ऐसा क्यों है ?: ग़ज़ल (अश्विनी आश्विन)

फोटो गूगल से साभार

सोच रहा हूँ!! नया वर्ष यह, कैसा होगा ?

सोच रहा हूँ!! नया वर्ष यह, कैसा होगा ?
चिंतित हूँ!! क्या विगत वर्ष के जैसा होगा ??
विगत वर्ष का भी यूं ही सत्कार किया था ।
नूतन विधियों से स्वागत, मनुहार किया था।।
खूब पटाखे फोड़े, फुलझड़ियाँ छोड़ी थीं।
गए वर्ष से कितनी उम्मीदें जोड़ी थीं ।।
सोचा था, आतंक मिटेगा, ग़म कम होगा ।
अब मानव, मानव का सच्चा हमदम होगा ।।
वैमनस्य की गहरी खाई, पट जायेगी ।
मन से, मन की दूरी, निश्चित घट जायेगी ।।
जाति-धर्म, भाषा-भूषा के भेद मिटेंगे ।
मानवता के कलुष धुलेंगे, खेद मिटेंगे ।।
अब न रहेगी पंगु, मूक, रोगी मनुष्यता ।
हर बन्धन से त्वरित, मुक्त होगी मनुष्यता ।।
मानव, पर-पीड़ा को सहज समर्पित होगा ।
तन से, मन से, जन-सेवा को अर्पित होगा ।।
किन्तु रहा अफ़सोस, स्वप्न निष्प्राण रह गया ।
ह्रदय रह गया शुष्क, भाव पाषाण रह गया ।।
आशा का यह दीप, पुनः वाले बैठा हूँ !
आँखों में यह स्वप्न, सतत पाले बैठा हूँ !!
नया साल, शायद! मुझ पर उपकार करेगा ।
मेरे भोले सपने को साकार करेगा ।।

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