“आदिम समाज से लेकर कबीले या गण समूहों में मातृसत्तात्मक समाज ही था और वंश अथवा संतान की पहचान माता के रूप में होती थी। आदिम समाज के स्वच्छंद यौन संबंध हों या सामाजिक विकास का यह कबीलाई रूप हो जहां एक गण के पुरुष दूसरे गण की स्त्रियों से यौन संबंध बनाते थे, पुरुष आधारित संतति की पहचान मुश्किल थी इसीलिये पहचान माता के नाम पर ही होती थी।
सामंती समाज का विकास और उत्कर्ष स्त्री-दासता की गाथा है। कृषि आधारित अर्थ व्यवस्था और विकसित हो रही सामाजिक संरचना में भूस्वामित्व महत्वपूर्ण था। राज्य व्यवस्था कृषि उत्पाद का दाय या अंश जो कर के रूप में था, वसूल करती थी। दूसरा साधन राज्यों का विस्तार और युद्ध होते थे। कृषि जब व्यक्तिगत स्तर पर परिवार के ढांचे का हिस्सा बनने लगी तो को अब संपत्ति की विरासत अपने द्वारा उत्पन्न पुत्राों के लिये चाहिये थी। संतति की पहचान अब पुरुष से होनी थी और इसके लिये स्त्री का एक ही पुरुष से यौन संबंध होना आवश्यक था। संतति की पहचान और अतिरिक्त उत्पाद के रूप में संपत्ति का संग्रह पितृसत्तात्मक सामाजिक स्वरूप का आधार बना।”

डा० नमिता सिंहके द्वारा, स्त्री आन्दोलन के इस विस्तृत विमर्श को निरंतर किस्तों में प्रकाशित किया जाएगा |   आलेख की पहली क़िस्तके बाद के बाद अगली क़िस्त जल्द ही आप पढेंगे ….| संपादक  

स्त्री आंदोलन-इतिहास और वर्तमान 

नमिता सिंह

नमिता सिंह

हम अक्सर कहते हैं कि मानव सभ्यता का विकास स्त्री-जाति की पराधीनता का इतिहास भी है। यह ठीक उसी तरह है कि मानव सभ्यता के इतिहास में विकास का प्रत्येक चक्र निम्न दास अथवा वंचित वर्ग के श्रम के शोषण चक्र से जुड़ा हुआ है। सामंती समाज में वर्गीय संबंधों पर आधारित क्रियाओं-अंतःक्रियाओं पर आधारित ये निष्कर्ष सटीक हैं और इतिहास सम्मत हैं। दरअसल ये स्थितियाँ व्यवस्था जनित हैं और समाज के वर्चस्ववादी समूह द्वारा निर्मित सामाजिक नियम-कानूनों से संचालित होती हैंं। शासन-व्यवस्था और सामाजिक शक्ति के केंद्र परस्पर सहयोगी होते हैं जिसमें तीसरा आयाम धार्मिक समूहों द्वारा अक्सर राज्य और समाज के संचालन में निर्णयकारी भूमिका में होता है। थोड़े बहुत उलटफेर के साथ जिसमें किसी व्यक्ति विशेष की भूमिका, किसी विशेष कालखंड अथवा परिस्थितियों में होने वाले बदलाव के कारण वाह्य स्वरूप में कुछ बदली हुई स्थितियां दिखाई दे सकती हैंं लेकिन मूलभूत सामाजिक संरचना और क्रियाकलापों में ज्यादा अंतर नहीं हो सकता।

व्यवस्था की शक्तियां और सामाजिक समूहों के शक्ति केन्द्र सामाजिक स्वरूप का निर्धारण करते हैंं। आदिम समाज के बाद आग की खोज और फिर फल-वनस्पति उत्पादों के रूप में भोजन संग्रह वाले कालखंड के बाद का समय पशु पालन आधारित है। यह वह समय है जब घुमन्तू चरवाहों के रूप में समूह थे और कबीलाई पद्धति शुरू हो चुकी थी। आदिम समाज से लेकर कबीले या गण समूहों में मातृसत्तात्मक समाज ही था और वंश अथवा संतान की पहचान माता के रूप में होती थी। आदिम समाज के स्वच्छंद यौन संबंध हों या सामाजिक विकास का यह कबीलाई रूप हो जहां एक गण के पुरुष दूसरे गण की स्त्रियों से यौन संबंध बनाते थे, पुरुष आधारित संतति की पहचान मुश्किल थी इसीलिये पहचान माता के नाम पर ही होती थी। कबीलों (गणों) की संपत्ति की विरासत भी केवल स्त्री से संबंधित रक्त-संबंधियों के लिये ही थी। कबीलाई समाज में युद्ध अनिवार्य थे। पशुधन मुख्य संपत्ति थी और युद्ध की लूट में पशु तथा पराजित दास थे। जीवन यापन के लिये गण समूहों द्वारा स्थाई निवास और संगठित समाज की शुरूआत के साथ-साथ कृषि उत्पादन की पहचान और उसके लाभकारी स्वरूप से भी अब परिचय हुआ था। कृषि के रूप में उत्पादन प्रक्रिया के आरंभिक दौर में भी समूह गत यौन संबंध प्रचलित रहे और मातृ सत्तात्मक सामाजिक स्वरूप बना रहा। पशु पालन करके और जानवरों की नयी नस्लों को तैयार करते हुए दौलत का एक ऐसा स्रोत खुला जिसकी पहले कल्पना नहीं की जा सकती थी। उसकी बदौलत नये सामाजिक संबंधों का जन्म हुआ। पशुओं के रेवड़ परिवार के मुखिया की संपदा थे। इसी तरह दास भी उनकी संपत्ति थे। कृषि के विकास के साथ दासों की जरूरत बढ़ी और उनके श्रमबल से समृद्धि का रास्ता बना।

कृषि के विकास के साथ सामाजिक संरचना भी बदलने लगी और संगठित सामाजिक स्वरूप विकसित होने लगा। पशुधन के विकास और अतिरिक्त उत्पादन ने व्यापार के रूप में विनिमय प्रक्रिया आरंभ की। सामूहिक जीवन पद्धति के साथ कृषि भी अभी सामूहिक रूप में थी। कृषि के विकास और अतिरिक्त उत्पादन में एक ओर स्त्री समूह शामिल था तो दूसरी ओर दासों-भूदासों के श्रम का इसमें योगदान भी था।

सामाजिक अर्थव्यवस्था के कृषि के रूप में स्थापित होने के बाद निरंतर इसका विस्तार हुआा। भूमि आधारित आर्थिक उत्पादन ज्यों-ज्यों समृद्ध हुआ उसी के साथ समाज का स्वरूप मातृसत्तात्मक से पितृसत्तात्मकता में बदलने लगा। अब कृषि उत्पादन का अतिरिक्त उत्पाद आवश्यकता की पूर्ति के बाद व्यापार के प्रयोजन हेतु उपलब्ध था। इस व्यापार ने हर संभव अधिकतम कृषि उत्पाद के लिये प्रयास किये जिसके परिणाम स्वरूप एक ओर कृषि आधारित तकनीकों और प्रयुक्त होने वाले साधन, उपकरणों का विकास और सुधार हुआ, वहीं दूसरी ओर मुफ्त श्रम को प्राप्त करने के उपाय खोजे जाने लगे। जाहिर है मानव-संसाधन के रूप में ही यह श्रम उपलब्ध हो सकता था और दास या गुलाम और कृषि दास अथवा शूद्रों के रूप में विभिन्न सामंती समाजों ने अपने-अपने तरीकों, नियम-साधनों के रूप में इसके लिये व्यवस्था की। कालांतर में श्रम-शोषण एक सीमा के बाद अमानवीय स्तर के शोषण स्वरूपों में बदल गया। न केवल इतिहास बल्कि अलग-अलग देशों-भाषाओं के साहित्य में ये शोषण गाथाएँ अंकित हैं तो सामाजिक अन्याय के विरुद्ध समय-समय पर होने वाली प्रतिकार गाथाएं भी वैश्विक समाज की धरोहर हैंं। जैसे-जैसे संपत्ति बढ़ती गयी, नारी की तुलना में पुरुष का महत्व बढ़ता गया। उत्तराधिकार की पुरानी प्रथा भी उलट होने लगी। पुरुष के स्वयं के बच्चे संपत्ति के हकदार हो सकें (रेवड़, दास-दासी, कृषि जनित आय) तो नये नियमों के अनुसार व्यवस्था की जाने लगी कि गण के पुरुष सदस्यों के वंशज गण में रहेंगे और स्त्रियों के वंशज गण से अलग कर दिये जायेंगे। इस प्रकार नारी के नाम से वंश चलना और माता के द्वारा विरासत का अधिकार मिलना बंद हो गया।

साभार google से

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सामंती समाज का विकास और उत्कर्ष स्त्री-दासता की गाथा है। कृषि आधारित अर्थ व्यवस्था और विकसित हो रही सामाजिक संरचना में भूस्वामित्व महत्वपूर्ण था। राज्य व्यवस्था कृषि उत्पाद का दाय या अंश जो कर के रूप में था, वसूल करती थी। दूसरा साधन राज्यों का विस्तार और युद्ध होते थे। कृषि जब व्यक्तिगत स्तर पर परिवार के ढांचे का हिस्सा बनने लगी तो को अब संपत्ति की विरासत अपने द्वारा उत्पन्न पुत्राों के लिये चाहिये थी। संतति की पहचान अब पुरुष से होनी थी और इसके लिये स्त्री का एक ही पुरुष से यौन संबंध होना आवश्यक था। संतति की पहचान और अतिरिक्त उत्पाद के रूप में संपत्ति का संग्रह पितृसत्तात्मक सामाजिक स्वरूप का आधार बना।

पितृसत्तात्मकता की स्थापना के बाद ‘सभ्य युग’ के रूप में सामाजिक विकास का इतिहास अंकित हुआ जिसका मुख्य आधार एकनिष्ठ विवाह था। ‘‘पुरुष और नारी के बीच पहला श्रम विभाजन बच्चा पालने को लेकर हुआ।…’’ परिवार-व्यक्तिगत स्थिति और राज सत्ता की उत्पत्ति-एंगेल्स स्त्री का संबंध उत्पादन प्रणाली से था और पुनरुत्पादन से भी था। कृषि के विकास और विस्तार से अब केवल पुरुष उत्पादक की भूमिका में हो गया था। अपनी पुनरुत्पादकता के कारण स्त्री की भूमिका अब मात्रा संतोनोत्पादकता तक सीमित हो गयी थी। ‘‘मातृ सत्ता का विनाश नारी जाति की एक ऐसी पराजय थी जिसका पूरे विश्व के इतिहास पर प्रभाव पड़ा…. वह पुरुष की वासना की दासी, संतान उत्पन्न करने की एक यंत्रा मात्रा बनकर रह गई।’’ (एंगेल्स-वही)

परिवार की उत्पत्ति के साथ अब पुरुष परिवार का मुखिया था। प्रारंभिक अर्थों मं फैमिली ;थ्ंउपसंद्ध (परिवार) दरअसल भूदासों का समूह था जो परिवार के मुखिया की संपत्ति थी। लैटिन भाषा में ;थ्ंउनसनेद्ध का अर्थ है घरेलू दास। बाद में नये सामाजिक संगठन के रूप में परिवार को स्पष्ट करने के लिये इसका प्रयोग किया जाने लगा। मार्क्स के अनुसार ‘आधुनिक परिवार में न केवल दास प्रथा बल्कि कम्मी प्रथा (अर्धदास प्रथा) भी बीज रूप में निहित है क्योंकि परिवार का संबंध शुरू से ही खेती के काम करने वालों से रहा है।’ संतति की पहचान और वंशबेल की वृद्धि के लिये स्त्री का परिवार के भीतर मुखिया की संपत्ति के रूप में रहना जरूरी था। अब कबीलों के परस्पर युद्घों में संपत्ति के रूप में पशुधन था, कृषि उत्पाद थे, दास थे और परिवार की स्त्रियां भी थीं। भूस्वामी के रूप में अब पुरुष समाज के शीर्ष पर था। उसका गौरव भूिम के अलावा दासों और स्त्रियों के स्वामित्व पर आधारित था। सामंती व्यवस्था ज्यों-ज्यों मजबूत होती गयी, स्त्रियों की भूमिका घर-परिवार के अंतःपुर तक सीमित होती गयी। भूस्वामी की विरासत पुत्राों के लिये और स्त्री की भूमिका पुत्राोत्पत्ति तक शेष थी। अतिरिक्त कृषि उत्पाद ने जहां व्यापार के लिये रास्ते खोले वहीं भोग विलास को सामंती समाज का मानो अनिवार्य स्वरूप बना दिया।

स्त्री दासता से मुक्ति की कल्पना सामंती समाज में करना असंभव था। राज्य सत्ता, सामंती समाज और अब धार्मिक वर्चस्व का गठजोड़ आधी आबादी के ऊपर स्थापित किये अपने प्रभुत्व को कैसे छोड़ सकता था जिसे ऐतिहासिक परंपराओं ने निरंतर मजबूत ही किया था और अब वह संस्कृति के रूप में शोषित और शोषक वर्ग, दोनों में ही समान रूप से सबके दिलो-दिमाग में बस गया था।

भारत में बंदी स्त्री की मुक्ति का अभियान 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध से ही शुरू हुआ, जब समाज सुधार आंदोलन शुरू हुए। यह समय अलग-अलग नामों से इतिहास में दर्ज हुआ जो मूलतः नवजागरण काल के रूप में जाना गया। योरोप में नवजागरण काल ने (रेनेसाँ) औद्योगिक क्रांति के साथ राजनैतिक-सामाजिक जीवन में प्रवेश किया। नये आविष्कारों और तकनीकी विकास के साथ नये उद्योग धंधों की नींव पड़ी और नया पूंजीपति वर्ग उभर कर आया।

योरोप के देशों और फिर उत्तरी अमरीका के देशों में उद्योगों की स्थापना तथा पूंजीपति वर्ग के उदय और विस्तार के साथ स्त्रियों की जीवन पद्धति और भूमिका में भी बदलाव आया। श्रमिक स्त्री के रूप में यह उसकी नयी भूमिका थी जिसने सामाजिक संरचना को बदला। साथ ही सामंती समाज की स्त्री के श्रमिक रूप में रूपांतरित होने के साथ-साथ मध्यवर्ग के उपभोक्तावादी समाज में परिवर्तित होने की प्रक्रिया ने नयी समस्याओं के साथ ही स्त्री रूपांतरण के नये आयाम भी प्रस्तुत किये। पश्चिम की स्त्री चेतना और हलचल ने स्त्री आंदोलन के विभिन्न चरणों को रेखांकित किया जो लगभग दो शताब्दियों के कालखंड को लेखा जोखा है।

(क्रमशः … … )

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