योरोप के नवजागरण के विपरीत भारत में नयी चेतना और विचारों का परिदृश्य एकदम भिन्न था। प्रारंभिक अवस्था में यह समाज सुधार आंदोलन थे जिन्होंने बंदिनी अवस्था की भारतीय स्त्री के जीवन की त्रासदी को समझते हुए उन स्थितियों को बदलने के प्रयास किये और अपने विचारों को संगठित रूप में आंदोलनकारी स्वरूप दिया।

डा० नमिता सिंह’ के द्वारा, स्त्री आन्दोलन के इस विस्तृत विमर्श की ‘सातवीं क़िस्त’…| संपादक

स्त्री आंदोलन-इतिहास और वर्तमान

डॉ० नमिता सिंह

योरोप के नवजागरण के विपरीत भारत में नयी चेतना और विचारों का परिदृश्य एकदम भिन्न था। प्रारंभिक अवस्था में यह समाज सुधार आंदोलन थे जिन्होंने बंदिनी अवस्था की भारतीय स्त्री के जीवन की त्रासदी को समझते हुए उन स्थितियों को बदलने के प्रयास किये और अपने विचारों को संगठित रूप में आंदोलनकारी स्वरूप दिया। बंगाल के राममोहन राय जो स्वयम् संपन्न जमींदार परिवार से थे वे अपने भाई की विधवा पत्नी को जबरन सती करने की घटना से बहुत आहत थे। स्त्री जीवन के सुधार के लिये सती प्रथा के विरुद्ध यह पहला प्रयास था। उन्होंने समाज के शिक्षित, चेतना संपन्न लोगों के साथ मिलकर 1818 में ‘ब्रह्म समाज’ संगठन की स्थापना की। समाज सुधारों विशेष रूप से स्त्री जीवन के लिये किये जाने वाले कामों के कारण वह अग्रणी पंक्ति में गिने जाते हैं। अपने अथक प्रयासों से वह 1829 में सती प्रथा को प्रतिबंधित करने का कानून बनवाने में सफल रहे। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी वह अग्रणी थे और उन्होंने बंगला, फ़ारसी और हिंदी में पत्रा पत्रिकाएं निकालीं। इनमें भी राष्ट्रीय प्रश्नों के अलावा समाज सुधार और स्त्रियों की दशा में सुधार संबंधी लेख होते थे।

उन्नीसवीं सदी के सभी समाज सुधार आंदोलन विशेष रूप से स्त्री केंद्रित थे और कुछ विशिष्ट परिवारों की स्त्रियों को अपवाद स्वरूप छोड़ दें तो सामान्यतः वे सामाजिक जीवन में अनुपस्थित थीं। बंगाल के ब्रह्म समाज आंदोलन के साथ ईश्वरचंद्र विद्यासागर, केशवचंद्र सेन जैसे लोग संबद्ध थे। सती प्रथा के प्रतिबंध के बाद इन लोगों के प्रयासों से विधवा विवाह को कानूनी मान्यता मिली और सदी के अंत में बालविवाह का विरोध मुख हुआ। समाज में विधवा स्त्रियों विशेष रूप से बाल विधवाओं की भीषण दुर्गति और दयनीय अवस्था के कारण इन सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध आंदोलन विरोध कर रहे थे। दूसरी ओर परंपरागत हिन्दू समाज इन सुधार प्रयासों का हर संभव विरोध कर रहा था। उनका कहना था कि सती प्रथा और बालविवाह को प्रतिबंधित करने वाले कानून हिन्दू धर्म और संस्कृति पर कुठाराघात है और कि विधवा पुनर्विवाह का समर्थन और बालविवाह का निषेध हिन्दू स्त्रियों को चरित्रहीन बनाकर पथ भ्रष्ट करेगा। इन कानूनों के विरोध में हिन्दू समाज के अनेक संगठनों ने इंग्लैंड में महारानी के पास हजारों लोगों के हस्ताक्षरों के साथ अपनी पिटीशन भी दायर की। यह तथ्य भी ध्यान रखने योग्य है कि इसी समय कलकत्ता की महिला चिकित्सकों ने भी लड़कियों के विवाह की उम्र बढ़ाने के लिये समाज सुधारकों का समर्थन किया। 1890 में सोलह सौ ‘हिन्दू’ स्त्रियों ने भी बालविवाह के विरुद्ध और विवाह के लिये कानूनी उम्र बढ़ाने के लिये महारानी विक्टोरिया के सम्मुख याचिका प्रस्तुत की।

ब्रह्म समाज के समानांतर महाराष्ट्र में प्रार्थना सभा थी स्थापना हुई जिसके अग्रणी महादेव गोविंद रानाडे थे। इसके मुख्य कार्यक्रमों में स्त्री शिक्षा के अतिरिक्त बालविवाह का विरोध तथा विधवा विवाह का समर्थन था। उत्तर भारत में स्त्री जीवन में सुधारों के लिये प्रयत्नशील दयानंद सरस्वती द्वारा आर्य समाज आंदोलन शुरू किया गया। देश में एक नयी चेतना और जागृति का वातावरण निर्मित हो रहा था जिसमें इन सामाजिक कुरीतियों का जो स्त्रियों के दुखमय जीवन का कारण थीं, विरोध हो रहा था। ये सभी आंदोलन स्त्री शिक्षा के लिये भी प्रयत्नशील थे और इसके लिये शिक्षा संस्थाएं आरंभ कर लड़कियों को शिक्षित करने के लिये विभिन्न माध्यमों से प्रचार कर रहे थे।

जैसे पहले भी कहा जा चुका है, भारतीय नवजागरण और समाज सुधार आंदोलन एक ओर पश्चिमी शिक्षा और नयी चेतना की देन थे तो दूसरी ओर नयी उभरती राष्ट्रीय चेतना और उपनिवेशवादी रीतिनीति के प्रतिरोध का भी प्रतिफलन थे। उदाहरण के लिये उन्नीसवीं सदी के आरंभ से ही अनेक ईसाई मिशनरी संस्थाएं शिक्षा के क्षेत्र में, विशेष रूप से लड़कियों की शिक्षा के लिये बहुत सक्रिय थीं। लगभग पूरे देश में ये स्कूल और कालेज खोल रहे थे। 1810 में सबसे पहले लड़कियों के लिये स्कूल अंग्रेजों ने और मिशनरियों ने शुरू किये। मुस्लिम लड़कियां भी यहां पढ़ने आ रही थीं। 1827 तक हुगली जिले में ही वे 12 कन्या पाठशालाएँ खोल चुके थे। अंग्रेजों द्वारा चलाई जाने वाली अन्य अनेक संस्थाएं भी हिन्दुस्तानी लड़कियों के बीच शिक्षा के प्रसार में दिलचस्पी ले रही थीं और स्कूल खोल रही थीं। इन मिशनरी स्कूलों में अधिकतर लड़कियां गरीब परिवारों से थीं। अब बंगाल में हिन्दू और ब्राह्मण कन्या पाठशालाएं भी खोली जाने लगीं जिनमें अधिकतर ऊँची जाति की और सम्पन्न परिवारों की लड़कियां पढ़ने जाने लगीं।

भारतीय समाज सुधारक ईसाई मिशनरियों द्वारा खोले गये स्कूलों और बड़े पैमाने पर शिक्षा के प्रसार से सशंकित थे। उनका विचार था कि शिक्षा के साथ-साथ ये मिशनरी ईसाई धर्म का प्रचार कर रहे हैं और बालक-बालिकाओं को धर्मांतरण के लिये भी प्रेरित कर रहे हैं। इसी कारण से बंगाल में ब्रह्म समाज हो, तत्ववोधिनी सभा हो, इन संगठनों ने भी लड़कियों के लिये स्कूल खोले और उनके लिये पाठ्य पुस्तकें तैयार कराईं। भारतीय संस्कृति और भाषा के अध्ययन के साथ इस प्रकार पाठ्यक्रम बनाये गये कि लड़कियां गृहकार्य में दक्ष हों। उत्तर भारत में आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती और बाद में उनके अनुयायियों द्वारा दयानंद ऐंग्लो वैदिक (डीएवी) स्कूल और कालेजों की लंबी शृंखला का निर्माण किया। बाल विवाह के विरोध और विधवा पुनर्विवाह का समर्थन भी बहुत सक्रिय रूप से आर्य समाज ने किया।

स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में ज्योतिबा फुले और उनकी पत्नी सावित्री फुले को स्मरण करना आवश्यक है। उन्नीसवीं सदी के मध्य में भारतीय समाज के जनजीवन में नवजागरण की उत्ताल लहरों के बीच उल्लिखित सामाजिक कुरीतियों पर जब अनेक समाज सुधारक अपनी सोच और क्रियात्मकता को केंद्रित कर रहे थे, दलित चिंतक और समाज सुधारक ज्योतिबा फुले ने दलित समाज के प्रति वर्णवादी हिन्दू समाज की छुआछूत जैसी असमानता पर आधारित परंपराओं पर ध्यान दिया। उन्होंने सर्वप्रथम अछूत कन्याओं के लिये पाठशालाएं खोलीं। अपनी पत्नी सावित्री बाई को शिक्षित किया और उन्हें दलित कन्याओं की शिक्षा का दायित्व सौंपा। 1852 तक फुले ने तीन कन्या पाठशालाएं तथा दलितों के लिये एक स्कूल खोला। इन कार्यों के लिये ज्योतिराव फुले और सावित्री फुले को न सिर्फ सवर्ण समाज बल्कि स्वयम् के दलित और पिछड़े समाज के लोगों के विरोध का सामना भी करना पड़ा। दलित कन्याओं की शिक्षा और सामाजिक उत्थान के लिये उनके प्रयासों को संगठित रूप देने के लिये उन्होंने बाद के वर्षों में ‘सत्यशोधक समाज’ संस्था की स्थापना की।

इस दौरान तेजी से उभरते प्राकृतिक विज्ञान के अनेक नये जैव सिद्धांत प्रतिपादित हुए। प्रजातिवादियों ने अनुवांशिक श्रेष्ठता के सिद्धांत के आधार पर स्थापित करने का प्रयास किया कि ‘अंग्रेजी शासन प्रकृति प्रदत्त’ है। यानि वंशवादियों का कहना था कि ‘अंग्रेज अनुवांशिक रूप से शासन करने के लिये ही उपयुक्त हैंं। इसलिए वे निम्न जातियों को अपना शिकार बनाते हैं’ (राधाकुमार-स्त्री संघर्ष का इतिहास)। इसका विरोध भी चेतना संपन्न, पढ़े लिखे वर्ग ने किया। भारतीय समाज सुधारकों ने सिद्ध करने का प्रयास किया कि हेयता या निम्नता अनुवांशिक नहीं बल्कि समाज व्यवस्था के परिणाम स्वरूप है। पश्चिमी जीवन से तुलनात्मक स्तर में भारतीय स्त्री के उत्थान और सशक्तीकरण की अब महती आवश्यकता थी। अतः समाज सुधारकों ने स्त्री की हीन स्थिति के लिये उत्तरदायी परंपराओं और प्रथाओं जैसे सती, बालविवाह, परदा प्रथा की आलोचना करते हुए उसे स्त्री जीवन का कलंक बताया। साथ ही स्त्रियों को उन्नतशील बनाने के लिये उनकी शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह के आंदोलन तेज कर दिये। विधवाओं का दुर्गतिपूर्ण जीवन विश्व के अन्य समाजों के बीच भारतीय परंपरा की निम्नतर स्थितियों का परिचायक था।

इसके साथ ही एक अन्य आंदोलन जो तीव्र हुआ वह फैक्ट्री कानून लागू करने के लिये था। भारत में अब उद्योगों की स्थापना हो रही थी। अंग्रेजों द्वारा शुरू किये गये उद्योगों के अलावा देसी पूंजीपति-उद्यमी वर्ग भी उभर रहा था। ऐसी स्थितियों में स्त्रियां भी श्रमिक के रूप में अब काम कर रही थीं। 1890 तथा 1891 में इंडियन फैक्ट्रीज़ अमेंडमेंट एक्ट बना। इसके अंतर्गत बाल श्रमिक की न्यूनतम आयु 7-14 वर्ष और काम के घंटे नौ से सात कर दिये गये। इसी प्रकार स्त्रियाँ जो कारखानों में काम करती थीं उनके काम के लिये ग्यारह घंटे निर्धारित किये गये जिसमें डेढ़ घंटे का मध्यान्ह विश्राम के लिये अवकाश था।

हिन्दूवादी और परंपरावादी भारतीय समूहों के प्रबल विरोध के बावजूद 1860 में लड़कियों के विवाह के लिये रजामंदी की उम्र 10 वर्ष निर्धारित करने का कानून पास कर दिया गया। इसके बाद यह आंदोलन थम सा गया। सदी के अंतिम वर्षों में बरहम मालाबारी ने पुनः इस मुद्दे को उठाया। मालाबारी पारसी थे लेकिन उन्हें हिन्दू समाज के पढ़े लिखे प्रबुद्ध वर्ग का व्यापक समर्थन प्राप्त था। दरअसल फूलमणि देवी नामक 10 वर्षीय बालिका वधू विवाह की पहली रात ही अत्यधिक स्राव के कारण मृत्यु को प्राप्त हो गयी। अखबारों में छपी इस घटना ने एक बार फिर बाल विवाह विरोध के आंदोलन को तीव्रतर किया। आंदोलन के समर्थकों की राय थी कि इसके कारण ही भारत का भौतिक और आध्यात्मिक पतन हो रहा है। कच्ची उम्र में शादी और फिर प्रसव के कारण अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। बहुधा ‘स्त्रियों की मृत्यु तक हो जाती है। लघुवय माताओं के बच्चों के सिर को असमय दबा दिये जाने के कारण ऐसे बच्चे समय से पूर्व ही मर जाते हैं या शरीर या दिमाग से कमजोर होकर सारी उम्र मूर्खों की भांति बिताते हैं।’ (सर्जन-मेजर डी.एन. पारिख, गोकुलदास तेजपाल हास्पीटल, बांबे-उद्धृत स्त्री संघर्ष का इतिहास, राधा कुमार)

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