1917 में ऐनी बेसेंट (जो होमरुल लीग की संस्थापकों में थी) उन्होंने मार्गेट कूजिंस, सरोजनी नायडू समेत अन्य अनेक कांग्रेसी महिलाओं के साथ स्त्रियों के वोट देने के अधिकार की मांग की। ऐनी बेसेंट का विचार था कि होमरुल आंदोलन में स्त्रियों की सहभागिता से आंदोलन की शक्ति दस गुना बढ़ जायेगी।

डा० नमिता सिंह’ के द्वारा, स्त्री आन्दोलन के इस विस्तृत विमर्श की ‘आठवीं क़िस्त’…| संपादक

स्त्री आंदोलन-इतिहास और वर्तमान 

डॉ० नमिता सिंह

सदी के उत्तरार्ध में शुरू हुए आर्य समाज आंदोलन ने तो लड़कियों की विवाह की उम्र 16 वर्ष करने के लिये प्रचार किया। इन सारे प्रयासों के फलस्वरूप 1891 में एज आॅफ कंसेंट, लड़की के लिये 10 से बढ़ाकर 12 वर्ष कर दी गयी। सामाजिक अंतर्विरोध इस अवसर पर भी देखने को मिले। परंपरागत हिंदू समाज तो विरोध कर ही रहा था, सामाजिक रूप से सुधारों के प्रति सक्रिय प्रबुद्धजनों ने भी एक समय में बालविवाह को प्रतिबंधित करने और विवाह में रजामंदी की उम्र लड़कियों के लिये बढ़ाई जाने का विरोध किया। 1839 में स्थापित तत्वबोधिनी सभा के संस्थापक रवींन्द्रनाथ टैगोर ने भी इन प्रतिबंधों का विरोध करते हुए इन्हें भारतीय संस्कृति और परंपराओं पर ब्रिटिश शासकों का अनुचित हस्तक्षेप कहा और अपने इस मंतव्य को राष्ट्रवाद से जोड़ा।

लेखन के स्तर पर इस कालखंड की दो कृतियों का उल्लेख करना उचित होगा जो उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में बदल रहे सामाजिक परिदृश्य और उभरती हुई स्त्री चेतना को प्रदर्शित करते हैं। 1882 में ‘स्त्री-पुरुष तुलना’ मराठी में ताराबाई शिंदे द्वारा लिखी गयी पुस्तिका है जिसमें स्त्री समाज के प्रति स्त्री और पुरुषों के गुणों की तुलना करते हुए वो सिद्ध करने का प्रयास करती हैं कि स्त्री में भी पुरुषों के समान योग्यता है और क्षमता है। पुरुषों में भी अनेक दुर्बलताएं और अवगुण हैं। फिर स्त्रियों को हीन सिद्ध कर उन्हें निम्नतर जीवन जीने के लिये क्यों विवश किया जाता है। उत्तर भारत में 1882 में ही ‘एक अज्ञात हिंदू औरत’ द्वारा ‘सीमन्तनी उपदेश’ पुस्तिका लिखी गयी। पुस्तक की भाषा और विषय से ज्ञात होता था कि अनाम लेखिका शिक्षित थी और आर्य समाज से प्रभावित थी। सीमन्तनी उपदेश में लेखिका ने समाज में चार दीवारी के भीतर बंदिनी स्त्री के निम्नतर जीवन और हीन स्थितियों पर आक्रोश प्रकट करते हुए पुरुष समाज की मानसिकता और सामाजिक स्वरूप की चर्चा की है और दुख प्रकट किया है कि स्त्रियों को किन भयानक स्थितियों में जीवन व्यतीत करना पड़ता है। पूरा जीवन वे अमानवीय असमानता और अन्याय का शिकार होती हैं। ये दोनों ही पुस्तकें स्त्री शिक्षा के फलस्वरूप बदल रही स्त्री मानसिकता और सामाजिक चेतना की प्रतीक हैं। एक उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि येन केन प्रकारेण कुछ शिक्षा प्राप्त कर अनेक स्त्रियों ने हिंदी, अंग्रेजी, बंगला, उर्दू तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अपनी आत्मकथाएं लिखीं और अपने समय के समाज और परिस्थितियों का जीवंत वर्णन किया है।

उन्नीसवीं सदी के अंत से इन समाज सुधार आंदोलनों का प्रत्यक्ष प्रभाव दिखाई देना शुरू हो गया था। इस बीच इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना हो चुकी थी और आरंभिक प्रशासनिक सुधार कार्यक्रमों से आगे अब इसकी राष्ट्रीय चेतना का स्वरूप प्रखर हो रहा था। 1916 में होमरूल लीग की स्थापना के साथ भारतीयों द्वारा ‘अपनी सरकार’ अभियान भी शुरू हुआ। 1917 में ऐनी बेसेंट (जो होमरुल लीग की संस्थापकों में थी) उन्होंने मार्गेट कूजिंस, सरोजनी नायडू समेत अन्य अनेक कांग्रेसी महिलाओं के साथ स्त्रियों के वोट देने के अधिकार की मांग की। ऐनी बेसेंट का विचार था कि होमरुल आंदोलन में स्त्रियों की सहभागिता से आंदोलन की शक्ति दस गुना बढ़ जायेगी।

अब तक स्त्री शिक्षा का उद्देश्य उनके स्त्रिायोचित गुणों का विकास कर उनकी मानसिक और व्यवहारिक क्षमता में वृद्धि करना था ताकि उनके व्यक्तित्व का विकास हो, वे समतापूर्ण सामाजिक वातावरण में अपने परिवार और संतति को उन्नतशील बना सकें। धीरे-धीरे उच्च तथा मध्यवर्गीय परिवारों की जो स्त्रियां शिक्षित थीं वे अब राष्ट्रवादी आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाने लगीं और शीर्ष नेतृत्व की पंक्ति में उन्हें भी स्थान मिलने लगा। राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन जैसे-जैसे तेज हुआ विभिन्न वर्गों और समूहों की स्त्रियों की उपस्थिति आंदोलनों के विभिन्न कार्यक्रमों में अधिक दिखाई देने लगी। स्त्री चेतना और सशक्तीकरण अब राष्ट्रीयता का पर्याय बनने लगे। घर के पारंपरिक वातावरण से निकल कर हर वर्ग और समुदाय की स्त्रियां धरना और जुलूसों में हिस्सेदारी करने लगी थीं और गिरफ्तारी भी देती थीं।

अनेक पढ़ी लिखी स्त्रियों ने लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और राष्ट्रीय आंदोलन के लिये महिलाओं को जागरुक किया। अनेक पत्रा-पत्रिकाओं का महिलाएं संपादन कर रही थीं। अशिक्षा, बाल विवाह, पर्दा प्रथा, जादू टोना जैसी सामाजिक कुरीतियों और अंधविश्वासों के विरुद्ध लगातार विभिन्न पत्रा पत्रिकाओं में सामग्री प्रकाशित होती थी जिनमें महिलाओं द्वारा भी लेख आदि लिखे जाते थे। स्त्री सशक्तीकरण के पहले चरण में ‘शिक्षित स्त्री और स्वस्थ स्त्री’ ही अभियान का उद्देश्य था और स्त्री का सर्वोपरि गुण ‘मातृत्व’ के रूप में स्थापित किया जाने लगा था और जो अंतिम परिणति के रूप में राष्ट्रीयता का स्वरूप लेने लगा। स्वस्थ स्त्री और स्वस्थ मातृत्व को आधार मानते हुए 1908 में इंडियन फैक्ट्री कमीशन ने स्त्रियों के काम के घंटे निश्चित करने की आवश्यकता पर बल तो दिया लेकिन व्यवहारिक तौर पर अधिक सुधार नहीं हुआ। अलबत्ता बीसवीं सदी के पहले दशक में ‘शिशु कल्याण’ जैसे कार्यक्रमों की योजना बनने लगी जिसमें गर्भावस्था में देखभाल और प्रसव के समय उचित सहायता के रूप में ‘शिशु कल्याण योजना’ सामने आई। इस प्रकार श्रमिक माता की भूमिका भी स्वस्थ श्रमिक पैदा करने वाली स्त्री के रूप में ही स्थापित करने का प्रयास हुआ।

सरोजनी नायडू ने अपने एक भाषण में कहाµ‘पालना झुलाने वाले हाथ ही विश्व पर शासन करते हैं।’ कांग्रेस के एक शीर्ष नेता सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने भी स्वाधीनता आंदोलन में देशवासियों का आह्वान करते हुए कहाµ‘‘मित्रो, आप चाहे किसी भी जाति या वर्ण के हों, आइये हम सब अपने मतभेद भुलाकर मातृत्व के झंडे तले एकजुट हो जाएं (उद्धृत-राधा कुमार-स्त्री संघर्ष का इतिहास)

हिंदी और बंगला में पत्रा पत्रिकाओं का प्रकाशन उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध से ही शुरू हो गया था। अंतिम दशक तक आते आते पढ़ी लिखी स्त्रियों की भागीदारी अब साहित्य और पत्रकारिता में भी बढ़ रही थी। कमला पत्रिका (स्थापना 1907, संपादक जीवानंद शर्मा) में पुष्प कुमारी नामक महिला जो पत्रिका के महिला खंड की सम्पादक थीं, लगातार धार्मिक अंधविश्वासों, पर्दा प्रथा, बालविवाह आदि के विरुद्ध लिख रही थीं। 1907 में ही कुमुदिनी मित्रा ने ‘सुप्रभात’ नामक पत्रा शुरू किया। 1924 में ‘महिला महत्व’ का संपादन रमादेवी और पार्वती देवी कर रही थीं। पत्रिका में स्त्रियों के बीच राष्ट्रीय चेतना के प्रसार हेतु सामग्री प्रकाशित होती थी। 1931 से प्रकाशित पत्रिका ‘नारी गौरव’ पत्रिका की संपादक यशोदा देवी थीं। उनके पत्रा में एक स्तंभ ‘बालिका लेखमाला’ के रूप में था। 1938 से आरंभ हुई पत्रिका ‘महिला’ की संपादक सीता देवी थीं। सौदामिनी मेहता इस पत्रिका की नियमित लेखिका थीं और वे स्त्रियों की शिक्षा, उनके उत्थान और राष्ट्रीय आंदोलन में उनकी भागीदारी से संबंधित लेख लिखा करती थीं। सुभद्रा कुमारी चौहान कांग्रेस के राष्ट्रीय आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में थीं और राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत हिंदी की महत्वपूर्ण लेखिका भी थीं दूसरा प्रमुख नाम महादेवी वर्मा का है। राष्ट्रवादी चेतना के साथ स्त्री अस्मिता की प्रबल पक्षधर उनकी पुस्तक ‘शृंखला की कडि़यां’ (1938) एक महत्वपूर्ण पुस्तक है। दूसरी अन्य महत्वपूर्ण पत्रा-पत्रिकाएं भी लगातार स्त्री केंद्रित सामग्री प्रकाशित करती थीं। अन्य अनेक स्त्रियां जो राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय थीं, उनमें श्रीमती रामेश्वरी नेहरू ने 1909 में ‘स्त्री दर्पण’ नामक मासिक पत्रिका का संपादन किया। रूपकुमारी नेहरू ने लड़कियों के लिये पत्रिका ‘कुमारी दर्पण’ प्रकाशन किया। ‘गृहलक्ष्मी’ पत्रिका भी स्त्रियों को समाज और राष्ट्र से जुड़े प्रश्नों पर संबोधित करती थी। महाराष्ट्र में पंडिता रमाबाई केवल सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता ही नहीं बल्कि लेखन के लिये भी जानी गयीं। उनकी पुस्तक ‘हाई कास्ट हिन्दू वुमन’ भारतीय समाज की स्त्रियों की त्रासदी का लेखा जोखा है। इसके अतिरिक्त काशीबाई कानितकर, पार्वती बाई, रुक्मणी बाई आदि भी लेखन के माध्यम से जानी जाती थीं। ‘इंडियन लेडीज़ मैगज़ीन’ की संपादक कमला सत्यनंदन थीं। बंगाल में बंगला और अंगे्रेजी में लिखने वाली रुकैया सखावत हुसैन का संपूर्ण लेखन स्त्री जीवन के विविध पक्षों पर था। उनकी कृति ‘अबरोध बासिनी’ में हिन्दू और मुस्मिल दोनों समाजों की स्त्रियों में पर्दा प्रथा की भीषण और अमानुषिक त्रासदी के अनुभवों की गाथा है।

इस दौरान राष्ट्रीय चेतना के उभार तथा गौरवपूर्ण इतिहास-संस्कृति का स्मरण कराने हेतु अतीत के गर्भ से और इतिहास के पन्नों से निकालकर भारतीय गौरव के प्रतीक पुरुषों (महाराणा प्रताप, शिवाजी आदि) और धार्मिक मिथकों जैसे माँ दुर्गा, माँ काली को भारत माता के शक्ति स्वरूप में स्थापित करने का प्रयास भी राष्ट्रवादियों द्वारा किया जाने लगा। गोखले द्वारा बीसवीं सदी के पहले दशक में गणेश चतुर्थी को व्यापक स्तर पर आयोजित कर पूरे हिन्दू समाज को एकजुट कर राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम से जोड़ने की कोशिश भी की गयी। इससे पुनरुत्थानवादी राजनीतिक परिदृश्य भी बनने लगा जिससे आगे चलकर सांप्रदायिक स्तर पर अनेक धाराएं और अंतर्धाराएं विकसित हुईं। बंगाल में दुर्गा पूजा और काली पूजा के सामूहिक आयोजन होने लगे जिनका निरंतर विस्तार हुआ। माँ दुर्गा और माँ काली के मिथक से जोड़कर उसे स्त्री समुदाय का शक्तिरूप पुनरुत्थानवादियों द्वारा राष्ट्रीय चेतना की एक समानांतर धारा निर्मित करने का प्रयास था।

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