पंखुरी की कहानियां स्त्री विमर्श का हिस्सा हैं, इस बयान को हालांकि खारिज नहीं किया जा सकता, क्यों कि वे स्‍त्री मन के अत्यंत सूक्ष्म मनोभावों को परत दर परत खोलती चली जाती हैं। उनके मनोभावों में  कहीं कोई जटिलता नहीं है, बहुत साधारण है, लेकिन लेखन की खासियत यह है कि उसे बहुत ही कोमलता से स्पर्श किया गया है। ‘कोई एक अभयारण्य’ की सरोज अपनी पहचान, अपने अस्तित्व को तलाशती हुई पति के हुकूमत की लक्ष्मण रेखा से पैर बाहर निकाल लेती है …|’  पंखुरी सिन्हा के कथा संग्रह ‘कोई भी दिन‘ पर ‘अमृता ठाकुर’ का पुर्नसमीक्षित आलेख …..| – संपादक 

स्‍त्री मन के सूक्ष्म मनोभावों को परत दर परत खोलतीं कहानियां

स्‍त्री मन के सूक्ष्म मनोभावों को परत दर परत खोलतीं कहानियां: (अमृता ठाकुर) -: 'कोई भी दिन' 'पंखुरी सिंहा' :-

अमृता ठाकुर

कहानी की दुनिया में पंखुरी सिन्हा एक जानी-पहचानी हस्ताक्षर हैं। भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित दोनों कहानी संग्रह ‘कोई भी दिन’ व ‘किस्सा ए कोहनूर’ उनकी हुनरमंदी की विकास यात्रा को बखूबी बयां करता है। पंखुरी की कहानियां सपाट, बनी बनाई परिपाटी पर पैर धरते हुए आगे नहीं बढती बल्कि आसपास के माहौल पर चिंतन करती, टटोलती हुई आगे बढ़ती जाती है। युवा, प्रयोगधर्मिता, सरोकार- ये तीनों शब्द आपस में गुंथे हुए हैं, और अच्छी बात यह है कि ये तीनों ही तत्व पंखुरी की कहानियों में मिलते हैं। लेखिकाओ पर अक्सर ये आरोप लगाये जाते रहे हैं कि उन्हें ‘देह’ व ‘स्‍त्री सरोकार’ की परिधि के बाहर कुछ और नहीँ दिखता। जीवन के आसपास तमाम तरह के विषय होने के वाबजूद स्‍त्री और उसकी समस्याओं के इर्द- गिर्द ही इन लेखिकाओं के कथानक हैं। ये आरोप पंखुरी की कहानियों पर नहीं लगाए जा सकते हैं। इनकी कहानियों का कैनवास बहुत विस्तृत व विविधवर्णीं है। इनके मूल में ‘स्त्री विमर्श’ की झलक भले ही मिलती है, पर इनमें साम्राज्यवाद, वर्गभेद, पारिवारिक रिश्ते, राजनीति व मीडिया की कलुषता जैसे विषयों का समावेश भी गहनता के साथ किया गया दिखता है।

कथा संग्रह ‘कोई भी दिन‘ पंखुरी सिन्हा का पहला कहानी संग्रह है जो नवलेखन प्रतियोगिता में चयनित है। इसमें बारह कहानियां हैं। दूसरा कहानी संग्रह है ‘किस्सा ए कोहनूर‘, जिसमें ग्यारह कहानियां है। पहले संग्रह की तुलना में दूसरे संग्रह की कहानियों में परिपक्वता का एहसास स्वतः हो जाता है। दोनों ही संग्रह की कहानियों में विषय की विविधता है। पंखुरी पत्रकारिता क्षेत्र से जुडी रहीं हैं, मीडिया जगत के अंदर की कालिमा से वह अच्छी तरह परिचित हैं। पत्रकारिता, जो एक समय में आंदोलन का हथियार हुआ करता था आज पूंजीवाद ने उसे कमाई का औजार बना दिया है। मीडिया का दर्शन है, जो बिकता है उसे ही छापो, उसे ही दिखाओ। मीडिया का वर्तमान सच यही है। किस तरह हाशिए पर पड़े लोग और उनकी समस्याएं कभी खबर का हिस्सा नहीं बनते हैं, राजनैतिक उठा पटक, फैशन और गरमा- गरम गॉसिप ही बिकते और बेचे जाते हैं। ‘कहानी का सच’ का नीरज दिल्ली के सबसे बड़े हकीमी दवाखाना की बदहाली पर स्टोरी करता है लेकिन प्रोड्यूसर उस स्टोरी को यह कहकर खारिज कर देता है, ‘ड्राप करो, अरे यार, आज इतनी राजनीतिक खबरें हैं, बुलेटिन बड़ा भारी हो रहा है, कोई चटपटा फीचर लगा, अंशु करके लाई है फैशन शो वो लगाओ।‘ सीढियां उतरते हुए चीफ नीरज को समझाने लगे, ‘देखो नीरज, आयुर्वेद, हकीमी इन सबकी बुरी हालत हो रही है। पर ये खबर नहीं है। ये लंबे समय से धीरे धीरे हो रहा है। मान लो अगर यह इमारत ढह जाए और दो बच्चे मर जाएं, तो वो खबर है।‘ पंखुरी की कहानियों में पत्रकारों का चौकन्नापन और घटनाओं को अत्यंत सूक्ष्मता से अवलोकन करने की प्रवृत्ति भी दिखाई देती है। जैसे- ‘बेघर लोग जो पहले जॉर्ज पंचम की मूर्ति के नीचे सोते थे, अब जवाहर लाल नेहरू की मूर्ति के नीचे सोयेंगे, उन्हें क्या फर्क पड़ता है मूर्ति किसकी है, बहुत साल बाद।‘ यही सच है, वो गरीब जिसके सिर पर छत नहीं है, पेट में रोटी नहीं है उसकी चिंता छत या रोटी होगी न कि आजाद देश या नेता।

पंखुरी की कहानियां स्त्री विमर्श का हिस्सा हैं, इस बयान को हालांकि खारिज नहीं किया जा सकता, क्यों कि वे स्‍त्री मन के अत्यंत सूक्ष्म मनोभावों को परत दर परत खोलती चली जाती हैं। उनके मनोभावों में कहीं कोई जटिलता नहीं है, बहुत साधारण है, लेकिन लेखन की खासियत यह है कि उसे बहुत ही कोमलता से स्पर्श किया गया है। ‘कोई एक अभयारण्य’ की सरोज अपनी पहचान, अपने अस्तित्व को तलाशती हुई पति के हुकूमत की लक्ष्मण रेखा से पैर बाहर निकाल लेती है, एक कांवेंट में अपने ठाकुर जी को जिंदा रखे हुए आश्रय ले लेती है। बचपन से मिला हिंदू संस्कार और मजबूरी में अपनाए गए ईसाई माहौल के बीच का द्वंद्व तब पूरी तरह खत्म हो जाता जब भौतिक दुनिया से उसकी उम्मीदें पूरी तरह टूट जाती हैं। तब उसी ठाकुर जी की आस्था को मन में दबाए हुए वह नन बन जाती है। ‘अकेला पर्यटन और अकेली पूजा’ की पात्र एक औरत है, जो मां, है, सास है और विधवा भी है। सास बहू के आपसी रिश्ते में वर्चस्व की लड़ाई तो वह लड़ रही है लेकिन विधवा मां तब हार जाती है जब सधवा बहू के सिर पर समाज की स्वीकृति का हाथ पड़ जाता है। पितृसत्तात्मक समाज अपनी सत्ता पर नियंत्रण को बनाए रखने के लिए उन परंपराओं को हमेशा पोषित व अनुग्रहित करने का प्रयास करता रहा है, जो स्‍त्री की अकेली पहचान को नकारता है। सधवा स्‍त्री ‘सौभाग्यवती’ है और विधवा स्त्री ‘अपशकुन’ की सूचक। यह परंपरा इस आधुनिक युग में भी कुछ हद तक बनी हुई है। इस पितृसत्तात्मक सोच के वाहक के रूप में स्त्री भी किस तरह काम करती है इन पंक्तियों में देखा जा सकता है—‘लेकिन इला ने प्रभात का हाथ पकड़ा और बड़े दर्प से उसे आगे ले चली जैसे विजयी सेना शत्रु को पीछे छोड़कर विजय पताका लहराती आगे बढ़ जाती है, कुछ वैसे गर्व के साथ। लेकिन इला की आंखों में यह क्या देखा था मैने? क्या कहती थीं इला की आंखें?’ बात बहुत साधारण है लेकिन अत्यंत सूक्ष्मता से पकड़ी व जाहिर की गई है। बेलगाम रेस की संगीता के माध्यम से स्त्री के संघर्ष को पंखुरी ने सामने लाने की कोशिश की है। स्‍त्री, जो किसी भी वर्ग की है, किसी भी जाति की है, किसी भी उम्र की है, वह केवल स्त्री है। उसका संघर्ष एक जैसा है। मां की दादी भी इसी जात की थीं, मेरी नानी भी, संगीता भी है, और मैं भी रहूंगी। संगीता आएगी तो उससे कहूंगी कि तेरी मेरी एक ही जात है और इस छोटे से कमरे की तेरी सारी हरकत मैं देख चुकी हूं। देखना मुझे और कुछ भी नहीं है पर कहने को तो पूरी पोथी है।

कोई भी दिन

कोई भी दिन

‘किस्सा- ए- कोहनूर’ की कहानी ‘तीर्थयात्रा, अर्थशास्त्र और ईश्वर’ का शीर्षक ही कहानी के मूल कथ्य को स्पष्ट कर देता हैं। इस कहानी में लेखिका ने श्रद्धा, आस्था, जरूरत और बाजार, एक दूसरे से गूंथे चारों तथ्यों को अत्यंत तार्किक तरीके से सुलझाने की कोशिश की है। व्यक्ति की आस्था और श्रद्धा को बाजार किस तरह से भुनाता है, तीर्थ स्थानों का बाजारीकरण, जिसका व्यक्ति की श्रद्धा से कोई संबंध नहीं होता, जो विशुद्ध लाभ के मनोविज्ञान से संचालित होता है। रोजी रोटी का सवाल धर्म, पुण्य पाप से कहीं ऊपर होता है, इस बात को पंखुरी ने सरल तरीके से सामने रखा है। तीर्थ यात्रा के दौरान पहाड़ की चढ़ाई के लिए छड़ी बेचने वाला मोहम्मद अली और उचित दाम में बेची उसकी छड़ी, जो वास्तव में लंबी दूरी पार करने में पूरी सहायता करती है, कई सवाल खड़ा करते हैं। कहानी के पात्र तारक व तृप्ति एक स्थान पर पाप पुण्य पर बहस करते हुए कहते हैं जब वे दूसरे धर्म को मानते हैं तो इस धर्म में जो पाप पुण्य हैं वो उन्हें कैसे चढ़ेगा। अब तारक ढूंढ़कर तृप्ति को जवाब दे रहा था, पर तृप्ति के पास और सवाल आ रहे थे, तो क्या अलग अलग धर्मों के अलग अलग पाप पुण्य होते है। ‘किस्सा- ए- कोहनूर’ की पहली कहानी ‘समानान्तर रेखाओं का आकर्षण’ प्रेम और आकर्षण के बीच की दुविधा को सामने रखती है। अक्सर जिसे प्रेम समझा जाता है वह मात्र शारीरिक आकर्षण होता है। रचना अपने जिम इंस्ट्रक्टर विक्टर से प्रेम करने लगती है, जो उससे उम्र में छोटा भी है, जबकि विक्टर के मन में इस बात को लेकर किसी तरह की दुविधा नहीं है, वह जानता है कि उन दोनों के बीच मात्र शारीरिक आकर्षण है, उसे प्रेम कहा जाना ठीक नहीं है। दोनों के बीच बने शारीरिक संबंध में कहीं कोई नैतिकता का द्वंद्व नहीं दिखता, यह बात अच्छी लगी। अक्सर इस तरह की कहानियां नैतिकता, अनैतिकता के बहस में ही उलझ कर ही रह जाती हैं। ‘यात्रा और संक्रमण’ एक अच्छी कहानी है। दूसरे शहर में नौकरी के लिए जाती बेटी, मां का उसे स्टेशन छोड़ने आना, अकेली लड़की को देख ट्रेन में बैठे सहयात्रियों की प्रतिक्रिया, समाज अकेली लड़की को कैसे देखता है, समाज के इस नजरिए की वजह से लड़की के अंदर आने वाली असुरक्षा की भावना को पंखुरी ने हल्की फुल्की प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है और उसमें वह सफल भी रही हैं। इन पंक्तियों को देखें- ‘उत्सुक महिला आंखें ज्यादा खतरनाक हैं। महिला होना उनकी उत्सुकता को जायज नहीं बनाता, पर लाइसेंस देता है कुरेद कुरेद कर उसे शांत कर लेने का। एक लड़की ट्रेन में बैठ कर जा रही है, और एक अकेली औरत प्लेटफॉर्म पर खड़ी हाथ हिला रही है, क्या मजाक है। नहीं, बल्कि क्या मजाल है।………..वह मुझे ऐसे देख रहा था जैसे लोग भिंडी के खिले हुए फूल को देखते हैं। उम्रदार औरत मुझे ऐसे देख रही थी जैसे लोग भिंडी के बिगड़ गये पेड़ को देखते हैं।……….अजब बात है, वह मुझे घूर सकता है। मै उसे झूठ नहीं कह सकती? पर शीशे में खुद को देखा तो अफसोस नहीं हुआ। क्रोध मेरे चेहरे पर बुरा नहीं लगता, बुरी लगती है बेबसी।….क्या मैं रात भर ठिठुरती रहूंगी? इनमें से किसी न किसी के पास एक फालतू चादर तो होगी। पर किसे उठाऊं? महिलाएं तो मुझ पर चादर जाया करने से रहीं। यदि किसी पुरुष को उठाऊं तो वह चादर के साथ साथ कहीं कुछ और भी न देने लगे? कहानी ‘वीकएंड का स्पेस‘ में कामकाजी व्यक्ति के जीवन में छुट्टी का दिन कितना महत्वपूर्ण होता है जिसे वह अपनी इच्छानुसार गुजारता है। छुट्टी का दिन वह स्पेस होता है जब व्यक्ति अपने आप में रहता है, दुनिया के हिसाब से उसे नहीं चलना होता है। रश्मि के उसी स्पेस में जब ननद के बेटे अरित्र के घुसने की संभावना बनती है तो वह बौखला जाती है। लेकिन अपने बचपन की घटना को याद करने पर उसे एहसास होता है कि अपने स्पेस से थोड़ी कटौती करके अरित्र जैसे बच्चे को देगी, जो अपनों से दूर बार्डिँग में रह रहा है तो वह स्पेस घटेगा नही बल्कि बढ़ेगा। कहानी छोटी सी है, लेकिन कुछ शब्दों में ही बहुत कुछ कह जाती है। पंखुरी की कहानियों की यह खासियत है, चलते फिरते हल्के फुल्के ढंग से यह बहुत कुछ कह जाती हैं।

कहानियां आमतौर पर दो तरह की होती हैं। एक, जिसमें पात्र और घटनाएं एक दूसरे का हाथ थामे निरंतर आगे बढ़ते जाते हैं और अपने चरम पर पहुंचते हैं या जिसे ‘क्लाइमेक्स’ कहते हैं। जिसमें बीच- बीच में लेखक घटनाओं या पात्रों के माध्यम से दुनिया- जहान के मुद्दों पर अपनी राय भी रखता जाता है। यानी कहानी में अपनी चिंता या विचार डालना। इस शैली में लिखी कहानियों में जिज्ञासा का तत्व ज्यादा रहता है, पाठक जैसे- जैसे कहानी पढ़ते हुए आगे बढ़ता जाता है उसकी जिज्ञासा बढ़ती जाती है। दूसरी, जो पंखुरी की शैली कही जा सकती है, वह है विचारों में कहानी डालना। और विचार भी एक संदर्भ वाले नहीं, विविध प्रकार के विचारों के ताने- बाने के बीच कहानी डाली गई है। पंखुरी की लेखन शैली प्रयोगात्मक है। अधिकतर कहानियां शुरुआत में अब्सट्रेक्ट का आभास देती हैँ। पंखुरी के दोनों कहानी संग्रह में संकलित ज्यादातर कहानियों में एक साथ कई मुद्दों को उठाने की कोशिश की गई है। इन सभी मुद्दों को एक दूसरे से इस तरह से गूंथा गया है कि अगर याद्दाश्त बहुत तेज न हो तो कई बार याद करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है कि कहानी की शुरुआत किस संदर्भ से हुई थी। जिस तरह मस्तिष्क में अलग- अलग विचार एक दूसरे से जुड़ते जाते हैं और विचारों की पूरी श्रृंखला बन जाती है और जरूरी नहीं कि सभी विचार अर्थ की दृष्टि से एक दूसरे जुड़े हों। ठीक इसी तरह पंखुरी की कहानियों में भी ऐसा ही कुछ है। कहानी संग्रह ‘कोई भी दिन‘ की पहली कहानी ‘प्रदूषण’ लें, तो इस कहानी का पहला वाक्य ‘उसे मैंने अंततः इसलिए छोड़ा क्योंकि जो कुछ भी मै कहती थी, वह यही कहता था कि मैंने बहुत ज्यादा किताबें पढ़ ली हैं और मेरा दिमाग खराब हो गया है।‘ इस वाक्य में जिस पात्र का जिक्र है वह पूरी कहानी में कहीं नहीं मिलता, हां यह अवश्य है कि यह पात्र कहानी के सूत्र का शुरुआती सिरा है, या पहला विचार है जिसके अंत को थामे हुए दूसरा विचार आगे बढता जाता है, पर पहले विचार का दूसरे विचार से कोई संबंध नहीं है। विचार के इसी ऊहापोह के बीच पंखुरी का मूल चिंतन का मुद्दा है, इंसान को मशीन बनाता पूंजीवाद, शहर की आपाधापी, अकेली लड़की के सामने आती समस्याएं, विवाहेतर संबंध, लिव इन रिलेशन के प्रति समाज का नजरिया और अंतत: जरूरत और जीवन से भी बड़ा नैतिकता का सवाल। पंखुरी की ज्यादातर कहानियों मे अनावश्यक विस्तार देने की उनकी प्रवृत्ति कहानी की गति को अवरूद्ध कर बोझिल बनाती है। पंखुरी अलग अलग विषयों पर भटकने की जगह मूल विषय पर केंद्रित रहें तो उनकी कहानी में प्रवाह आएगा, जिसका अभाव कुछ कहानियों में खासतौर पर दिखता है। भाषा सरल व प्रवाहपूर्ण है तथा कठिन शब्दों व वाक्यों का इस्तेमाल करने से बचने का प्रयास किया गया है, जो विषय को आम पाठक वर्ग को ग्राह्य बनाने में सहयोग देता है।

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