सब जानते हैं कि हिन्दी रोजगार की कोई गारंटी नही देती, अन्य कोई भाषा भी नही देती लेकिन यह भी सत्य है कि  अंग्रेजी के ज्ञान के बगैर नौकरी नही मिलती। मीटिंगों-पार्टियों में हिन्दी में बातचीत नही होती। मॉल और होटलों में सैल्सपर्सन और बेयरे स्वयं को अमरीकी,ब्रिटिश या फ्रेंच जतलांने का प्रयास करते नजर आते हैं। कुछ घंटों में,कुछ दिनों में अंग्रेजी सिखानेवालों की सुसज्जित शॉप्स हमारे मुहल्लों में खुल गईं हैं। पहले मजाक में कहा जाता था कि भारतीय व्यक्ति गुस्से और नशे में अंग्रेजी बोलता है, अब उलटा हो गया है, अंग्रेजी नही बोल पाने पर गुस्सा आने लगता है।   ब्रजेश कानूनगोका व्यंग्य ….|

हिन्दी और मेरा आलाप  

ब्रजेश कानूनगो

ब्रजेश कानूनगो

यही वह समय है जिसमें सहजता से यह सुविधा उपलब्ध हो जाती है कि हम भी अपना राग आलाप सकें। ऐसा नही है कि जो बात मैं कहना चाह रहा हूँ वह पहले नही कही जा सकती थी । लेकिन आमतौर पर सितम्बर में मौका भी होता है और दस्तूर भी होता है। यही वह समय होता है जब हर कोई हिन्दी को लेकर चिंतित हो उठता है। इस वक्त हिन्दी की फिक्र करनेवालों के कोरस में अक्सर यह खतरा हमारे सामने आ खडा होता है कि कहीं हमारी आवाज दब कर न रह जाए। फिर भी मैं राजभाषा के इस राष्ट्र व्यापी देश राग में अपना अक्खड सुर भी लगाना चाहता हूँ।
राजभाषा का मुकुट पहनकर भी हमारी हिन्दी की आज जो दशा है, वह किसी से छुपी नही है। अभी पिछली यूपीए सरकार के समय की ही बात है. वह किस्सा शायद ही कोई भूला होगा जब देश के कानून मंत्री सीबीआई रिपोर्ट की अंग्रेजी सुधारने के चक्कर में अपना मंत्री पद गंवा बैठे थे। अब यदि रिपोर्ट हिन्दी में आई होती तो भला क्योंकर मंत्रीजी से सुधरवाने की नौबत आती,विभाग का हिन्दी अधिकारी ही उसकी हिन्दी ठीक कर देता। पर होनी को कौन टाल सकता है। अंग्रेजी महारानी का राज ऐसे ही समाप्त थोडे हो जाता है। वर्षों पहले बोए अंग्रेजियत के बीजों के पल्लवित-पुष्पित होकर फल देने का शानदार समय अब आ ही गया है।

यह वह समय है जब हिन्दी स्वयं अंग्रेजी परिधानों में सुसज्जित होकर प्रस्तुत होने को लालायित दिखाई देने लगी है । किसी हिन्दी अखबार या पत्रिका को उठाकर एक पेंसिल से अंग्रेजी शब्दों पर गोले लगाते जाएँ, सच्चाई आपके सामने होगी । जो शब्द चिन्हित होने से बचेंगे उनमें से भी अधिकतर ऐसे होंगे जिन्हे आपने हिन्दी का समझकर छोड दिया था।

आजाद हिन्दुस्तान में अपनी सुविधा से हिन्दी लिखने की सबको आजादी है। जो थोडा बहुत लिखा जा रहा है, उसमें व्याकरण, वर्तनी की किसी को परवाह नही है। जो चलन में है वही सही है। स्कूली शिक्षकों तक को बतानेवाला कोई नही कि कहाँ अल्पविराम लगेगा और कहाँ अनुस्वार। कम्प्यूटर प्रचालकों ने जो सुविधानुसार टाइप कर दिया, वही प्रचारित होकर मानक बन जाता है।

google से साभार

google से साभार

सब जानते हैं कि हिन्दी रोजगार की कोई गारंटी नही देती, अन्य कोई भाषा भी नही देती लेकिन यह भी सत्य है कि अंग्रेजी के ज्ञान के बगैर नौकरी नही मिलती। मीटिंगों-पार्टियों में हिन्दी में बातचीत नही होती। मॉल और होटलों में सैल्सपर्सन और बेयरे स्वयं को अमरीकी,ब्रिटिश या फ्रेंच जतलांने का प्रयास करते नजर आते हैं। कुछ घंटों में,कुछ दिनों में अंग्रेजी सिखानेवालों की सुसज्जित शॉप्स हमारे मुहल्लों में खुल गईं हैं। पहले मजाक में कहा जाता था कि भारतीय व्यक्ति गुस्से और नशे में अंग्रेजी बोलता है, अब उलटा हो गया है, अंग्रेजी नही बोल पाने पर गुस्सा आने लगता है।

स्थिति तो यह है कि घर के बच्चे दादीमाँ के निर्देश पर गाय को रोटी डालने जाते हैं तो आवाज लगाते हैं-‘कॉउ कम..कम..’ और गाय दौडी चली आती है। वह विज्ञापन तो याद ही होगा आपको जिसमें एक फिल्मी सितारा मुर्गी से हिन्दी में तीन अंडे माँगता है, मुर्गी दो ही अंडे देती है, सितारा मुर्गी को डाटता है,. हिन्दी नही आती क्या? आय से थ्री.. और मुर्गी आसानी से अंग्रेजी समझकर तुरंत तीन अंडे प्रस्तुत कर देती है। गाय और मुर्गी तक ने समय के अनुसार अपने को ढाल लिया है.. अब हम जैसे हेकड लोगों को भी शायद हिन्दी का हठ छोड ही देना चाहिए। क्या खयाल है आपका।

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