(“हरिशंकर परसाई: – चर्चा ज़ारी है ….. ”  का तीसरा दिन ……..’प्रेम जनमेजय’ का आलेख )

हिंदी व्यंग्य साहित्य में यह निरंतर होता आया है और हो रहा है कि हास्य-व्यंग्य को एक हाईफन से जोड़ देने के कारण उसे भाई-बहन सा मान लिया गया और अक्सर फूहड़ हास्य लिखने वालों ने भी दावा किया कि वे व्यंग्य लिख रहे हैं। हिंदी व्यंग्य के कुछ आलोचकों की चमड़ी इतनी मोटी थी कि उनके थुलथुल पेट पर व्यंग्य का नुकीला चाकू रख दिया गया तो उसकी चुभन से उनको गुदगुदी होने लगी। परसाई जैसे व्यंग्य के प्रखर और गंभीर व्यंग्यकार की रचनाओं पर, अपनी सीमित सोच के चलते, ऐसे तथाकथित आलोचक यह कहते पाए जाते हैं कि परसाई की रचनाएं गुदगुदाती हैं। संभवत: ऐसे ही धृतराष्टीय आलोचकों को दृष्टि देने के लिए परसाई व्यंग्य के प्रति तथा अपने लेखन के प्रति भूमिकाओं के रूप में, अपने विचार व्यक्त करते रहे। 

सन: 1961 में प्रकाशित, अपने एकमात्र व्यंग्य उपन्यास ‘रानी नागफनी की कहानी’ की भूमिका में वे लिखते हैं- मुझ पर शिष्ट हास्य का रिमार्क चिपक रहा है। यह मुझे हास्यास्पद लगता है। महज हंसाने के लिए मैंने शायद ही कभी कुछ लिखा हो। और शिष्ट तो मैं हूं ही नहीं। मगर मुश्किल यह है कि रस नौ हो सकते हैं और उसमें ‘हास्य ’ भी एक है। कभी ‘शिष्ट हास्य’ कहकर पीठ दिखाने का भी सुभीता होता है। मैंने देखा है- जिस पर तेजाब की बूंदें पड़ती हैं, वह भी दर्द दबाकार, मिथ्या अट्टाहास , कर कहता है, ‘वाह, शिष्ट हास्य है!’ ‘मुझे यह गाली लगती है।’

हिंदी व्यंग्य की धर्मिक पुस्तक- परसाई

जब आप लेखकीय बिरादरी से जुड़ते हैं तो कुछ अनाम और कुछ संज्ञायुक्त संबंध् जिंदगी का अहम हिस्सा बन जाते हैं। मैं आभारी हूं साहित्य की दुनिया का कि उसने मुझे अपने से जोड़कर, एक वृहद परिवार दिया। यदि साहित्य की इस दुनिया ने मुझे नहीं स्वीकारा होता तो अनेक महत्वपूर्ण चेहरे मेरी जीवन से गायब होते। ऐसे लोग जो मानवीय समाज को और बेहतर करने के लिए अपनी ईमानदारी के साथ संघर्षरत हैं, उनकी भूमिका को मैं साक्षात कहां देख पाता। साहित्य ने मेरी सोच के दायरे को व्यापक तो किया ही किया, उसे नया आयाम भी दिया तथा इसके साथ ही आत्मीय संबंधों का एक विशाल समूह दिया। मैं इन अर्थों में साहित्य का शुक्रगुजार हूं कि उसने मुझे एक अलग तरह का परिवार दिया। एक ढांचे में बंधे परिवार के संबंध तो निश्चित नाम के साथ आते हैं। वहां आपके सामने उस नाम को स्वीकारने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं होता। आपकी मां एक ही है तथा वो कौन है, ये भी निश्चित है। इस परिवार में मां -जैसी एक नहीं, कई हो सकती हैं। और मजे की बात है कि आपसे उम्र में कोई छोटा या छोटी होने के बावजूद अपने व्यवहार, असीम अनुभव, गरिमा और गहन समझ सोच एवं बौद्धिकता के चलते आपकी दीदी अथवा बड़ा भाई हो सकता है। ये सबंध कहीं बोझ नहीं होते हैं क्योंकि यह आपकी अपनी इच्छा और संवेदना का परिणाम होते है। बोझ बनने पर इन्हें उतारना भी कठिन नहीं होता है। अनेक बार ऐसे संबंध परिवारिक संबंधों से अधिक जुड़ाव वाले होते है।
परसाई को मैंने रचनाओं के माध्यम से जितना जाना है उसके मुकाबले व्यक्तिगत रूप से न के बराबर जाना है। मेरे लिए परसाई से मिलना एक भक्त से भगवान के मिलने जैसा था। मैं उनका अंधभक्त जैसा था। परंतु परसाई ने मेरे अंधभक्ति भाव को बहुत बेरहमी से तोड़ा। मेरी उनसे तीन-चार मुलाकातों से अधिक मुलकाते नहीं हुई हैं। पर जितनी मुलाकाते हुईं मेरे अनुभव क्षेत्रा में वृद्धि करने, अपने आदर्श रचनाकार से मिलने की इच्छा को पूर्ण करने और एक इतिहास से जुड़ने के लिए पर्याप्त हैं।

मेरे जीवन में परसाई साकार और निराकार दोनों रूप में उपस्थित हैं। परसाई का साकार रूप उनका व्यंग्यकार व्यक्तित्व है। अपने व्यंग्य के शैशवकाल में, सन: 1966 के लगभग, मैंने परसाई का व्यंग्यकार का साकार रूप ही देखा है। ये वो समय था जब परसाई व्यंग्य को शूद्र से ब्राहमण का दर्जा दिलाने में सृजनरत थे। जब वे व्यंग्य का मुराड़ा लिए गद्य की विधाओं के घर जा चुके थे और आह्वान कर रहे थे कि जिसे गद्य की परंपरागत विधाओं से हटकर व्यंग्य के पथ पर चलना है वे उनके साथ आ जाए। ऐसे परसाई से मेरे जैसे अनेक रचनाकार संस्कार ग्रहण कर रहे थे। इन परसाई को धर्मयुग के ‘बैठे ठाले’ स्तंभ और ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ के ताल बेताल स्तंभ में निरंतर पढ़ा जा सकता था। ये वो समय था जब धर्मवीर भारती ने हरिशंकर परसाई, शरद जोशी और रवीन्द्र नाथ त्यागी के रूप में व्यंग्य की त्रयी स्थापित कर दी थी। ये वो समय था जब बाकी के व्यंग्यकार खद्योत सम थे और हिंदी व्यंग्य के आकाश में यही त्रयी जगमगा रही थी। उस समय ‘राग दरबारी’ जैसा क्लासिक लिखने के बावजूद श्रीलाल शुक्ल इस त्रयी में नहीं आते थे। जहां एक ओर यह त्रयी एक आदर्श प्रस्तुत कर रही थी, वही अपने उपस्थित आतंक के साथ रचनाकारों के समक्ष एक चुनौती भी प्रस्तुत कर रही थी कि वे त्रयी के इस फ्रेम को तोड़ें। तीनों रचनाकार अपनी भाषा शैली तथा विषय वस्तु वर्णन में एक दूसरे से अलग थे। परसाई जो लिख रहे थे उसके सैद्धांतिक पक्ष पर भी अपने विचार बेबाकी से कह रहे थे। वे अपनी रचनाओं के माध्यम से व्यंग्य के स्वरूप को स्पष्ट तो कर ही रहे थे, उसके सैद्धांतिक पक्ष पर भी बेबाकी से अपने विचार प्रकट कर रहे थे। उनके अनेक संकलनों की भूमिकाएं आधुनिक व्यंग्य के स्वरूप को समझने में आज भी सहायक हैं।

परसाई निरंतर हास्य और व्यंग्य के अंतर को स्पष्ट करते रहे हैं। वे आरंभ से व्यंग्यकार को हंसोड़ मानने का विरोध करते रहे हैं। हिंदी व्यंग्य साहित्य में यह निरंतर होता आया है और हो रहा है कि हास्य-व्यंग्य को एक हाईफन से जोड़ देने के कारण उसे भाई-बहन सा मान लिया गया और अक्सर फूहड़ हास्य लिखने वालों ने भी दावा किया कि वे व्यंग्य लिख रहे हैं। हिंदी व्यंग्य के कुछ आलोचकों की चमड़ी इतनी मोटी थी कि उनके थुलथुल पेट पर व्यंग्य का नुकीला चाकू रख दिया गया तो उसकी चुभन से उनको गुदगुदी होने लगी। परसाई जैसे व्यंग्य के प्रखर और गंभीर व्यंग्यकार की रचनाओं पर, अपनी सीमित सोच के चलते, ऐसे तथाकथित आलोचक यह कहते पाए जाते हैं कि परसाई की रचनाएं गुदगुदाती हैं। संभवत: ऐसे ही धृतराष्टीय आलोचकों को दृष्टि देने के लिए परसाई व्यंग्य के प्रति तथा अपने लेखन के प्रति भूमिकाओं के रूप में, अपने विचार व्यक्त करते रहे।

सन: 1961 में प्रकाशित, अपने एकमात्र व्यंग्य उपन्यास ‘रानी नागफनी की कहानी’ की भूमिका में वे लिखते हैं- मुझ पर शिष्ट हास्य का रिमार्क चिपक रहा है। यह मुझे हास्यास्पद लगता है। महज हंसाने के लिए मैंने शायद ही कभी कुछ लिखा हो। और शिष्ट तो मैं हूं ही नहीं। मगर मुश्किल यह है कि रस नौ हो सकते हैं और उसमें ‘हास्य ’ भी एक है। कभी ‘शिष्ट हास्य’ कहकर पीठ दिखाने का भी सुभीता होता है। मैंने देखा है- जिस पर तेजाब की बूंदें पड़ती हैं, वह भी दर्द दबाकार, मिथ्या अट्टाहास , कर कहता है, ‘वाह, शिष्ट हास्य है!’ ‘मुझे यह गाली लगती है।’ मुझे परसाई के इस तेवर ने बहुत आकार्षित किया, या कहें यह मेरे लेखन का लक्ष्य बन गया। व्यंग्य में हास्य के घेलमेल, व्यंग्य की कुनैन गोली को लड्डू में खिलाने वाले, हास्य को व्यंग्य की बहननुमा आवश्यक्ता मानने वाले, ‘भद्र हास्य’ के लेखन द्वारा व्यंग्य की सीढ़ियां चढ़ने वाले वरिष्ठ रचनाकार मेरे आदर्श न बन सके अपितु कोफ़्त का कारण बनते रहे। और मुझे भी, व्यंग्य के नाम पर ‘शिष्ट हास्य’ एक गाली लगने लगा। मैंने जितनी गंभीरता से परसाई की रचनाओं को पढ़ा उतनी ही गंभीरता से व्यंग्य संबंधी उनके विचारों को भी पढ़ा। न केवल पढ़ा ही अपितु उनसे प्रभावित भी हुआ। परसाई की व्यंग्य दृष्टि ने मुझे संस्कारित किया और मैं व्यंग्य को उसी फ्रेम में देखने लगा जिसमें कि परसाई देख रहे थे।
लेखन के शैशवकाल में यदि परसाई जैसा सही दृष्टि संपन्न रचनाकार मिल जाए तो नवागत को सही दिशा मिल जाती है। उस समय नरेंद्र कोहली भी परसाई के भक्त थे। वे उनकी रचनाएं पढ़ने के लिए मुझे प्रेरित करते थे। उनकी सोच भी प्रगतिशील थी। उनकी दृष्टि के खुलेपन ने मेरे साहित्य आकाश को विस्तृत किया। उन दिनों दिविक रमेश के साथ मित्रता भी प्रगाढ़ता की ओर कदम बड़ा रही थी। दिविक प्रगतिशील सोच के गंभीर रचनाकार हैं। इसके साथ ही सन: 1973 में कॉलेज ऑफ वोकेशनल स्टडीज में रमेश उपाध्याय के साथ प्राध्यापक के रूप में एक साथ नौकरी आरंभ करना और निरंतर रमेश उपाध्याय के साथ संबंध प्रगाढ़ होना उस साहित्यिक दृष्टि का परिणाम था जो मैंने परसाई से ग्रहण की थी।

जहां एक ओर मैं परसाई के लेखन, उनकी वैचारिक दृष्टि और हिंदी व्यंग्य के प्रति उनके आंरभिक ‘प्यार’ से प्रभावित रहा, वहीं परसाई के प्रति एक मोहभंग का शिकार भी हुआ। मैंने अपने अराध्य को हिंदी व्यंग्य की एक मूर्ति बनाते ही नहीं उसे सही तरह से तराशते भी देखा। परंतु उसी परसाई को उस मूर्ति को, एक विचारधारा की अंधभक्ति के कारण तोड़ते भी देखा। मुझे नहीं लगा कि इस मूर्ति को तोड़ने की आवश्यकता है। व्यंग्य की वकालत करने वाला ही व्यंग्य को कटघरे में खड़ा कर रहा है। न्याय व्यवस्था से जैसे विश्वास उठ गया। रचनाकार के रूप में परसाई मेरे आदर्श हैं, मेरे अराध्य हैं परंतु उसके स्वरूप के व्याख्याकार के रूप में मैं उनके विरुद्ध खड़ा हुआ हूं। मैं व्यंग्य के संबंध में उनकी ‘प्रगतिशील’ मान्यताओं से सहमत नहीं हो पाता हूं।

जो परसाई मेरे लेखन के प्रेरणा स्त्राोत रहे, जो मेरे आदर्श हैं, जिनसे मैं शिक्षित हुआ, जिनके प्रति अंध भक्ति की सीमा तक श्रद्धानत रहा, और जिनकी व्यंग्य की पाठशाला का, नालायक ही सही, परिश्रमी छात्र हूं, उन परसाई जी से मैं मात्र तीन बार मिला हूं और तीनों बार अलग-अलग रूप में। परसाई जी के जीवन में जहां एक ओर उनका पिटना महत्वपूर्ण घटना है वहीं उनकी टांग का टूटना भी एक महत्वपूर्ण घटना है। इसे परसाई भी महत्वपूर्ण घटना ही मानते हैं। 1980 में प्रकाशित विकालंग श्रृद्धा का दौर की कैपिफयत में वे लिखते हैं- कुछ चुनी हुई रचनाएं इस संग्रह में हैं। ये 1975 से 1979 तक की अवधि में लिखी गई हैं। 2-4 पहले की भी हो सकती हैं। पिछले सालों में मैंने लघुकथाएं अधिक लिखीं। वे इस संग्रह में हैं। पिछले 5 सालों में दो घटनाएं महत्वपूर्ण हुई- 1975 से राजनीतिक उथल-पुथल और 1976 में मेरी टांग का टूटना। राजनीतिक विकलांगता और मेरी शारीरिक विकलांगता।. . . मेरी टांग का टूटना भी एक व्यक्तिगत आपातकाल था, जो मेरी मानसिकता पर छाया रहा। इस मानसिकता से मैंने एक से अधिक निबंध और कहानियां लिखीं। इस दुर्घटना के संदर्भ भी कई जगह आ गए हैं। राजनीतिक और व्यक्तिगत विकालांगकता की प्रतिक्रिया स्वरूप जिस अभिव्यक्ति की प्रेरणा हुई, मैंने उसे पुनरावृत्ति की परवाह किए बिना, प्रकट कर दिया।’ संयोग से परसाई की इस टूटी टांग से मेरी मुलाकातों के भी संदर्भ जुड़े हुए हैं। जैसा कि मैंने कहा मैं परसाई से केवल तीन बार मिला, और तीन बार थे- परसाई की टांग टूटने से पहले जबलपुर में रमेश सैनी, श्रीराम आंयगार जैसे मित्राों के साथ, दूसरे परसाई की टांग टूटने पर सापफदरजंग अस्पताल में चल रहे उनके ईलाज के समय और टूटी टांग के साथ जबलपुर में प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे परसाई से।

मैंने परसाई को एक संघर्षशील रचनाकार से एक धार्मिक पुस्तक बनते देखा है। जैसे किसी धर्म की और विशेषत: अल्पसंख्यक धर्म की धार्मिक पुस्तक का विरोध उपद्रव का कारण बनता है वैसा ही कुछ परसाई का विरोध बन सकता है। परसाई का विरोध उनके विरोधियों को भी शायद गले न उतरे। परसाई निश्चित ही हिंदी व्यंग्य की एक धार्मिक पुस्तक हैं। इस पुस्तक को मैंने अनेक बार पढ़ा है।

हरिशंकर परसाई प्रगतिशील चेतना के नैसर्गिक रचनाकार हैं। वे किसी के प्रभाव या लालच में ‘प्रगतिशील विचारधरा संपन्न’ नहीं हुए। प्रारंभ से ही उनका लेखन प्रगतिशील सोच, चिंतन और चेतना से युक्त रहा है। किसी व्यक्ति के अनुकरण और प्रभाव में न तो वे प्रगतिशील विचारधरा से ‘संपन्न’ हुए और न ही उन्होंने किसी के अनुकरण और प्रभाव में ‘तय’ करके व्यंग्य लेखन किया। यह उनके सहज -स्वाभाविक नैसर्गिक चिंतनशील व्यक्तित्व एवं उनके जीवन में घटित संघर्षशील दुर्घटनाओं का प्रतिफल है। एक समय में ‘गर्दिश के दिन’ नामक स्तंभ चला करता था जिसमें अनेक रचनाकारों ने अपने स्वर्णिम दिनों को छिपाकर गर्दिश के दिनों का ‘लोमहर्षक’ वर्णन शहीदाना अंदाज में किया था। यदि किसी लेखक के गर्दिश के दिनों का सही अनुभव करने की तीव्र इच्छा साहित्य के पाठकों में हो तो वह परसाई के जीवन से बहुत कुछ जान सकता है। संघर्षशील एवं अभावग्रस्त जीवन ही रचनाकार में आक्रोश का संचार करता है तथा सत्य आधरित विरोध् के लिए प्रेरित करता है। ऐसे रचनाकार के विचारतंतु विसंगतियों को लक्षित कर आक्रामक हो जाते हैं। उसकी दृष्टि परिवेशगत विसंगतियों के निरंतर उदघाटन की रहती है। उसके हाथ में मुराड़ा रहता है जिसके द्वारा वह अपनी सुख समृद्धि की सोच को जला चुका होता है और आपको भी प्रेरित करता है कि आप उस सोच को जला दें तथा प्राथमिकता की दृष्टि से मानव समाज की बेहतरी को प्राथमिकता दें।

प्रेमचंद की तरह अभावों में जीने वाले परसाई एवं कबीर को अपना आदर्श मानने वाले परसाई के लेखकीय व्यक्तित्व में यदि व्यंग्य- चेतना ने प्रवेश किया तो इसमें आश्चर्य कैसा? सामाजिक विसंगतियों के विरुद्ध लेखकीय आक्रोश का मूल कारण परसाई का संघर्षशील जीवन एवं व्यक्तित्व रहा है।
सन: 1975 में सरोजिनी नगर में स्थित ब्लू स्टार क्लब ने ‘सार्थक’ नाम की पत्रिका आंरभ की थी जिसके कुछ आंरभिक अंको का मैं संपादक था। उसी में मैंने एक संपादकीय लिखा था- संपादकीय में मैंने सवाल उठाया था कि क्या लेखक को किसी राजनीतिक दल का सदस्य होना चाहिए? क्या किसी राजनीतिक दल का सदस्य होते ही लेखक कार्यकर्ता नहीं हो जाता है? उसकी स्वतंत्र सोच पर पार्टी की सेाच दबाव नहीं डालती है? क्या आप स्वयं को सीमित नहीं कर लेते हैं? लेखन की दृष्टि से यदि आप किसी विचार के प्रति प्रतिबद्ध हैं तो क्या उसे प्रमाणित करने के लिए किसी दल की प्रतिबद्धता आवश्यक है? वैचारिक प्रतिबद्धता पर मोहर लगवाने के लिए किसी दल में होना आवश्यक है वरना आप उस सवाल का जवाब नही दे पाएंगे- तय करो किस ओर हो तुम? क्या किस ओर हो तुम, आपकी वैचारिक प्रतिबद्धता से नहीं आपकी दलगत प्रतिबद्धता से ही तय किया जा सकता है ?
दलगत प्रतिबद्धता की सीमा को मैंने जबलपुर में आयोजित ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के सम्मेलन में जाकर जाना। इस सम्मेलन में मैं कुछ अंदरूनी बात जानने के इरादे से नहीं गया था और न ही रहा किनारे बैठ की शैली में कुछ देखने गया था अपितु उसका स्वयं को हिस्सा मानकर वैचारिक प्रतिबद्धता के कारण, एक सिंपेथाईसर, के रूप में। ‘जनयुग’ में लगातार लिख रहा था और मेरे ‘इंस्पेक्टर का तबादला’, ‘नेकरों की वापसी’ जैसे ‘निबंध्’ बहुत पसंद भी किए गए थे। दिविक, रमेश उपाध्याय, रमेश बतरा, श्याम कश्यप, राजकुमार सैनी, केवल गोस्वामी आदि की मित्रता मुझे अनेक अर्थों में वैचारिक दृष्टि से शिक्षित कर रही थी। मेरी सोच को समर्थन और दिशा मिल रही थी। जबलपुर जाने का एक और लालच था कि परसाई उस सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे थे। परसाई जी की टांग टूटी हुई थी। वे अध्यक्ष थे। अपना अध्यक्षीय वक्तव्य आरंभ करते हुए उन्होंने कहा- मैं आजकल चलता नहीं हूं चेयर पर ही रहता हूं, इसलिए चेयरमैन तो मुझे बनाना ही था।’ इस सम्मेलन में प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े सभी दिग्गज विद्यमान थे। हमें एक बड़े से हाल में सामूहिक रूप से ठहराया गया था जबकि अध्किांश दिग्गज होटलों की शोभा बढ़ा रहे थे। यदि दिग्गज के रूप में किसी ने नहीं ठहरना स्वीकार किया तो वे भीष्म साहनी थे। वे हमारे साथ सामूहिक रूप से रहे थे, एक साथी की तरह। वहां के अनुभव पर ही मैंने एक व्यंग्य लिखा था। ‘भेड़ाघाट, चाँदनी रात और कवि मित्र’। इसी सम्मेलन में मैंने किसी संघ के सदस्य होने की सीमाओं का अनुभव किया। मैंने देखा कि यदि आप स्वतंत्र सोच के व्यक्ति नहीं हैं, और लेखक न होकर कार्यकर्ता हैं, तो कैसे दल के प्रति प्रतिबद्ध होकर आप दृष्टि बाध्ति, एकांगी और अनपढ़ भी हो जाते हैं।

मुझे लगा कि अपनी प्राथमिकताओं, व्यक्तित्व एवं परिस्थितयों के आधर पर व्यक्ति को अपनी राह स्वयं तय करनी होती है। व्यंग्य के स्वरूप को लेकर मेरी जो सोच है उसे मैं किसी ‘संघ’ का सदस्य होने की बाध्यता से बदल नहीं सकता। परसाई ने एक बातचीत में आलोचना की स्वस्थ एवं स्वतंत्र दृष्टि देते हुए कहा था- समाज गतिशील है, जीवन रोज बदलता है। नये संदर्भ हैं, उन्हें नये लोग पकड़ें। मैंने जब लिखना शुरु किया था, अगर मैंने औरों की नकल की होती तो मैं यहां न होता। खामख्वाह नकल न करें। हमने कईं चीजें नहीं देखी हैं। हमने अपन बाप का नंगापन नहीं देखा, हमारे संस्कार ऐसे थे। नई पीढ़ी ने सब देखा है।’ जब तक लेखक में नएपन की चाह नहीं होगी, चुनौतियों से निपटने का साहस नहीं होगा उसका विकास नहीं होगा। हर व्यक्ति अपना जीवन स्वयं जीता है। आप दूसरे का जीवन नहीं जी सकते, बहुत कठिन है असंभव की सीमा तक। अपनी राह बनाने के लिए वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ-साथ स्वतंत्र सोच भी आवश्यक है।

परसाई की व्यंग्य के ‘स्ट्रक्चर’ संबंधी मान्यताओं से मैं सहमत नहीं हूं परंतु उनके रचनात्मक लेखन से अत्यधिक प्रभावित हूं। परसाई के प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ने, अध्यक्ष आदि बनने अथवा व्यंग्य के प्रति ‘प्रतिबद्ध’ दृष्टिकोण रखने के कारण उनके लेखन के प्रति मेरे मन में श्रृद्धा बिल्कुल भी कम नहीं हुई है। परसाई के प्रशंसकों की संख्या में चाहे उनके प्रगतिशील लेखक संघ में जाने से अभूतपूर्व वृद्धि हुई हो परंतु इस कारण कमी नहीं आई है। अधिकांश लोग उनके लेखन से प्यार करते हैं। परसाई में अपने पाठकों एवं युवा रचनाकारों के प्रति अपार स्नेह का भाव था। वे युवा रचनाकारों को निंरतर प्रोत्साहित करते थे। श्रीराम अयंगार, महेश आदि ने उनके मार्गदर्शन में न केवल ‘व्यंग्यम’ जैसी पत्रिका का प्रकाशन किया अपितु अनेक गोष्ठियों का आयोजन भी किया। परसाई यथासंभव पत्रों का उत्तर देते थे। वे पत्र लिखने में वे बिल्कुल कंजूस नही थे जबकि शरद जोशी बहुत ही कंजूस थे। परसाई के पत्र आत्मीय शैली से युक्त होते। 1975 में वे जब टांग टूटने पर अपने ईलाज के लिए सपफदरजंग में भरती थे तो मैं नजदीक होने के कारण उनसे अक्सर मिलने जाता । 25 सिंतंबर को मेरे बड़े बेटे उज्जवल का जन्मदिन होता है, उसके पहले जन्मदिन की मिठाई मैंने परसाई जी को अस्पताल में खिलाई थी। इसे वो भूले नहीं। 7 मई 1991 के पत्र में, लगभग 16 वर्ष बाद भी जब उन्होंने मुझे पत्र लिखा तो अंत में यह लिखना नहीं भूले- कभी अच्छे कभी बुरे स्वास्थ्य के साथ काम कर रहा हूं। दिल्ली अस्पताल में तुमने मेरी बहुत सेवा की। पर हड्डी ठीक नहीं जुड़ी। अपने परिवार के हाल लिखना। पत्नी और बच्चे को आशीष।’
मुझे जब हरदा में पहला ‘हरिशंकर परसाई स्मृति सम्मान’ मिला था तो ज्ञानरंजन का बधई पत्र मिला था। ज्ञानरंजन ने लिखा था- आपको परसाई सम्मान के लिए मेरी बधई। असल में 12 दिन की यात्रा के बाद 26 को ही वापस जबलपुर आया और फिर तुरंत कामकाज के बकाया ढेर और सेहत के कारण हरदा नहीं आ सका। मुझे आपको बधई देने में कुछ देर हुई पर कई दिन से यह लिखने का आग्रह, मन में था। परसाई जी हमारे लिए इतने समृद्ध थे और इतने बड़े गद्यकार और शैलीकार कि उनके नाम से संबंध होने वाले लेखक के लिए हमारे मन में आदर पैदा होता है। इसलिए आपको बधई देते समय बहुत खुशी भी है। आपसे निवेदन है कि अपनी भावी रचना यात्रा में परसाई के स्वप्न और उनके लक्ष्य के इर्द गिर्द रहेंगें तो सार्थक होगा। आपके उपर इस सम्मान के बाद एक गंभीर दायत्वि कुछ जादा बढ़ गया है।’ एक चुनौती के रूप मे | सही लिखा ज्ञानरंजन ने कि इस सम्मान के बाद एक गंभीर दायत्वि कुछ जादा बढ़ गया है। मैंने इसे इसी रूप में लिया और परसाई ने जो राह दिखाई, उसपर अपने पैरों से, बिना किसी की बैसाखी का सहारा लिए, सार्थक व्यंग्य लेखन द्वारा आगे बढ़ने लगा।

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    By: प्रेम जनमेजय

    जन्म : 18 मार्च 1949, इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश)
    भाषा : हिंदी
    विधाएँ : व्यंग्य, बाल साहित्य, आलोचना, नाटक
    -व्यंग्य संकलन : राजधानी में गँवार, बेर्शममेव जयते, पुलिस! पुलिस!, मैं नहिं माखन खायो, आत्मा महाठगिनी, मेरी इक्यावन व्यंग्य रचनाएँ, शर्म मुझको मगर क्यों आती, डूबते सूरज का इश्क, कौन कुटिल खल कामी, ज्यों ज्यों बूड़ें श्याम रंग
    आलोचना : प्रसाद के नाटकों में हास्य-व्यंग्य, हिंदी व्यंग्य का समकालीन परिदृश्य, श्रीलाल शुक्ल : विचार, विश्लेषण और जीवन
    नाटक : सीता अपहरण केस
    बाल साहित्य : शहद की चोरी, अगर ऐसा होता, नल्लुराम
    अन्य : हुड़क, मोबाइल देवता
    संपादन : व्यंग्य यात्रा (व्यंग्य पत्रिका), बींसवीं शताब्दी उत्कृष्ट साहित्य : व्यंग्य रचनाएँ, हिंदी हास्य-व्यंग्य संकलन (श्रीलाल शुक्ल के साथ सहयोगी संपादक)
    -संपर्क- 73 साक्षरा अपार्टमेंट्स, ए-3, पश्चिम विहार, नई दिल्ली – 110063
    फोन- 011-25264227
    ई-मेल- premjanmejai@gmail.com

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