दरअसल मार्क्स ने वर्गीय आधार पर आधुनिक समाज में स्त्रियों के शोषण और उनकी निम्नतर स्थितियों के लिये बड़ी सीमा तक पूंजीवादी व्यवस्था को जिम्मेदार समझते हुए कहा कि स्त्रियों का संघर्ष चाहे वह परिवार में हो या कार्यक्षेत्र में, व्यक्तिगत के बजाय सामूहिक स्तर पर वर्गीय संघर्ष के रूप में होने से बदलाव की स्थिति बनती है। अमीर-गरीब के अथवा श्रमिक-मालिक के मध्य व्याप्त वर्गीय शोषण के समाप्त होने से लैंगिक शोषण भी स्वतः समाप्त हो जायेगा।  क्लारा जेटकिन, इलीनोर मार्क्स और एजेक्जेन्ड्रा कोलेन्तायी जैसी नेत्रियां भी लैंगिक असमानता के निवारण हेतु पुरुष समाज के विरुद्ध युद्ध छेड़ने की नीति से सहमत नहीं थीं। उनके विचार से आर्थिक आत्म निर्भरता और लैंगिक समानता हेतु वर्ग संघर्ष ही प्रभावी माध्यम था। 

डा० नमिता सिंहके द्वारा, स्त्री आन्दोलन के इस विस्तृत विमर्श को निरंतर किस्तों में प्रकाशित आलेख की ‘पांचवीं क़िस्त’ के बाद अगली क़िस्त जल्द ही आप पढेंगे ….| संपादक  

स्त्री आंदोलन-इतिहास और वर्तमान 

डॉ० नमिता सिंह

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में नारीवादी आंदोलन को समाजवादी विचारधारा का आधार भी मिला। जर्मन सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी के आॅगस्ट बेबेल ने लैंगिक आधार पर समाज में व्याप्त स्त्रियों की असमानता का विरोध करते हुए पुस्तक लिखी और स्त्रियों को समान अधिकारों के लिये आंदोलन का रूप भी दिया। 1907 में समाजवादी स्त्रियों की पहली इंटरनेशनल कांफ्रेंस स्टुटगार्ट में हुई जहां विश्व की स्त्रियों के लिये वोट के मताधिकार का समर्थन करते हुए उसे वर्ग संघर्ष का माध्यम बनाने का आह्वान किया। क्लारा जेटकिन इस आंदोलन का प्रमुख नेत्राी थीं जो लंबे समय तक समाजवादी समाज के निर्माण में स्त्री अधिकारों और उनकी भूमिका को नीतिगत रूप देने हेतु सक्रिय रहीं। इसी क्रम में क्लारा जेटकिन के प्रयासों से 1910 में कोपेनहेगेन में दूसरी इंटरनेशनल सभा का आयोजन हुआ जिसमें स्त्रियों को ‘काम का अधिकार’ के साथ उन्हें राजनीति में समान अवसर और समान आर्थिक अधिकारों की मांग की गयी। इसी सभा में विश्व के क्षितिज पर मंडरा रहे (प्रथम) विश्व युद्ध की संभावना के परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रों से शांति की अपील की गयी, क्योंकि युद्ध जैसी अस्थिर और अशांति के समय सबसे अधिक कष्ट महिलाएं ही उठाती हैं। शांति की इस अपील पर दुनिया की लाखों महिलाओं ने हस्ताक्षर किये। 1917 में सोवियत रूस की क्रांति के बाद वहां श्रमजीवी किसान-मजदूरों की सरकार बनी। हजारों की संख्या में स्त्रियां अपने परिवारों का भरणपोषण देहव्यापार के द्वारा कर रही थीं। उस समय रूस की साधारण जनता में गरीबी और निम्नस्तरीय जीवन का बोलबाला था। क्लारा जेटकिन से नवनिर्वाचित सरकार के अध्यक्ष लेनिन ने स्पष्ट कहा कि देश की उन्नति और विकास के लिये स्त्री समाज को उत्पादन की प्रक्रिया से जोड़कर मुख्य धारा में लाना होगा। स्त्रियों की क्षमता और जीवन केवल पत्नी और मां के रूप में चूल्हे-चौके और गृहस्थी में समाप्त हो जाता है। इसलिये राज्य व्यवस्था बच्चों के लालन-पालन की जिम्मेदारी भी उठायेगी ताकि स्त्रियां राष्ट्र के विकास में पूरा योगदान दे सकें और इसी से उन्हें परंपरागत शोषण से मुक्ति मिलेगी और राजनैतिक-सामाजिक रूप से समानता और सम्मान मिलेगा। कहना न होगा कि सत्तर-अस्सी के दशक में रूस में डॉक्टर, इंजीनियर और अध्यापक के रूप में महिलाओं की संख्या पुरुषों से कहीं अधिक थी। विज्ञान, राजनीति से लेकर समाज के हर क्षेत्र में उनकी प्रभावी उपस्थिति थी।

दरअसल मार्क्स ने वर्गीय आधार पर आधुनिक समाज में स्त्रियों के शोषण और उनकी निम्नतर स्थितियों के लिये बड़ी सीमा तक पूंजीवादी व्यवस्था को जिम्मेदार समझते हुए कहा कि स्त्रियों का संघर्ष चाहे वह परिवार में हो या कार्यक्षेत्र में, व्यक्तिगत के बजाय सामूहिक स्तर पर वर्गीय संघर्ष के रूप में होने से बदलाव की स्थिति बनती है। अमीर-गरीब के अथवा श्रमिक-मालिक के मध्य व्याप्त वर्गीय शोषण के समाप्त होने से लैंगिक शोषण भी स्वतः समाप्त हो जायेगा। फ्रेडरिक एंगेल्स ने भी वर्गीय शोषण को लैंगिक शोषण से जोड़ते हुए स्त्री श्रमिक समाज को व्यापक वर्ग संघर्ष में हिस्सेदारी के लिये आह्वान किया। उत्पादन संबंधों से स्त्री को अलग कर केवल घर की देखभाल तक सीमित करना ही उसके शोषण और सामाजिक असमानता का कारण है। क्लारा जेटकिन, इलीनोर मार्क्स और एजेक्जेन्ड्रा कोलेन्तायी जैसी नेत्रियां भी लैंगिक असमानता के निवारण हेतु पुरुष समाज के विरुद्ध युद्ध छेड़ने की नीति से सहमत नहीं थीं। उनके विचार से आर्थिक आत्म निर्भरता और लैंगिक समानता हेतु वर्ग संघर्ष ही प्रभावी माध्यम था।

अनेक नारीवादी नेत्रियां इससे सहमत नहीं थीं कि केवल वर्ग संघर्ष के आधार पर स्त्री समानता के विभिन्न आयाम स्त्री समाज को उपलब्ध हो सकते हैं। स्त्रियों का शोषण पितृसत्तात्मक समाज का परंपरागत गुण है अतः लैंगिक समानता के विभिन्न रूपों को अलग से संबोधित करना होगा और विभिन्न प्रयास करने होंगे।

आधुनिक समय में विभिन्न क्षेत्राीय और वर्गीय समाजों ने अपने सशक्तीकरण और अधिकारजनित समानता के मुद्दे स्वयं तय किये हैं और इसके लिये राजनीतिक रूप से सशक्तीकरण को आवश्यक माना है। इनका विचार है कि परंपरागत रूप से चली आ रही वर्चस्ववादी पुरुष सत्ता के विरुद्ध स्त्रीवर्ग का संघर्ष आवश्यक है और इसके साथ ही राजनीतिक स्तर पर राज्य व्यवस्था में संघर्ष भी उतना ही अनिवार्य है। तभी परिस्थितियों में परिवर्तन हो सकता है। जर्मेन ग्रियर, एल.सूसन ब्राउन जैसी लेखिका और आंदोलनकारियों का अनेक अन्य स्त्रीवाद नेत्रियों ने भी सहयोग और समर्थन दिया।

साहित्य और समाज में आज उत्तर आधुनिकतावादी दौर की पहचान की जा रही है। इस के अनुरूप ‘उत्तर स्त्रीवाद’ अब तक चले आ रहे प्रश्नों और स्थितियों को नये परिप्रेक्ष्य में देख रहा है। स्त्रीवाद दृष्टिकोण को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में व्यापक बनाकर जीवन और समाज के हर क्षेत्र में लागू करने, नयी अवधारणाएं और मंतव्य खोजने का प्रयास भी हो रहा है। साहित्य, पर्यावरण और समाज शास्त्र के नियमों के अलावा नृशास्त्र, अर्थशास्त्र, दर्शनशास्त्र, इतिहास, मनोविज्ञान के अलावा मीडिया, सिनेमा तथा कला रूपों आदि लगभग सभी क्षेत्राों में स्त्रीवाद दृष्टि से पुनर्व्याख्या का सिलसिला भी शुरू हो गया है। साहित्य में स्त्रीवाद लेखन की अनेक धाराएँ और उपधाराएँ हैं जो विशुद्ध स्त्री केंद्रित से लेकर व्यापक सामाजिक समावेशन तक विस्तारित हैं। स्त्रीवाद आलोचना विशेष रूप से आज चर्चित है। लैंगिकता, राजनीति और सत्ता के परंपरागत संबंधों को विश्लेषित करना ‘‘स्त्री समानता’’ के लिये जरूरी है। स्त्रियों द्वारा रचा गया साहित्य, स्त्री रचनात्मकता और भाषाई विशेषता के अंतर्गत आज विशेष अध्ययन के विषय हैंं।

रेखाचित्र- अनुप्रिया

इक्कीसवीं सदी के नारीवादी आन्दोलन – उत्तर उपनिवेशवादी आंदोलन

आज पश्चिम के विकसित और विकासशील देशों में, विशेष रूप से जहां लोकतांत्रिाक राज्यव्यवस्थाएं हैं और महिलाओं की राजनीति तथा सामाजिक क्षेत्राों में विभिन्न स्तरों पर भागीदारी है, बहुत सीमा तक उन्हें अधिकार प्राप्त हैंंं। समानता के स्तर भी अलग-अलग हैं। वर्गीय चेतना आज अधिक प्रखर है। जाति, नस्ल, क्षेत्र आधारित आंदोलन और संगठन हैंं। उत्तर उपनिवेशवादी संस्कृति पर आज बहस हो रही है। पूर्व उपनिवेशों में नस्लगत और जाति-वर्ग गत शोषण के कारण स्त्रियाँ नये प्रकार के शोषण का शिकार हुईं। उन्हें मूक-बधिर, असंस्कृत और हीनतर समूह के रूप में तथा उनके मुकाबले पश्चिम की साम्राज्यवादी राष्ट्रों की स्त्रियों को आधुनिक, श्रेष्ठ, शिक्षित-सुसंस्कृत रूप में प्रस्तुत किया गया। उपनिवेशवादी शोषण की मानसिकता ने उन क्षेत्राों की संस्कृति, परंपरा और सभ्यता की भी आलोचना की तथा साम्राज्यवादी नीतियों के अंतर्गत सांस्कृतिक वर्चस्ववाद की स्थापना का प्रयास किया। भारत सहित तीसरी दुनिया के अन्य पूर्व औपनिवेशिक राष्ट्रों में आज यह प्रतिक्रियात्मक रुझान देखा जा सकता है जिसके कारण पुनः एक पुनरुत्थानवादी, सैकड़ों वर्ष पुरानी परंपरागत संस्कृति (जो जाति और लिंग की असमानता और शोषण पर आधारित थी) को गौरवान्वित करने और पुनर्स्थापित करने का प्रयास हो रहा है। अपने भारतीय समाज में भी यह सांस्कृतिक पुनरुत्थानवाद की प्रवृत्ति देखी जा सकती है जहां पुरानी-‘गौरवशाली-महान’ परंपरा के नाम स्त्रियों के अधिकारों और कार्यक्षेत्र को सीमित करने के प्रयास चल रहे हैं और आधुनिक जीवन पद्धति को बाधित कर स्त्रियों को हिंसात्मक रूप से निशाना बनाया जा रहा है।

उत्तर उपनिवेशवादी नारीवाद ने अब पश्चिम के राजनैतिक-सामाजिक जीवन में लैंगिक समानता के संघर्षों से अलग अपनी गतिविधियों का स्वरूप निर्धारित करने की प्रवृत्ति दिखाई है। यद्यपि इसके भी राजनैतिक कारण हैं और व्यवस्था जनित संदेश हैं।

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