1949 में फ्रांस की प्रसिद्ध लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता सिमोन द बुआ ने ‘सेकिंड सेक्स’ पुस्तक लिखी। इसमें अपने मित्र अस्तित्ववादी फ्रांसीसी लेखक-चिंतक ज्याँ पाल सात्र से सहमत होते हुए स्त्रीवाद-अस्तित्ववाद के प्रकाश में पूर्व प्रचलित स्त्री नैतिकता की अवधारणा को खंडित किया। लैंगिक आधार पर सामाजिक असमानता का विरोध करते हुए उनका प्रसिद्ध वाक्य हैµ‘‘स्त्री पैदा नहीं होती-बनाई जाती है।’’ क्योंकि पुरुष समाज उसे अपने समान नहीं बल्कि (निम्नतर) ‘अन्य’ की श्रेणी में रखता है। विवाह और प्रजनन संबंधी स्त्री अधिकारों और गर्भपात को कानूनी मान्यता हेतु चल रहे उस समय के आंदोलन में ‘‘मैंने गर्भपात कराया है’’ जैसे घोषणा पत्रा पर सीमोन ने भी हस्ताक्षर किये।

डा० नमिता सिंहके द्वारा, स्त्री आन्दोलन के इस विस्तृत विमर्श को निरंतर किस्तों में प्रकाशित आलेख की ‘चौथी   क़िस्त’ के बाद अगली क़िस्त जल्द ही आप पढेंगे ….| संपादक  

स्त्री आंदोलन-इतिहास और वर्तमान… 

लैटिन अमरीकी देशों जैसे क्यूबा, निकरागुआ, ब्राजील, बेनेजुएला, वोलिविया में तानाशाही व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष के बाद स्थापित वहां की समाजवादी सरकारों ने स्त्री समानता और अधिकारों को व्यवस्था के मुख्य एजेंडा का हिस्सा बनाया। पश्चिमी पूंजीवादी देशों की सरकारों की आंख का कांटा बने इन राष्ट्रों ने समाजवादी राज्य की स्थापना के साथ स्त्री अधिकारों का सम्मान करते हुए उन्हें समान रूप से कानून और व्यवहार में समान अधिकार प्रदान किये।

वैश्विक स्तर पर एक सामान्य प्रवृत्ति देखी गयी कि स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु व्यापक जन-आंदोलनों में स्त्रीवाद आंदोलनों ने भी शिरकत की और अहम् भूमिका निभाई। चाहे वह फौजी तानाशाह अथवा राजतंत्रा अथवा उपनिवेशवादी व्यवस्था के विरुद्ध हो। स्त्रियों की समान अधिकार की मांग राष्ट्रीय आंदोलनों के साथ जुड़ गयी। प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भी अनेक राज्य व्यवस्थाओं ने आवश्यकता के अनुरूप स्त्रियों को विभिन्न कार्यक्षेत्रों में अनेक उत्तरदायित्वों से जोड़ा। अंतिम परिणति के बाद चाहे स्वतंत्रता प्राप्ति हो या विश्वयुद्धों की समाप्ति हो, भेदभावपूर्ण सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध स्त्री आंदोलनों की प्रखरता धूमिल हुई और उन्हें मिलने वाला व्यापक जनसर्थन भी मद्धिम हुआ।

स्त्री आंदोलन की दूसरी लहर बीसवीं सदी के सातवें दशक से अधिक स्पष्ट और तीव्र हुई। दरअसल वैश्विक स्तर पर स्त्रीवाद की आधारभूमि का निर्माण हो चुका था। द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद विभिन्न राष्ट्रों में तेजी से राजनैतिक परिवर्तन हो रहे थे और राज्य व्यवस्थाओं का स्वरूप बदल रहा था। पिछली सदी से आरंभ आंदोलनों की पृष्ठभूमि में पिछड़े, वंचित, स्त्री समूहोंं की भागीदारी और उत्पन्न हुए आत्मविश्वास ने अधिकारों के इस संघर्ष को नयी दिशा भी दी। भारत सहित अनेक नवस्वतंत्र राष्ट्रों के अलावा पश्चिम के तथा योरोप के राष्ट्रों में व्यवस्था बदलाव ने स्त्री समानता के संघर्ष को नये आयाम दिये। अब संघर्ष अन्याय और वंचना झेल रही स्त्री के संवैधानिक और सामाजिक स्तर पर समान अधिकारों के लिये था। दरअसल सामाजिक स्तर पर संघर्ष कठिन रहा है क्यों कि यहां मुठभेड़ परंपरागत सामाजिक व्यवहार और स्त्री के प्रति प्राचीन काल से चली आ रही अवधारणा से है जिसको धार्मिक विश्वास और रीतिरिवाजों से बने संस्कार मजबूत करते हैं।

चित्र – अनुप्रिया

1949 में फ्रांस की प्रसिद्ध लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता सिमोन द बुआ ने ‘सेकिंड सेक्स’ पुस्तक लिखी। इसमें अपने मित्र अस्तित्ववादी फ्रांसीसी लेखक-चिंतक ज्याँ पाल सात्र से सहमत होते हुए स्त्रीवाद-अस्तित्ववाद के प्रकाश में पूर्व प्रचलित स्त्री नैतिकता की अवधारणा को खंडित किया। लैंगिक आधार पर सामाजिक असमानता का विरोध करते हुए उनका प्रसिद्ध वाक्य हैµ‘‘स्त्री पैदा नहीं होती-बनाई जाती है।’’ क्योंकि पुरुष समाज उसे अपने समान नहीं बल्कि (निम्नतर) ‘अन्य’ की श्रेणी में रखता है। विवाह और प्रजनन संबंधी स्त्री अधिकारों और गर्भपात को कानूनी मान्यता हेतु चल रहे उस समय के आंदोलन में ‘‘मैंने गर्भपात कराया है’’ जैसे घोषणा पत्रा पर सीमोन ने भी हस्ताक्षर किये।

बीसवीं सदी की एक अन्य स्त्रीवाद आंदोलनकारी अमरीका की बैट्टी फ्रीडमैन और उनकी चर्चित पुस्तक ‘द फेमिनिन मिस्टीक’ (1963) सीमोन की ‘द सेकिंड सेक्स’ के समान उल्लेखनीय है। बैट्टी फ्रीडमैन ने घर के अंदर बंद स्त्री का परंपरागत पत्नी और माँ तक सीमित पहचान का विरोध किया। स्त्री की क्षमता और योग्यता उसे समाज में अलग पहचान दे और वह स्वतंत्रा अस्तित्व का निर्माण कर अपना स्थान बनाये-इस पर बल देते हुए विशेष रूप से मध्यवर्गीय स्त्री को फोकस कर अमरीकी समाज की संरचना को बदलने का प्रयास किया। स्त्रीवाद कार्यकर्ता-लेखिका कैरॉल हानिश ने इस दौर में ‘‘व्यक्तिगत राजनीतिक है’’ जैसी अवधारणा पर बहस करते हुए कहा कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था में घर-परिवार के भीतर स्त्री की जो स्थिति है वह मात्रा पारिवारिक या व्यक्तिगत नहीं है बल्कि चली आ रही स्त्री विरोधी राजनीति का ही परिणाम है। पुरुषप्रधान व्यवस्थागत राजनीति स्त्री जाति की निम्नस्तर स्थिति और लैंगिक असमानता के लिये उत्तरदायी है।

सत्तर के दशक में ‘वीमेन्स लिबरेशन’ जैसा आंदोलन अमरीका में बहुत प्रचलित हुआ। इसमें एक कार्यक्रम ‘ब्रा बर्निंग’ का भी था। वह एक तरह से चली आ रही प्रचलित नैतिक अवधारणाओं तथा स्त्री के स्वरूप और उसकी मन लुभावन भूमिका के अस्वीकार्य का आंदोलन था। स्त्रीवाद के परिदृश्य में यह स्त्री को अलग रूप-रंग में देखने की परंपरा और उसे ‘अलग’ समझने की मानसिकता का विरोध था जिसका परिणाम सामाजिक असमानता में समझा जा सकता था। यह प्रचलित नैतिकतावाद का विरोध भी था जिसका असर भारत के स्त्रीवाद आंदोलन सहित अन्य देशों में भी व्यापक रूप से पड़ा।

‘वीमेन्स लिबरेशन’ का यह आंदोलन अधिकतर उत्साही-मध्यवर्ग में प्रचलित और लोकप्रिय हुआ। लेकिन इसका विरोध अनेक महिला सिविल राइट एक्टीविस्ट ने किया। अफ्रीकी-अमरीकन महिला ग्लोरिया जीन वॉटकिन्स (‘बेल हुक्स’ के नाम से चर्चित) नामक प्रमुख महिला नेत्राी ने स्त्री समाज को बांटने वाली प्रवृत्तियों और मुद्दों को स्त्री मुक्ति आंदोलन में शामिल न करने की आलोचना की। ज़ाहिर है इस मुक्ति आंदोलन ने अफ्रीकी मूल की अमरीकी स्त्रियों के प्रश्नों और अधिकारों को समावेशित नहीं किया था और यह मूलतः उच्च-मध्यवर्गीय श्वेत अमरीकी स्त्रियों तक सीमित था। अल्पसंख्यक अश्वेत अमरीकी स्त्रियों के प्रश्नों को वॉटकिंस ने अपनी पुस्तक ‘फेमिनिस्ट थ्योरी फ्रॉम मार्जिन टु सेंटर’ (1984) में भी विस्तार से उठाया जिसमें आम तौर पर श्वेत स्त्रियों के मुकाबले रंगभेदी मानसिकता के कारण अश्वेत-अमरीकी स्त्रियां अलग प्रकार की सामाजिक-राजनैतिक असमानता का शिकार थीं।

चित्र- अनुप्रिया

बीसवीं सदी के आठवें-नवें दशक तक विश्व के अधिकांश देशों में लोकतांत्रिाक व्यवस्थाएं किसी न किसी रूप में स्थापित हो चुकी थीं। संविधान प्रदत्त और सामाजिक स्तर पर स्त्री के समान अधिकार सैद्धांतिक रूप से मान्य तो हो रहे थे, स्त्रीवाद संगठनों के समय-समय पर विभिन्न मुद्दों पर आंदोलन और उनकी सक्रियता से कानूनों में बदलाव भी हुए और अधिकारों के प्रति जागरुकता भी स्पष्ट होने लगी। स्त्री आंदोलन की तीसरी लहर में एक तरह से दूसरे कालखंड में उठाये जाने वाले मुद्दों का नये सामाजिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में विस्तार हुआ। बीसवीं सदी के आठवें-नवें दशक से विश्व स्तर पर राज्य व्यवस्थाओं में बड़े परिवर्तन दिखाई दिये। समाजवादी सोवियत ब्लॉक खत्म होकर बिखर गया और पूंजीवादी अमरीका के नेतृत्व में पश्चिमी देशों की साम्राज्यवादी नीतियां मजबूत हुईं। इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में विश्वव्यापी मंदी की लहर के कारण बेरोजगारी का नया स्वरूप निर्मित हुआ। इसी समय में दूर संचार माध्यमों का अपरिमित विस्तार और मीडिया की व्यापक सामाजिक भूमिका के साथ और वैश्विक स्तर पर विभिन्न व्यवस्थाओं द्वारा कमोबेश, सहमत अथवा असहमत होते हुए भी उदारवादी-बाजारोन्मुखी आर्थिक व्यवस्था का अंगीकार बीसवीं सदी के अंतिम खंडों के प्रमुख घटनाक्रम बने। इसके साथ ही लातिन अमरीकी देशों क्यूबा, बेनेजुएला, ब्राजील, बोलिविया जैसे देशों में पुनः समाजवादी विचारधारा का उभार हुआ और समाजवादी-कम्युनिस्ट सरकारों का गठन हुआ।

स्त्री आंदोलन ने भी नये बन रहे वातावरण में स्त्री अस्मिता के प्रश्न उठाये और स्त्री अधिकारों की प्राप्ति हेतु कानूनी लड़ाई के लिये जनसंगठनों की ताकत को विस्तारित किया। योरोप में अब वर्गीय चेतना प्रखर हो रही थी अतः विभिन्न स्त्री समाजों के मुद्दे भी अलग महसूस किये जाने लगे। मुख्य रूप से अब स्त्री यौनिकता पर परंपरागत मनोभावों का विरोध करते हुए उसे स्त्री की शक्ति के रूप में पहचान देने का प्रयास हुआ। दरअसल बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में ‘नारी आंदोलन’ (वीमेन लिबरेशन) की व्यापकता और स्त्री अस्मिता और समानता को साहित्य-संस्कृति और समाज में केन्द्रीयता में लाने के प्रयास में दूसरे वर्गों (राजनीतिक-सामाजिक) में जो प्रतिक्रियायें हुईं, अब स्त्रीवादियों द्वारा उनका आक्रामक-प्रतिरोध था। अब लैंगिक समानता के साथ ‘स्त्री यौनिकता’ को उसके व्यक्तित्व का, उसके सम्मान और अस्मिता के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया गया। बीसवीं सदी के मध्य स्त्री सशक्तीकरण हेतु उसके लिये ‘क्या उचित है और क्या अनुचित है’… जैसी व्याख्या जनित धारणाओं को भी अब स्त्रीवादियों ने चुनौती दी।

इस बीच मनोवैज्ञानिक करॉल गिलिगन तथा कुछ अन्य नारीवादियों ने परंपरागत विचारधारा के अनुरूप स्त्री-पुरुष के बीच कुछ मूलभूत भिन्नताओं को स्वीकार किया और उसके अनुरूप स्त्री अधिकारों की मांग का समर्थन किया। इसके विपरीत ‘स्त्री-पुरुष में मूलभूत लैंगिक भिन्नता की अवधारणा केवल समाज द्वारा निर्मित है’µयह विचार आज भी स्त्री आंदोलनों की आधारभूमि है। अश्वेत नारीवादियों ने लैंगिक असमानता के साथ नस्ली भेदभाव को भी स्त्री आंदोलन का हिस्सा बनाने पर जोर दिया। ग्लोरिया अंजालदुआ, बेल हुक्स, आॅड्री लोर्ड, मैक्सिन हांग किंग्स्टन जैसी अनेक अश्वेत स्त्रीवाद लेखिकाओं-कार्यकर्ताओं ने व्यापक स्त्री प्रश्नों के मध्य नस्लगत और रंगभेद आधारित प्रश्न उठाये। इसी के आधार पर एलिस वॉकर जैसी चर्चित अश्वेत अमरीकी लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता ने ‘फेमिनिज़्म’ के स्थान पर ‘वोमनिज़्म’ शब्द का प्रयोग किया जो व्यापक रूप से सभी स्त्री समूहों को समावेशित करता है।

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