ऐसे में सोशल मीडिया अपने तमाम खतरों और अतिवादी प्रकृति के बावजूद भाषा विशेषकर हिन्दी और हिन्दी साहित्य के प्रसार में बहुत मददगार हो सकता है. हुआ भी है. थोड़े विवेक और समझदारी से किये इसके उपयोग से नए जमाने के नए साधनों से संपन्न लोगों तक साहित्य को पहुंचाया जा सकता है……

हिन्दी के प्रयोग में सोशल मीडिया की भूमिका

ब्रजेश कानूनगो

देश-दुनिया के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में लगातार बहुत तेजी से बदलाव हो रहे हैं. ख़ास तौर पर हमारी जीवन शैली और आचरण पूरी तरह अब वह नहीं रहा है जो हमारे पितामह के समय में हुआ करता था. पिता और पितामह का समय भले थोड़ा-बहुत उनके आचार-व्यवहार में कुछ मेल खा जाता था लेकिन अब पितामह और पौत्र की जीवन शैली में जमीन-आसमान का अंतर हम सहजता से देख पा रहे हैं.
परिवार के इतर यदि हम किसी व्यवसायिक संस्थान के उदाहरण को ही लें, तो देखेंगे कर्मचारियों और उपभोक्ताओं में भी पिछले कुछ सालों के दौरान बहुत संक्रमण की स्थिति बनी है. विशेषकर डिजिटलाइजेशन अथवा मोटे रूप में कहें कि कम्प्युटराइजेशन के बाद प्रौढ़ स्टाफ और युवा उपभोक्ताओं, ग्राहकों के बीच अपेक्षाओं और निष्पादन में काफी असंतुलन और परेशानियों का सामना भी करना पड़ा है. समय से जिसने नई टेक्नोलोजी से तालमेल बैठा लिया वह ही इस प्रतियोगी समय में बने रहने के योग्य रह पाया है.
भाषा और साहित्य का क्षेत्र भी इस बदलाव से अछूता नहीं रह गया है. किसी भी साहित्यकृति के पीछे जो ख़ास तत्व होते हैं उनमें विचार, अनुभूति, दृष्टि और अभिव्यक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका कही जा सकती है. इन तत्वों पर अलग से विस्तार से बातचीत करें तो वह केवल एक साहित्यिक विमर्श भर रह जाएगा. हिन्दी भाषा के प्रयोग को बढाने और सोशल मीडिया की भूमिका के सन्दर्भ में बात कुछ ओर तरीके से करना होगी.
हिन्दी के प्रयोग और ठीक- ठाक हिन्दी सीखने की दृष्टि से पहले किताबों, पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से बहुत सहज और आमतौर पर बहुत मदद मिल जाती थी. लेकिन बदलते दौर में साहित्य-प्रकाशन भी धीरे धीरे अपने लोक-मंगल के उद्देश्यों से थोड़ा विचलित (कुछ अपवादों को छोड़कर) होता भी दिखाई देता है.यहाँ भी कास्ट कटिंग और लाभ अर्जन जैसी विवशताएँ भटकाव का कारण बनी हैं.
कुछ साहित्यिक लघु पत्रिकाओं को छोड़ दें तो लोकप्रिय पत्र-पत्रिकाओं (अपवाद छोड़कर) में जो साहित्यिक रचनाओं का स्थायी पृष्ठ हुआ करता था वह या तो ख़त्म हो गया है या उसकी साइज बहुत छोटी हो गयी है. नए रचनाकारों को तो अपने आपको अभिव्यक्त करने के लिए वहां कोई स्पेस ही नहीं रहा है. साहित्यिक गोष्ठियों, सांस्कृतिक समाचारों की रिपोर्टिंग सिकुड़ती गयी है. किताबों की समीक्षाओं का स्थान पुस्तक परिचय के नाम से मात्र किताब के कवर की तस्वीर भर रह गया है.
इलेक्ट्रोनिक मीडिया की तो और भी चिंतनीय स्थिति है. जीवन मूल्यों और साहित्य में जिन विषयों को आलोचना और तिरस्कार के योग्य माना जाता रहा है, वे ही चैनलों पर चौबीसों घंटे दर्शकों के मानस पर दुष्प्रभाव डालते हुए उनके विवेक और समझ को ही कुंद करने में संलग्न हैं.
ऐसे में सोशल मीडिया अपने तमाम खतरों और अतिवादी प्रकृति के बावजूद भाषा विशेषकर हिन्दी और हिन्दी साहित्य के प्रसार में बहुत मददगार हो सकता है. हुआ भी है. थोड़े विवेक और समझदारी से किये इसके उपयोग से नए जमाने के नए साधनों से संपन्न लोगों तक साहित्य को पहुंचाया जा सकता है.
छोटे से स्मार्टफोन पर अब दुनिया हमारी मुट्ठी में आ गयी है. उँगलियों के इशारे पर अधिकाश कार्य संपन्न हो जाते हैं. कंप्यूटर और लेपटॉप भी उपलब्ध हैं. इंटरनेट कि उपलब्धता ने चौबीसों घंटे संपर्क में बने रहना और सम्प्रेषण को आसान बना दिया है. संसार के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से हम सीधे बातचीत के लिए संपर्क में हैं. साहित्य भी इसी मार्ग से होकर अब दुनियाभर में विस्तारित हो रहा है.
इसी रास्ते से हमें हिन्दी और हिन्दी साहित्य के प्रसार के उपाय खोजना होंगे. सबसे पहले तो प्रत्येक डिजिटल साधन में चाहे वह मोबाइल हो या टेबलेट या कंप्यूटर उसके की बोर्ड में हिन्दी में टाइप हो सकने वाले टूल को सक्रीय किया जाना चाहिए. मैं जब भी किसी ऐसे मित्र से मिलता हूँ जिसके मोबाइल में ‘हिन्दी इनपुट’ डाउनलोड नहीं होता उसमें मैं स्वयं यह कार्य कर देता हूँ, सिखा देता हूँ कि इसमें कितनी आसानी से रोमन या देवनागरी के अक्षरों को टाइप करते हुए हिन्दी लिखी जा सकती है. शुद्धता के कई विकल्प भी की बोर्ड उपलब्ध करा देता है. यह कार्य हम सबको सबसे पहले अवश्य कर लेना चाहिए.
यदि थोड़ा बहुत संवेदनशील हैं, अच्छे-बुरे पर अपनी प्रतिक्रया व्यक्त कर सकते हैं तो खूब हिन्दी में लिखें, टाइप करें. सेव करें. फ़ाइल बनाएं. यह सब करना अब नई बात नहीं रह गयी है, रोज ही करते हैं, अब हिन्दी में करने को प्राथमिकता दें.
सोशल मीडिया में सक्रियता के लिए इन दिनों सबसे ज्यादा वाट्सएप, फेसबुक ,ट्विटर आदि दैनिक रूप से अभिव्यक्ति के साधन हैं. एक रचनाकार इन माध्यमों से अपने सृजन को मित्रों और अन्य लोगों तक पहुंचाने के प्रयास कर सकता है. बहुत से वरिष्ठ और युवा ख्याति प्राप्त साहित्यकार भी इन माध्यमों में सक्रीय रहते हैं जिन्हें फोलो करके उनकी रचनाओं को पढ़ा और शेयर किया जा सकता है. यह भी श्रेष्ठ साहित्य के प्रसार का बहुत बेहतर माध्यम बना है. इन्ही पर हम साहित्यिक गतिविधियों के समाचार, तस्वीरें आदि भी पोस्ट करके अधिक लोगों तक पहुंचा सकते हैं.
यह बहुत सुखद है कि कुछ वाट्स एप समूह ऐसे भी बने हैं जिनमें साथी रचनाकार प्रतिदिन किसी एक विषय पर अपनी नई रचनाएं पोस्ट करते हैं ,फिर उन पर चर्चा करते हैं, सुझाव देते हैं, रचनाओं में संशोधन से उनमें क्रमशः निखार आता जाता है. ये समूह लगभग एक साहित्यिक कार्यशाला की तरह काम कर रहे हैं. इस तरह भी हिन्दी में लेखन और हिन्दी साहित्य के प्रचार प्रचार का रास्ता खुलता है. समूहों में सृजित रचनाओं को फेसबुक पर पोस्ट करके बड़े पाठक समूह तक इसे पहुंचाने में सहायता मिल जाती है. बाद में सोच-विचार करते हुए रचनाओं को यहाँ लगातार संशोधित भी किया जा सकता है.
ऐसे अनेक साहित्यिक पोर्टल उपलब्ध हैं जो किसी भी प्रिंट पत्रिका के बेहतर विकल्प के तौर पर प्रतिष्ठा अर्जित कर चुके हैं. जिन पर साहित्यिक रचनाओं को शेयर किया जा सकता है और श्रेष्ठ रचनाकारों की सभी विधाओं की रचनाओं को पढ़ा जा सकता है. इसके साथ ही हम अपना खुद का ब्लॉग बनाकर भी रचनाओं को पोस्ट कर सकते हैं, जिसका लिंक मित्रों को भी दे सकते हैं. सोशल मीडिया का महत्त्व इसी बात से समझा जा सकता है कि अब कई अखबार और पत्रिकाएँ सीधे ब्लॉग और फेस बुक आदि से भी अच्छी सामग्री का चयन करके प्रकाशित करने लगे हैं.
रचनाओं का पाठ करते हुए हम अपना लाइव विडिओ बनाकर भी सोशल साईट पर पोस्ट कर सकते हैं. कुछ साइटों पर तो जाने-माने उद्घोषक और कुशल अभिनेता रचनाओं का पाठ करते हैं. हिन्दी साहित्य के लिए यह एक बहुत प्रभावी और रोचक सम्प्रेषण का महत्वपूर्ण जरिया बना है.
सोशल मीडिया पर अब अनेक पुस्तकें ऑनलाइन पढ़ने के लिए उपलब्ध हैं. हम अपनी पुस्तक भी ऑन लाइन प्रकाशित कर सकते हैं. ऐसी अनेक ऑनलाइन एजेंसियां हैं जो आपको विचार से लेकर लिखने, सम्पादन, कॉपी राइटिंग, प्रूफ रीडिंग ,प्रकाशन और बाद में उसकी मार्केटिग, विक्रय और पुरस्कारों के नामांकन तक के लिए सहायता करती हैं. साहित्य के प्रसार के सन्दर्भ में सोशल मीडिया का यह बहुत सकारात्मक और उत्साहवर्धक पक्ष है.
अंत में बात फिर वहीं आ जाती है..जो हम अक्सर कहते रहते हैं.. सब कुछ उपलब्ध है…साधनों की कोई कमी नहीं… बस दृढ संकल्प और इच्छा शक्ति के साथ लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ना होगा. कोशिश तो करके देखिये ज़रा…!

Leave a Reply

Your email address will not be published.