“1997 में सर्वोच्च न्यायालय ने भंवरी देवी केस के प्रकाश में कामकाजी महिलाओं के यौन उत्पीड़न को रोकने हेतु कार्यस्थल के लिये जारी निर्देशों का पालन अनिवार्य करते हुए हर विभाग, संस्थान चाहे सरकारी हो या निजी स्तर का हो, आंतरिक शिकायत निवारण कमेटी बनाने का आदेश दिया। इसके अतिरिक्त यौन उत्पीड़न की परिभाषा को भी विस्तारित किया गया। विशाखा केस स्त्री यौन उत्पीड़न के विरुद्ध नारी संगठनों द्वारा चलाये गये आंदोलन की एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक जीत थी।”

डा० नमिता सिंह’ के द्वारा, स्त्री आन्दोलन के इस विस्तृत विमर्श की ‘दसवीं और अंतिम क़िस्त’…संपादक

स्त्री आंदोलन-इतिहास और वर्तमान 

डॉ० नमिता सिंह

बीसवीं सदी के अंतिम दशक में कामकाजी महिलाओं के कार्यस्थल में यौन उत्पीड़न संबंधी विशाखा केस के बारे में सर्वोच्च न्यायालय में पहली बार स्पष्ट रूप से पीडि़त महिलाओं के पक्ष में निर्णय दिया। राजस्थान में महिला विकास कार्यक्रम के अंतर्गत भंवरी देवी ‘साथिन’ के रूप में कार्यरत थी। बालविवाह के विरुद्ध प्रचार और उसे रोकने की जिम्मेदारी निभाते हुए वह गांव के दबंगों के विरोध में खड़ी हुई तो उसे सामूहिक रूप से बलत्कृत किया गया। जनवादी महिला संगठनों के उग्र प्रदर्शनों और उनके द्वारा भंवरी देवी को सभी प्रकार की कानूनी सहायता उपलब्ध कराने के बावजूद सभी आरोपी हाई कोर्ट से छूट गये और कहा गया कि ये समाज के सम्मानित व्यक्ति हैं अतः ऐसा असामाजिक कृत्य नहीं कर सकते। दबंगों की सहायता करने वाले पुलिसकर्मी भी छूट गये। इस निर्णय के बाद एक बार फिर ‘विशाखा’ नामक जनसंगठन ने केस उठाया। पूरे देश में ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी गूंज सुनाई दी। अंततः 1997 में सर्वोच्च न्यायालय ने भंवरी देवी केस के प्रकाश में कामकाजी महिलाओं के यौन उत्पीड़न को रोकने हेतु कार्यस्थल के लिये जारी निर्देशों का पालन अनिवार्य करते हुए हर विभाग, संस्थान चाहे सरकारी हो या निजी स्तर का हो, आंतरिक शिकायत निवारण कमेटी बनाने का आदेश दिया। इसके अतिरिक्त यौन उत्पीड़न की परिभाषा को भी विस्तारित किया गया। विशाखा केस स्त्री यौन उत्पीड़न के विरुद्ध नारी संगठनों द्वारा चलाये गये आंदोलन की एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक जीत थी।

ऐसा ही दूसरा प्रकरण जिसमें लगभग संपूर्ण देश की पढ़ी लिखी संभ्रांत मध्यवर्गीय महिलाएं-लड़कियां संगठित रूप में उठ खड़ी हुई और उतनी ही बड़ी संख्या में पुरुष समाज भी साथ खड़ा हुआ, वह दिसंबर, 2012 का निर्भया प्रकरण था। यह निर्मम अमानुषिक यौन हिंसा के विरुद्ध स्वतः स्फूर्त आंदोलन था जिसने संपूर्ण भारतीय जनमानस को झकझोर दिया। 2013 में जस्टिस जे.एस. वर्मा कमेटी द्वारा इस कांड के मद्देनजर यौन हिंसा के विरुद्ध कानून में बदलाव और अनेक आवश्यक बिंदुओं के जोड़ने की सिफारिश की गयी थी। संसद द्वारा इस कमेटी के अधिकांश सुझावों को स्वीकार कर लिया गया लेकिन (पति द्वारा) वैवाहिक बलात्कार को नहीं माना गया। भारतीय समाज का बहुसंख्यक पुरुष वर्ग विवाह संस्था के भीतर स्त्री के शरीर पर अपना पूर्ण अधिकार समझता है। जिसमें स्त्री की सहमति या असहमति के कोई अर्थ नहीं। उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में भी बरहम मालावारी ने पति के साथ संसर्ग के बाद जब फूलमणि देवी की पहली रात्रि में ही मृत्यु हो गयी थी तो इसे पति द्वारा बलात्कार की संज्ञा दी थी (और लड़कियों की विवाह योग्य उम्र बढ़ाने की सिफारिश की थी) उस समय भी राष्ट्रवादी-उदारवादी समाज सुधारक सामान्य पुरुष वर्ग के साथ इस वैवाहिक बलात्कार जैसी बात पर खामोश थे।

विशाखा निर्णय से पहले 1987 में भी एक उल्लेखनीय घटना हुई जिसने भारतीय समाज की पुरुषवादी मानसिकता का असली चरित्र स्पष्ट करते हुए उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध के सामाजिक वातावरण का स्मरण करा दिया। राजस्थान के देबराला में रूप कुंवर नामक पढ़ी लिखी ग्रेजुएट लड़की को, जिसका विवाह हुए केवल छह महीने हुए थे, सती के रूप में जलाकर मार दिया गया। राजस्थान के अनेक क्षेत्राों में सती समर्थक संगठन हैं, राणी सती मंदिर है और ये विभिन्न हिंदूवादी संगठनों से आर्थिक सहायता प्राप्त करते हैं। नारीवादियों ने इस कांड का विरोध किया और राजस्थान के अलावा देश भर में प्रदर्शन हुए। सबसे दुखद पक्ष ये था कि राजस्थान के अनेक राजनेता, मंत्रियों ने सती प्रकरण का समर्थन किया। इसको भी अधिक दुखद था कि जनसत्ता (29.9.87-बनवारी), इंडियन एक्सप्रेस (5.10.87-आशीष नंदी), स्टेट्स मैन (5.11.87-पैट्रिक डी. हैरीगेन) ने अपने अपने लेखों में भारतीय नारीवादी आंदोलन की आलोचना की… लेखक त्रय के अनुसार नारीवादी एक ऐसे समाज पर बाजार प्रभावित समानता और आजादी का दृष्टिकोण थोपने की कोशिश कर रहे थे जिसने आत्म बलिदान का सर्वोत्तम उदाहरण पेश किया था उनकी गरिमा और गौरवशाली छवि को निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा क्षति पहुंचाई जा रही है। (स्त्री संदर्भ का इतिहास-राधा कुमार)
प्रबुद्ध पुरुष समाज द्वारा संस्कृति के नाम पर नारी विरोधी मानसिकता की यह पुनरावृत्ति थी। क्षुब्ध नारीवादी संगठनों ने पूरी छानबीन और जांच के बाद पाया कि रूप कुंवर जो बचने के लिये घुड़साल में छिप गयी थी, उसे खींचकर लाया गया था, नशे के ढेर सारे इंजेक्शन लगाये गये थे और फिर चिता में बिठाकर लकड़ी और नारियल के छिलकों से ढक कर आग लगाई गयी थी। दरअसल, जैसा अक्सर पहले भी होता आया है, इस घटना की पृष्ठभूमि में धन-संपत्ति का लालच भी था। रूप कुंवर अपने साथ दहेज में तीस तोले सोना लाई थी जो उसकी संपत्ति थी। पति की मृत्यु के बाद परिवार की संपत्ति में भी उसकी हिस्सेदारी बनती थी। इस बीच खबर मिलने पर पहुंचे प्रेस वालों की पिटाई की गयी। पुलिस की जीप स्थल तक पहुंची ही नहीं, बीच से लौट आई। रूप कुंवर को सती करने के बाद वह परिवार सामाजिक प्रतिष्ठा का केंद्र बनने की राह पर आ गया और ‘सती व्यापार’ भी फलने फूलने लगा।
इस पूरे कांड का जनवादी महिला समिति, एन.एफ.आई.डब्ल्यू., प्रगतिशील महिला संगठन, समता सहित अनेक संगठन व्यापक विरोध कर रहे थे। हिन्दूवादी संकीर्ण समुदाय के साथ विभिन्न पार्टियों के राजनेताओं ने सती समर्थन में राजनीति करनी शुरू कर दी क्योंकि ये वोट बैंक को मजबूत करने का मामला भी था। इस बीच समय-समय पर मंहगाई विरोधी स्त्री आंदोलन होते रहे हैं। अधिकतर ये आंदोलन राजनैतिक दलों द्वारा किये जाते रहे हैं जिसमें उनके दल के महिला संगठन की विशेष भागीदारी रहा करती है।

‘मेरा शरीर-मेरा अधिकार’ जैसी अवधारणा आज भारतीय समाज के मध्य-उच्चवर्ग के बीच स्वीकार्य हो रही है। समाज के विशिष्ट स्त्री वर्ग ने, विशेष रूप से नारीवादी लेखिकाओं ने इसे अपने लेखन का विषय भी बनाया है। वैचारिक स्तर पर मान्य ‘मेरी देह – मेरा अधिकार’ आर्थिक और सामाजिक रूप से आत्मनिर्भर संपन्न और विशिष्ट वर्ग में ही प्रचलित हो सका है जहां परिवार का वातावरण नितांत आधुनिक है और परस्पर हस्तक्षेप रहित व्यक्तिवादी स्वरूप में हैं।
आज इक्कीसदी सदी में भी स्त्री प्रश्न बरकरार हैं। पुनरुत्थान वादी मानसिकता उपयुक्त राजनैतिक माहौल में फिर पल्लवित होने लगती है। धर्म, संप्रदाय और जाति की राजनीति में जो वातावरण तैयार होता है उसका शिकार भी सर्वाधिक महिलाएं ही होती हैं। 2002 के गुजरात दंगों में मुस्लिम समाज की स्त्रियों के साथ जो हिंसा और अमानवीयता का तांडव हुआ, उसने स्त्री विमर्श के प्रश्नों को पुनः व्याख्यायित करने की आवश्यकता को रेखांकित किया। इसी प्रकार से दलित-सवर्ण संघर्षों में दलित स्त्रियों पर हिंसात्मक यौन आक्रामणों पर अन्य समाजों की चुप्पी भी स्त्री अस्मिता की अवधारणा पर प्रश्नचिह्न लगाती है। आज विभिन्न धार्मिक समूहों के स्वयभू नेता सांप्रदायिक आधार पर कभी अलग-अलग समुदाय के लड़के-लड़कियों पर पाबंदी लगाते हैं, कभी प्रेम संबंधों की परिणति हत्याओं में होती है। भारतीय संस्कृति और धर्म के नाम पर इन अमानुषिक स्त्री विरोधी कृत्यों का विरोध भी नहीं होता।

आज देश के महिला संगठन अधिकतर राजनीतिक पार्टियों के अनुषांगिक संगठन के रूप में हैं। वे अपनी पार्टी लाइन के आधार पर काम करते हैं जिनका मुख्य उद्देश्य पार्टी के जनाधार और वोट बैंक के लिये महिला समूहों को तैयार करना है। स्त्री अस्मिता, स्त्रियों के प्रति यौन हिंसा, असमानता जैसे मुद्दे उनके यहां गौण हैं। ये अधिकतर मध्यवर्गीय संगठन हैं। अगर कभी ये प्रकरण उठाये भी गये तो वो विशुद्ध पार्टी के राजनैतिक स्वरूप और जरूरत के अनुसार होते हैं।
कम्युनिस्ट पार्टियों के महिला संगठन अधिकतर श्रमिक स्त्रियों और कामकाजी स्त्रियों के बीच हैं जहां वर्गीय हितों के आधार पर कार्यक्रम होते रहे हैं। पिछले वर्षों में कम्युनिस्ट पार्टियों का जनाधार बहुत कमजोर हुआ है और इसीलिये आंदोलनकारी भूमिका भी क्षीण हुई है। यूं अपनी संगठनात्मक अवधारणा में इन संगठनों का मूलचरित्र पूंजीवाद और साम्राज्यवाद विरोध अवश्य रहा है और वैचारिकता के आधार पर दलित-निम्नवर्गीय स्त्रियों के बीच उनकी पहुंच भी रही है। श्रमिक स्त्रियों के संगठनों की सक्रियता अस्सी-नब्बे के दशक तक कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यक्रमों का आवश्यक अंग थी।

भारतीय समाज में बलात्कार और यौनहिंसा आज संभवतः स्त्री प्रश्नों में सर्वाधिक प्रमुख हो गये हैं। एक ओर भारतीय संस्कृति-परंपरा-पारिवारिक सम्मान जैसी धारणाएं, दूसरी ओर समय की मांग और वातावरण के अनुरूप स्त्रियों में शिक्षा, आत्मनिर्भरता तथा तीसरी ओर नयी आर्थिक नीतियों के फलस्वरूप बाजारवादी अर्थव्यवस्था और उपभोक्तावाद के साथ चौथा आयाम नयी निर्मित हो रही वैश्वीकृत संस्कृति के साथ नित नयी विकसित हो रही टैक्नोलोजी तक बहुत बड़े भारतीय वर्ग की, विशेषकर युवा वर्ग की पहुंच… ये सभी मिलकर जो परिदृश्य निर्मित कर रहे हैं उसमें आधारभूत स्त्री प्रश्न कभी धुंधले होते हैं तो कभी स्पष्ट भी दिखाई देते हैं। स्त्री समानता और सामाजिक न्याय के लिये अभी लंबा रास्ता बनाना है, नये विचारों के साथ नये तरीकों का अन्वेषण भी करना है।

(समाप्त)

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