सोशल मीडिया,विकी,पॉडकास्ट,वेबब्लॉग,मिक्रोब्लॉगिंग जैसे टूल्स ने लोगो के ज्ञान प्राप्ति के माध्यमों को एक ऐसा मंच प्रदान किया जहाँ एक क्लिक से पूरी दुनिया  से जुडी जान कारी उनके सामने फैली पडी थी, .वहीँ लोगो के विभन्न समूहों के बीच ज्ञान,सूचना को ऑनलाइन साझा करने से संचार कौशल को बढ़ावा मिला। स्काईप,ऑरकुट,ट्विटर,माइस्पेस ने ख़ासकर युवा वर्ग को एक ऐसा मौक़ा दिया जहाँ उन्हें अपने साथियों के साथ वो सब कुछ शेयर करने की आज़ादी मिली जो वो  चाहते थे शेयर करसकते थे. 

सोशल मीडिया  का दिशा प्रवाह….! 

सीमा आरिफ

सीमा आरिफ

भारत में इंटरनेट क्रांति के आने से सवांद के माध्मयों में एक व्यापक बदलाव आया जिसके कारण लोगो के सामाजिक जीवन का तानाबाना धीरे धीरे बदलने की  तरफ अग्रसर होने लगा.मुझे आज भी याद है 1992 में जब हमारे यहाँ लैंड-लाइन फोन लगा था तो यह हमारे लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था क्योंकि पूरे  गाँव में हमारा परिवार ही ऐसा वाहिद परिवार था जिसके यहाँ फोन लगा था, और देखते ही देखते पूरे मोहल्ले के फोन हमारे यहाँ आने शुरू हो गए | हम उन खास  लोगो में गिने जाने लगे जिनका सोशल स्टेटस ऊँचा होता था, इस एक फोन के कारण ही हमें अपने पूरे मोहल्ले के लोगों की पर्सनल लाइफ, के बारे में एक एक  चीज़ मालूम होती थी | पड़ोसियों के घर आने-जाने का यह बहाना भी हुआ करता था और उनके निजी जीवन को कुरेदने का एक सफल हथियार भी |
धीरे-धीरे जनसंचार के माध्यमों का विस्तार हुआ,इन्टरनेट क्रांति से सवांद की ज़रिये बढ़े, और लोगों को अपनी लाइफ में प्राइवेसी नाम का शब्द जोड़ने का मौक़ा  मिल गया. जिससे एक व्यापक पैमाने पर लोगो के आपस में संवाद स्थापित करने के टूल्स बदले,साथ ही ख़त ओ किताबत करने के ज़रिये,संवाद के माध्यम भी  बदले. पिछले 15-16 सालों में इंटरनेट नेटवर्किंग एक फिनोमिना के रूप में भारत में तेज़ी के साथ उभरा, जिसने लोगो के जीवन को एक आयाम भी दिया, साथ  ही साथ सोचने के नए तरीक़े,नए ज़रिये भी प्रदान किये,ट्विटर,फेसबुक, फ्लिकर, युट्यूब जैसे सोशल नेटवर्किंग उपकरणों ने पारंपरिक मीडिया की तुलना में विचारों  के आदान प्रदान में एक अहम भूमिका निभाई हमारे कामकाज के स्थानों से ले कर सामाजिक जीवन में भी इंटरनेट के दखल को स्पष्ट देखा जा सकता है
सोशल मीडिया,विकी,पॉडकास्ट,वेबब्लॉग,मिक्रोब्लॉगिंग जैसे टूल्स ने लोगो के ज्ञान प्राप्ति के माध्यमों को एक ऐसा मंच प्रदान किया जहाँ एक क्लिक से पूरी दुनिया  से जुडी जान कारी उनके सामने फैली पडी थी, .वहीँ लोगो के विभन्न समूहों के बीच ज्ञान,सूचना को ऑनलाइन साझा करने से संचार कौशल को बढ़ावा मिला। स्काईप,ऑरकुट,ट्विटर,माइस्पेस ने ख़ासकर युवा वर्ग को एक ऐसा मौक़ा दिया जहाँ उन्हें अपने साथियों के साथ वो सब कुछ शेयर करने की आज़ादी मिली जो वो  चाहते थे शेयर करसकते थे.
भारत के युवा वर्ग के लिए 2007 में फेसबुक, माइस्पेस के आने के बाद एक ऐसा स्थान मिल चुका था जहाँ पर बिना रोक टोक के कॉलेज के अपने दोस्तों  साथियों के साथ कम्युनिकेशन कर सकते थे.जिसमें वो अपना प्रोफाइल,परिचिय,फोटोज,वीडियो अपने मीलों दूर बैठे दोस्तों से साझा कर सकते है. एक सर्वेक्षण के  अनुसार इस समय भारत भर में 800 मिलियन लोग सोशल मीडिया का किसी रूप में उपयोग कर रहे हैं. सोशल मीडिया के दुवारा हर एक वर्ग को एक  आवाज़,एक पहचान मिली,जिससे वो अपनी हक की बात को या किसी अनुचित चीज़ के विरोध की बात हो इन्टरनेट और सोशल मीडिया के दुवारा उन्हें अपनी बात को जनता के बीच अधिक से अधिक पहुचाने के लिए एक सीढ़ी मिली .लोगों ने यहाँ पर अपनी पहचान यानी वर्ग, समाज, जाति, समुदाय के हिसाब से भी ग्रुप बनाये और वह ज़्यादा से ज़्यादा लोगो तक अपनी बात को पहुचा पाए. अन्ना हजारे आन्दोलन, केजरीवाल दुवारा सरकार एवं भष्टाचार के ख़िलाफ़ छेड़ी गयी मुहीम हो या १६ दिसम्बर का बलात्कार जिसमें हम ने देखा कि सरकार के ख़िलाफ़ संसद से इंडिया गेट, रायसीना हिल तक हज़ारों नौजवानों और बड़ी तादात में लोगो को
लामबंध होने के लिए किसी मुखिया या किसी लीडर की ज़रुरत नहीं पडी बल्कि लोग केवल सोशल मीडिया के दुवारा ही सरकार पर रातों रात दबाव डालने में  सफल रहे | पूरे देश से लगभग 600 से अधिक विभिन्न महिला संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किये, इस विरोध प्रदर्शन में सोशल नेटवर्किंग साइटों जैसे फेसबुक,  व्हाट्सऐप दुवारा एक ज़बरदस्त मुहीम लोगों दुवारा चलाई गयी, लोगों ने अपने काले रंग की डॉट इमेज को अपनी प्रोफाइल पिक्चर बना कर गुस्सा ज़ाहिर किया |

साभार google से

साभार google से

सोशल मीडिया,

इस केस में दिलचस्प बात यह थी कि लगभग दस हज़ार लोगों ने एक साथ ऑनलाइन याचिका पर हस्ताक्षर किये, तथा सरकार को इतने बड़े लेवल पर जनता के  विरोध का सामना करना पडा | इतने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन को देखते हुए देश की विभिन्न सरकारों को महिलाओं की सुरक्षा के लिए सख़्त क़ानून बनाने पड़े  | जस्टिस वर्मा कमेटी का गठन किया गया और रेप से जुड़े क़ानून में बदलाव किये गए | दूसरी तरफ़ छत्तीसगढ़ की एक आदिवासी स्कूल शिक्षिका ‘सोनी सॉरी’ पर  2011 में जबरन वसूली, आपराधिक साजिश और गैर कानूनी गतिविधियों सहित विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया, सोनी सॉरी छत्तीसगढ़ की एक
साधारण सी स्कूल टीचर रही थी, पर सोशल मीडिया पर सामाजिक कार्यकर्ताओं, सामाजिक संग़ठनों दुवारा एक मुहीम चलकर प्रशासन पर दबाव डाला गया |  छत्तीसगढ़ की एक मामूली सी शिक्षिका के लिए दिल्ली के जंतर मंतर से संसद तक आंदोलन, प्रदर्शन किये गए | लोगों ने सोनी सॉरी के जेल में रहने तक उसको  चिट्ठियाँ, पत्र लिखे एवं उसके नाम से हर शहर के नाम से save soni sori नाम का फेसबुक पेज बनाया गया, सरकार दबाव में आई और जुलाई 2013 में  सोनी सॉरी को जेल से रिहा कर दिया गया |
इसी तरह से आयरन लेडी ऑफ़ मणिपुर कही जाने वाली सोशल एक्टिविस्ट ‘इरोम शर्मीला’ जोकि पिछले 15 वर्षों से मणिपुर में दस मासूम नवयुवको की पुलिस  दुवारा निर्मम हत्या के खिलाफ और सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम (एएफएसपीए), को मणिपुर से हटाने की मांग को लेकर भूक हड़ताल पर है), के  आंदोलन को सोशल मीडिया पर लोगों का ज़बरदस्त रिस्पांस, सहायता, सहयोग मिला।
बिनायक सेन छत्तीसगढ़ के सोशल एक्टिविस्ट की, सरकार दुवारा नक्सलवाद के आरोप में गिरफ्तारी से लेकर ज़मानत तक में हमें सोशल मीडिया के दुवारा लोगों  का विशेषकर युवाओं की इस निरंकुसता के ख़िलाफ़ एक बुलंद आवाज़ नज़र आई और उसका सकारात्मक असर भी उनकी ज़मानत के रूप में नज़र आया |

मुझे लगता है कि यही वो स्थान, प्लेटफार्म है जो लड़के-लड़कियों में किसी भी प्रकार का जेंडर भेदभाव किये एक सामान मंच प्रदान करता है | हिन्दुस्तान की लड़कियों के लिए इस तरह के एक प्लेटफार्म की बेहदज़रूरत भी मेरे ख़याल से थी क्योंकि यहाँ वे किसी भी दायरे या बंदिश में बंधी नहीं है | यहाँ उनकी एक ऐसी दुनिया है जो उनको उनकी सोच से भी ज़्यादा सोचने लिखने समझने की आज़ादी प्रदान कर रही थी | खासकर लड़कियों के सामने एक ऐसा तैयार मंच खड़ा था जहाँ उनकी सोच को कोई रोक टोक करने वाला नहीं था, वो अपनी मर्ज़ी से अपनी
तस्वीरों,वीडियो से लेकर अपनी भावनाओं को व्यक्त कर पाई | वे खुद ही फेवरिट भी है, कवियत्री  भी है, डांसर, नाटककार, लेखक वह सब कुछ है जिसकी कल्पना उसके मन के अंदर कहीं दबी थी बस सोशल मीडिया ने उसे पंख दिए |  साहित्य की अगर हम बात करें तो ख़ासकर हिंदी साहित्य जिसके बारे में कहा जाने लगा था कि हिंदी साहित्य या इस ज़ुबान को पढ़ने वाले लोगों की संख्या कम  होती जा रही है जिसका बड़ा कारण नौजवानों का किताबों को दरकिनार करके फोन या ऐसी मशीनों की और बढ़ता रुझान माना गया, पर यहाँ पर भी हम देखते है
सोशल मीडिया पर युवा वर्ग के बीच हिंदी साहित्य को ज़बरदस्त रेस्पोंसे पिछले 2-3 सालों में मिला है | लोगों के बीच इ-बुक्स, फेसबुक ग्रुप, विभिन्न हिंदी पोर्टल  आदि ने हिंदी साहित्य को फिर से जीवंत कर दिया | यहाँ पर पुस्तक समीक्षाएं, कविता लेखन, ग़ज़ल, लघु कहानियों, उपन्यास आदि लगभग सभी विधाओं में  साहित्य बड़ी मात्रा में उपलब्ध है | लोगो में ग़ज़ल, शेरो-शायरी की ओर लगाव बढ़ रहा है | आज इंटरनेट के इस दौर में हर एक दूसरा व्यक्ति लेखक कवि के रूप  में नज़र आ रहा है निश्चित तौर पर यह संकेत है कि आज युवा पीढ़ी के मन में कुछ सवाल तो हैं, यह वहस का मुद्दा हो सकता है कि वे कोन सी दिशा पकड़ रहे हैं | यह सब भी इसी लिए हो पा रहा है कि उन्हें अपनी किसी रचना या अभिव्यक्ति को छपवाने के लिए किसी पब्लिशर की ज़रुरत नहीं है | बल्कि उन्हें यह  सहूलियत सोशल मीडिया दे रह है |
इस समय बिजूका, बिजूका इंदौर, दस्तक, दोस्त दूर देश के, सरोकार आदि ग्रुप रचनात्मक, सांस्कृतिक, सामाजिक और साहित्यिक गतिविधियों के साथ सकारात्मक  इस्तेमाल की मिसाल हैं | ऐसे ग्रुप जो व्हाट्सअप आदि पर बने और संचालित हैं | यहाँ पर मीलों दूर बैठकर भी लेखक, पाठक और दोस्त व्हाट्सअप् के माध्यम से  राबता कयाम कर साहित्यिक सामाजिक वह्सों में जुटे हैं | इसके अलावा अनेक ऐसे ब्लॉगस,पेज हैं जो हिंदी साहित्य को सोशल मीडिया के ज़रिये फ़िर से नव रूप  देने के नेक काम में जुटे हैं |  बावजूद इसके सोशल मीडिया के इन तमाम मंचों पर अवतरित होती वैचारिक और भावनात्मक अभिव्यक्ति की उत्तेजित धारा में निर्विवेक होकर बह जाना या  सम्पूर्ण सच का माध्यम स्वीकार लेना भी बड़ी मूर्खता होगी |
क्योकि सोशल मीडिया का उपयोग अमानवीय तरीकों और गलत वजहों से भी किया जा रहा है, जिसके बारे में हमें गहनता
से विचार करने की भी आवश्यकता है | असम के दंगे हो या मुज़फ़्फ़रनगर की बात जहाँ एक तरफ व्हाट्सअप, यूट्यूब, फेसबुक का विकृत रूप में राजनैतिक और असामाजिक इस्तेमाल तात्कालिक हालातों में आग में घी  डालने जैसा था वहीँ सामाजिक रूप से वोट की राजनीति को समझने समझाने और आपसी एकता के लिए मानवीय सन्देश भी इन्हीं मंचों पर भरे पड़े थे | असम  के दंगों के दौरान सोशल मीडिया के ज़रिये फैलाई गई भ्रांतियों से डर कर ही दूर प्रदेशों में बसे असमवासीयों को अपना काम-धाम छोड़कर वापस आना पड़ा था.
संचार क्रांति के आने से किसी भी विषय पर जनता का इंस्टेंट रिस्पांस मिलना कुछ विचारधारा के लोगों के लिए एक प्लेटफार्म साबित हुआ उन्होंने अपनी सोच को ज़्यादा से ज़्यादा लोगो तक पहुचने में इसे एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल भी किया, जिसमें 2015 के लोकसभा चुनाव को याद किया जा सकता है | वहीं राजनेताओं, लेखकों के बहस, मुबाहिसों की जगह केवल न्यूज़ चैनल के बंद कमरे ही नहीं रह गए है, अब वे अपनी बहस को ‘ट्विटर’ के माध्यम से जारी  रखते हैं|
इस तरह से सोशल मीडिया ने हर एक आम व्यक्ति को एक सोच, नजरिया और उस नज़रिये से समाज को देखने, लिखने की भरपूर आज़ादी दी है. आज हम  इसके बिना अपने अस्तित्व की कल्पना करें तो यह बेमानी होगा और न आने वाले समय में हम सोशल मीडिया के बिना लाइफ को तरक्की की तरफ़ ले जाने की  कल्पना कर पाएंगे | लेकिन रचनात्मक और तार्किक तरीकों से सही दिशा में इसका उपयोग निश्चित ही आम जन को अपनी बात रखने का यह एक मज़बूत धारा  के रूप में साबित हो सकता है |

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