अनचाहे गहराते अंधेरों में व्याप्त सन्नाटे को अपने रचना शब्दों से तोड़ने का प्रयास करती “शहनाज़ इमरानी की कविता …..संपादक 

स्थिति नियंत्रण में है

शहनाज़ इमरानी

पुलिस कि गश्त है
चौराहों, सड़कों, गलियों में
अफवाओं का ज़ोर है और दहशत तारी है
तलवार,चाकू या कोई भी हो हथियार
सभी को चाहिये तेज़ धार
किस नस्ल का ख़ून है रग़ों में
वहशीपन और बर्बरता के शिकार
गोरे , काले, लाल, पीले और सफ़ेद
सभी कि रगों में है लाल ख़ून
क्या प्रतिशोध और प्रतिज्ञायें देती हैं
लहूलुहान हाथों को सुकून
सड़कें भागते क़दमों से थक कर
आहटें बन जाती हैं
क़त्लगहा बन गया है शहर
और वो मेहफ़ूज़ जगहों पर बैठे
कहते है स्थिति नियंत्रण में है
सारे शहर में आग, धुँआ फ़ायरिंग चीख़ और ख़ून
और हर तरफ “रास्ता बंद है” कि लगी हैं तख्तियां।

दृश्य के बाहर

मैं मान लेती हूँ कि मेरे पास
कहने के लिए नया कुछ नहीं
जो भी है कहा जा चुका है
अगर में न बोलूं तब भी
मेंरी ख़ामोशी का कोई मतलब निकाल लोगे
मेंरी सोच पर इल्ज़ाम लगा दोगे
अगर सोचे हुए रास्ते से चल कर
सोचे हुए मुक़ाम पर पहुँच जाऊँ
तो हो सकता है सोचा हुआ वो न हो मेरे सामने
मुश्किल है पहचान का अनपहचाना होना
मगर पहचान का अर्थ यह तो नहीं है
की उसे दृश्य मान लूँ
जो तुम्हे दिखाई देता है
पूरा सच बहुत सख़्त होता है
पर सबसे बड़ा सच मौक़ा परस्त है
एक आवाज़ जो नहीं है किसी और की तरह
दृश्य के बाहर हैं सन्नाटे और अँधेरा।

पुराना डाकख़ाना

चौड़ी सड़कों में दबे
पानी के बाँध में समा गए
शहर की तरह एक दिन तुम भी
तमाम मुर्दा चीज़ों में शुमार हो जाओगे
वक़्त की चाबूक से छिल गई है राब्ते की पीठ
कुछ शब्दों को नकार दिया है
कुछ पुराने पड़ गए शब्दों को
मिट्टी में दबा दिया है
उखड़ी सड़क, झाड़-झंखाड़
और अकेले खड़े तुम
रोज़ अंदर-ही-अंदर का
खालीपन गहरा होता जाता है
पुराने धूल भरे कार्ड
पत्रिकायें, बेनाम चिट्ठियां
जाने कहाँ-कहाँ भटकी हैं
कुछ आँखें धुंधला गयी होंगी इंतज़ार में
कुछ आँखों से बहता होगा काजल
कुछ आँखें को आज भी इंतज़ार है
गुम हुई चिट्ठियों के मिलने का।

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