सेक्सुअल शोषण की काली हकीक़त, ‘कहानी २’ 

आईए ‘नक्शाब जारचवी’ को जाने: सख्शियत (सैयद एस तौहीद)

एस तौहीद शहबाज़

शोषण के हर रुप का विरोध ज़रूरी है. यह किसी भी रुप में मौजूद हो सकता है.सुजॉय घोष की हालिया ‘कहानी 2 दुर्गा रानी सिंह’ इसी बात को रेखांकित करती है.सेक्सुअल शोषण की काली हकीक़त  को फ़िल्म ने बड़ी संजीदगी से लिया है. सेक्सुअल शोषण पर पर बात करने को बुरा माना जाता है. सौ परदे में रखने से क्या लेकिन सच को छुपाया जा सकता है ? नहीं छुपाया जा सकता.परिवार के साए में हुए शोषण की बात भी सामने आनी चाहिए.छोटी मिनी को परिवार के अंदर से शोषण मिल रहा था. शोषण के इस कुचक्र के खिलाफ अकेली औरत का संघर्ष देखना चाहते हैं तो कहानी 2 देखें.

दुर्गा (विद्या बालन) मिनी के स्कूल में ही अकाउंट का काम देखती थी.बच्ची के व्यवहार में आ रहे बदलाव का उसने संजीदगी से नोटिस लिया.उसे समझ नहीं आ रहा था कि मिनी बार -बार क्लासरूम में सो क्यों जाती है ? दुर्गा बच्ची का सच जानना चाहती थी.बार-बार मिनी के क़रीब आने की उसकी कोशिश उस दिन सफ़ल हुई जब उसे मिनी को ट्यूशन पढाने का अवसर मिला.जिस तरह से मिनी की तकलीफ सामने आई वो सामाजिक सुरक्षा घेरो पर सवालिया निशान खड़ा करती है.क्यों एक बच्ची सुरक्षित घेरों में सुरक्षा का  शिकार हो जाती है ? जिस तरह से मूल्यों में विघटन देखने को मिल रहा वो हर चीज़ को ध्वस्त कर देगा.बुराई को रोकने के लिए उसकी पहचान ज़रूरी होती है.अच्छे-बुरे का स्पष्ट फ़र्क ज़रूरी होता है.अच्छे या बुरे लोग हम आप जैसे ही सामान्य दिखते हैं. आदमी का सच उसे अच्छा या बुरा बनाता है.फिल्मकार ने जिस विषय को उठाया वो आस -पास कहीं का ही था.सुजॉय घोष की नई ‘कहानी’ पिछली कहानी का विस्तार नहीं है.पुरानी को आगे  बढ़ाने के  बजाए दर्शकों को नई कहानी देते हैं. कहानी के मौजूदा संस्करण की यही शक्ति है.

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कथा के नाम फ़िल्म को अच्छी कहानी मिली है.किरदारों में दुर्गा रानी सिंह के रुप में विद्या बालन अच्छा काम किया है. कथा को अच्छे से  जिया.मेरे ख़याल में दुर्गा रानी सिंह के किरदार की बारीकियों में विस्तार एवम जटिलता की गुंजाइश थी.पहले संस्करण से तुलना करेंगे तो कमी महसूस होगी. विद्या में सामान्यता अधिक किंतु  सस्पेन्स कम हावी नज़र आता है.पुलिस इंस्पेक्टर इन्द्रजीत के किरदार में अर्जुन रामपाल सामान्य से बेहतर लगे हैं. इस किस्म के किरदार उन पर जंचते हैं. यह किरदार कहानी में फ्रेशनेस की एक वजह बनी है.दूसरी वजहें जुगल हंसराज और मिनी के किरदार में बनी है. हालांकि जुगल को इतना स्पेस मिला नहीं जितना कि खौफ उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त होते हैं. उनके किरदार पर ख़ास मेहनत की ज़रूरत होती है. इस किस्म के किरदार देखकर सिहरन होनी चाहिए जोकि आई नहीं. कह सकते हैं कि नाटकीयता कथा को थोड़ा और रोचक बना सकती था. फिल्मकार ने नए किरदार तो ज़रूर रचे गहराई भूल गए ? क्या नए किरदारों से कहानी रोचक बन जाती है ? जवाब फ़िल्म बेहतर दे पाए.

परिवार के चंगुल से आज़ाद कर दुर्गा  मिनी को अपने साथ ले जाती है.मिनी को लेकर उसमें एक विशेष सम्वेदशीलता थी.कहीं न कहीं वो उसे उस सब खाराबियों से आजाद करना चाहती थी जो  एक माइनर लड़की चुपचाप झेल रही थी. कहानी सामान्य है लेकिन नज़रअंदाज़ नहीं की जा सकती..इस कुचक्र सेमुक्त  करने के  क्रम में दुर्गा को हत्या भी करनी पड़ी.गिरफ्त से बचने के लिए दूसरे नाम के साथ मिनी की मां बनकर रहने लगी थी.सब कुछ ठीक ही चल रहा था कि एक दिन किशोरी मिनी का अपहरण हो गया..दुर्गा उसे खोज तो नहीँ सकी उस दिन लेकिन हादसे का शिकार ज़रूर हो गई..अस्पताल में भर्ती घायल दुर्गा ने मिनी को कैसे बचाया..रोचक समापन आपको फ़िल्म के बिल्कुल एंड तक ले जाता है.

फ़िल्म को पीक प्वाइंट पर समाप्त कर देना अच्छा होता है. कहानी उससे थोड़ी आगे बढ़ गई मालूम हो रही. जहां उसे न्याय रुप से ख़त्म हो जाना चाहिए था.फ़िर भी  विषय की सम्वेदना के लिए इसे देखा जाना चाहिए.जिस नेक मकसद को लेकर वो चली है,उसके लिए..कमियों के बावजूद सकारात्मक हस्तक्षेप पर सटीक उतरी फिल्म.

 

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