‘स्त्री देह आज हाई टेक्नोलॉजी के माध्यम से विभिन्न तरीकों से मनोरंजन के साधन के रूप में उपलब्ध हो रही है। स्त्रीदेह का वस्तुकरण पुरानी मान्यताओं, नैतिकता के मानदंडों को ध्वस्त कर हर क्षेत्र में स्थापित हो रहा है। इक्कीसवीं सदी में व्यापार और सर्वव्यापी मीडिया के हाथों में वस्तु बनी स्त्रीदेह के सवालों ने स्त्री अधिकारों के लिये होने वाले विमर्शों को नया मोड़ दे दिया है। जैसे समलैंगिकता (लेस्बियनिज़्म) को देह की स्वायत्तता और अधिकार की परिधि में लाने की पैरोकारी अनेक नारीवादियों ने की है। इन सभी बहसों का स्वरूप और विस्तार भविष्य तय होगा।’

डा० नमिता सिंहके द्वारा, स्त्री आन्दोलन के इस विस्तृत विमर्श को निरंतर किस्तों में प्रकाशित आलेख की ‘छटवीं क़िस्त’ के बाद अगली क़िस्त जल्द ही आप पढेंगे ….| संपादक  

यौनिकता के प्रश्न 

डॉ० नमिता सिंह

बीसवीं सदी के अस्सी-नब्बे के दशक में स्त्री यौनिकता के प्रश्न नारीवादी आंदोलनों के केंद्र में आ गये। मध्यवर्गीय शिक्षित और कामकाजी स्त्रियों के बीच ‘मेरे शरीर पर मेरा अधिकार’ का नारा चर्चित हुआ और अनेक अग्रणी नेत्रियों तथा रचनाकर्मियों, संस्कृति कर्मी-कलाकारों को इसने आकर्षित भी किया। इससे पहले भी पचास के दशक से प्रजनन संबंधी अधिकारों की मांग नारीवादी आंदोलन करते रहे थे। कई देशों में (परिस्थितियों के अंतर्गत) गर्भपात कानून भी लागू हुआ। गर्भ नियोजन तकनीक उन्नत हुई और इसने स्त्रियों को अपने कार्य क्षेत्र और घर-परिवार के बीच सामंजस्य स्थापित करने की सुविधा दी। प्रारंभिक चरणों में अमरीका की मार्गरेट सेंगर और ब्रिटेन में मेरी स्टोप्स इस दिशा में अग्रणी नेतृत्व में थीं।

सदी के अंतिम दशकों में नारीवादी आंदोलनों के माध्यम से स्त्रियाँ अपनी यौनिकता के प्रति सजग हुई। कैथरिन मैक्किनॉन का तर्क था कि स्त्री यौनिकता उसकी स्वयत्तता है जिस पर केवल उसका नियंत्रण हो सकता है। पितृसत्तात्मकता में स्त्री यौनिकता और स्वयं स्त्री के शरीर पर अधिकार के प्रश्न सदैव पुरुष समाज द्वारा निर्धारित किये जाते रहे हैं और पुरुषों द्वारा स्त्रियों (पत्नियों) पर की जाने वाली यौन हिंसा का भी यही कारण रहा है। पत्नी के रूप में स्त्री यौन संबंधों के लिये एक तरह से पति की कानूनन गुलाम है और धर्म सम्मत यह अधिकार प्रत्येक समाज और संस्कृतियों में लागू होता है। स्त्री यौनिकता को वस्तु के रूप में तथा स्त्री शरीर को मनचाहे रूपों में प्रदर्शित, प्रचारित करने का सिलसिला भी पितृसत्तात्मक समाज में आरंभ से रहा है। स्त्री भोग विलास की वस्तु समझी गयी और पुरुष समाज ने उसे मनचाहे रूपों में प्रस्तुत किया। इसके परिणाम स्वरूप बहुधा स्त्री शरीर का प्रस्तुतिकरण जो विभिन्न स्तरों पर होता रहा उसमें अश्लीलता का मुद्दा भी नारीवादी आंदोलनों ने उठाया। स्त्री देह के सार्वजनिक प्रदर्शन को अश्लीलता और स्त्री गरिमा के विरुद्ध घोषित करते हुए इसके विरोध में भी नारी आंदोलनों में स्वर उठे। ‘मेरी देह मेरा अधिकार’ जैसी प्रवृत्ति का प्रस्तुतिकरण अनेकबार अतिवाद की चपेट में आया और उसके विरोध में भी स्वर उठे।

बीसवीं सदी के अंत से ही एक बहुत सीमित समूह के रूप में आधुनिकतावादी, उच्च-मध्यवर्गीय स्त्रियों ने स्त्री स्वातंत्रय और समानता की उत्तर आधुनिक व्याख्या करते हुए घोषित किया कि उनकी देह उनकी अपनी संपत्ति है और इस पर सिर्फ उनका अधिकार है जो परंपरागत पुरुषवादी व्यवस्था के सामाजिक नियमों से परे है। इसका एक प्रतीकात्मक प्रदर्शन 2012 में कनाडा से ‘स्लट वॉक’ के रूप में शुरू होकर दुनिया के अनेक देशों के कुछेक शहरों में भी हुआ। छोटे कपड़ों में जा रही एक महिला को एक पुलिसकर्मी ने उसके लिबास पर टोका तथा कहा कि इसीलिये पुरुषों द्वारा छेड़खानी की घटनाएं होती हैं। इस टिप्पणी के विरोध में चुनौती के रूप में महिलाओं ने छोटे कपड़े पहनकर प्रदर्शन किया। इसी तरह से कुछ संकीर्ण पुरातनवादी संगठनों के ‘नैतिक पुलिसिया रवैये’ से नाराज भारत के अनेक शहरों में ‘सार्वजनिक चुंबन’ के रूप में प्रदर्शन हुए।

इक्कीसवीं सदी का वैश्विक स्वरूप इसकी बाजारवादी अर्थ व्यवस्था है। उपभोक्तावाद बाजारवादी संस्कृति का चेहरा है। बाजारवाद का अनिवार्य अंग है विज्ञापन। आज विज्ञापन उद्योग का असीमित विस्तार हुआ है और स्त्री इस उद्योग के केंद्र में है। दूर संचार क्रांति ने आज समाज का चेहरा बदल दिया है। अर्थ-संस्कृति परंपरा और आधुनिकता जैसी शब्दावली को नयी उन्नत टैक्नोलोजी नये रूप में परिभाषित कर सर्वथा एक दूसरा रूप द रही है। स्त्री देह आज हाई टेक्नोलॉजी के माध्यम से विभिन्न तरीकों से मनोरंजन के साधन के रूप में उपलब्ध हो रही है। स्त्रीदेह का वस्तुकरण पुरानी मान्यताओं, नैतिकता के मानदंडों को ध्वस्त कर हर क्षेत्र में स्थापित हो रहा है। इक्कीसवीं सदी में व्यापार और सर्वव्यापी मीडिया के हाथों में वस्तु बनी स्त्रीदेह के सवालों ने स्त्री अधिकारों के लिये होने वाले विमर्शों को नया मोड़ दे दिया है। जैसे समलैंगिकता (लेस्बियनिज़्म) को देह की स्वायत्तता और अधिकार की परिधि में लाने की पैरोकारी अनेक नारीवादियों ने की है। इन सभी बहसों का स्वरूप और विस्तार भविष्य तय होगा।

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स्त्री आंदोलन विश्व के अलग-अलग समाजों में स्थानीयता के स्वरूप के साथ मुख्य रूप से व्यवस्था के अंग रहे हैं। इनमें आज भी स्त्री अधिकार के भिन्न-भिन्न स्तर हैं। कट्टरवादी वर्चस्व वाले क्षेत्राों में स्त्रियां आज भी पर्दे के भीतर पितृसत्तात्मकता के निकृष्टम रूप में जीने के लिये अभिशप्त हैं। यह प्रतीक है कि स्त्री प्रश्न वास्तविकता में राजनीति के, राजनीति जनित व्यवस्था के प्रश्न हैं। जनतांत्रिक अधिकारों के प्रश्न हैं। आज वैश्विक संस्थाएं भी स्त्री प्रश्नों को अपने संज्ञान में ले रही हैं और उसे अपनी नीतिगत योजनाओं से संबद्ध कर रही हैं। व्यापक स्त्री आंदोलनों का ही यह परिणाम है। संयुक्त राष्ट्र मानव विकास रिपोर्ट-2004 के अनुसार घरेलू स्तर पर या बाहर कार्यक्षेत्र हों, स्त्रियां पुरुषों से अधिक काम करती हैं। 2001 में संयुक्त राष्ट्र की पैन पैसिफिक साउथ ईस्ट एशिया वीमेन्स असोसियेशन के 21वें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में कहा गया कि पूरे विश्व के स्तर पर स्त्रियां आबादी का 51 प्रतिशत हैं लेकिन पुरुषों की तुलना में 66 प्रतिशत काम करती हैं लेकिन उनकी आमदनी मात्रा 10 प्रतिशत है और उनमें से अपनी निजी संपत्ति की हकदार 1 प्रतिशत से भी कम हैं।

जाहिर है स्त्रीवाद आंदोलनों ने पिछले दो ढाई सौ सालों में काफी कुछ हासिल किया है लेकिन स्त्री पुरुष समानता का आंकड़ा अभी काफी दूर है। विश्व के अनेक समाजों में स्त्रियां अभी भी घोर सामंती मध्यकालीन स्थितियों में जी रही हैं।

स्त्री आंदोलन-भारतीय संदर्भ

भारतीय संदर्भों में स्त्री पराधीनता से मुक्ति के लिये किये जाने वाले प्रयास प्रारंभ में समाज सुधारकों द्वारा किये गये। भारतीय स्त्री समाज के बदलाव की प्रक्रिया उन्नीसवीं सदी से प्रारंभ हुई। योरोप की औद्योगिक क्रांति ने पूँजीवाद की स्थापना की और उसका तेजी से विकास हुआ तो परिणामस्वरूप उपनिवेशवादी राजनीति पल्लवित हुई। नयी वैज्ञानिक खोजों और निरंतर उन्नत हो रही टेक्नोलॉजी ने नये उद्योगों की स्थापना की और बहुतायत से बने माल के लिये बाजार का निर्माण उपनिवेशों के माध्यम से हुआ। भारत अपने विशाल प्राकृतिक स्रोतों और संसाधनों के अलावा उन्नत हस्तशिल्प के कारण जो दुनिया के शीर्ष पर था अब समाजवादी लूट-खसोट और बहुस्तरीय शोषण का शिकार हुआ। व्यापार हेतु भारत में आई ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने उन्नीसवीं सदी तक भारत के अधिकांश भूभाग पर राजनैतिक सत्ता कायम कर ली। किसानों से मालगुजारी और लगान के रूप में मानो वे पूरा खून ही चूस लेना चाहते थे। खनिज संपदा के भारी भरकम स्रोत भी लुटने लगे और इंग्लैंड भेजे जाने लगे।

ईस्ट इंडिया कंपनी से मुलाजिम के तौर पर जुड़े अनेक भारतीय अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त कर प्रशासन से जुड़े थे तो अनेक जमींदार-सामंत भी कंपनी के सहायक और कृपा पात्र थे। आधुनिक पश्चिमी शिक्षा से संपर्क और भारतीय समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों तथा अनेक स्तरों पर भेदभाव और असमानता पूर्ण सामाजिक संरचना के प्रति उनकी दृष्टि अब आलोचनात्मक होने लगी। स्त्रियों के प्रति आमतौर पर किया जाने वाला सामाजिक व्यवहार और उनके लिये कठोर सामाजिक नियम इस नये आधुनिक भारतीय समाज के चेतनासंपन्न लोगों को असह्य लगने लगे। सामाजिक विकास के लिये उनके चिंतन और प्रयासों में स्त्री समाज की दशा में सुधार अब प्राथमिकता के रूप में थी। फ्रांसीसी क्रांति के बाद नये बन रहे आधुनिक योरोप में लोकतांत्रिाक राज्य व्यवस्था की स्वतंत्रता-समता-बंधुत्व जैसी शब्दावली अब शिक्षित भारतीय समाज के संज्ञान में भी थी और वे इन नये विचारों से उद्वेलित हो रहे थे। साम्राज्यवादी शोषण के स्तर पर किसान-मजदूर मानो अपने जीवन का अर्थ ही खो रहे थे। पूरी मालगुजारी बसूल न कर पाने की स्थितियों में जमींदारियां नीलाम हो रही थीं। इन्हें बहुधा ईस्ट इंडिया कंपनी के भारतीय कारिंदे, अदालतों के कर्मचारी और गाँव-शहर के महाजन खरीद लेते थे। ये नये शहरी सामंत थे जिनमें से अनेकों ने व्यापारी बनकर या उद्योग लगाकर योरोपीय ढंग से वाणिज्य-वित्तीय कारोबार शुरू किया। इस प्रकार भारत में देसी पूँजीपति वर्ग के उभार की शुरूआत भी हुई। समाज सुधार आंदोलनों में इस वर्ग की ऐतिहासिक भूमिका है। यह वर्ग पढ़ा लिखा था, पश्चिमी सभ्यता और विचारों से प्रभावित था अतः कालांतर से होने वाले स्त्री जीवन के प्रति सुधार आंदोलनों में तथा स्वाधीनता आंदोलनों में भी इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। दूसरी ओर योरोपीय औद्योगिक क्रांति और अब अधीनस्थ उपनिवेश के रूप में भारत। यहां सस्ते श्रम के उपभोग हेतु उद्यम आरंभ हुए, विनिमय-व्यापार को सुविधाजनक बनाने के लिये बंदरगाहों को विकसित करने का, डाक संचार व्यवस्था शुरू करने का और सुगम आवागमन हेतु रेल लाइन बिछाने का काम भी हुआ। यह नये काम सामाजिक जीवन में बदलाव के माध्यम थे। बदलाव की प्रक्रिया एकांगी नहीं होती। किसी विशेष उद्देश्य से परिवर्तनशील प्रक्रिया अन्य अनेक प्रक्रियाओं को जन्म देती है जो उपफल (बाइप्रोडक्ट) के रूप में कभी-कभी मुख्य उद्देश्य से अधिक अर्थपूर्ण और महत्वपूर्ण हो जाते हैं। अठारहवीं सदी के भारतीय समाज में होने वाले ये भौतिकवादी परिवर्तन वैचारिक और सामाजिक परिवर्तनों के संवाहक भी बने।

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