस्ती टी शर्ट उतारकर वापस बैग में भर लेता है।
सिपाही लाश उठाकर चलने लगते हैं। सुखीराम कफन से मुंह निकालकर झांकता है। मौका पाते अर्थी पर से छलांग मारकर नीचे आ जाता है।
इमरती उसके बच्चे और जात-बिरादर के लोग अर्थी के पीछे-पीछे चलते हुए बाहर जाने लगते हैं। केवल सुखीराम का भूत रह जाता है। पार्श्व की तरफ जाने लगता है। पीपल पेड़ के नीचे रूकता है। लट पकड़ कर धीरे-धीरे ऊपर चढ़ने लगता है। पार्श्व से आलाप चलता है। अंधेरा होने लगता है…
पूर्ण अंधेरा…
खेत की तरफ हल्की-हल्की रोशनी… इमरती अपने बच्चों व गोतिया लोगों के साथ शहर से लौटती हुई दिखाई देती है। बच्चे साइकिल पर बैठे हैं, झुनिया पैदल है। पोस्टमार्टम होने के बाद सुखीराम का दाह संस्कार शहर में ही कर दिया है।
सीवान पर गांव के कुछ बुजुर्ग लोग मिल जाते हैं। वे हाल-समाचार लेते-लेते साथ हो लेते हैं।
इमरती घर में दाखिल होती है। पीछे-पीछे समाज के लोग भी। बुजुर्ग खाट पर बैठ जाते हैं। बाकी इधर-उधर। ]
ग्रामीण 1 ः सुखी भइया की लहाश गाँव लाती तो अंतिम बार देख तो
लेते।
इमरती ः हम तो लाना चाह रहे थे पर तुम्हारे भइया की लहास पर
हमारा बस थोड़े चल रहा था?
ग्रामीण 2 ः कोई मना कर रहा था क्या?
इमरती ः लहास जब पोस्टमार्टम होकर बाहर आयी, पता नहीं कहाँ से ढ़ेर सारे लोग आ गये। सफेद कुरता, टोपी पहने हुए। लहास को घेर कर जोर-जोर से नारे लगाने लगे।
ग्रामीण 3 ः कौन लोग थे वे?
इमरती ः कोई कह रहा था, विरोधी पार्टी के बहुत बड़े नेता हैं। उनके आदमी बिना हमसे कुछ पूछे लहास को उठाकर जुलूस बनाकर सड़क पर चलने लगे। हमने पूछा, हे भइया इनको कहाँ ले जा रहे हो तो कहने लगे कि हम सरकार का घेराव करने जा रहे हैं। यह एक सुखिया की भूख से मौत नहीं हैं, बल्कि लाखों किसानों के मौत का सवाल है।
ग्रामीण 2 ः फिर तुमने क्या कहा?
इमरती ः हमरी बात सुन कौन रहा था? हम तो उनके पीछे-पीछे चले जा रहे थे।
ग्रामीण 4 ः कहाँ ले गये जुलूस को?
इमरती ः शहर का इधर – उधर चक्कर काट कर विधान सभा के
सामने पहुँचे। एक अफसर आकर बोला, मुख्यमंत्री अभी
बाहर दौरे पर हैं। नेताजी ने कहा, जब तक मुख्यमंत्री आकर बात नहीं करेंगे, लहास उठने नही देगें। दो घंटे पता नहीं नेता और अफसरों के बीच क्या मान-मनौव्वल चलता रहा। अचानक पुलिस वाले आकर डंडा चलाने लगे। भगदड़ मच गयी। नेताजी कहाँ चले गये, पते नहीं चला। उनके आदमी भाग खड़े हुए। सड़क पर केवल हम रह गये थे। माय-पूत…और लहास। पुलिस वाले लहास को खींचकर सड़क किनारे कर दिया और कहा जल्दी ले जाओ।
ग्रामीण 1 ः तो लहास लेकर गाँव काहे नहीं आ गयी।
इमरती ः लहास की दुर्गत हो गयी थी भइया। जगह-जगह टाँका खुल गया था। और सबसे बड़ी बात तो ये थी कि हमरे पास फूटी कौड़ी भी ना थी कि गाड़ी भाड़ा कर के गाँव लाते।
ग्रामीण 2 ः फिर वहाँ कैसे लहास जलाया?
इमरती ः हम जलाने के बारे में सोच रहे थे कि एक बड़ी सी गाड़ी हमारे पास आकर रूकी। उसमें से कुछ औरतें उतरी। बड़े घर की लग रही थी। वे अपने साथ कुछ फोटो खींचनेवालों को भी लायी थी। आते ही वे लहास के सामने पोज बना-बनाकर फोओ खींचाने लगी। उसके बाद उनमें जो हेड थी, मेरे हाथ में एक लिफाफा थमाते हुए फोटो खिंचवायी। फिर अपनी गाड़ी में बैठकर चली गयी। मैंने लिफाफा खोलकर देखा, कुछ रूपये थे। फिर पहला काम किया, लहास को ठेले पर लाद कर भैंसाकुंड़ ले गयी और दाह संस्कार कर दिया…
[गली में मोटर साइकिल की आवाज सुनाई पड़ती है। आवाज सुनकर ग्रामीण और बुजुर्ग सशंकित हो उठते हैं। देखने के लिए दरवाजे की तरफ जाते हैं कि रिकवरी एजेंट अपने आदमियों के साथ घुस आता है। गांव वाले खिसकने लगते हैंं। ]
रिकवरी एजेंट ः (आवाज लगाते हुए) पकड़ो हरामजादे को! लोन के लिए साले हाथ जोड़ते हुए आते थे, जब देने का टाइम आया है तो पिछवाड़ा दिखा रहे हैं। हम देना जानते हैं तो हाथ डालकर पैसा निकालना भी जानते हैं। स्सालों को पकड़कर पूरे गांव में घुमाओ ताकि फिर मुंह दिखाने लायक न रह जाए…
[गांव वाले इधर-उधर भागने लगते हैं। ]
गुर्गा 1 ः रुक हराम के जनों ऽ ऽ …
गुर्गा 2 ः रुकता है कि नहीं ऽ ऽ …
[गुर्गे दौड़कर कुछ को पकड़ लेते हैं, लेकिन गांव वाले किसी तरह अपने को छुड़ाते हुए गली की तरफ भाग जाते हैं। ]
रिकवरी एजेंट ः भागकर गीदड़ जायेगा किधर ? (इमरती की तरफ बढ़ते हुए) चल निकाल रूपये, तुझसे ही बोहनी करते हैं। सुना है आजकल खूब माल काट रही है मुआवजे के पैसे से? नसीब अच्छा है तेरा जो सुखिया भूख से मर गया। तेरे नाम लॉटरी निकाल गया।
इमरती ः घर में घुसे नहीं कि कटोरा लियेे चले आये।
रिकवरी एजेंट ः भिखारी बोलती है।
इमरती ः बाद में आना तब देखेंगे।
रिकवरी एजेंट ः तेरे बाप के नौकर नहीं हैं जो तेरे हुकुम पे आये-जाये। अपना पैसा तो हम अभी लेकर जायेंगे, समझी ?
इमरती ः अभी हमारे पास अधल्ली भी नहीं है।
रिकवरी एजेंट ः अकेले गड़प जाना चाहती हैं?
गुर्गे ः कहां छिपा कर रखी है ?
इमरती ः जैसे बीडीओ ने बक्से के अंदर से… घड़े-डब्बे-बाल्टी- बर्तन से… खोज-खोज कर खाने के सामान निकाले थे, तुम भी निकाल लो मुआवजे वाले रूपइये…
रिकवरी एजेंट ः (लपक कर बाल पकड़ लेता है) गोली देती है। सीधे तरह से पैसा निकाल वरना तुम्हें पता नहीं हम कितनी कुत्ती चीज हैं ?
[इमरती दर्द से बिलखने लगती है। उसका लड़का दौड़ते हुए आता है और रिकवरी एजेंट के पैर में दांत काटने लगता है। एजेंट धक्का दे देता है। लड़का गिर पड़ता है। यह देखकर बारह साल की झुनिया भाग कर आती है और एजेंट को ताबड़तोड़ मुक्के मारने लगती है। ]
गुर्गा 1 ः बड़ी बीख है स्साली!
रिकवरी एजेंट ः (गुर्गे से) ले चलो इस चिरइया को। इसी से वसूल लेंगे मूल और सूद दोनों।
[गुर्गा 2 झुनिया को टांग लेता है। ]
झुनिया ः छोड़ हरामजादे!
[झुनिया गिरफ्त से छूटने के लिए हाथ-पैर चलाती है। ]
रिकवरी एजेंट ः कोई नहीं आयेगा बचाने। और कौन मुंह से आयेगा? है कोई जो करजा न खाया हो। (इमरती से) पैसे का इंतजाम हो जाए तो आकर ले जाना। तब तक हम झुनिया का झुनझुना बजाते रहेंगे।
[इमरती और उसके बच्चे गुर्गे की तरफ दौड़ते हैं। गुर्गे से भिड़ जाते हैं। एजेंट उनको मारने लगता है। इमरती चीखने-चिल्लाने लगती है।
चीत्कार सुनकर पीपल पेड़ से सुखीराम नीचे उतरता है और गुर्गों की तरफ भागता है। भिड़ जाता है पर यह क्या, वह तो हवा की तरह दूसरी तरफ निकल जाता है। मुड़कर वापस लौटता है पर जैसे उस पर कोई असर ही न पड़ रहा हो। मानो शक्ति विलुप्त हो गयी हो। सुखीराम रिकवरी एजेंट के हाथ को पकड़कर अपनी तरफ जोर लगाकर खींचने लगता है पर खींच नहीं पा रहा है। स्वयं खींचा चला जा रहा है। झल्लाकर सुखीराम सबों पर लात चलाने लगता है, उल्टे वह ही लुढ़क जाता है।
सुखीराम विवश हो जाता है तब आक्रोश में जोर-जोर से चीखने लगता है। दौड़कर दरांती उठाकर लाता है। मारने के लिए दौड़ता है तभी दरवाजे के पीछे से भयानक मुद्रा बनाते हुए यमराज ढोल-ताशे की तेज थाप पर प्रकट होता है। उसके पीछे कंधे पर बड़ी सी सफेद बोरी लादे तीन यमदूत। बोरी पर किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के खाद्य उत्पादक का लेबल प्रिंटेड है। यमराज सफेद रंग का बड़ा सा लबादा पहने हए हैं, सर पर गांधी टोपी। हाथ में सुनहला लौह दंड, मुंह नीले रंग से पुता है। यमदूत इसके विपरीत काले लबादों में, मुंह सफेद रंग से पुते।
सुखीराम ज्यों दरांती से मारने को होता है, यमदूत पीछे से आकर पकड़ लेते हैंं। सुखीराम की आंखों के सामने रिकवरी एजेंट और उसके गुर्गे झुनिया को उठा कर ले जाते हैं। इमरती मूर्छित हो जाती है। ]
यमराज ः आने में जरा सी देर क्या हो गयी, भूतगिरी दिखाने लगे ?
सुखीराम ः कौन हो तुम ?
यमराज ः मूर्ख, दिख नहीं रहा यह भयानक रूप! (तांडव करने लगता है।)
सुखीराम ः नचनिया हो का ?
यमराज ः (चिंघाड़ कर) मैं यमराज हूं।
सुखीराम ः गोली किसी और को देना, यमराज कुरता -टोपी पहनता है?
यमराज ः यहां आने के पहले एक नेता का प्राण लेने आया था लेकिन वह इतना नंबरी निकला कि ड्राइंग रूम में हमें बिठाकर अंतिम बार कुर्सी का दर्शन करने गया तो दो दिन तक आने का नाम नहीं लिया। यमदूत ढूंढते रहे, कमबख्त का कहीं पता न चला। उसकी टोपी छूट गयी थी। मुझे लगा, इसमें कोई रहस्य है। मृत्युलोक का यह मुकुट धारण कर लिया। (टोपी ठीक करते हुए) काला कपड़ा पहनते-पहनते बोर हो गया था, सोचा अब कुछ खादी हो जाए। खादी भी कमाल की चीज हे, हर काला काम इसमें सफेद हो जाता है।
सुखीराम ः मैं झुनिया को छुड़ाकर आता हूं फिर आपके साथ चलता हूं।
यमराज ः तुम भी उस नेतवा की तरह गोली देने के चक्कर में हो? नहीं, तुम कहीं नहीं जा सकते। यहां के सारे दरवाजे तुम्हारे लिए बंद हो चुके हैं। (यमदूतों से) मुंह क्या देख रहे हो, पकड़कर बोरे में बंद करो। (खाट पर बैठते हुए) हफ्ते भर से प्राणों के कलेक्शन पर निकले हुए हैं। थक कर शरीर चूर-चूर हो गया है। किसानों को तो जैसे मरने के अलावा कोई काम ही नहीं है। खाला का घर समझ रखा है, जब जी किया मुंह उठा के चल दिए। पता नहीं किसानों को आत्महत्या करने में क्या मजा आता है? कायर, डरपोक कहीं का! सरकार इतना कुछ तो कर रही है उनके लिए…उचित सर्मथन मूल्य…पुराने बकाये का सीधे भुगतान…खाद-बीज की सब्सिडी…कर्जो की माफी…बर्बाद हुई फसलों का मुआवजा…फिर क्यों? क्या खाकर ये सरकार को गरियाने पर तुले हैंं? अब तक डेढ़ लाख किसान आत्महत्या कर चुके हेैं। एक प्राण का कलेक्शन करके लौटो तो दूसरा मरने के लिए तैयार बैठा मिलता है। दुष्ट, हर आठ मिनट पर आत्महत्या कर रहे हैं…
यमदूत 1 ः आत्महत्या करने वाले प्राण एक नम्बर के शैतान होते हैं।
यमदूत 2 ः एक को पकड़ो तो दूसरा उछलकर बाहर आ जाता है।
यमदूत 3 ः कोई ग्रामीण बैंक की तरफ भागता है…
यमदूत 2 ः तो कोई विश्व बैंक के चक्कर लगाने लगता है…
यमदूत 1 ः बड़ी मशक्कत के बाद बोरे में बंद हुए हैं।
यमदूत 2 ः हरामी, वहां भी चैन से नहीं बैठते।
यमदूत 3 ः अंदर से फसल के दाम बढ़ाने के लिए चिकोटी काटते हैं…
यमदूत 1 ः तो खाद का दाम कम करने के लिए अंगुल करते हैं…
यमदूत 1,2,3 ः लात मारते हैं मक्कार!
यमराज ः (सुखीराम से) सुना है, बहुत बड़ा हीरो बन गये हो? भूख से मरने का डरामा करके एसेम्बली तक में हंगामा काट रखा है। सरकार के नाक में दम कर रखा है।
सुखीराम ः इ डरामा ना है महाराज , हम सचमुच भूख से मरे हैं ।
यमराज ः पहले बाढ़ में किसान मरते थे, सुखाड़ में मरते थे। प्लेग-टीबी-हैजा से करते थे। भूख से मरने की बात पहली बार सुन रहा हूँ। तुम्हारे बाप-दादा भी तो किसान थे, वे क्या भूख से मरे थे ?
यमदूत 1 ः अपोजिशन वाले कह रहे हैं, कर्ज के बोझ से दब कर मरा है।
यमराज ः उन गदहों से पूछो, किसानों ने कब कर्जा नहीं लिया ?
यमदूत 2 ः हां महाराज, पहले जब बैंक नहीं खुले थे तब भी सेठ-साहूकार से कर्ज लेते थे।
यमराज ः आज तक किसी किसान को कर्ज से मरते सुना है ? और आज कौन कर्ज नहीं लेता है? उद्योगपति, पूंजीपति सब कर्ज में डूबे होते हैं लेकिन तुमलोगों की तरह कोई आत्महत्या नहीं करता है?
सुखीराम ः कोई शौक से नहीं करता आत्महत्या, कोई न कोई मजबूरी होती है।
यमराज ः और रास्ते भी तो होते हैं?
सुखीराम ः आदमी जब हार जाता है तो कोई रास्ता नहीं रहता है।
यमराज ः कितना कर्जा था ?
सुखीराम ः बारह हजार।
यमराज ः बस्स.. बारह हजार !
सुखीराम ः करजा तो बारह हजार ही था पर सूदे इतना हो गया कि पूछिए मत।
यमराज ः कर्जा लेने की नौबत ही क्यों आयी ?
सुखीराम ः दुख-तकलीफ तो किसान के साथ लगा ही रहता है।
यमराज ः बेटी के ब्याह के लिए लिया था ?
सुखीराम ः नहीं महाराज, खेती के लिए।
यमराज ः नोट बोता था क्या ?
सुखीराम ः आज पहले की तरह खेती नहीं है महाराज। खेत की जुताई ट्रैक्टर से होती है।
यमराज ः बैल क्या दुल्लती मारता है ?
सुखीराम ः वह तो और भी खर्चीला है। साल भर चारा कहां से लायेंगे?
यमराज ः तो जुताई पहले से सस्ती हुई न!
सुखीराम ः जुताई के अलावा और भी तो खर्चे हैं महाराज। मंहगाई इतनी बढ़ गयी है कि कीमत आसमान छू रही है।
यमराज ः मंहगाई की मार तो सब पर पड़ रही है, सिर्फ किसान ही क्यों मर रहे हैं ? क्यों आत्महत्या कर रहे हैं ?
यमदूत 1 ः किसान सब कोढिया हो गये हैंं
यमदूत 2 ः काम-धंधा कुछ करते नहीं, कर्जा खाकर मुटियाये रहते हैं।
यमराज ः (सुखीराम से) मेरे पास तुम्हारा पोस्टमार्टम रिपोर्ट है, इसमें डॉक्टर ने साफ लिखा है… सुखीराम बीमारी से मरा है।
सुखीराम ः कौन सी बीमारी महाराज ?
यमराज ः बीमारियों की कमी थोड़े है यहां।
सुखीराम ः उसका कोई नाम भी तो होगा ?
यमराज ः (धीमे से) हाइड्रोसील का नाम सुना है ?
सुखीराम ः आप भी खूब ठिठोली करते हैं।
यमराज ः पसंद नहीं तो दूसरी चुन लो। खूनी बवासीर कैसा रहेगा… नहीं तो भगंदर तो जरूर ही पसंद आयेगा।
सुखीराम ः ये जानलेवा बीमारी नहीं है महाराज।
यमराज ः मुझे न पढ़ा, भूख के अलावा सब बीमारी जानलेवा है। ये पृथ्वीलोक की रिपोर्ट है। मैं तो सोच रहा हूं यमलोक की रिपोर्ट में तुम पर कुछ और मेहरबानियां कर दूूं। पेट के अंदर दो किलो बासमती चावल दिखा दूूं।
यमदूत 1 ः आप बड़े कृपालु है महाराज।
यमराज ः (टोपी ठीक करते हुए) अगर कृपा की मात्रा कुछ कम लग रही हो तो उसमें कुछ काजू, किशमिश के दाने भी डाल सकता हूं।
यमदूत 2 ः महाराज, उसमें बादाम और चिलगोजे भी डाल दीजिए।
यमराज ः चावल का प्लाव बनाओ या बिरयानी… पर लोगों में यह संदेश जरूर जाना चाहिए कि सुखीराम की मौत भूख से नहीं, अधिक खाने से हुई है। उसके पिछले जन्म के किसी पाप के कारण हुई है…
[इमरती को होश आ जाता है। वह बच्चों का हाथ पकड़कर घर से निकल पड़ती है। पीपल पेड़ के नीचे आकर रूकती है। जो लटें झूल रही है, उसके फंदे बनाती है। दो फंदे बच्चों के और एक अपने गले में डाल लेती हैं। सुखीराम की नजर पड़ती है तो खेत की तरफ भागता है। यमदूत पकड़ने के लिए उसके पीछे दौड़ते हैं। ]
यमदूत 1 ः कहां जा रहे हो ?
यमदूत 2 ः हमारे साथ ऊपर चलो।
यमराज ः ऊपर तुम्हारा इंतजार हो रहा है।
सुखीराम ः मुझे नहीं जाना।
यमराज ः कब तक यहां भटकते रहोगे ?
सुखीराम ः जब तक भूख से मुक्त नहीं हो जाता।
[यमदूत सुखीराम को पकड़ लेते हैं।
इमरती लकड़ी के कटे टुकड़े पर खड़ी हो जाती हे। चेहरे पर प्रतिरोध का भाव है। अपने बच्चों के साथ फंदे से लटक जाती है…
सुखीराम धक्का देकर उनकी गिरफ्त से छूट जाता है। भागकर पीपल के पेड़ के नीचे आता है। बचाने की कोशिश करने लगता है । कभी
एक के पैर अपने कंधे पर रखता है, कभी दूसरे के। चीख-चीखकर गांव वालों को मदद के लिए गुहार करता है पर कोई नहीं आता है। भागकर यमराज के पास मदद के लिए जाता है। यमराज मुंह घुमा लेता है। सुखीराम बदहवास इधर-उधर भागता रहता है। यमदूत पकड़ने के लिए रस्सी से बांधने की कोशिश करते है पर सफल नहीं हो पाते है। उसके आक्रामक मूड को देखकर पीछे हट जाते हैं। सुखीराम पीपल पेड़ के नीचे आता है। उनके पैर अपने कंधों पर रखकर बेबश चीत्कार करता है। धीरे-धीरे घुटनों के बल आने लगता है। लाशें पेड़ से झूलने लगती हैं। सुखीराम टूटे कदमों से घर में आता है। आंगन में रखे मिट्टी के घड़े तोड़ने लगता है। जमीन पर सर रखकर फूट-फूटकर रोते रहता है…
कम होती मृदंग की थाप तेज होने लगती है। देखते ही देखते मंच पर आत्महत्या किये हुए ढेर सारे किसान फंदों पर झूलते नजर आते हैं।
यमराज अपने दूतों के साथ लटक रहे फंदों के बीच दौड़ता-हांफता आता है। चेहरे पर हवाइयां उड़ रही है। ]
यमराज ः ऐसा हो नहीं सकता… ऐसा तो कभी हो ही नहीं सकता!…
आत्महत्या से मरे हुए किसानों के प्राण जो बोरों में बंद थे… हरामजादे लात मार कर बाहर हो गए… न जाने कहां गायब हो गए…
[यमराज की दुर्दशा देखकर फंदे पर लटक रहे किसान खिलखिला कर हंस पड़ते हैं। यमराज रोते-बिलखते अपने यमदूतों के साथ ढूंढ़ने का अभिनय करते हुए मंच के बाहर प्रस्थान हो जाता है।
आत्महत्या किये हुए किसान फंदों से धीरे-धीरे नीचे उतरते हैं। भाव ऐसा है मानों आत्महत्या के विरूद्ध खड़े हो। सुखिया सबसे आगे है। सब गाते हैं। ]
(गाना)
हम न मरैं मरिहैं संसारा
हम कूं मिल्या, लड़ावन हारा।
भूख अग्नि मा सब जग जरिहै,
फैल जाई यह, कुछ न बचिहै।
भूख मरिहै तो हमहूं मरिहै,
भूख न मरै, हम काहे कूं मरिहै।
हम न मरबै, अब हम न तरबै,
करके सारे जतन, भूख से लड़बै।
जब दुनिया से भूख मिटावा
जब मरिबे के हम सुख पावा।
हम न मरैं…
(अंधेरा)

उत्तरार्द्ध

[रात का समय है। अर्थी पर स्पॉट है। मंच पार्श्व की तरफ से एसडीएम, बीडीओ, बैंक मैनेजर, डॉक्टर, मास्टरनी, प्रधान और कोटेदार बंद दरवाजे को हौले से ठेलकर घर के अंदर दाखिल होते हैं। सबों ने आंखों पर काला चश्मा लगा रखा है जो रात की नीली रोशनी में रहस्यमय लग रहा है।
आहट सुनकर सुखीराम कफन के अंदर से मुंह निकाल कर झांकने लगता है।
एसडीएम के हाथ में टार्च है। आगे-आगे चल रहा है ,बाकी पीछे-पीछे। ]
एसडीएम ः घर तो भायं-भायं कर रहा है।
बीडीओ ः सुखिया के बदले दुखिया के घर में तो नहीं घुस आये।
सुखीराम ः (अर्थी पर से उठते हुए) सही ठिकाने पर आये हैं, महाराज। इस टुटही झोपड़ियां में आपके चरण पड़ गये, हम तो धन्न-धन्न हो गये।
मास्टरनी ः घर वाले नहीं दिख रहे ?
सुखीराम ः दरोगा जी के डर से घर छोड़कर भाग गये। लेकिन एक बात समझ में नहीं आ रही कि आपके आने का रास्ता तो ऊपर से है… गली की तरफ से क्यों चले आ रहे हैं ? अच्छा, दरवाजे पर भैंंसा गाड़ी बांधने के लिए गली में उतर गये होंगे। या फिर ऐसा तो नहीं कि आपकी भी पुलिस से फटती है?
[सभी घर में फैलकर निरीक्षण करने लगते हैं। ]
डॉक्टर ः लाइन क्लियर है। सारा काम हम कर लेंगे और किसी को हवा तक न लगेगी।
सुखीराम ः ई टटेरी के लिए यमदूतों की इतनी बड़ी फौज लाने की क्या जरूरत थी ?
प्रधान ः गारंटी है, इस हुलिया में कोई माई का लाल हमें पहचान नहीं सकता।
सुखीराम ः कोई कह नहीं सकता कि आपलोग प्रान लेने वाले हैंं। बल्कि जिस तरह दबे पांव दाखिल हुए हैं, चोर-उचक्का- अटैची चोर समझेगा।
[मास्टरनी अंधेरे में इधर-उधर घूम रही है। ]
मास्टरनी ः मुझे तो बड़ा डर लग रहा है।
एसडीएम ः कहा था न, क्वार्टर में आराम करो। तुम तो समझ रही थी कि तुम्हारी सौतन से मिलने जा रहा है, पीछे-पीछे दौड़े चली आई।
कोटेदार ः (इधर-उधर देखकर) मुरदा नहीं दिख रहा ?
सुखीराम ः आंख है कि बटन! तेरे बाजू में ही तो पड़ा है।
कोटेदार ः (नजर पड़ते कोटेदार डर के मारे उछल पड़ता है) बाप रे!
[मास्टरनी से टकरा जाता है। मास्टरनी गिरने को होती है कि सुखीराम झट से बांहों में सम्भाल लेता है। ]
मास्टरनी ः हाऊ रोमांटिक ! कौन हो तुम ?
सुखीराम ः पहचान कौन ?
मास्टरनी ः नॉटी कहीं का! अंधेरे का फायदा उठाना चाहते हो ?
सुखीराम ः (कान में धीमे से फुसफुसाते हुए) मैं भूत हूं।
मास्टरनी ः तुम्हारी सब शैतानी समझती हूं।
सुखीराम ः भूत ऽ ऽ…
मास्टरनी ः डराते हो ?
सुखीराम ः मैं वास्तव में भूत हूं।
मास्टरनी ः यानी तुम वो नहीं हो ?
सुखीराम ः मरने के बाद आदमी जो बन जाता है वो हूं अ ऽ ऽ…
मास्टरनी ः भू… भू… भूत ऽ ऽ…
[मास्टरनी सुखीराम की बांहों से उछलकर मंच पर भागने लगती है। सुखीराम पीछे-पीछे दौड़ता है। ]
सुखीराम ः मैडम जी सुनिए तो… मैं उस तरह का भूत नहीं हूं, मैं भूख से मरे हुए आदमी का भूत हूं। गरीब भूत हूं जिससे कोई नहीं डरता। भूत तो होते हैं जमींदार-ठेकेदार-थानेदार के। जीते जी इतने डरावने होते हैं तो मरने के बाद क्या शक्ल हो जाती होगी। देख ले तो मूत निकल जाए। और कहीं मुंह फाड़ ले, आंख तरेर ले तो खड़े-खड़े लीद कर दे।
[एसडीएम मास्टरनी को पकड़ता है। ]
एसडीएम ः अंधेरे में दौड़ क्यों लगा रही हो ?
मास्टरनी ः मेरे पीछे भूत पड़ा है।
एसडीएम ः मैं तुझे भूत नजर आता हूं ?
[प्रधान एसडीएम के पास आता है। ]
प्रधान ः बोरी ढ़ोते-ढ़ोते हमारी तो कमर टूटी जा रही है। जल्दी बताइये कहां रखे ?
बीडीओ ः इतना सारा क्या-क्या ले आए ?
प्रधान ः गेहूं और चावल है।
सुखीराम ः अरे ये लेने नहीं, कुछ देने आये हैं!
कोटेदार ः रास्ते भर कुत्ते दौड़ाते रहे हैंं।
बैंक मैनेजर ः इसमें क्या है ?
कोटेदार ः दाल, चीनी, नमक, तेल…
सुखीराम ः नाहक इन पर शक किया !
एसडीएम ः बोरियों को ऐसी जगह रख दो कि कल जब डीएम साहब आयें तो मुरदे से पहले बोरी पर नजर पड़े।
कोटेदार ः दरवाजे पर टांग देते हैं।
एसडीएम ः दरवाजा छोटा है, डीएम साब के सर से टकरा जायेगा।
सुखीराम ः बात तो पते की कर रहा है।
प्रधान ः आंगन में रख दे ?
बीडीओ ः वहां तो सुखीराम की लाश रखी है।
बैंक मैनेजर ः लाश के ऊपर रख दो, दूर से ही डीएम साहब को नजर आ जायेगा।
बीडीओ ः मुझे यह आइडिया जम नहीं रहा है।
प्रधान ः मुझे तो इसमें कोई खामी नजर नहीं आ रही है।
एसडीएम ः मेरे ख्याल से कहीं और रखा जाए।
सुखीराम ः तुमलोगों की चिंता मैं हल किये देता हूं। (बोरी उठाकर बरामदे पर रख देता है।)
प्रधान ः (बोरी पर नजर पड़ते) बरामदे पर किसने रख दिया?
कोटेदार ः हटाओ वहां से ?
एसडीएम ः रख दिया तो रख दिया, अब हटाने की जरूरत नहीं है।
सुखीराम ः (मास्टरनी के हाथ से टिफन लेकर अर्थी पर बैठ जाता है) कितने दिनों के बाद खाना देख रहा हूं… (टिफन खोलकर खाने लगता है। खाते-खाते रोने लगता है) काश, ये खाना दो दिन पहले लाये होते।
मास्टरनी ः मेरा टिफन कहां है ? (इधर-उधर देखने लगती है। अर्थी पर नजर पड़ते) किसी ने डराने के लिए वहां रख दिया होगा। (सुखीराम के हाथ से टिफन छीनते हुए) मुझे इस तरह का मजाक जरा भी पसंद नहीं।
[कोटेदार एक कटोरे में आटा भरकर लाश के पास आता है। ]
कोटेदार ः जीते जी तो खा न सका, मरने के बाद भकोस ले। लेकिन खबरदार जो फिर कहा, मरा है भूख से…
[एक मुठ्ठी आटा सुखीराम के मुंह में ठूंस देता है। एक क्षण के लिए तो सुखीराम शांत रहता है, अचानक फूंक मारता है। आटा गुब्बार की तरह मंच पर फैल जाता है। ]
डॉक्टर ः ये आंधी कहां से आ गयी!
[बीडीओ भागते हुए एसडीएम के पास आता है। ]
बीडीओ ः सर, जरा टार्च दीजिएगा।
एसडीएम ः (देते हुए) क्या हुआ ?
बीडीओ ः (इधर-उधर टार्च मारते हुए) जमीन वाली कागज कहीं गिर गयी?
एसडीएम ः कौन सी जमीन ?
बीडीओ ः सुखीराम को भूमिहीन बनाकर बारह बिस्वा जमीन का पट्टा उसके नाम कर दिया था। चलते-चलते इंदिरा आवास भी आवंटित कर दिया था। (अर्थी के चारों तरफ ढूंढने लगता है।)
प्रधान ः उड़ कर अंदर तो नहीं चला गया।
[बीडीओ कफन के अंदर हाथ डालकर ढूंढ़ने लगता है। सुखीराम हड़बड़ा जाता है। ]
सुखीराम ः ये क्या कर रहे हो ? लाज-शर्म है कि नहीं ? या सब घोल कर पी गये ? एक इज्जत ही तो लेकर जा रहा हूं, उसकी भी मइयो करने पर तुले हो ? कुछ तो रहम करो। भगवान के लिए शरम करो। अरे कहां हाथ लगा रहे हो ? इज्जत के साथ मत खेलो भाई। गुदगुदी हो रही है।
बेशरम… हाथ हटा…
[गुदगुदी होने के कारण हंसने लगता है। हंसते-हंसते लोट-पोट हो जाता है। बुरा हाल हो जाता है। जमीन पर लोटने लगता है। ]
मास्टरनी ः (जोर से आवाज देते हुए) मिल गयी !
बीडीओ ः (भाग कर मास्टरनी के पास जाते हुए) कहां थी ?
मास्टरनी ः दीवाल के पास पड़ी थी।
बीडीओ ः याद आया… जब घर में घुसा था … इतना डर गया था कि पेशाब आ गयी। रोकना मुश्किल हो रहा था, बाहर जाना खतरे से खाली न था… इसलिए कोने में जाकर हल्कान हो लिया। उसी समय गिरी होगी।
मास्टरनी ः मरदाना लोगों की यही बुरी आदत है, जरा भी जगह का ख्याल नहीं करते।
एसडीएम ः आइंदा जगह का ख्याल गम्भीरता से रखें। (बैंक मैनेजर से) आपकी जेब से क्या झांक रहा है ?
बैंक मैनेजर ः (ऊपर वाली जेब से निकाल कर) ये सुखीराम का पासबुक है।
प्रधान ः उसका तो किसी बैंक में एकाउंट ही नहीं था।
बैंक मैनेजर ः खुलने में कितनी देर लगती है। लगे हाथ बीस हजार रूपया भी जमा कर दिया।
एसडीएम ः कहां से लाये इतने रूपये ?
बैंक मैनेजर ः घबड़ाइये नहीं, किसी को अपनी जेब से नहीं भरना है। नरेगा में मुसहरों के जॉब कार्ड पर अधिक दिन काम करना दिखाकर वो रूपये इस खाते में डाल दिया है।
एसडीएम ः किसान क्रेडिट कार्ड भी लाये हो ?
बैंक मैनेजर ः उसे कैसे भूल सकता हूं।
प्रधान ः साहब जी, आपलोगों जितना सम्पन्न आदमी तो नहीं हूं पर चावल-दाल के अलावा एक छोटी सी सौगात और लाया हूं।
एसडीएम ः पेश किया जाए।
प्रधान ः (प्रस्तुत करते हुए) सुखिया के नाम से एक बीपीएल कार्ड बनवा दिया है।
कोटेदार ः (झट से रजिस्टर पेश करते हुए) और राशन के रजिस्टर में दिखा दिया है कि सुखीराम हर महीने दस किलो गेहूं, दस किलो चावल, दो किलो दाल और पांच लीटर कैरोसिन तेल ले जाया करता था।
एसडीएम ः और कोई तो नहीं रह गया देने के लिए ?
मास्टरनी ः मैं उसके बच्चों के लिए मिड डे मील की स्पेशल खिचड़ी लायी हूं।
बीडीओ ः देख लिया है, छिपकली तो नहीं पड़ी है। (सब हंसने लगते हैं।)
डॉक्टर ः मैं सुखीराम का दिल बहलाने के लिए टी वी लाया हूं।
प्रधान ः बिजली कौन लायेगा ?
डॉक्टर ः साथ में एक मोबाइल भी। नरक से बातें किया करेगा।
एसडीएम ः एंड लास्ट बट नॉट लिस्ट। (जेब से एक बोतल निकाल कर) यह इंगलिश मेरी तरफ से…
[बोतल की ढक्कन खोलकर शराब अर्थी पर टपकाता है। सुखीराम मुंह निकाल कर चुल्लू से पीने लगता है। चुल्लू से मन नहीं भरता है तब एसडीएम के हाथ से बोतल लेकर खुद पीने लगता है। एक ही सांस में पूरी बोतल गले के नीचे उतार लेता है। फिर बोतल का ढक्कन बंद कर वापस एसडीएम के हाथ में थमा देता है। खेत की तरफ कुत्तों के जोर-जोर से भौंकने की आवाज होती है। ]
बीडीओ ः लगता है गांव वाले जग गये!
[पार्श्व अंधेरे में ढे़र सारे लोगों की धुंधली आकृतियां दिखाई देती है। ]
एसडीएम ः हम पकड़े जायेंगे।
[प्रधान दरवाजे के पास जाकर देखने लगता है। ]
प्रधान ः ये गांव के किसान हैं।
कोटेदार ः ये रात भर घर में रहते हैं और सुबह होते रिकवरी एजेंटों के डर से गांव छोड़कर जंगल में छिप जाते हैं।
डॉक्टर ः लगता है पूरा गांव चला जा रहा है …
कोटेदार ः गांव में कोई ऐसा आदमी नहीं है जो कर्जदार न हो।
बीडीओ ः हमलोगों को अब यहां से खिसक लेना चाहिए, नहीं तो बना-बनाया खेल बिगड़ जायेगा।
एसडीएम ः कुछ रह तो नहीं गया ?
बैंक मैनेजर ः एक कमी रह गयी है।
सब ः कौन सी !
बैंक मैनेजर ः मुरदे के ढ़ाचे को देखकर कोई भी कह देगा कि महीनों से खाना नसीब नहीं हुआ है।
डॉक्टर ः डॉन्ट वॉरी, इसका इलाज है मेरे पास।
बैंक मैंनेजर ः मुरदे को मोटा करने का!
डॉक्टर ः कहीं से एक कीप ढूंढ कर लाओ।
[कोटेदार अंदर से एक बड़ी कीप लेकर आता है। ]
डॉक्टर ः मुरदे के मुंह में ठूंस दो।
[सुखीराम के मुंह में कीप ठूंस देता है। ]
डॉक्टर ः चना लाये हो ?
कोटेदार ः बोरी में दस किलो चना है।
डॉक्टर ः भाग कर लाओ।
[कोटेदार पार्श्व से टीन का एक कनस्तर उठाकर लाता है। ]
डॉक्टर ः मुंह में उड़ेल दो।
[कोटेदार कीप में उड़ेलने लगता है। ]
कोटेदार ः भरने को तो नाम ही नहीं ले रहा है… स्साले का पेट है कि नाद!
डॉक्टर ः थोड़ी जगह छोड़ देना।
कोटेदार ः कनस्तर खाली हो गया।
डॉक्टर ः जल्दी से पानी लेकर आओ। (कोटेदार बाल्टी उठाकर लाता है) पिलाओ। (पानी उड़ेलने लगता है।)
कोटेदार ः पेट फूलने लगा है …
डॉक्टर ः बस्स…
कोटेदार ः थोड़ा सा रह गया है। (बचा-खुचा सारा पानी उड़ेल देता है) अब लग रहा है, भूख से नहीं… खाते-खाते मरा है।
डॉक्टर ः चलो, आ जाओ।
कोटेदार ः डॉक्टर साहब, पेट तो फूलता ही जा रहा है…
डॉक्टर ः हटो वहां से।
कोटेदार ः तंबू की तरह तनता जा रहा है…
डाक्टर ः दूर हटो ऽ ऽ …
कोटोदार ः फटा… फटा… फटा ऽ ऽ …
[सुखीराम के पेट में गैस बनने लगता है। पेट फूलता जा रहा है। अचानक जोरों की आवाज के साथ गैस निकलती है। आवाज इतने जोरों की है कि सब डर जाते हैंं। इधर-उधर भागने लगते हैं। मंच का चक्कर काटते हुए बाहर निकल जाते हैं। कुत्ते गलियों में भौंकते रहते हैं।
अंधेरा…
सरकारी वाहनों के सायरन की आवाज के साथ डीएम प्रवेश करता है। पीछे-पीछे एसडीएम, बीडीओ, बैंक मैनेजर, डॉक्टर, मास्टरनी, प्रधान और कोटेदार। बगल में फाइल-रजिस्टर दाबे। दरोगा और सिपाही कानून व्यवस्था बहाल करने में लगे हुए हैं। अर्दली डीएम के पीछे छतरी ताने चल रहा है।
अफसरों को देखकर घर के अंदर से औरते बच्चों सहित रोते-बिलखते हुए निकलती है। धारा 144 लागू होने तथा पुलिस की धड़-पकड़ से गांव का युवा तबका दूसरी जगह चले गये हैं। कुछेक बूढ़े-बीमार लोग रह गये हैं।
इमरती सुखीराम की लाश से चिपककर विलाप करती है। सुखीराम उठकर बैठ जाता है। डीएम सफारी सूट में है। आंखों पर काला चश्मा और हाथ में मोबाइल। रह-रहकर मोबाइल पर कॉल आते रहता है। ]
डीएम ः (पास जाकर) सुखीराम के निधन का हमें बहुत दुख है। (कॉल एटेंड करने के साथ-साथ) हम ईश्वर से दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं। (इमरती देवी सिसकती रहती है) जो होना था, हो गया। अब चुप हो जाओ।
[इमरती हाथ जोड़कर अरज करती है। ]
इमरती ः सरकार, अब आपका ही सहारा है। कोई नहीं रहा हमारा देखने वाला।
डीएम ः तुम्हारे पास कौन सा कार्ड है ?
इमरती ः (चुप)
सुखीराम ः कवनो कारड ना है सरकार।
डीएम ः एपीएल-बीपीएल कोई तो होगा ?
इमरती ः (कुछ समझ में नहीं आता है।)
सुखीराम ः हम झूठ थोड़े बोलेंगे।
डीएम ः कोई नहीं है ?
इमरती ः (केवल मुंह देखती रहती है।)
सुखीराम ः कोई नहीं है सरकार।
डीएम ः क्यों नहीं है ?
सुखीराम ः इ त बीडीओ साहब से पूछो।
इमरती ः हमार मरद तो कहत-कहत थक गया पर किसी ने बना के नहीं दिया। बनाया होता तो भूखों मरने की नौबत न आती। मरने की कोई उमर नहीं थी, कभी कोई बीमारी नहीं रही। सरकार, कर्जा उनको खाय गया। अब हम का करी? इ लरिकन के पेट कहां से भरिबै। (फूट-फूट कर रोने लगती है।)
डीएम ः (एसडीएम से) शर्मा जी, इस गांव में कितने कार्ड बांटे गये हैं ? (कॉल आ जाता है तो बात करने में लग जाता है।)
एसडीएम ः सर, इस तहसील में चार हजार कार्ड आवंटित किये गये हैं जिसमें सबसे ज्यादा भिखारीपुर गांव में बांटे गये हैं। तीन सौ एपीएल और दो सौ पच्चीस बीपीएल।
सुखीराम ः (डीएम को मोबाइल पर बातें करते देख दूसरे कान में ऊंची आवाज में बोलते हुए) एगो लाल कारड हमको भी बनवा दीजिए सरकार।
डीएम ः (चौंककर उछलते हुए) पीछे से कौन बोल रहा है ?
[गांव वालों की जमात से कोई बोलता है। ]
ग्रामीण 1 ः हुजूर, कारड के बंटवारे में बड़ी धांधली हुई है।
डीएम ः जो कहना है, सामने आकर कहो।
[एक बुजुर्ग निकल कर आता है। ]
ग्रामीण 1 ः जिनके यहां रसोई गैस, रंगीन टी वी और दोपहिया वाहन है… उनको भी गरीबी रेखा से नीचे कर दिया है।
सुखीराम ः (मोबाइल पर बात कर रहे डीएम के सामने आकर) पइसा से कारड बेचा गया है।
डीएम ः (झल्ला कर ग्रामीणों की तरफ मुड़कर) बहरा नहीं हूं।
ग्रामीण 2 ः खुल्लम-खुल्ला जात का खेल खेला गया है।
डीएम ः (एसडीएम से) शर्मा जी, आपलोग कुछ देखते-वेखते नहीं हैं ?
सुखीराम ः इन्हीं की शह पर तो हुआ है।
डीएम ः (ग्रामीणों से) किसी से कम्पलेन किया था ?
ग्रामीण 1 ः कई बार शिकायती प्रार्थना पत्र दिया।
ग्रामीण 2 ः कोई नहीं सुनता,कहां जाए हम ?
ग्रामीण 3 ः हमारी दरख्वास्त है हुजूर, दुबारा सर्वे किया जाए।
डीएम ः (एसडीएम की तरफ मुड़कर) शर्मा जी, आवंटन की फाइल दिखाइए।
एसडीएम ः (कान के पास मुंह ले जाकर) सर… विधायक जी की संस्तुति से ही कार्ड वितरित किये गये हैं। (सुखीराम भी कान लगाकर सुनने लगता है। एसडीएम फाइल खोलकर दिखाते हुए) जिन नामों को लेकर हल्ला कर रहे है, विधायक जी के खास आदमी है। (सुखीराम फाइल लेकर देखने लगता है।)
डीएम ः अगर कम्पलेन सीएम आॅफिस तक पहुंच गया तो विधायक जी हो या मंत्री जी… कोई नहीं बच पायेगा। इस मामले में सीएम साहब बहुत स्ट्रिक्ट हैं। वे कोई भी ऐसा लूप-होल छोड़ना नहीं चाहते जिससे केन्द्र सरकार उन पर चड्डी काट सके।
बीडीओ ः (सुखीराम के हाथ से फाइल लेकर डीएम के सामने पेश करते हुए) देखिए सर, सुखीराम के नाम पर कई सालों से बीपीएल कार्ड एलॉटेड है।
सुखीराम ः (फाइल छीनकर दूर फेंक देता है) कद्दू एलॉटेड है !
ग्रामीण 1 ः गांव का कोई भी आदमी इस पर विश्वास नहीं करेगा।
डीएम ः (झल्लाकर ग्रामीणों से) विल यू प्लीज शट अप! मुझे अपना काम करने दोगे या नहीं ? तुम्हें जो कहना था, कह दिया न! या और कुछ कहना है ? नहीं तो बाहर जाकर बैठो। (दरोगा ग्रामीण लोगों को ठेलकर बाहर ले जाता है । बीडीओ से) सोचो, जब गांव का एक भी आदमी यह मानने को तैयार नहीं कि सुखीराम के पास कोई कार्ड था तो राजधानी में बैठा सीएम यह कैसे मान लेगा कि इस प्रदेश में एक भी आदमी भूख से मरा है ?
एसडीएम ः हमारे पास अकाट्य प्रमाण है सर।
डीएम ः शो मी आॅल दिज पेपर।
एसडीएम ः (इमरती से) साहब को कार्ड दिखाओ।
सुखीराम ः कार्ड नहीं कटहल!
बीडीओ ः अंदर से लेकर आओ।
इमरती ः आपको हमारी बात पर विश्वास नहीं तो खुदे जाकर देख लीजिए। सारे बर्तन ढ़नढ़ना रहे हैं। तीन दिनों से चूल्हा नहीं जला है। धुआं नहीं उठा है घर से…
एसडीएम ः (बीडीओ से) प्रधान जी को लेकर अंदर जाइए।
[दोनों अंदर जाते हैं। ]
डीएम ः (एसडीएम से) बाहर चैनल वाला बैठा होगा, अंदर भेजो ।
[बीडीओ बक्से से कागज निकाल कर तेज कदमों से लौटता है। ]
बीडीओ ः (चिल्लाते हुए) मिल गया! बक्से में कपड़े के नीचे रखा हुआ था।
[सुखीराम भाग कर बक्से के अन्दर घुस जाता है। ]
सुखीराम ः (बक्से में से सर निकालकर) ये तो चमत्कार हो गया!
[चैनल वाले दौड़ते हुए आते हैं। ]
डीएम ः मीडिया को दिखाओ।
[बीडीओ कार्ड को हाथ में लेकर कैमरे के सामने करता है। ]
इमरती ः हम तो रोजे बक्सा खोलकर देखते थे, हमको तो आज तक नही दिखा।
सुखीराम ः अरी भागवान, ये जादू जानते हैं जादू!
कोटेदार ः (रजिस्टर खोलकर डीएम के सामने पेश करते हुए) देखिए सर, इस महीने का राशन सुखीराम ने दो दिन पहले ही उठाया था। यहां उसका अगूंठा भी लगा है।
सुखीराम ः गिलि गिलि गिलि गिलि फू ऽ ऽ …
इमरती ः जवन किरिया खाने को कहेंगे, खाने को तैयार हैं पर इ बात हम ना पतियायेंगे।
कोटेदार ः राशन का जो आटा इधर-उधर फैला हुआ है उसको देखकर तो काई अंधरा भी पतिया जायेगा। (झुककर जमीन पर से आटा उठाकर मीडिया को दिखाता है।)
सुखीराम ः (अरथी पर बैठकर) मान गये उस्ताद!
प्रधान ः (आंगन में घूमते हुए) इसको देखकर तो यही लगता है कि इस घर में बच्चे मिट्टी में नहीं, आटा में खेलते हैं। अरथी के अगल-बगल इतना आटा है मानो मुरदे को जल से नहीं, आटा से नहलाया गया है। (एक मुठ्ठी आटा सुखीराम के मुंह पर पोत देता है।)
सुखीराम ः (एक तमाचा प्रधान के गाल पर जड़ देता है ) लेकिन जादू से पेट नहीं भरता । ( प्रधान को कुछ समझ में नहीं आता है। भकुआया हुआ इधर-उधर देखता रहता है।)
कोटेदार ः (बरामदे पर से आवाज देते हुए) देखिए-देखिए, यहां अनाज की कितनी बोरियां पड़ी हैं… (मीडिया वाले दौड़कर उधर जाते हैं) … बोरी में गेहूं है … चावल है … और दाल भी है… (सबों को एक कोने की तरफ ले जाते हुए) इधर आइए, रसोई घर का नजारा देखिए…
सुखीराम ः (राशन का डिब्बा उठाकर, बजाते हुए) डब्बे खाली पड़े हैं…
कोटेदार ः (सुखीराम के हाथ से लेकर अंदर से मुठ्ठी भर चावल निकाल कर दिखाते हुए) भरे पड़े हैं।
प्रधान ः (बोतल उठाकर) बोतल में तेल…
सुखीराम ः (बोतल लेकर पलटता है) नहीं है… (लेकिन तेल गिरता है।)
कोटेदार ः कटोरे में दाल… चना… चबेना…
[सुखीराम को चक्कर आने लगता है। इमरती डीएम के पास जाकर गिड़गिड़ाने लगती है। ]
इमरती ः विश्वास कीजिए, हमको कुछ पता नहीं इ सब का हो रहा है?
[अन्दर से रिपोर्टर निकलकर आता है। उसके हाथ में कुछ कागजात हैं। ]
रिपोर्टर ः तब तो तुम्हें यह भी पता नहीं होगा कि सुखीराम का बैंक में कोई खाता भी है ?
सुखीराम ः आप कह रहे हैं तो जरूरे होगा।
[इमरती इंकार में सिर हिलाती है। ]
रिपोर्टर ः उसमें बीस हजार रूपये भी हैें ?
[इमरती दुबारा इंकार में सिर हिलाती है। ]
सुखीराम ः बड़ा उपकार किया!
बीडीओ ः चलो मान लेते हैं सुखीराम ने ये सब नहीं बताया… लेकिन ये तो बताया होगा कि तुम्हारे पास 20 बिस्वा जमीन है।
प्रधान ः ऊपर वाला देता है तो छप्पड़ फाड़ कर देता है।
सुखीराम ः और लेता है तो…
एसडीएम ः इंदिरा आवास का नाम सुना है ?
इमरती ः सोनिया गांधी की सास थी इन्निरा गांधी।
मास्टरनी ः सास-बहू के बारे में खूब पता रहता है।
बैंक मैनेजर ः सब सीरियल का असर है।
डीएम ः या तो यह एक नम्बर की चालाक औरत है या हम सब आले दर्जे के बेवकूफ जो इसकी बेसिर पैर की बातों पर भरोसा किये जा रहे हैं।
बीडीओ ः ऐसी औरतों को मैं बहुत अच्छी तरह से जानता हूं जो पैसे ऐंठने के लिए ऐसे स्वांग रचती है।
इमरती ः इ स्वांग ना है मालिक।
डीएम ः तो क्या है ? टसुएं बहा रही है कि बच्चों ने दो दिनों से खाना नहीं खाया है… (टिफन उठाकर) और बच्चे यहां मिड डे मील की खिचड़ी खींच रहे हैं… (जमीन पर पड़ी मोबाइल उठाकर) घर में दाना नहीं, अम्मा चली भुनाने ? मोबाइल मेन्टेन किया जा रहा है। (मिनरल वाटर बोतल को पैर से ठोकर मारते हुए) जो कहते हैं देश में गरीबी है, आकर देखें अपने माननीय गरीब दास को। (दारू की बोतल पर नजर पड़ती है) महाशय, इसका भी शौक फरमाते हैं। (इमरती के पास जाकर) जानती हो, सरकार की आंखों में धूल झोंकने का क्या मतलब होता है ?
एसडीएम ः एफ आई आर … जेल …
इमरती ः (हाथ जोड़कर) हमको जेहल मत भेजिए सरकार… (बच्चों को लेकर डीएम के पैरों पर लेट जाती है) हमें जीते जी न मारिए साहब। हमारे छोटे-छोटे बच्चे हैं। इन पर तरस खाइए।
डीएम ः (पास जाकर धीमे से) इसलिए कहता हूं, पति मर गया अब बेकार में तमाशा मत खड़ा कर। यहां आंसू बहाने वाले कम, राजनीति करने वाले ज्यादा होते हैं।
बीडीओ ः बहुत हो गया ये रोना-धोना।
प्रधान ः चुप हो जाओ।
सुखीराम ः अजीब हाल है, इनको रोने पर भी एतराज है।
प्रधान ः (रोना जारी देखकर) सुनाई नहीं देता ?
सुखीराम ः कोई बंदिश है ?
कोटेदार ः चुप होती है कि…
सुखीराम ः (झुंझला जाता है) नहीं तो क्या उखाड़ लोगे ?
एसडीएम ः कार्ड कैंसिल करके दूसरे के नाम कर दिया जायेगा।
[हठात् इमरती चुप हो जाती है। सुखीराम तिलमिलाकर एक कोने में बैठ जाता है। सर ठोंकने लगता है। ]
डीएम ः (मीडिया के सामने आकर) मीडिया के माध्यम से यह बतलाना चाहता हूं कि सुखीराम के परिजनों को आकस्मिक सहायता के रूप में जिला प्रशासन की तरफ से दस हजार रूपया नगद सहायता प्रदान किया जा रहा है…
[डीएम जेब से लिफाफा निकालकर इमरती के हाथ में थमा देता है। ]
अभी-अभी पता चला है कि सुखीराम भूमिधर किसान भी था, अतः किसान होने के नाते दुर्घटना बीमा से एक लाख रूपये का मुआवजा भी दिलाने की घोषणा करता हूं…
[एसडीएम, बीडीओ, बैंक मैनेजर, डॉक्टर, प्रधान, मास्टरनी और कोटेदार ताली बजाते हैं। दरोगा और सिपाही भी। मास्टरनी इमरती को ताली बजाने का इशारा करती है। इमरती इशारा समझ नहीं पाती है। मास्टरनी कान में फुसफुसाती है तो बजाने लगती है। सुखीराम दौड़कर आता है और इमरती का हाथ पकड़ लेता है। ]
(डॉक्टर की तरफ मुड़कर) इससे पहले कि गांव के लफंगे कोई नया बखेड़ा खड़ा कर दे, बॉडी को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाओ। दर्जन भर बच्चे पैदा कर लेते हैं, पालन-पोषण नहीं कर पाते हैं तो आत्महत्या करके सरकार को बदनाम करते हैं।(रिपोर्टर से) और शुक्ला जी, आपका क्या प्रोग्राम है ?
रिपोर्टर ः एकाध शॉट लेना रह गया है सर।
डीएम ः मिलते हुए जाइयेगा।
रिपोर्टर ः इट्स माय प्लेजर सर।
[सरकारी वाहन का सायरन जोर-जोर से बजने लगता है। डीएम दल-बल के साथ प्रस्थान कर जाता है। ]
रिपोर्टर ः (कैमरामैन से) सैंडी, फटाफट सुखिया के कुछ क्लोजअप शॉट ले ले।
कैमरामैन ः दुनिया भर के मीडिया वाले लक्मै फैशन शो कवर कर रहे हैं, हम यहां मुरदे की तस्वीर लेने में मरे जा रहे हैं। (गांव वालों से) चचा, जरा मुरदे के मुंह पर से कफन हटाना।
[ग्रामीण 1 सुखीराम के चेहरे पर से कपड़ा हटाता है। ]
(कैमरा जूम करते हुए) लोग मॉडलों के चिकने-चिकने टांग देखेंगे कि यह सड़ा-गला चेहरा।
रिपोर्टर ः हम तो टीआरपी के गुलाम है इसलिए तो किसानों की आत्महत्या पर राखी सावंत का चुंबन भारी पड़ता है।
[कैमरामैन सुखीराम का चेहरा शूट करना चाहता है कि सुखीराम उठकर बैठ जाता है। जल्दी-जल्दी जुल्फें संवारने लगता है। ]
सुखीराम ः तनिक चूल तो संवार लेने दो।
[कैमरा के सामने सुखीराम तरह-तरह की हस्यास्पद मुद्राएं बनाता है। ]
रिपोर्टर ः बच्चों के भी कुछ विजुवल्स ले लो।
[कैमरामैन बच्चों की तरफ बढ़ने लगता है। वे अपनी मां के साथ एक-दूसरे से सटे हुए बैठे हैं। कैमरामैन शूट करने लगता है कि रिपोर्टर टोक देता है। ]
यार, नंगे बदन में इनकी कंगाली कुछ ज्यादा नजर आ रही है…
कैमरामैन ः तभी तो मजा आयेगा।
रिपोर्टर ः प्रोवर्टी शूड नॉट वी ग्लोराफाईड।
कैमरामैन ः बच्चे लोग, कपड़े पहन के आओ।
बच्चे ः घर में कपड़े नहीं है।
[रिपोर्टर बैग में से अपनी टी शर्ट निकालकर उनकी तरफ फेंकता है। उन पर मेकडोनाल्ड व केएफसी के विज्ञापन प्रिंटेड है। टी शर्ट बड़े व बेमेल है, फिर भी बच्चे पहन लेते हैं। कैमरामैन शूट करते-करते रुक जाता है। ]
रिपोर्टर ः अब क्या हुआ ?
कैमरामैन ः बच्चे ऐसे बैठे हैं मानों उनके नहीं किसी दूसरे के बाप मरे हों।
रिपोर्टर ः व्हॉट डू यू वॉन्ट ?
कैमरामैन ः आई वॉन्ट सच ए रीयल एंड हटर्ली एक्शप्रैशन कि देखने वालों का कलेजा फटकर हाथों में आ जाए। चेहरे पर भूख, उदासी और निराशा के ऐसे गहरे भाव हो कि लगे ये नहीं, पूरा देश यतीम हो गया हो…
रिपोर्टर ः बेटे, भूख लगी है ?
बच्चे ः दो दिन से कुछ नहीं खाया है।
रिपोर्टर ः (बैग से ब्रान्डेड चॉकलेट का बड़ा पैकेट निकाल कर) चॉकलेट खाओगे ? लो खाओ और जरा मन लगाकर, रोकर दिखाओ।
[बच्चे चॉकलेट पर टूट पड़ते हैं। आपस में छीना-झपटी से लड़ने भी लगते हैं। जिसके हाथ जो आता है मुंह में ठूंस लेते हैं। ]
कैमरामैन ः (बच्चों से) चलो, अब शुरू हो जाओ।
[बच्चे यांत्रिक ढंग से रोना शुरू कर देते हैं।]
रिपोर्टर ः कैमरे की तरफ देखकर… जोर से…
[बच्चे जोर से रोने का अभिनय करने लगते हैं। वे रो कम, चीख ज्यादा रहे हैं।]
कैमरामैन ः रोने का भाव लाओ।
बच्चे ः अंकल, भाव क्या होता है ?
कैमरामैन ः ब्लडी एक्सप्रैशन! एक्सप्रैशन ऽ ऽ …
[बच्चे एक-दूसरे का मुंह देखने लगते हैं।]
रिपोर्टर ः फील करो… फील करो कि तुम्हारा एकलौता बाप मर गया है… भूख से तड़प-तड़प कर मर गया है।… आज तुम्हारा बाप मरा है… कल तुम्हारी मां मरेगी… उसके बाद एक-एक करके तुम्हारे सभी भाई… बहन…
[बच्चे रोने की पुरजोर नकल करते हैं। ]
कम आॅन!… कम आॅन!… सिर पटक-पटक कर रोओ… छाती पर मुक्के मार-मार कर… एक-दूसरे के गले लगकर… जार-जार…
[जैसा बताते हैं, बच्चे करते जाते हैं। ]
कैमरामैन ः (माथा पकड़ लेता है) शिट्ट !
रिपोर्टर ः व्हॉट हैपन्ड।
कैमरामैन ः बास्टर्ड, रो कम… हंस ज्यादा रहे हैं।
[रिपोर्टर बच्चों के करीब जाता है। घूरने लगता है। बच्चे चुप हो जाते हैं। अचानक रिपोर्टर एक बच्चे के गाल पर थप्पड़ जड़ देता है। बच्चा भोंकार मारकर रोने लगता है। डरकर दूसरे भी रोने लगते हैं। ]
रिपोर्टर ः टेक दिस शॉट… हरी अप… फास्ट… व्हॉट ए मारवल्स शॉट… एक्सलेंट… माइन्ड ब्लोइंग…
[बच्चों को रोता देखकर इमरती भी रो पड़ती है। अंकवार में भर लेती है। रिपोर्टर बच्चों के शरीर पर से जबरदस्ती टी शर्ट उतारकर वापस बैग में भर लेता है।
सिपाही लाश उठाकर चलने लगते हैं। सुखीराम कफन से मुंह निकालकर झांकता है। मौका पाते अर्थी पर से छलांग मारकर नीचे आ जाता है।
इमरती उसके बच्चे और जात-बिरादर के लोग अर्थी के पीछे-पीछे चलते हुए बाहर जाने लगते हैं। केवल सुखीराम का भूत रह जाता है। पार्श्व की तरफ जाने लगता है। पीपल पेड़ के नीचे रूकता है। लट पकड़ कर धीरे-धीरे ऊपर चढ़ने लगता है। पार्श्व से आलाप चलता है। अंधेरा होने लगता है…
पूर्ण अंधेरा…
खेत की तरफ हल्की-हल्की रोशनी… इमरती अपने बच्चों व गोतिया लोगों के साथ शहर से लौटती हुई दिखाई देती है। बच्चे साइकिल पर बैठे हैं, झुनिया पैदल है। पोस्टमार्टम होने के बाद सुखीराम का दाह संस्कार शहर में ही कर दिया है।
सीवान पर गांव के कुछ बुजुर्ग लोग मिल जाते हैं। वे हाल-समाचार लेते-लेते साथ हो लेते हैं।
इमरती घर में दाखिल होती है। पीछे-पीछे समाज के लोग भी। बुजुर्ग खाट पर बैठ जाते हैं। बाकी इधर-उधर। ]
ग्रामीण 1 ः सुखी भइया की लहाश गाँव लाती तो अंतिम बार देख तो
लेते।
इमरती ः हम तो लाना चाह रहे थे पर तुम्हारे भइया की लहास पर
हमारा बस थोड़े चल रहा था?
ग्रामीण 2 ः कोई मना कर रहा था क्या?
इमरती ः लहास जब पोस्टमार्टम होकर बाहर आयी, पता नहीं कहाँ से ढ़ेर सारे लोग आ गये। सफेद कुरता, टोपी पहने हुए। लहास को घेर कर जोर-जोर से नारे लगाने लगे।
ग्रामीण 3 ः कौन लोग थे वे?
इमरती ः कोई कह रहा था, विरोधी पार्टी के बहुत बड़े नेता हैं। उनके आदमी बिना हमसे कुछ पूछे लहास को उठाकर जुलूस बनाकर सड़क पर चलने लगे। हमने पूछा, हे भइया इनको कहाँ ले जा रहे हो तो कहने लगे कि हम सरकार का घेराव करने जा रहे हैं। यह एक सुखिया की भूख से मौत नहीं हैं, बल्कि लाखों किसानों के मौत का सवाल है।
ग्रामीण 2 ः फिर तुमने क्या कहा?
इमरती ः हमरी बात सुन कौन रहा था? हम तो उनके पीछे-पीछे चले जा रहे थे।
ग्रामीण 4 ः कहाँ ले गये जुलूस को?
इमरती ः शहर का इधर – उधर चक्कर काट कर विधान सभा के
सामने पहुँचे। एक अफसर आकर बोला, मुख्यमंत्री अभी
बाहर दौरे पर हैं। नेताजी ने कहा, जब तक मुख्यमंत्री आकर बात नहीं करेंगे, लहास उठने नही देगें। दो घंटे पता नहीं नेता और अफसरों के बीच क्या मान-मनौव्वल चलता रहा। अचानक पुलिस वाले आकर डंडा चलाने लगे। भगदड़ मच गयी। नेताजी कहाँ चले गये, पते नहीं चला। उनके आदमी भाग खड़े हुए। सड़क पर केवल हम रह गये थे। माय-पूत…और लहास। पुलिस वाले लहास को खींचकर सड़क किनारे कर दिया और कहा जल्दी ले जाओ।
ग्रामीण 1 ः तो लहास लेकर गाँव काहे नहीं आ गयी।
इमरती ः लहास की दुर्गत हो गयी थी भइया। जगह-जगह टाँका खुल गया था। और सबसे बड़ी बात तो ये थी कि हमरे पास फूटी कौड़ी भी ना थी कि गाड़ी भाड़ा कर के गाँव लाते।
ग्रामीण 2 ः फिर वहाँ कैसे लहास जलाया?
इमरती ः हम जलाने के बारे में सोच रहे थे कि एक बड़ी सी गाड़ी हमारे पास आकर रूकी। उसमें से कुछ औरतें उतरी। बड़े घर की लग रही थी। वे अपने साथ कुछ फोटो खींचनेवालों को भी लायी थी। आते ही वे लहास के सामने पोज बना-बनाकर फोओ खींचाने लगी। उसके बाद उनमें जो हेड थी, मेरे हाथ में एक लिफाफा थमाते हुए फोटो खिंचवायी। फिर अपनी गाड़ी में बैठकर चली गयी। मैंने लिफाफा खोलकर देखा, कुछ रूपये थे। फिर पहला काम किया, लहास को ठेले पर लाद कर भैंसाकुंड़ ले गयी और दाह संस्कार कर दिया…
[गली में मोटर साइकिल की आवाज सुनाई पड़ती है। आवाज सुनकर ग्रामीण और बुजुर्ग सशंकित हो उठते हैं। देखने के लिए दरवाजे की तरफ जाते हैं कि रिकवरी एजेंट अपने आदमियों के साथ घुस आता है। गांव वाले खिसकने लगते हैंं। ]
रिकवरी एजेंट ः (आवाज लगाते हुए) पकड़ो हरामजादे को! लोन के लिए साले हाथ जोड़ते हुए आते थे, जब देने का टाइम आया है तो पिछवाड़ा दिखा रहे हैं। हम देना जानते हैं तो हाथ डालकर पैसा निकालना भी जानते हैं। स्सालों को पकड़कर पूरे गांव में घुमाओ ताकि फिर मुंह दिखाने लायक न रह जाए…
[गांव वाले इधर-उधर भागने लगते हैं। ]
गुर्गा 1 ः रुक हराम के जनों ऽ ऽ …
गुर्गा 2 ः रुकता है कि नहीं ऽ ऽ …
[गुर्गे दौड़कर कुछ को पकड़ लेते हैं, लेकिन गांव वाले किसी तरह अपने को छुड़ाते हुए गली की तरफ भाग जाते हैं। ]
रिकवरी एजेंट ः भागकर गीदड़ जायेगा किधर ? (इमरती की तरफ बढ़ते हुए) चल निकाल रूपये, तुझसे ही बोहनी करते हैं। सुना है आजकल खूब माल काट रही है मुआवजे के पैसे से? नसीब अच्छा है तेरा जो सुखिया भूख से मर गया। तेरे नाम लॉटरी निकाल गया।
इमरती ः घर में घुसे नहीं कि कटोरा लियेे चले आये।
रिकवरी एजेंट ः भिखारी बोलती है।
इमरती ः बाद में आना तब देखेंगे।
रिकवरी एजेंट ः तेरे बाप के नौकर नहीं हैं जो तेरे हुकुम पे आये-जाये। अपना पैसा तो हम अभी लेकर जायेंगे, समझी ?
इमरती ः अभी हमारे पास अधल्ली भी नहीं है।
रिकवरी एजेंट ः अकेले गड़प जाना चाहती हैं?
गुर्गे ः कहां छिपा कर रखी है ?
इमरती ः जैसे बीडीओ ने बक्से के अंदर से… घड़े-डब्बे-बाल्टी- बर्तन से… खोज-खोज कर खाने के सामान निकाले थे, तुम भी निकाल लो मुआवजे वाले रूपइये…
रिकवरी एजेंट ः (लपक कर बाल पकड़ लेता है) गोली देती है। सीधे तरह से पैसा निकाल वरना तुम्हें पता नहीं हम कितनी कुत्ती चीज हैं ?
[इमरती दर्द से बिलखने लगती है। उसका लड़का दौड़ते हुए आता है और रिकवरी एजेंट के पैर में दांत काटने लगता है। एजेंट धक्का दे देता है। लड़का गिर पड़ता है। यह देखकर बारह साल की झुनिया भाग कर आती है और एजेंट को ताबड़तोड़ मुक्के मारने लगती है। ]
गुर्गा 1 ः बड़ी बीख है स्साली!
रिकवरी एजेंट ः (गुर्गे से) ले चलो इस चिरइया को। इसी से वसूल लेंगे मूल और सूद दोनों।
[गुर्गा 2 झुनिया को टांग लेता है। ]
झुनिया ः छोड़ हरामजादे!
[झुनिया गिरफ्त से छूटने के लिए हाथ-पैर चलाती है। ]
रिकवरी एजेंट ः कोई नहीं आयेगा बचाने। और कौन मुंह से आयेगा? है कोई जो करजा न खाया हो। (इमरती से) पैसे का इंतजाम हो जाए तो आकर ले जाना। तब तक हम झुनिया का झुनझुना बजाते रहेंगे।
[इमरती और उसके बच्चे गुर्गे की तरफ दौड़ते हैं। गुर्गे से भिड़ जाते हैं। एजेंट उनको मारने लगता है। इमरती चीखने-चिल्लाने लगती है।
चीत्कार सुनकर पीपल पेड़ से सुखीराम नीचे उतरता है और गुर्गों की तरफ भागता है। भिड़ जाता है पर यह क्या, वह तो हवा की तरह दूसरी तरफ निकल जाता है। मुड़कर वापस लौटता है पर जैसे उस पर कोई असर ही न पड़ रहा हो। मानो शक्ति विलुप्त हो गयी हो। सुखीराम रिकवरी एजेंट के हाथ को पकड़कर अपनी तरफ जोर लगाकर खींचने लगता है पर खींच नहीं पा रहा है। स्वयं खींचा चला जा रहा है। झल्लाकर सुखीराम सबों पर लात चलाने लगता है, उल्टे वह ही लुढ़क जाता है।
सुखीराम विवश हो जाता है तब आक्रोश में जोर-जोर से चीखने लगता है। दौड़कर दरांती उठाकर लाता है। मारने के लिए दौड़ता है तभी दरवाजे के पीछे से भयानक मुद्रा बनाते हुए यमराज ढोल-ताशे की तेज थाप पर प्रकट होता है। उसके पीछे कंधे पर बड़ी सी सफेद बोरी लादे तीन यमदूत। बोरी पर किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के खाद्य उत्पादक का लेबल प्रिंटेड है। यमराज सफेद रंग का बड़ा सा लबादा पहने हए हैं, सर पर गांधी टोपी। हाथ में सुनहला लौह दंड, मुंह नीले रंग से पुता है। यमदूत इसके विपरीत काले लबादों में, मुंह सफेद रंग से पुते।
सुखीराम ज्यों दरांती से मारने को होता है, यमदूत पीछे से आकर पकड़ लेते हैंं। सुखीराम की आंखों के सामने रिकवरी एजेंट और उसके गुर्गे झुनिया को उठा कर ले जाते हैं। इमरती मूर्छित हो जाती है। ]
यमराज ः आने में जरा सी देर क्या हो गयी, भूतगिरी दिखाने लगे ?
सुखीराम ः कौन हो तुम ?
यमराज ः मूर्ख, दिख नहीं रहा यह भयानक रूप! (तांडव करने लगता है।)
सुखीराम ः नचनिया हो का ?
यमराज ः (चिंघाड़ कर) मैं यमराज हूं।
सुखीराम ः गोली किसी और को देना, यमराज कुरता -टोपी पहनता है?
यमराज ः यहां आने के पहले एक नेता का प्राण लेने आया था लेकिन वह इतना नंबरी निकला कि ड्राइंग रूम में हमें बिठाकर अंतिम बार कुर्सी का दर्शन करने गया तो दो दिन तक आने का नाम नहीं लिया। यमदूत ढूंढते रहे, कमबख्त का कहीं पता न चला। उसकी टोपी छूट गयी थी। मुझे लगा, इसमें कोई रहस्य है। मृत्युलोक का यह मुकुट धारण कर लिया। (टोपी ठीक करते हुए) काला कपड़ा पहनते-पहनते बोर हो गया था, सोचा अब कुछ खादी हो जाए। खादी भी कमाल की चीज हे, हर काला काम इसमें सफेद हो जाता है।
सुखीराम ः मैं झुनिया को छुड़ाकर आता हूं फिर आपके साथ चलता हूं।
यमराज ः तुम भी उस नेतवा की तरह गोली देने के चक्कर में हो? नहीं, तुम कहीं नहीं जा सकते। यहां के सारे दरवाजे तुम्हारे लिए बंद हो चुके हैं। (यमदूतों से) मुंह क्या देख रहे हो, पकड़कर बोरे में बंद करो। (खाट पर बैठते हुए) हफ्ते भर से प्राणों के कलेक्शन पर निकले हुए हैं। थक कर शरीर चूर-चूर हो गया है। किसानों को तो जैसे मरने के अलावा कोई काम ही नहीं है। खाला का घर समझ रखा है, जब जी किया मुंह उठा के चल दिए। पता नहीं किसानों को आत्महत्या करने में क्या मजा आता है? कायर, डरपोक कहीं का! सरकार इतना कुछ तो कर रही है उनके लिए…उचित सर्मथन मूल्य…पुराने बकाये का सीधे भुगतान…खाद-बीज की सब्सिडी…कर्जो की माफी…बर्बाद हुई फसलों का मुआवजा…फिर क्यों? क्या खाकर ये सरकार को गरियाने पर तुले हैंं? अब तक डेढ़ लाख किसान आत्महत्या कर चुके हेैं। एक प्राण का कलेक्शन करके लौटो तो दूसरा मरने के लिए तैयार बैठा मिलता है। दुष्ट, हर आठ मिनट पर आत्महत्या कर रहे हैं…
यमदूत 1 ः आत्महत्या करने वाले प्राण एक नम्बर के शैतान होते हैं।
यमदूत 2 ः एक को पकड़ो तो दूसरा उछलकर बाहर आ जाता है।
यमदूत 3 ः कोई ग्रामीण बैंक की तरफ भागता है…
यमदूत 2 ः तो कोई विश्व बैंक के चक्कर लगाने लगता है…
यमदूत 1 ः बड़ी मशक्कत के बाद बोरे में बंद हुए हैं।
यमदूत 2 ः हरामी, वहां भी चैन से नहीं बैठते।
यमदूत 3 ः अंदर से फसल के दाम बढ़ाने के लिए चिकोटी काटते हैं…
यमदूत 1 ः तो खाद का दाम कम करने के लिए अंगुल करते हैं…
यमदूत 1,2,3 ः लात मारते हैं मक्कार!
यमराज ः (सुखीराम से) सुना है, बहुत बड़ा हीरो बन गये हो? भूख से मरने का डरामा करके एसेम्बली तक में हंगामा काट रखा है। सरकार के नाक में दम कर रखा है।
सुखीराम ः इ डरामा ना है महाराज , हम सचमुच भूख से मरे हैं ।
यमराज ः पहले बाढ़ में किसान मरते थे, सुखाड़ में मरते थे। प्लेग-टीबी-हैजा से करते थे। भूख से मरने की बात पहली बार सुन रहा हूँ। तुम्हारे बाप-दादा भी तो किसान थे, वे क्या भूख से मरे थे ?
यमदूत 1 ः अपोजिशन वाले कह रहे हैं, कर्ज के बोझ से दब कर मरा है।
यमराज ः उन गदहों से पूछो, किसानों ने कब कर्जा नहीं लिया ?
यमदूत 2 ः हां महाराज, पहले जब बैंक नहीं खुले थे तब भी सेठ-साहूकार से कर्ज लेते थे।
यमराज ः आज तक किसी किसान को कर्ज से मरते सुना है ? और आज कौन कर्ज नहीं लेता है? उद्योगपति, पूंजीपति सब कर्ज में डूबे होते हैं लेकिन तुमलोगों की तरह कोई आत्महत्या नहीं करता है?
सुखीराम ः कोई शौक से नहीं करता आत्महत्या, कोई न कोई मजबूरी होती है।
यमराज ः और रास्ते भी तो होते हैं?
सुखीराम ः आदमी जब हार जाता है तो कोई रास्ता नहीं रहता है।
यमराज ः कितना कर्जा था ?
सुखीराम ः बारह हजार।
यमराज ः बस्स.. बारह हजार !
सुखीराम ः करजा तो बारह हजार ही था पर सूदे इतना हो गया कि पूछिए मत।
यमराज ः कर्जा लेने की नौबत ही क्यों आयी ?
सुखीराम ः दुख-तकलीफ तो किसान के साथ लगा ही रहता है।
यमराज ः बेटी के ब्याह के लिए लिया था ?
सुखीराम ः नहीं महाराज, खेती के लिए।
यमराज ः नोट बोता था क्या ?
सुखीराम ः आज पहले की तरह खेती नहीं है महाराज। खेत की जुताई ट्रैक्टर से होती है।
यमराज ः बैल क्या दुल्लती मारता है ?
सुखीराम ः वह तो और भी खर्चीला है। साल भर चारा कहां से लायेंगे?
यमराज ः तो जुताई पहले से सस्ती हुई न!
सुखीराम ः जुताई के अलावा और भी तो खर्चे हैं महाराज। मंहगाई इतनी बढ़ गयी है कि कीमत आसमान छू रही है।
यमराज ः मंहगाई की मार तो सब पर पड़ रही है, सिर्फ किसान ही क्यों मर रहे हैं ? क्यों आत्महत्या कर रहे हैं ?
यमदूत 1 ः किसान सब कोढिया हो गये हैंं
यमदूत 2 ः काम-धंधा कुछ करते नहीं, कर्जा खाकर मुटियाये रहते हैं।
यमराज ः (सुखीराम से) मेरे पास तुम्हारा पोस्टमार्टम रिपोर्ट है, इसमें डॉक्टर ने साफ लिखा है… सुखीराम बीमारी से मरा है।
सुखीराम ः कौन सी बीमारी महाराज ?
यमराज ः बीमारियों की कमी थोड़े है यहां।
सुखीराम ः उसका कोई नाम भी तो होगा ?
यमराज ः (धीमे से) हाइड्रोसील का नाम सुना है ?
सुखीराम ः आप भी खूब ठिठोली करते हैं।
यमराज ः पसंद नहीं तो दूसरी चुन लो। खूनी बवासीर कैसा रहेगा… नहीं तो भगंदर तो जरूर ही पसंद आयेगा।
सुखीराम ः ये जानलेवा बीमारी नहीं है महाराज।
यमराज ः मुझे न पढ़ा, भूख के अलावा सब बीमारी जानलेवा है। ये पृथ्वीलोक की रिपोर्ट है। मैं तो सोच रहा हूं यमलोक की रिपोर्ट में तुम पर कुछ और मेहरबानियां कर दूूं। पेट के अंदर दो किलो बासमती चावल दिखा दूूं।
यमदूत 1 ः आप बड़े कृपालु है महाराज।
यमराज ः (टोपी ठीक करते हुए) अगर कृपा की मात्रा कुछ कम लग रही हो तो उसमें कुछ काजू, किशमिश के दाने भी डाल सकता हूं।
यमदूत 2 ः महाराज, उसमें बादाम और चिलगोजे भी डाल दीजिए।
यमराज ः चावल का प्लाव बनाओ या बिरयानी… पर लोगों में यह संदेश जरूर जाना चाहिए कि सुखीराम की मौत भूख से नहीं, अधिक खाने से हुई है। उसके पिछले जन्म के किसी पाप के कारण हुई है…
[इमरती को होश आ जाता है। वह बच्चों का हाथ पकड़कर घर से निकल पड़ती है। पीपल पेड़ के नीचे आकर रूकती है। जो लटें झूल रही है, उसके फंदे बनाती है। दो फंदे बच्चों के और एक अपने गले में डाल लेती हैं। सुखीराम की नजर पड़ती है तो खेत की तरफ भागता है। यमदूत पकड़ने के लिए उसके पीछे दौड़ते हैं। ]
यमदूत 1 ः कहां जा रहे हो ?
यमदूत 2 ः हमारे साथ ऊपर चलो।
यमराज ः ऊपर तुम्हारा इंतजार हो रहा है।
सुखीराम ः मुझे नहीं जाना।
यमराज ः कब तक यहां भटकते रहोगे ?
सुखीराम ः जब तक भूख से मुक्त नहीं हो जाता।
[यमदूत सुखीराम को पकड़ लेते हैं।
इमरती लकड़ी के कटे टुकड़े पर खड़ी हो जाती हे। चेहरे पर प्रतिरोध का भाव है। अपने बच्चों के साथ फंदे से लटक जाती है…
सुखीराम धक्का देकर उनकी गिरफ्त से छूट जाता है। भागकर पीपल के पेड़ के नीचे आता है। बचाने की कोशिश करने लगता है । कभी
एक के पैर अपने कंधे पर रखता है, कभी दूसरे के। चीख-चीखकर गांव वालों को मदद के लिए गुहार करता है पर कोई नहीं आता है। भागकर यमराज के पास मदद के लिए जाता है। यमराज मुंह घुमा लेता है। सुखीराम बदहवास इधर-उधर भागता रहता है। यमदूत पकड़ने के लिए रस्सी से बांधने की कोशिश करते है पर सफल नहीं हो पाते है। उसके आक्रामक मूड को देखकर पीछे हट जाते हैं। सुखीराम पीपल पेड़ के नीचे आता है। उनके पैर अपने कंधों पर रखकर बेबश चीत्कार करता है। धीरे-धीरे घुटनों के बल आने लगता है। लाशें पेड़ से झूलने लगती हैं। सुखीराम टूटे कदमों से घर में आता है। आंगन में रखे मिट्टी के घड़े तोड़ने लगता है। जमीन पर सर रखकर फूट-फूटकर रोते रहता है…
कम होती मृदंग की थाप तेज होने लगती है। देखते ही देखते मंच पर आत्महत्या किये हुए ढेर सारे किसान फंदों पर झूलते नजर आते हैं।
यमराज अपने दूतों के साथ लटक रहे फंदों के बीच दौड़ता-हांफता आता है। चेहरे पर हवाइयां उड़ रही है। ]
यमराज ः ऐसा हो नहीं सकता… ऐसा तो कभी हो ही नहीं सकता!…
आत्महत्या से मरे हुए किसानों के प्राण जो बोरों में बंद थे… हरामजादे लात मार कर बाहर हो गए… न जाने कहां गायब हो गए…
[यमराज की दुर्दशा देखकर फंदे पर लटक रहे किसान खिलखिला कर हंस पड़ते हैं। यमराज रोते-बिलखते अपने यमदूतों के साथ ढूंढ़ने का अभिनय करते हुए मंच के बाहर प्रस्थान हो जाता है।
आत्महत्या किये हुए किसान फंदों से धीरे-धीरे नीचे उतरते हैं। भाव ऐसा है मानों आत्महत्या के विरूद्ध खड़े हो। सुखिया सबसे आगे है। सब गाते हैं। ]
(गाना)
हम न मरैं मरिहैं संसारा
हम कूं मिल्या, लड़ावन हारा।
भूख अग्नि मा सब जग जरिहै,
फैल जाई यह, कुछ न बचिहै।
भूख मरिहै तो हमहूं मरिहै,
भूख न मरै, हम काहे कूं मरिहै।
हम न मरबै, अब हम न तरबै,
करके सारे जतन, भूख से लड़बै।
जब दुनिया से भूख मिटावा
जब मरिबे के हम सुख पावा।
हम न मरैं…
(अंधेरा)

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    By: राजेश कुमार

    (जन्म 11 जनवरी 1958, पटना) रंगमंच की तीसरी धारा का रंगकर्मी । नाटक के माध्यम से चेतना प्रसार का प्रबल समर्थक । सन् 1976 से अब तक अनवरत् रंगकर्म करने वाले होलटाइमर। शिक्षा ः प्रारंभिक शिक्षा आरा से । भागलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज से बी0 एस0 सी0 (इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग)।
    नौकरी ः उ0 प्र0 पावर कारपोरेशन में अधीक्षण अभियंता ।
    थियेटर ः भोजपुर की चर्चित नाट्य संस्था ‘युवा नीति ‘, भागलपुर की ‘दिशा‘ , अलीगढ़ की ‘दृष्टि ‘, शाहजहांपुर की ‘ अभिव्यक्ति‘ और लखनऊ की ‘धार‘ के संस्थापक सदस्यों में से । शुरुआत मंच नाटक से लेकिन शीघ्र एक जरुरत के तहत नुक्कड़ नाटक की तरफ टर्न ।
    डेढ़ दशक तक लगातार कार्य करने के बाद पुनः प्रोसिनयम की तरफ । फिलहाल एकल नाट्य विद्या पर गंभीरता से कार्यरत्।
    लेखन ः देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में एक दर्जन कहानियां एवं दो दर्जन से अधिक नुक्कड़ नाटकों का प्रकाशन । दो नुक्कड़ नाटक पुस्तिकाओं (‘नाटक से नुक्कड़ नाटक तक‘ और मोरचा लगाता नाटक‘) का संयुक्त संपादन ।
    पूर्णकालिक नाटक ः झोपड़पट्टी, आखिरी सलाम, अंतिम युद्व, गांधी ने कहा था, घर वापसी, मार पराजय, हवनकुंड सत भाषै रैदास, गांधी और अम्बेडकर, द लास्ट सैल्यूट ,सुखिया मर गया भूख से और असमाप्त संवाद ।
    प्रकाषित नुक्कड़ नाट्य संग्रह ः हमें बोलने दो, जनतंत्र के मुर्गे‘ ,‘ कोरस का संवाद ‘ नुक्कड़ नाटक संग्रह का संपादन। एकल संग्रह प्रकाशित ः पांच एकल (शताब्दी की परछाइयां) ।
    सम्पर्क ः बी- 206, रोहिणी अपार्टमेन्ट, सेक्टर-4, गोमती नगर विस्तार,
    लखनऊ 226010 मो. ः 09453737307
    ई मेल ः rajeshkr1101@gmail.com

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