अभिज्ञात, मानवीय रिश्तों के सूक्ष्म धागे के साथ सामाजिक,  आर्थिक  विषमताओं की समर्थ सार्थक पड़ताल कर रहे हैं अपनी इन दो कविताओं में , हालांकि आपकी कवितायें अन्य कई रंगों और सरोकारों के साथ गुजरती हैं | हमरंग पर आपका स्वागत है |संपादक 

अगली सदी तक हम

अगली सदी तक हम
स्पन्दन बचा है अभी
कहीं, किन्हीं, लुके छिपे संबंधों में
अन्न बचा है
अनायास भी मिल जाती हैं दावतें
ॠण है कि
बादलों को देखा नहीं तैरते जी भर
बरस चुके कई-कई बार
क्षमा है कि बेटियां
चुरा लेती हैं बाप की जवानी
उनकी राजी-खुशी
जोश है बचा
कि रीढ़ सूर्य के सात-सात घोड़ो की ऊर्जा से
खींच रही है गृहस्थी
कहीं एक कोने में बचे हैं दु:ख
जो तकियों से पहले लग जाते हैं सिरहाने
और नींद की अंधेरी घाटियों में
हांकते रहते हैं स्वप्नों की रेवड़
पृथ्वी पर इन सबके चलते
बची है होने को दुर्घटना
प्रलय को न्योतते हुए
नहीं लजायेंगे अगली सदी तक हम।

हवाले गणितज्ञों के 

तब भी जोड़ो-घटाओ
अगर गणित कमजोर हो
ख़रीद लो सबसे पहले
कलकुलेटर
यह दुनिया
गणितहीन लोगों के लिए नहीं है
गणित का निषेध
आदमी के पक्ष में है
और इस पक्ष में सचमुच होना
आदमी का
सबसे संगीन मुहावरा है
लो, गणित के पक्ष में
गढ़े जा रहे हैं
मुहावरे
यह पृथ्वी की विशाल लेखनवही
गणितज्ञों के हवाले है।

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    By: अभिज्ञात

    जन्म : 1 अक्टूबर 1962, आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश)
    भाषा : हिंदी
    विधाएँ : उपन्यास, कविता, कहानी
    मुख्य कृतियाँ
    उपन्यास : अनचाहे दरवाजे पर, कला बाजार
    कहानी संग्रह : तीसरी बीवी, मनुष्य और मत्स्यकन्या
    कविता संग्रह : एक अदहन हमारे अंदर, भग्न नीड़ के आर-पार, सरापता हूँ, आवारा हवाओं के खिलाफ चुपचाप, वह हथेली, दी हुई नींद, खुशी ठहरती है कितनी देर
    सम्मान
    आकांक्षा संस्कृति सम्मान, कादम्बिनी लघुकथा पुरस्कार, कौमी एकता पुरस्कार, अम्बडेकर उत्कृष्ट पत्रकारिता सम्मान
    संपर्क
    फैंसी बाजार,6 स्टेशन रोड, तीसरा फ्लोर, टीटागढ़, कोलकाता-700119
    फोन
    91-09830277656
    ई-मेल
    abhigyat@gmail.com

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    अदृश्य दुभाषिया: एवं अन्य कविताएँ (अभिज्ञात)

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