वर्तमान सामाजिक और राजनैतिक बदलाव के बीच किसी कलैंडर की तरह बदलते और गुजरते वर्षों को युवा पीढ़ी खुद के भीतर बढती हताशा के रूप में देखने को विवश है और यह सायास है कि ऐसे में उसकी आंतरिक चेतना असार्गर्भित नगरीय चीख-पुकार से दूर माँ की थपकियों और इंसानी रिश्तों की सामाजिक बुनाबट में उलझे बदरंग सवालों से गुज़र कर खुद को खोजने में सुकून पा रही है | युवा पीढी के इन्हीं मानवीय एहसासों के साथ शोधार्थी अनुपम सिंहकी कविताएँ …… संपादक 

हमारे गाँव की विधवाएँ 

अनुपम सिंह

उधध रंगों में लिपटी औरतें
हमारे गाँव की विधवाएँ हैं।

हमारी दादियाँ चाचियाँ माएँ हैं
जवान भाभियाँ, बहनें हैं
जो उजाड़ ओढ़ अंधेरे में
सिसकियाँ भर रही हैं।

ज्ञान की खोज में जब पोते-पोतियाँ
कहीं दूर जा रहे होते हैं
तो विधवा दादियाँ दूर से ही
अपना प्रेमाशीष हवा में छोड़ देती हैं ।

विधवाएँ टूटी हुई बाल्टियाँ हैं
जिसमें सगुन का जल नहीं भरा जाता।

विधवा हुई माएँ बेटियों के ब्याह में
अपने आंचल से उनका सिर नहीं ढकतीं
बस हारी आँखों से उन्हें निहारती रहती हैं।
मन ही मन क्षमा माँग लेती हैं माएँ
विदा होती बेटियों से
और न जाने किन जंगलों में खो जाती हैं।

शुभ कार्यों से बेदख़ल विधवाएँ
मंगलाचार को रुदन के राग में गाती हैं।

हमारे गाँव की विधवाएँ और बिल्लियाँ एक जैसी हैं
बहुवर्णी स्त्रियाँ कब बनीं विधवाएँ
बिल्लियों में किसने भरे ये रंग
न विधवाएँ जान पाती हैं
न ही बिल्लियाँ।

माँ के लिए 

जब कभी
माँओं के प्यार-दुलार की बात चलती है
थोड़े से बच्चे चहकते हैं
बाक़ी सब उदास हो जाते हैं।
उन उदास बच्चों के साथ खड़ी मैं
याद करना चाहती हूँ अपनी माँ का स्पर्श।
मुझे याद आती हैं उसकी गुट्ठल खुरदुरी हथेलियाँ
नाखूनों के बगल निकले काँटों-से सूतरे
जो कई बार काजल लगाते समय
आँख में गड़ जाते थे।
सिंगार पटार के बाद माथे पर बड़ी तेजी से
टीक देती थी एक काला टीका
जिसे न जाने प्यार से लगाती थी या गुस्से से।
सोचती हूँ याद करूँ

साभार google

वो थपकियाँ जो माँएँ बच्चों को देकर सुलाती हैं,
देखती हूँ, वह चरखे के सामने बैठी
एक हाथ में रूई की पूनी पकड़े
दूसरे को
चरखे की घुण्डी पर टिकाए
उझक उझक कर सो रही है।
अब भी मेरे घर में मेहमानों के लिए जो सबसे सुंदर
चादर और दरियाँ हैं, उसके रेशे रेशे में
माँ झपकियाँ ले रही है
देर रात तक चरखा चलाती, ऊँघती माँ
दिन में भी तकली की तरह घूमती रहती
पाँवों में ढेरों गुरखुल छुपाए
कंकड़ पर पाँव पड़ते ही वह चीखती और ठंडी पड़ जाती।
माँ नहीं याद आती कभी माँ के रूप में
याद आती है चूल्हे की धुधुआती लकड़ियाँ
जिसे वह अपनी फूँक से अनवरत
सुलगा रही है ।
देख रही हूँ, माँ अपनी छोटी-सी गुमटी में बैठी
फरिश्तानुमा बच्चों का इंतिज़ार कर रही है
जहाँ दिन में एक दो बच्चे अपने घरों से
एकाध सेर गेहूँ चुरा लाते हैं
वह उन्हें हड़बड़ी में कुछ चूस नल्लियां पकड़ा देती है
इस समय सबसे ज़्यादा भयभीत दिखती है
वह उंकड़ू बैठी माँ।
माँ नहीं है माँ
वह चरखा तकली अटेरन है
भोर का सुकवा तारा है वह
जिससे
नई दुलहने अपने उठने का समय तय करती हैं।
माँ चक्की से झरने वाला पिसान है जिससे
घर ने मनपसंद पूरियाँ बनाईं।
अब वह एक उदास खड़ी धनकुट्टी है जिसके
भीतर की आवाज़ कहीं नहीं पहुँचती
अपने ही जंगलों में गूँज कर बिला जाती है।
यह कई बेटियों बेटों और पोतों वाली
हमारी पैसठ साला माँ के लिए
मर्सिया पढ़ने का समय है!

नया साल 

शुरू हुए इस नए साल में
कुछ लड़कियाँ तीस साल की हो जाएंगीं
इस उम्र में लड़कियाँ लेंगी
कुछ छोटे-बड़े फैसले

यह तीस की उम्र
कुछ के प्रेम संबंधों के
टूटने की उम्र होगी
उनके भीतर एक हूक उठेगी
जो बाहर सिसकियों में बदल जाएगी

एक दिन उठेंगी वे
आंखे बंद करेंगी
और जी कड़ा करके
प्रेमी को लिख भेजेंगी करारा जवाब

कुछ चुनेंगी शाम का अकेलापन
और ऊबी हुयी रातें

कुछ अपनी ही पराजय को
उत्सव में बदल
हँसेंगी ठठाकर

कुछ तीस तक पैदा कर चुकी होंगी
तीन –तीन बच्चे
आपरेशन की जगहों से
रिसता रहेगा मवाद

मेरे लिए यह तीस की उम्र
अपराधबोध की उम्र होगी
मेरे कुछ न कर पाने की सजा
मेरी छोटी बहनों को मिलेगी
मेरे चेहरे की कम होती चमक
स्तनों का ढीला होना
वितृष्णा का विषय होगा
और आनन-फानन में
ब्याह दी जाएँगी कम उम्र की बेटियाँ

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