हम तो ऐसे ही देखेंगे…..! 

फिर लौट आई कामिनी: कहानी (अनीता चौधरी)

अनीता चौधरी

बहुत दिनों बाद, कल एक मित्र से मुलाक़ात हुई | सरकारी नौकरी करते हैं तो काफी दिनों बाद ही मिलना-मिलाना हो पाता है| बोले, ‘क्या बताऊँ आजकल बहुत ही त्रस्त चल रहा हूँ | मेरे विभाग में अभी पांच महिलायें भर्ती हो गई हैं | एक कानूनगो है और चार लेखपाल हैं | एक एस डी एम पहले से थी | अब इन पाँचों महिलाओं के काम का बोझ भी हम पुरुषों पर बढ़ गया है | ये काम क्या करेंगी ? हमें तो इनकी सिक्योरिटी और करनी पड़ती है, क्योंकि जिस पोस्ट पर इनका सलेक्शन हुआ है, वह पोस्ट फील्ड में जाने की है | लोगों से संपर्क बनाकर काम करने की हैं | पुरुष समर्थ होते हैं, आपसी सम्बन्ध बनाने में | वह समाज में लोगों को समझा-बुझाकर, आपसी बोलचाल से काम करा सकते हैं | जब खेतों की नपाई करनी होती है तो किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है, और जमीन पर सरकारी कब्जा लेना होता है उस समय लोगों से व्यवहारिक होकर काम करना पड़ता है | यह सब महिलाओं के बस की बात नहीं हैं |’ जब मैंने उन्हें बीच में ही टोकना चाहा तो बोले, ‘अरे मैडम जी मैं महिलाओं के नौकरी करने के खिलाफ नहीं हूँ लेकिन उन्हें सिर्फ ऑफिस के ही कार्य देने चाहिए | वे बहुत नाजुक होती हैं, बाहार के काम संभालना उनके बस की बात नहीं हैं |’ मैं बीच में ही दखल देती हुई बोली, ‘अगर ऐसा है तो आप सरकार में अपनी अर्जी लगाएं कि औरतों की ऐसे पदों पर भर्ती न करें और अगर सरकार ऐसे पदों पर उनकी भर्ती कर रही है, तो फिर उन्हें उस पदानुसार अपनी योग्यता सिद्ध करने दें | या तो वे फील्ड में काम करेंगी या फिर अपना त्यागपत्र देकर घर बैठ जायेंगी |

बात यहाँ पर उनके काम करने या नही करने पर नहीं है | या की वह कितना कर पाएंगी | अक्सर समाज में लोगों द्वारा कहा जाता रहा है कि स्त्री और पुरुष में प्रकृति ने एक अंतर किया है | पुरुष हमेशा स्त्री से ज्यादा बलशाली होता है | पास में बैठे दूसरे सज्जन भी अपनी चुप्पी को बर्दाश्त न कर पाने की स्थिति में बीच में ही टांग अडाते हुए बोले, “माना की आज महिलायें हर क्षेत्र में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है | लेकिन समाज में आज भी दस प्रतिशत काम ऐसे है जिन्हें सिर्फ पुरुष ही कर सकते हैं |” उनका ऐसा मानना हो सकता है | क्योंकि यह कोई समाज के पहले ऐसे पुरुष नहीं हैं जो इस तरह सोच रहे थे | इस समाज के 95 प्रतिशत पुरुष यही सोचते हैं | इन लोगों का महिलाओं के प्रति दिमाग पहले ही सैट होता है | कि ये काम महिलाओं के हैं और ये पुरुषों के |

इस दुनिया में जब इंसान रूपी जीव पैदा होता है तो उसकी शारीरिक बनावट या ढांचा एक जैसा ही होता है| उस समय वह एक बालक के रूप में विकसित होता है जैसे ही हमें उसके स्त्री या पुरुष के रूप में पहचान होती है हमारी मानसिकता में बदलाब आ जाता है | समाज में उस बच्चे के लिंग के अनुसार ही खानपान से लेकर रहन-सहन तक की सारी स्थितियां बदल जाती हैं | धीरे-धीरे माहौल के अनुसार ही उसका शारीरिक विकास होता जाता है | वहीँ हम लड़कियों पर शिकंजा कसना शुरू कर देते हैं और लड़कों को अपना शारीरिक विकास करने के लिए हर तरह की सुख सुविधाएं मुहैया कराते हैं | अगर यह सच है की महिलाओं की शारीरिक बनावट का अलग होना ही शारीरिक दुर्बलता या अन्य अक्षमताओं का कारण है तो फिर ‘कर्णम मल्लेश्वरी’ जैसी महिला इतना भार कैसे उठा लेती है, वहीँ मुक्केबाजी में अपना लोहा मनवाने वाली ‘मेरीकॉम’, जमीन को अपने पैरों से नापने वाली ‘पी.टी. उषा’, जे. जे. शोभा (एथलेटिक्स), कुंजरानी देवी (भारोत्तोलन), डायना एडल्जी (क्रिकेट), साइना नेहवाल (बैडमिंटन), कोनेरू हम्पी (शतरंज) और सानिया मिर्जा (टेनिस) फुटबॉल में ‘अदिति चौहान’, तीरंदाजी में ‘दीपिका कुमारी’ से लेकर ‘साक्षी मालिक, पी वी सिन्धु’ आदि महिलायें कैसे पैदा हो जाती है |

ऐसे अनगिनत नाम हैं जिन्होंने हर क्षेत्र में अपनी योग्यता के झंडे गाड़े हैं | चाहे फिर माउंट एवरेस्ट विजेता ‘बछेन्द्री पाल’ हो या दो बार चढ़ने वाली सबसे कम आयु की पर्वतारोही ‘डिकी डोल्मा’ या फिर विकलांग होने के बावजूद अपनी जिजीविषा से सबको हतप्रद करने वाली माउंट एवरेस्ट फतेहा ‘अरुणिमा सिन्हा’ या अंटार्कटिका और उत्तरी ध्रुव पर पहुँचने वाली ‘मेहर मूसा’ और ‘प्रीति सेन गुप्ता’ हो या कि नाव द्वारा पूरे विश्व की परिक्रमा करने वाली ‘उज्जवला पाटिल’ | अंतरिक्ष में सर्वाधिक समय बिता कर सबको चौकाने वाली प्रथम भारतीय मूल की महिला ‘सुनीता विलियम्स’ या फिर अंतरिक्ष में जाने वाली यात्री ‘कल्पना चावला ‘|
हम वर्तमान से लेकर एक नज़र अतीत पर डालें तो हमारे इतिहास में अनेक नाम महिलाओं के निकल आते है, जिन्होंने राजनीति के क्षेत्रों में भी सफलता हासिल की जिनमें रज़िया सुल्तान दिल्ली पर शासन करने वाली पहली एकमात्र महिला थी| महारानी दुर्गावती, चाँद बीबी, नूरजहाँ, प्रतिभा सिंह पाटिल, मीरा कुमार, सरोजिनी नायडू, ऐनी बेसेन्ट, राजकुमारी अमृत कौर, सुचेता कृपलानी, राधाबाई सुबारायन, इंदिरा गाँधी, मायावती आदि महिलाओं ने अपनी क्षमताओं के प्रदर्शन के बल पर अपनी एक पहचान हासिल की है | इसके अलावा महिलाओं ने भारत की आजादी के संघर्ष में हर क्षेत्र में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है जिनमें ,भिकाजी कामा, डॉ॰ एनी बेसेंट, प्रीतिलता वाडेकर, विजयलक्ष्मी पंडित, , अरुना आसफ़ अली, कस्तूरबा गाँधी, मुथुलक्ष्मी रेड्डी, दुर्गाबाई देशमुख आदि प्रमुख हैं

हम अगर इन क्षेत्रों के अलावा कला, मनोरंजन, साहित्य, शिक्षा, स्वास्थ्य, क़ानून व्यवस्था, व्यपार-वाणिज्य आदि क्षेत्रों में देखें तो अनेक महिलाओं के नाम सामने आते हैं जिनमें एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी, गंगूबाई हंगल, लता मंगेशकर और आशा भोंसले जैसी गायिकाएं एवं वोकलिस्ट, आंजोली इला मेनन जैसी प्रसिद्ध चित्रकार वहीँ अभिनय के लिए जानी जाने वाली महिलाओं में शबाना आजमी, मधुबाला, मीनाकुमारी, दीपिका पादुकोण, कंगना रानाउत से लेकर अनगिनत नाम है, जिनकी फेहरिस्त बहुत लम्बी है | नायिका देविका रानी रोरिक को उनके बेहतरीन अभिनय के लिए दादा साहेब फाल्के पुरूस्कार से सम्मानित किया ही गया था | इसके साथ साथ साहित्य में भी महादेवी वर्मा, इस्मत चुगतई, अमृता प्रीतम, मन्नू भंडारी, महाश्वेता देवी, अरुंधती राय आदि महिलाओं ने अपनी लेखनी के माध्याम से समाज को एक आइना दिया हैं | वहीँ चिकित्सा के क्षेत्र में स्नातक उपाधि प्राप्त करने वाली महिला विधुमुखी बोस एवं विर्जिनिया मितर (कोलकाता मेडिकल कॉलेज) तथा सर्जन डॉ. प्रेमा मुखर्जी जैसे असंख्य नाम हैं | क़ानून के लिए सर्वोच्च न्यायालय की न्यायधीश मीरा साहिब फ़ातिमा बीबी, लीला सेठ, अन्ना चांडी, अधिवक्ता- रेगिना गुहा, ‘रैमन मैग्सेसे’ पुरस्कार प्राप्त महिला किरण बेदी, पुलिस महानिदेशक कंचन चौधरी भट्टाचार्य, लेफ़्टिनेंट जनरल पुनीता अरोड़ा, आदि महिलायें भी फर्ज के लिए अपने पथ पर अडिग रहीं |

समूचे विश्व को संचालित करने के लिए अर्थ (पूंजी) की जरुरत होती है क्योंकि दुनिया का विकास अर्थ पर ही टिका रहता है जिस देश या कंपनियों की आर्थिक नीतियां जनता के हित में काम करती हैं वे देश या कंपनियां अच्छी तरक्की करती हैं | अगर हम व्यपार और उद्धोग की बात करें तो श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़ गुजरात की उन सात महिलाओं की व्यापारिक सफलताओं की कहानी कहता है जिन्होंने 80 रूपये से काम की शुरुआत को 500 करोड़ की कंपनी में तब्दील कर दिया है | आज भी भारत के लगभग आधे बैंक व वित्त विभाग की अध्यक्षता महिलाओं के हाथ में है। जिनमें अरुंधति भट्टाचार्य, चंदा कोचर, रेणु सूद कर्नाड, चित्रा रामकृष्ण, शिखा शर्मा, शुभलक्ष्मी पणसे, विजयलक्ष्मी अय्यर, अर्चना भार्गव, नैना लाल किदवई, कल्पना मोरपारिया-जे पी मोर्गन, काकू नखाते- बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच, भारत के शीर्ष पर हैं। उषा सांगवान भारत की सबसे बड़ी जीवन बीमा कंपनी एल आई सी की प्रबंध निदेशक है और रिजर्व बैंक की डिप्टी गवर्नर के.जे. उदेशी | इसके अलावा भारतीय रिज़र्व बैंक के केंद्रीय निदेशक बोर्ड में इला भट्ट व इंदिरा राजारमन भी शामिल हैं | इन सभी महिलाओं ने इस क्षेत्र में अपना योगदान देकर भारत को आर्थिक मजबूती प्रदान की है |

हम आजादी के इन सत्तर सालों के इतिहास को, आज वर्तमान तक देखें तो पता चलता है की महिलाओं ने कोई ऐसा क्षेत्र नहीं छोड़ा है जहाँ अपनी उपस्थिति दर्ज न कराई हो चाहे फिर ऑटो चलने वाली ‘सुनीता चौधरी’ हो या फिर बस की ड्राईवर सीट पर बैठकर यात्रियों को अपने गंतव्य तक पहुंचाने वाली ‘वी सारिथा’ हो | अगर बात और भी नई तकनीक की हो तो चेन्नई में सबसे पहले मेट्रो ट्रेन की स्टेरिंग घुमाने वाली ‘ए प्रीती’ या फिर दिल्ली की सड़कों पर गाडी दौड़ाने वाली ‘उमा यादव’ | मैं यहाँ पर कुछ ऐसे क्षेत्रों के नाम ले रही हूँ जहाँ पर हमेशा से यह माना जाता रहा है इन क्षेत्रों में महिलायें काम नहीं कर सक्रती है तो फिर इन जगहों पर ‘डॉ सीमा राव’ जैसी महिला कैसी पहुँच जाती है जो भारत की पहली महिला कमांडो ट्रेनर बनती है और जो बीस सालों से भारत के पैरा फोर्सेज को ट्रेंड कर रही है |

वहीँ दूसरी तरफ लड़ाकू विमानों को उड़ाने का संकल्प, मध्य प्रदेश की ‘अवनी चतुर्वेदी’, दरभंगा की ‘भावना कंठ’ और राजस्थान की ‘मोहना सिंह’ पायलेट के रूप में कर चुकी हों | अगर बात आसमान से ठीक नीचे पानी के ऊपर तैरने की हो तो वहां पर भी नौ सेना में ‘सीमा रानी शर्मा’ और ‘अम्बिका हुड्डा’ के नाम उनके साहस का परिचय देते है | रिक्शा चलाने से लेकर फाइटर विमान या फिर चाहे राजनीति का अखाड़ा हो या फिर घर का हर जगह महिलाओं ने अपनी सफलताओं के परचम लहराए हैं |

इसके बावजूद अब भी समाज में पुरुषों का यह सोचना कि महिलायें पुरुषों से कमतर होती हैं तो उन्हें अपनी रुढ़िवादी मानसिकता को तोड़कर महिलाओं के प्रति स्थिर विचारों में बदलाव लाने की आवश्यकता है | क्योंकि किसी भी देश का विकास महिला पुरुषों के प्रगतिशील विचारों के साथ काम करने पर ही संभव होता है |
निसंकोच कि आज भी पूरे समाज के द्वारा आधी आबादी को अपने जैसा इंसान समझकर उसे साथ खड़ा करके, उसे छोटे-बड़े कार्य के लिए प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। सरकारें महिलाओं के लिए तरह तरह के इवेंट तो बनाती हैं लेकिन उनके आत्मनिर्भर बनने की दिशा में उतना काम नहीं हो पाता जितना कि होना चाहिए। महिलाओं को सक्षम बनाने की दिशा में हमारी सरकारों द्वारा मुफ्त में लैपटॉप या फोन बांटने से उन्हें आत्मनिर्भर या सशक्त नहीं बनाया जा सकता है। अगर सही मायने में हम महिलाओं की पूरी भागीदारी इस सामाजिक और आर्थिक ढांचे में चाहते है तो उन्हें शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, व सामाजिक रूप से कमज़ोर देखने और सोचने की दृष्टि में बदलाब लाना होगा। महिलाओं के प्रति लोगो की सोच को परिवर्तित करने के लिए विद्यलयों, कॉलेज, ऑफिस-दफ्तरों और गांव व् सार्वजानिक जगहों पर नए-नए कार्यक्रम व् वर्कशॉप आयोजित करने की आवश्यकता है, जिससे महिलायें भी दूसरे लोगों की तरह समाज में इंसान बनकर अपना जीवन यापन करें, न कि लाचार व अबला स्त्री बनकर।

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