निरंतर डिजिटल होते समय में वास्तविक और जीवंत जगत स्मृतियाँ बनता जा रहा है, ‘सूत्रोंकी मानें तो ….. जी हाँ पहले कभी बेताबी से डाकिया बाबू का इंतजार किया करते थे अब रोज अपलक टीवी निहारा करते हैं देखें आज क्या खबर आनेवाली है “सूत्रों” के हवाले से ……संपादक 

सूत्रों के हवाले से 

ब्रजेश कानूनगो

उस जमाने में आज की तरह जोशवर्धक रसायनों और ताकत बढाने वाली कैप्सूलों का इतना ज्यादा प्रचार-प्रसार नही हुआ था। अखबारों में ऐसे विज्ञापनों से ज्यादा कविताएँ छपा करती थीं। लोह भस्म का सेवन किए बगैर ही कवि सबसे लोहा लेता रहता था। उसकी शक्ति के आगे बडे-बडे तुर्रम और सम्राट नत मस्तक हो जाते थे। उसकी वाणी में इतना दम होता था कि वह लोगों के भीतर चिंगारी सुलगाने का सामर्थ्य रखती थी। उनके विचारों से ऐसी आग धधक उठती थी जिससे लोग क्रांति की मशाल प्रज्ज्वलित कर सत्ता का तख्त आदि तक पलट दिया करते थे। कवि की इसी ताकत और पहुंच की व्यापकता के कारण कहावत बन गई –‘जहाँ न पहुंचे रवि,वहाँ पहुंचे कवि।’ जिन दुर्गम स्थलों और कोनों तक पहुंचने में सूरज की भी साँस फूल जाया करती थी वहाँ से कवि अपने विचारों की रोशनी में अपने बल पर सच्ची खबर ले आता था।

अब कवि के बस में यह सब नही रहा। बहुत गिनती के ऐसे कवि रह गए हैं जो जोखिम में पडकर परहित के दुर्गम रास्तों और अन्धेरों में भटकने का दुस्साहस दिखा पाते हों। आ बैल मुझे मार वाला अब यह काम ‘सूत्र’ करता है। चूंकि वह बैल से मार नही खाना चाहता इसलिए अपनी पहचान छुपा कर यह काम करता है। दरअसल यह ‘सूत्रों’ का ही समय है। ऐसा लगता है कि इन दिनों हमारा कोई असली शुभचिंतक है तो वह सिर्फ मीडिया समाज की वह ‘सूत्र बिरादरी’ ही है जो छुपी हुई वास्तविकताओं और उनके कारणों को सच्चाई के साथ उजागर करके पुण्य कमा रही है।

सूत्र ही वह प्राणी है जो अब पूर्व के कवि का काम करता है। ‘सूत्र’ रवि और कवि दोनों से अधिक प्रभावी और प्रतिभाशाली होते हैं। सच्चाई तक पहुंचने के लिए रवि और कवि दोनों को स्वयं भी प्रकाशित होना पडता रहा है, इसलिए उनको काम करते हुए हर कोई देख सकता है। यह बहुत खतरनाक होता है।  सूत्रों के साथ ऐसा नही होता। वे अदृश्य रहकर अपना काम करते रहते हैं। इन्हे कोई नही जान पाता। न ही उनके तौर-तरीके पर कोई सवाल करना सम्भव होता है।

सूत्र मिस्टर इंडिया की तरह अदृश्य रहकर बडी निडरता से काम करता है लेकिन उसके काम करने की प्रक्रिया में डर की बडी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जहाँ वह जाता है अंजान भय से लोग घबराने लगते हैं कि कहीं कोई गुप्त कैमेरा, छुपा हुआ रेकार्डर तो अपना काम नही कर रहा।  लक्ष्य प्राप्ति के लिए सूत्र हर नीति कुटनीति को अपनाने में हिचक नही रखता। वह हमेशा परिणाम में विश्वास रखता है। जब सूत्र नतीजे पर पहुंच जाते हैं तब सूत्रधार उनके नतीजों का खुलासा करता है और खबरों की दुनिया में आग लगा देता है। यह आग तब तक बनी रहती है जब तक की कोई अन्य सूत्र किसी और नतीजे पर नही पहुँच कर नया धमाका नही करता।

सूत्र बस सूत्र होते हैं। उनका कोई नाम नही होता। टीवी चैनलों पर हमे केवल इतना भर पता चलता है कि उन्हे यह खबर सूत्रों के हवाले से मिली है। सूत्रों को गुमान होता है कि वे हमारे जीवन को बेहतर बनाने के कार्य में पूरी मुस्तैदी से लगे हुए हैं। शोले के जेलर के जासूसों की तरह चैनल के सूत्र देश के कोने कोने में फैले हुए रहते हैं । इनका नेटवर्क बडा व्यवस्थित होता है। मंत्रालयों की मक्खियों से लेकर कैटरिना के बाथरूम के साबुन तक उनकी नजरें लगी रहती हैं।

चैनलों के इन बेनाम सूत्रों पर भरोसा करना हमारी स्वाभाविक प्रकृति है। बहुत सी बातों पर हम विश्वास करते हैं, समोसे को हरी चटनी से खाने से कृपा होने और सपने के संकेत से खजाना मिलने की उम्मीद पर हम विश्वास करते हैं। विश्वास करना हमारे संस्कारों का हिस्सा है । पहले कभी बेताबी से डाकिया बाबू का इंतजार किया करते थे अब रोज अपलक टीवी निहारा करते हैं देखें आज क्या खबर आनेवाली है सूत्रों के हवाले से। इन सूत्रों से ही जीवन का सूत्र कायम है। ये सूत्र ही हमारे जीवन को रसमय बना रहे हैं, यह क्या छोटी मोटी बात है।

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