राष्ट्रीय आंदोलन के विभिन्न कार्यक्रमों के नेतृत्व में हिन्दू स्त्रियों के अलावा मुस्लिम, पारसी और मार्गरेट कूजीन्स व ऐनी बेसेंट जैसी विदेशी महिलाएँ भी थीं।  राष्ट्रीय आंदोलन ने यह भी प्रमाणित किया कि महिलाओं के अपने सरोकारों के अलावा बड़े-सामाजिक और राष्ट्रीय प्रश्नों पर उनकी आंदोलनकारी भूमिका निर्णायक भी हो सकती है। ऐसा ही अठारहवीं शताब्दी में फ्रांस की क्रांति के समय भी हुआ था।…….

डा० नमिता सिंह’ के द्वारा, स्त्री आन्दोलन के इस विस्तृत विमर्श की ‘नवीं क़िस्त’…संपादक

स्त्री आंदोलन-इतिहास और वर्तमान

डॉ० नमिता सिंह

बीसवीं सदी के मध्य तक आते-आते स्त्री सशक्तीकरण और राष्ट्रवादी चेतना पर्याय हो चुके थे और राष्ट्रीय आंदोलन में उनकी सहभागिता लगातार बढ़ रही थी। पहला बड़ा आंदोलन नमक सत्याग्रह और नमक कानून तोड़ने का था जिसमें गांधी का दांडी मार्च जो 12 मार्च 1930 से 6 अप्रैल 1930 तक चला उसमें लाखों स्त्रियों ने भागीदारी की। यह संभवतः पहला राष्ट्र व्यापी आंदोलन था जिसमें पूरे देश की स्त्रियां बड़ी संख्या में शामिल हुई। गांधी ने दांडी मार्च में अपने साथ शामिल लोगों में किसी स्त्री को शामिल नहीं किया था और इससे स्त्रियों का शीर्ष कांग्रेसी नेतृत्व नाराज भी था। दरअसल गांधी का दृष्टिकोण राष्ट्रीय आंदोलन में स्त्री सहभागिता को सम्मिलित करने का तो था लेकिन वे उनकी भूमिका को सीमित भी रखना चाहते थे। दांडी मार्च के अंतिम दिन केवल सरोजनी नायडू एकमात्रा महिला थीं जो उनके साथ शामिल हुईं और उन्होंने गिरफ्तारी दी। राष्ट्रीय आंदोलन में अन्य अनेक पक्षों के अलावा स्त्री की भूमिका के संदर्भ में भी अनेक अंतर्विरोध थे जो समय-समय पर सतह पर दिखाई देते । मसलन शीर्ष नेतृत्व की ऐनी बेसेंट और मैडम भीकाजी कामा हिन्दुस्तानी स्त्री की आध्यात्मिक और हिन्दूवादी धार्मिक छवि की समर्थक थीं। ये परिस्थितियों का दबाव था कि देश की सामान्य स्त्रियां धीरे-धीरे आंदोलनों में हिस्सा ले रही थीं और जाति-धर्म-लिंग भेद जैसी कोई सीमा राष्ट्रीय चेतना की उत्ताल तरंग के सामने कारगर नहीं थी। नमक सत्याग्रह में लाखों औरतों ने इसमें शामिल होकर नमक बनाया और कानून तोड़ा। कमलादेवी चट्टोपाध्याय, ऐनी बेसेंट, मार्गेट कूजिंस तथा सरोजनी नायडू जैसी सभी नेत्रियों ने इसे यादगार आंदोलन की संज्ञा दी। यह भी याद रखने की बात है कि बड़ी संख्या में पढ़ी लिखी, उच्च कुलीन तथा राजनैतिक रूप से सक्रिय नेताओं के परिवार की स्त्रियां भी जो राष्ट्रीय आंदोलन के विभिन्न कार्यक्रमों में नेतृत्व कर रही थीं उनमें हिन्दू स्त्रियों के अलावा मुस्लिम, पारसी और मार्गरेट कूजीन्स व ऐनी बेसेंट जैसी विदेशी महिलाएँ भी थीं। समाज और आंदोलन के प्रति इनके दृष्टिकोण और कार्यविधि में मतभेद हो सकता था लेकिन गांधी का राजनीति और समाज के हर वर्ग पर व्यापक प्रभाव के कारण जनव्यापी आंदोलन का चरित्र मूलतः राष्ट्रवादी और स्वाधीनता के उद्देश्य के लिये ही रहा। राष्ट्रीय आंदोलन ने यह भी प्रमाणित किया कि महिलाओं के अपने सरोकारों के अलावा बड़े-सामाजिक और राष्ट्रीय प्रश्नों पर उनकी आंदोलनकारी भूमिका निर्णायक भी हो सकती है। ऐसा ही अठारहवीं शताब्दी में फ्रांस की क्रांति के समय भी हुआ था।

कांग्रेस के आंदोलन में अब विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार और शराबबंदी आंदोलन में धरना और आबकारी लाइसेंस की नीलामी रोकना जैसे कार्यक्रम शामिल किये गये जिनमें महिलाएँ आगे आगे थीं। स्त्री आंदोलनकारियों के विभिन्न कार्यक्रमों को संचालित करने के लिये अब अनेक संगठन थे जिनमें महिला राष्ट्रीय संघ, लेडीज़ पिकेटिंग बोर्ड, स्त्री स्वराज्य संघ और स्वयंसेविका संघ प्रमुख थे। इसके साथ ही सूत कातने, खादी बुनने जैसे कार्यक्रम भी गांधी जी की प्रेरणा से शुरू हुए जिनमें घरेलू महिलाओं की अप्रत्यक्ष रूप से बड़ी संख्या शामिल थी। ऐसे सामाजिक वातावरण में जहां समझा जाता है कि स्त्री पति की आज्ञा से ही घर से बाहर निकलती और काम कर सकती है, राष्ट्रीय आंदोलन के प्रखर वातावरण में ये अवधारणाएं कमजोर हुईं। यह महत्वपूर्ण था कि पितृसत्तात्मक समाज में वे बड़ी संख्या में इन कार्यक्रमों में भाग लेती तथा जेल भी जाती दिखाई दीं।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद स्त्रियों की आंदोलनकारी भूमिका धीरे-धीरे समाप्त हो गयी। स्त्री सशक्तीकरण हेतु अभी बहुत कुछ किया जाना था। उस समय स्त्री साक्षरतादर मात्रा 9 प्रतिशत थी। अब स्त्रियों को लोकतांत्रिाक राज्य व्यवस्था में सभी संवैधानिक अधिकार समान रूप से प्राप्त थे। अब सब कुछ सरकार के कार्यक्रमों पर और शासन व्यवस्था की प्रगति की अवधारणा पर निर्भर था। अब अंग्रेज के रूप में शोषणकारी-दमनकारी शत्रु भी नहीं था। दरअसल भारतीय समाज में लैंगिक आधार पर असमानता और पुरुष-वर्चस्ववाद कभी बहस का विषय नहीं बन पाया था। लिंग आधारित स्त्री पराधीनता परंपरागत रूप से इतनी मजबूत थी, भारतीय समाज व्यवस्था के अभिन्न अंग के रूप में स्वीकृत थी और धार्मिक आख्यानों, पुराण कथाओं के रूप में धर्म सम्मत थी और सर्वमान्य थी कि उस पर प्रश्नचिह्न लगाना स्त्री समाज के लिये लगभग असंभव था।

स्वतंत्रता के बाद किसी बड़े आंदोलन में स्त्रियों की बड़ी संख्या में भागीदारी तेलंगाना आंदोलन में हुई। भूमि पुनर्वितरण और भूमि सुधारों की मांग को लेकर होने वाले खेतिहर किसानों के आंदोलन सरकार की दमननीति का शिकार हुए लेकिन आंध्र प्रदेश के तेलंगाना में आंदोलन कम्युनिस्टों और माओवाद से प्रभावित नेताओं के हाथ में था। वहां तेलंगाना के ढाई हजार गाँव ‘मुक्त’ करा लिये गये और वांछित भूमि पुनर्वितरण के साथ सुधार कार्यक्रम लागू हुए। तेलंगाना आंदोलन में हड़तालों और रैलियों में हजारों की संख्या में स्त्रियां शामिल थीं। कम्युनिस्ट पार्टी पर प्रतिबंध लगने के बाद छापामार (गुरिल्ला) युद्ध में भी वे तरह-तरह से मदद करती थीं। भूमि सुधार आंदोलन के दौरान पुरुषों को स्त्रियों और पत्नियों के प्रति समानता और सम्मानजनक व्यवहार के लिये भी प्रेरित किया जाता था। जाहिर है किसी आंदोलन में पुरुषों के साथ स्त्रियों की भागीदारी और सक्रियता हमेशा समानतापूर्ण वातावरण बनाने में मददगार साबित हुई है। छठे-सातवें दशक में विशेष रूप से उत्तराखंड में स्त्रियों की वृहद भागीदारी जंगल के वृक्षों के कटान रोकने के लिये होने वाले आंदोलन में रही है। जंगल और पर्यावरण पहाड़ी जीवन और जन-जीवन के लिये कितना आवश्यक है, वहीं के निवासी इसे समझ सकते हैं।

सातवें-आठवें दशक में स्त्रियों द्वारा अन्य बड़े आंदोलनों में शराबबंदी प्रमुख मुद्दा रहा। उत्तराखंड के अलावा पूर्वोत्तर के राज्यों में भी यह समस्या रही है जहाँ पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियां श्रमशील हैं और परिवार संभालती हैं लेकिन पुरुष शराब के व्यसनी हैं। समय-समय पर शराबबंदी आंदोलन जगह-जगह पर चले। महिलाओं का मानना था कि परिवार की बदहाली और स्त्रियों के प्रति हिंसा का कारण शराब है।

स्त्रियों के प्रति हिंसा के मामलों में स्त्रियों ने सदैव आंदोलनकारी रुख अपनाया। समाज में पुरुषों के वर्चस्ववादी सोच के साथ जब सत्ता की ताकत जुड़ जाती है तब स्त्रियों के प्रति हिंसा भी भयानक रूप में होती है। नब्बे के दशक में हैदराबाद में एक मुस्लिम औरत से पुलिस वालों ने बलात्कार किया और विरोध करने पर उसके रिक्शाचालक पति को मार डाला। इसके विरोध में हैदराबाद में हजारों की संख्या में उग्र प्रदर्शन हुआ। जिसमें अंततः पुलिस को गोली चलानी पड़ी। बाद में सत्र न्यायालय से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने पुलिस वालों को छोड़ दिया। आज भी यौन हिंसा के विरुद्ध स्वतः स्फूर्त आंदोलन समय-समय पर उठते ही रहे हैं।

1980 के महाराष्ट्र में पुलिस वालों ने मथुरा नामक लड़की को थाने ले जाकर बलात्कार किया। घर परिवार और गांव के लोगों के दवाब से पुलिस वाले गिरफ्तार तो हुए लेकिन सत्र न्यायालय से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने उन्हें वरी कर दिया। कारण यह कहा गया कि मथुरा के अन्य किसी या किन्हीं व्यक्तियों से संबंध हैं। यह प्रचलित पुरुषवादी मानसिकता का प्रतीक था जिसके अनुसार यदि किसी स्त्री के अन्य पुरुष से संबंध हैं तो वह अवश्य पतिता है और हर पुरुष को उससे संबंध बनाने या बलात्कार करने का अधिकार मिल जाता है। मथुरा केस के संबंध में पूरे देश में हलचल हुई और स्त्रियों के प्रति होने वाले यौन अपराधों के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव और न्यायिक प्रक्रिया में बदलाव की बात भी जोर शोर से उठाई गयी।

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