“हिंदी दिवस” पर विशेष….. ‘आरिफा एविस’ की हिंदी व्यंग्य रचना…..

और क्या बताऊँ  अम्मा!  कालेज पूरा किया तो नौकरी की तलाश शुरू की. नौकरी मिलती कहाँ आजकल, जॉब मिलती है .पर चाहिए वहां भी अंग्रेजी ही. एक रिशेप्शनिष्ट की नौकरी तक के लिए अंग्रेजी की माला पहननी पड़ती है. जहाँ भी गये भैया अंग्रेजी में इंटरव्यू दो ऐसा लग रहा था जैसे मुझे नहीं मेरी भाषा को काम मिलेगा.. एक दो जगह तो महज इसलिए नहीं रखा गया कि हमें अंग्रेजी नहीं आती थी, काम बेशक हिंदी में करना था लेकिन अंग्रेजी की जरूरत थी तो थी . यहाँ हम अपनी बात हिंदी में ही नहीं रख पा रहे लोग अंग्रेजी की मांग कर रहे हैं ये हाल है अपने हिंदी भाषियों का. और कहते हैं- ‘अपनी मातृभाषा बोलो और गर्व के साथ रहो.’……

‘हिंदी हैं हम वतन हैं हिन्दोस्ताँ हमारा

आरिफा एविस

हिंदी दिवस हो और स्कूल कालेज इसका जश्न ना मनाये ऐसा कैसे हो सकता है. जश्न का मजा भी वही ले सकता है जिसके पास उसका अभाव हो, अब रोज रोज हिंदी का प्रयोग करने वाला जश्न तो मनाने से रहा. हुआ यूँ पिछले दिनों कालेज में एक कार्यक्रम हुआ. यूँ तो कभी ऐसे कार्यक्रमों में जाते नहीं. जाना हुआ तो मूड खराब हो गया.. सबने हिंदी की खूब वाहवाही की, करते क्यों ना इसी के लिए तो बुलाया था.. दो चार ने हिंदी की दुर्दशा पर आंसू भी बहाए, ऐसा लग रहा था जैसे सैयाद ही शिकार पर रो रहा हो.
कालेज में हिंदी दिवस पर प्रबुद्धजनों का यह जमावड़ा देखकर ऐसा लग रहा था जैसे पूरा विश्व हिन्दीमय हो गया है. ऐसा लग रहा था सारी समस्या बस हिंदी को ही है. जो कभी हिंदी में बात नहीं करते वो हिंदी की समस्या पर बात कर रहे थे. सबने अपने भाषण दिये और खा पीकर चले गये.

अगले दिन सुबह के एक अखबार में उसी कालेज का इश्तहार था- ” हिंदी के लिए असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति. अंग्रेजी माध्यम को वरीयता दी जायेगी.”
अरे हाँ कालेज की दीवार पर कुछ नारे लिखे हुए थे.
‘हिंदी का सम्मान देश का सम्मान.’
‘हम अपनी राष्ट्र भाषा के बिना गूंगे के समान है.’
‘हिंदी लिखो, हिंदी पढ़ो, हिंदी बोलो.’

वैसे भी ऐसे नारे गढ़ने और पढ़ने में ही अच्छे लगते हैं.असल में अमल तो कुछ और किया जाता है. मैं अंदर ही अंदर बहुत दुखी थी. मैंने मम्मी को उस आयोजन की पूरी कहानी सुनाई. ‘उस दिन हमें सभी गर्व करना सिखा रहे थे. मैं आपको बताती हूँ हमें हिंदी पर कैसे गर्व होता है. स्कूल से कालेज गये तो वहां पहले दिन  काउंसलिंग अंग्रेजी में हुई तो  बड़ा  गर्व महसूस किया. कालेज में आधी सखियां तो इसीलिए दूर हो गयी कि मैं हिंदी भाषी थी | वे हीन भावना से ग्रसित तो उन्होंने हमसे बात करना छोड़ दी.  गर्व के चक्कर में कई लोग ख़ुशी ख़ुशी आत्महत्या तक कर लेते हैं. हिंदी भाषी होने का नतीजा यह हुआ कि सहेलियां आठ से चार ही रह गयी. अरे वो हमसे दोस्ती रखती तो उनको गैर हिंदीभाषी होने का तमगा मिलता. कॉलेज हिंदी मीडियम , पर सारे काम हिंदी में हो यह जरूरी नहीं. कालेज के नाम से लेकर नोटिस बोर्ड, केन्टीन तक हिंदीविहीन है.

और क्या बताऊँ  अम्मा!  कालेज पूरा किया तो नौकरी की तलाश शुरू की. नौकरी मिलती कहाँ आजकल, जॉब मिलती है .पर चाहिए वहां भी अंग्रेजी ही. एक रिशेप्शनिष्ट की नौकरी तक के लिए अंग्रेजी की माला पहननी पड़ती है. जहाँ भी गये भैया अंग्रेजी में इंटरव्यू दो ऐसा लग रहा था जैसे मुझे नहीं मेरी भाषा को काम मिलेगा.. एक दो जगह तो महज इसलिए नहीं रखा गया कि हमें अंग्रेजी नहीं आती थी, काम बेशक हिंदी में करना था लेकिन अंग्रेजी की जरूरत थी तो थी . यहाँ हम अपनी बात हिंदी में ही नहीं रख पा रहे लोग अंग्रेजी की मांग कर रहे हैं ये हाल है अपने हिंदी भाषियों का. और कहते हैं- ‘अपनी मातृभाषा बोलो और गर्व के साथ रहो.’
‘तो क्या खेती किसानी भी अंग्रेजी में ही करायेंगे ?’ मम्मी बोली .
‘क्या मम्मी? आप भी! खेती किसानी से अंग्रेजी हिंदी का क्या मतलब?’
‘मम्मी  बोली ! ‘तो क्या हिंदी विमर्श से किसानों,मजदूरों, बेरोजगारी, बच्चों की मौत, बलात्कार से छुटकारा मिल जायेगा”
मैंने बस इतना कहा – ‘हिंदी हैं हम वतन हैं हिन्दोस्तान हमारा’

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