इस बार क्यों, सदन का चलना तो हर बार ही मुश्किल होता है. जब ये सत्ता में थे तब भी विपक्ष ने चलने नहीं दिया था. अब ये विपक्ष में हैं तो भी यही होगा, कौन सी नई बात है.’ मैंने कहा. ‘पर इस बार ललितगेट, व्यापम जैसे ज्वलंत मुद्दे हैं.’ वे बोले. ‘तब भी कोयला, स्पेक्ट्रम आदि होते थे. बस नाम ही तो बदला है साधुरामजी. गठबंधन बदला है.

हंगामे का संस्कार

ब्रजेश कानूनगो

ब्रजेश कानूनगो

भारी बारिश के बावजूद साधुरामजी अचानक बारह ताड़ी की छतरी थामें मेरे घर चले आये. मुझे थोड़ा अचरज भी हुआ. ऐसे खराब मौसम में भले ही कितना ही जरूरी काम क्यों न हो वे घर से नहीं निकलते हैं.
‘क्या बात है साधुरामजी ! इतनी बारिश में यहाँ ? सब ठीक तो है?’ मैंने दरवाजा खोलते हुए पूछा.
‘सोंचा है आज पूरा दिन आपके साथ टीवी देखेंगे. अकेले–अकेले संसद की कारवाही देखने में मजा नहीं आयेगा.’ अपनी छतरी को सुखाने के लिए बरामदे में फैलाते हुए वे बोले.
‘अरे वाह! यह तो बड़ा अच्छा किया आपनें. मौसम भी बहुत अच्छा है. चाय-पकौड़े और संसद का सत्र. खूब मजा आयेगा. आइये-आइये.’ मैंने सोफे की ओर इशारा करते हुए उन्हें बैठने का आग्रह किया.
‘संसद की कारवाही भी पकौड़ों के आनंद से कम नहीं होती साधुरामजी.’ मैंने चुहुल की. ‘कैसे?’ उन्होंने मुस्कुराते हुए पूछा.
‘मानसून सत्र की विशेषता ही यह होती है साधुरामजी कि सदन के बाहर बारिश की ठंडी फुहारें होती हैं और भीतर गरमा गर्म बहसों का पकौड़ों की तरह भीतर बैठे सदस्य लुत्फ़ उठाते रहते हैं.’ मैंने कहा.
टीवी चालू किया तो देखा जबरदस्त हंगामें के बाद अध्यक्ष महोदय ने सदन की कारवाही आधे घंटे के लिए स्थगित कर दी थी.
‘इस बार थोड़ा मुश्किल ही होगा सदन का सुचारू रूप से चलना.’ साधुरामजी ने आशंका व्यक्त की.
‘इस बार क्यों, सदन का चलना तो हर बार ही मुश्किल होता है. जब ये सत्ता में थे तब भी विपक्ष ने चलने नहीं दिया था. अब ये विपक्ष में हैं तो भी यही होगा, कौन सी नई बात है.’ मैंने कहा.
‘पर इस बार ललितगेट, व्यापम जैसे ज्वलंत मुद्दे हैं.’ वे बोले.
‘तब भी कोयला, स्पेक्ट्रम आदि होते थे. बस नाम ही तो बदला है साधुरामजी. गठबंधन बदला है. नाम बदलने से कुछ नहीं होता, सब पहले जैसा ही होता रहेगा.’ मैं निराशा में बोलता गया.
‘क्या करें भाई ! यही प्रजातंत्र है. किसी के माथे पर नहीं लिखा होता कि कोई ठीक काम करेगा. अब देखिये अब उस संस्थान का नाम भी बदला जा रहा है.’ साधुरामजी आज मुझ से थोड़े सहमत दिखाई दिए.
‘केंद्र सरकार ने भी तो ऐसा ही कुछ किया था ‘योजना आयोग’ के साथ. वह भी अब ‘नीति आयोग’ हो गया है. अब देखिये आयोग-आयोग भर ही दिखाई देता है. पहले योजना रुकी रहती थी अब नीति लापता है.’ साधुरामजी ने सरकार पर तंज करते हुए कहा.
‘व्यापम की बिगड़ी छवि सुधारने के लिए उसका नाम ‘भरती एवं प्रवेश परीक्षा मंडल’ कर देने से यह सुनिश्चित नहीं हो जाता कि अब वहां गडबडी नहीं होंगी. कपडे बदल लेने से आँखों का रंग नहीं बदला करता.’ मैंने अपनी बात बढाई.
‘बिलकुल ठीक कहते हो तुम . नागनाथ कह लो या सांपनाथ, दोनों एक ही हैं. दोनों में से कोई भी डस ले हमारा मरना स्वाभाविक ही है.’ साधुरामजी मुस्कुराए.
‘दरअसल, व्यापम संस्था नहीं, संस्कार है साधुरामजी! जैसे कभी कहा जाता था कि ईश्वर कण-कण में व्याप्त है ,उसी तरह व्यापम तंत्र की रग-रग में समाविष्ट हो गया है. व्यापम में हम इतनें संस्कारित हो चुके हैं कि लगता है उसके बगैर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सकता. कुछ पाने के लिए व्यापम स्नान के बाद ही फल की आकांक्षा की जा सकती है अब.’ मेरा गुबार निकल रहा था.
‘ठीक है भाई, इतना गुस्सा भी ठीक नहीं. तुम्हारा ही बीपी बढेगा इससे, कहीं अस्पताल न जाना पड़ जाए.’ साधुरामजी ने वातावरण को थोड़ा सहज बनाना चाहा.
‘और वहां किसी व्यापम हितग्राही डाक्टर से सामना हो जाए तो और भी मुश्किल हो जायेगी.’ मैं हंसते हुए कहने लगा.‘ खैर, जाने दीजिये किसी ने कहा भी है ‘नाम में क्या रखा है’ कुछ भी रख लो, जयकिशन नाम बदलकर जैकी हो जाता है तो उसकी नाक छोटी नहीं हो जाती. बहुत समय हो गया है आप भी साधुरामजी ही बने हुए हैं अब तक, आपको भी अब ग्लोबलाइजेशन के दौर में ‘एस राम’ कहूं तो कोई आपत्ति तो नहीं है आपको?’
‘चलो अब टीवी लगाओ, शायद संसद की कारवाही फिर शुरू हो गयी होगी.’ साधुरामजी ने बात बदलते हुए टीवी की तरफ इशारा किया तो मैंने रिमोट का बटन दबा दिया. देखा कि संसद में फिर हंगामा हो गया था , अध्यक्ष ने दोबारा आधे घंटे के लिए कारवाही स्थगित कर दी थी.

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