सुसंगठित रूप में स्त्री अधिकारों के लिये आंदोलन उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के शुरूआती दशक से ही माने जा सकते हैं। लैंगिक असमानता की पोषक सामाजिक व्यवस्था के बदलाव और स्त्री अधिकारों के लिये संघर्ष नारीवादी आंदोलनों का आधार रहा है। योरोप के नारीवादी आंदोलनों को मुद्दों पर आधारित तीन कालखंडों में चिन्हित किया जा सकता है। पहला काल खंड उन्नीसवीं सदी से लेकर बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक माना जा सकता है जो स्त्री के घर से निकल विभिन्न स्तरों पर श्रमिक की भूमिका के साथ मध्यवर्गीय चेतना के उदय का परिणाम थी। दूसरा कालखंड बीसवीं सदी के सातवें दशक से और तीसरा अंतिम दशक से माना जा सकता है। इन विभिन्न कालखंडों में भिन्न-भिन्न प्रकार के विचार और उनके आधार पर अनेक सैद्धांतिक दर्शन प्रस्तुत हुए जो निश्चित रूप से अलग-अलग दृष्टिकोणों से थे और विभिन्न स्त्री समूहों की स्थितियों को संज्ञान में लेकर निर्मित हुए थे।  

डा० नमिता सिंहके द्वारा, स्त्री आन्दोलन के इस विस्तृत विमर्श को निरंतर किस्तों में प्रकाशित आलेख की ‘तीसरी  क़िस्त’ के बाद के बाद अगली क़िस्त जल्द ही आप पढेंगे ….| संपादक  

पश्चिमी नारीवाद की अवधारणा और विभिन्न नारीवादी आंदोलन…..

से आगे…. Namita Singh

कहा कि ‘‘स्त्रिायोचित स्वभाव (फेमिनिज़्म) जैसी बात जो स्त्रियों के लिये निर्धारित की जाती है वह एक नकली चीज है और कुछ दिशाओं में बाध्यतापूर्ण दमन और कुछ दिशाओं में अप्राकृतिक फैलाव का परिणाम है।’’ मिल ने स्त्री पराधीनता का कारण समाज द्वारा निर्मित व्यवस्था को बताया। इसी कड़ी में यहाँ अंग्रेजी की लेखिका वर्जीनिया वुल्फ़ का जिक्र करना समीचीन होगा जो नारीवादी सोच की लेखिका थी और अपने लेखों-भाषणों में उन्होंने घर-परिवार और समाज के स्तर पर स्त्री क्षमताओं को पहचानने और एक व्यक्ति के रूप में अपने स्वतंत्रा व्यक्तित्व के निर्माण पर बल दिया। बीसवीं सदी के चौथे दशक में लिखी उनकी पुस्तक ‘वन्स ओन रूम’ स्त्री अधिकारों के विमर्श में संदर्भ के रूप में आज भी याद की जाती है। योरोप में श्रमिक वर्ग के उदय और उनके संघर्ष एक ओर थे तो मध्यवर्ग की जागरुक स्त्रियों की बढ़ रही सक्रियता का परिणाम हुआ कि वहाँ समान अधिकारों के लिये संघर्ष की शुरूआत वोट के अधिकार के लिये हुई और उसके लिये प्रदर्शन आदि का सिलसिला भी शुरू हुआ।। घर से बाहर निकल आर्थिक आत्मनिर्भरता और सामाजिक जीवन में अपनी उपस्थिति से आश्वस्त अब महिलाएं जागरुक थीं और पुरुष समाज के बीच स्वय्म की स्थिति का आकलन करते हुए समान अधिकारों के लिये संघर्ष की राह पर चल पड़ी थीं। पुरुषों के समान वोट के अधिकार के लिये उनका आंदोलन योरोप के लगभग सभी देशों में किसी न किसी रूप में कहीं उग्र तो कहीं संतुलित रूप में था। बीसवीं सदी के पहले दशक में अमरीकी श्रमिक महिलाओं ने कई दशकों के संघर्ष के बाद काम के घंटों में कटौती के साथ अनेक अन्य मांगों के स्वीकार किये जाने पर सफलता प्राप्त की थी।

स्त्रियों की आंदोलनकारी भूमिका और समान अधिकारों के लिये संघर्ष ने विचार और दर्शन के रूप में स्त्री सरोकारों को मुखर किया। सामाजिक रूप से सक्रिय अनेक स्त्रियों ने अपने व्यापक अनुभवों और चिंतन के आधार पर स्त्री समानता के प्रयासों को आंदोलनकारी स्वरूप प्रदान किया। इसने विश्वस्तर पर लैंगिक असमानता के प्रश्नों को उठाया और स्त्रीवाद या स्त्रीविमर्श या फेमिनिज़्म जैसी संज्ञा प्रदान कर चिंतन और अध्ययन की एक नयी दिशा का निर्माण किया।

आज भारत सहित विश्वस्तर पर विश्वविद्यालयों में स्त्री अध्ययन केंद्र हैं। असंख्य संस्थाएं स्त्री कल्याण और स्त्री सरोकारों पर न केवल अकादमिक कार्य कर रही हैं बल्कि व्यवहारिक स्तर पर जरूरतमंद स्त्री समूहों के बीच संवाद और सहायता प्रदान करने का काम भी रही हैं। ये कार्यक्षेत्र मध्यवर्ग से लेकर धार्मिक, जातीय, अल्पसंख्यक, आदिवासी, रंगभेद आधारित, वंचित, शोषित समाजों के बीच हैं।

सुसंगठित रूप में स्त्री अधिकारों के लिये आंदोलन उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के शुरूआती दशक से ही माने जा सकते हैं। लैंगिक असमानता की पोषक सामाजिक व्यवस्था के बदलाव और स्त्री अधिकारों के लिये संघर्ष नारीवादी आंदोलनों का आधार रहा है। योरोप के नारीवादी आंदोलनों को मुद्दों पर आधारित तीन कालखंडों में चिन्हित किया जा सकता है। पहला काल खंड उन्नीसवीं सदी से लेकर बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक माना जा सकता है जो स्त्री के घर से निकल विभिन्न स्तरों पर श्रमिक की भूमिका के साथ मध्यवर्गीय चेतना के उदय का परिणाम थी। दूसरा कालखंड बीसवीं सदी के सातवें दशक से और तीसरा अंतिम दशक से माना जा सकता है। इन विभिन्न कालखंडों में भिन्न-भिन्न प्रकार के विचार और उनके आधार पर अनेक सैद्धांतिक दर्शन प्रस्तुत हुए जो निश्चित रूप से अलग-अलग दृष्टिकोणों से थे और विभिन्न स्त्री समूहों की स्थितियों को संज्ञान में लेकर निर्मित हुए थे।

स्त्रीवाद आंदोलन की पहली व्यापक लहर वोट के अधिकार के लिये थी। इंग्लैंड मेंं 1905 में वोट के अधिकार के लिये होने वाले आंदोलनों में अनेक महिलाओं की गिरफ्तारियाँ भी हुईं। अंततः 1918 में निजी मकान का स्वामित्व रखने वाली, 30 वर्ष से ऊपर की और फिर 1927 में 21 वर्ष से ऊपर की सभी श्रेणी की महिलाओं को वोट का अधिकार मिला। ब्रिटेन में आंदोलन की अग्रणी नेता एमेलिन पैंक्हर्स्ट को ‘टाइम’ पत्रिका ने बीसवीं सदी की सौ सर्वाधिक प्रभावशाली महिलाओं में मानते हुए लिखा कि ‘उसने पुरातन स्वरूप बदलते हुए एक ऐसी नयी स्त्री का निर्माण किया है जहां से अब पीछे लौटना संभव नहीं।’ इसका प्रभाव योरोप के अन्य औद्योगिक समाज वाले देशों पर भी पड़ा। स्त्री मताधिकार के लिये आंदोलन तेज हुए और धीरे-धीरे वहां की औरतों को भी यह अधिकार मिला। संयुक्त राष्ट्र अमरीका में अग्रणी स्त्री नेतृत्व की भूमिका में लुकेशिया मॉट, एलिजाबेथ कैडी स्टेनटन और सूसन एन्थनी थीं जो न केवल स्त्री-मताधिकार के लिये बल्कि अमरीका में गुलामी की प्रथा के अंत के लिये भी आंदोलनरत थीं। मार्गरेट सेंगर और वोल्टाटीन डी क्लेर जैसी नेत्रियां उस समय भी स्त्रियों के लैंगिक, प्रजनन संबंधी और आर्थिक अधिकारों की मांग कर रही थीं। संयुक्त राष्ट्र अमरीका के सभी राज्यों को स्त्री मताधिकार 1919 में प्राप्त हुआ। प्रारंभिक स्त्री आंदोलनों ने स्त्री अधिकारों के साथ-साथ वैश्विक समाज के सामने प्रस्तुत बड़े सामाजिक-राजनैतिक प्रश्नों को भी अपने आंदोलन का हिस्सा बनाया। इसी तरह 1910 में द्वितीय सोशलिस्ट इंटरनेशनल कोपेनहेगेन में आयोजित हुई जिसमें 17 देशों की महिला प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। संयुक्त राष्ट्र अमरीका की श्रमिक स्त्रियों के अपने अधिकारों के लिये लंबे संघर्ष और विजय को महत्व देते हुए इसमें अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का प्रस्ताव भी स्वीकृत हुआ। इसमें महिलाओं के सम्मान और समान अधिकारों के लिये तथा विश्वस्तर पर सभी देशों की स्त्रियों के वोट देने के अधिकार हेतु आंदोलन का प्रस्ताव पारित किया गया और द्वितीय सोशलिस्ट इंटरनेशनल में स्त्री अधिकारों के लिये आंदोलन के साथ ही विश्व में राजनैतिक स्तर पर होने वाले घटनाक्रमों के परिप्रेक्ष्य में प्रथम विश्वयुद्ध के विरुद्ध जनमत निर्माण का प्रयास भी किया गया और फिर हस्ताक्षर अभियान चलाया गया। यहां यह उल्लेख करना आवश्यक होगा कि प्रथम विश्वयुद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारत सहित विश्व स्तर पर स्त्री आंदोलन तेज हुए और स्त्रियों की भूमिका समाज और राजनीति में उल्लेखनीय रूप से रेखांकित की गयी। इसके बाद फिर मानो स्त्रियां अपने घरों को लौट आईं परंपरागत पितृसत्तात्मकता प्रभावी होने लगी। अलग अलग समाजों में इसके कारण अलग-अलग हो सकते हैं जो एक पृथक अध्ययन का विषय हैं।

स्त्री आंदोलन की दूसरी लहर बीसवीं सदी के सातवें दशक से मानी जा सकती है जिसका मुख्य फोकस पुरुषों के समान स्त्रियों को भी समान राजनैतिक और कानूनी अधिकारों को प्राप्त करना था साथ ही सामाजिक, कानूनी और परंपरागत सांस्कृतिक स्तर पर व्याप्त असमानता के विरुद्ध संघर्ष भी था। वोट के अधिकार के लिये संघर्ष दुनियां के अनेक हिस्सों में बीसवीं सदी के सातवें-आठवें दशक तक भी चला। उदाहरण के लिये फ्रांस में स्त्रियों को पूरी नागरिकता के साथ वोट का अधिकार 1944 में दिया गया। स्विट्जरलैंड में 1971 के फेडरल इलेक्शन में वोट का अधिकार मिला लेकिन स्थानीय संस्थाओं में वोट का अधिकार केवल 1991 में स्त्रियों को प्राप्त हुआ। स्विट्जरलैंड के पड़ोसी दुनियां के संभवतः सबसे छोटे देश लिंचेंस्टीन में यह अधिकार केवल 1984 में ही मिल सका।

विश्व के अन्य भागों में भी व्यवस्था परिवर्तन के साथ स्त्री अधिकारों की शुरूआत हुई। चीन में बीसवीं सदी के मध्य परंपरागत सामंती समाज व्यवस्था और औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के बाद सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ने स्त्रियों को वोट का अधिकार दिया तथा उनको समाज की मुख्य धारा में समावेशित करने के लिये उनके श्रम को समाजोन्मुख बनाते हुए उनके सशक्तीकरण हेतु अनेक कार्यक्रम शुरू किये। रूस में भी 1917 की क्रांति के बाद वहां की समाजवादी सरकार ने स्त्रियों को समान अधिकार प्रदत्त किये और उनके सशक्तीकरण के लिये तथा उन्हें राष्ट्र की मुख्य धारा का हिस्सा बनाकर उनके लिये अनेक परियोजनाएँ शुरू की।

अरब क्षेत्र में स्त्रीवाद अरब राष्ट्रीयता का एक हिस्सा था। 1899 में मिस्र में कासिम अमीन अरब स्त्रीवाद के बड़े पैरोकार के रूप में नज़र आये और स्त्री समाज के लिये सामाजिक सुधारों के लिये उन्होंने प्रयास किये। उनके प्रयासों से ही काहिरा विश्वविद्यालय की स्थापना हुई और वहां के राष्ट्रीय आंदोलन का सशक्तीकरण हुआ। 1923 में हुदा शारवी द्वारा मिस्र के स्त्रीवाद संगठन का गठन हुआ जो अरब स्त्रियों के अधिकार आंदोलन की पहचान बना। मिस्र में 1956 में गणतांत्रिक राज्य की स्थापना के बाद गमाल अब्देल नासिर ने राज्य प्रायोजित स्त्रीवाद कार्यक्रमों की शुरूआत की और वोट के अधिकार के साथ लैंगिक आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव पर कानूनी रोक भी लगायी। बाद के इस्लामिक आंदोलनों में सत्ता परिवर्तन के साथ धार्मिक कट्टरता आधारित शासन व्यवस्था में फिर स्त्री अधिकार समाप्त कर दिये गये। ईरान में 1905 में संवैधानिक क्रांति शुरू हुई जिसका उद्देश्य व्यवस्था को जनतांत्रिक स्वरूप प्रदान करना था। स्त्री अधिकारों के लिये होने वाला आंदोलन इस क्रांति के साथ सम्मिलित हुआ। स्त्री आंदोलन का फोकस शिक्षा और कैरियर में समान अवसर के अतिरिक्त विवाह संबंधों और कानूनों में समान अधिकारों के लिये था। कालांतर में नयी शासन व्यवस्था में स्त्रियों को समानता आधारित अधिकार प्राप्त हुए लेकिन 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद कट्टर धार्मिक नेताओं वाली राज्य व्यवस्था में स्त्री-समानता के ये अधिकार समाप्त हो गये तथा परंपरागत पर्दा प्रथा के साथ स्त्री की भूमिका घर के भीतर तक पुनः सीमित हो गयी। इधर हाल के वर्षों में परिवर्तन के कुछ संकेत दिखाई दे रहे हैं लेकिन पर्दा प्रथा अभी भी वहां अनिवार्य है। सऊदी अरब और उस जैसे कुछ छोटे इस्लामिक देश की स्त्रियां अभी भी समान नागरिक अधिकारों से वंचित हैंंं। तालिबान प्रभावित मुस्लिम आबादी के क्षेत्राों के समान वहां भी स्त्रियां सार्वजनिक स्थलों पर अकेले नहीं जा सकतीं और अनिवार्य रूप से पूरा पर्दा करती हैं।

:- क्रमशः ………..

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