मशीनी सभ्यता से मानवीय रिश्तों की गर्माहट से तपती ज़मीन को खोज लाना लेखकीय जिद है जैसे जीवित किन्तु इंसानी अवशेषों का प्रमाण | कुछ ऐसी ही ज़िद है “सीमा आरिफ़” की  रचनाओं में जो भावुक स्पर्श और भ्रामक स्पंदन के बीच अजीब वेचैनी से  गुजरते हुए स्त्री मन को सम्पूर्णता में टोह लेना चाहती हैं …..संपादक

स्त्री जब पुरुष के साथ…!

सीमा आरिफ

स्त्री जब पुरुष के साथ
सम्भोग के उन पलों में होती है
तो वो केवल भूख की लालसा
को नहीं मिटा रही होती है,
न ही ये एक वासना की तृप्ति
भर होती,
जानते हो तुम उस छण वो
दुनिया पर फ़तह पा लेना चाहती है
स्वयं को जीत लेना चाहती है
हार लेना चाहती है,
बहुत जो छूट गया है
अतीत की परछाई से

पा लेना चाहती है
हाथों में पुरुष के हाथों को लेकर
कोई वादा-वफ़ा का करने को
तत्पर नहीं होती उस की
वो रंगीन उँगलियाँ
बल्कि उन उँगलियों से वो
बहरूपिया मुल्क का
नक़्शा पुरुष की बदन पर
खींचती है उसकी नर्म उँगलियाँ
उसके अध्मुस्काए होंठों से
एक आत्मसंतुष्टि का भाव उभरता है
एवं उस पल स्त्री की यदि आँखें
पुरुष को बंद दिखाई देती हैं
तो ये उसका भ्रम है
वो इन बंद आँखों से
समाज पर अपना
क्रोध प्रकट कर रही होती है
वो केवल शरीर से
पुरुष के साथ नहीं होती
बल्कि उस पल
प्रेम रूपी धुंधले से
स्पर्श को छू रही कर
सांसरिक रिश्ते से ऊपर उठकर
समाधि पर वापसी कर रही होती है
स्त्री जब पुरुष के साथ
केवल शरीर से ही साथ नहीं होती।

2 –

गुल्ज़ार की नज्मों की तरह
क्यूँ आजकल रेस्पोंस करने लगे हो?
बुलबुला नहीं हो पानी का तुम
जो न डूबते हो न उभरते हो
न तारीख बदल सकी है
न हवा रोक पाई है तुम्हें
इसलिए ये जान लो
तुम गुलज़ार की नज़्म नहीं
न ही मेरी कविताओं से
इजाद हुई कोई शब्दवाली

3 –

मैं रात का अँधेरा नहीं
दिन का उजाला तो हूँ
मैं सुबह की पहली किरण न सही पर
दिनभर आंगन में धमाचौकड़ी तो हूँ
मैं शाम से बतियाती रात न सही
पर हर ख़्वाब की तस्वीर में तो हूँ
चेहरे पर गिरी बारिश की पहली बूँद न सही
पर छत पर बिखरी शफ़्फ़ाक़ धूप तो हूँ
मैं तेरी होकर भी तेरी न सही
पर तेरे रूह का हिस्सा तो हूँ

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