सामाजिक, राजनैतिक बदलावों के साथ उद्घाटित होते वर्तमान के ताने बाने में उलझी इंसानी जिंदगी, मानो मकड़ी के जाले में फंसी हुई मक्खी | सतही तौर पर हँसते, गाते, मुस्कराते चेहरे जरूर हैं किन्तु मानव मन का सच क्या यही है….? “ये जो सबसे ज्यादा हंस रहा है, आकंठ दर्दों से भरा है |” के यथार्थ और कुछ ऐसे ही मानवीय सवालों के जवाब ढूँढने को वक्ती पड़ताल के साथ मानव मन की गहराइयों में चुपके से उतरती है गीता श्रीकी कलम …….. | संपादक 

“रात के इस पहर में हालांकि ऋषभ के पापा उसके साथ बात करना तो नहीं चाहते थे, पर उनके पास समय ही नहीं था कि अपने बेटे से बात कर सकें। ये कोरपोरेट कल्चर कितना दूर कर देता है सबको। फिर चाहे उनकी बेटी हो जो शादी के नाम से ही कांपती है या ऋषभ, जिसकी शादी का पता नहीं चलता कि शादीशुदा है भी या नहीं। हिमानी की जिंदगी केवल इस समय शॉपिंग और उसके बेटे की केयर करने तक ही सिमट गयी है। उन्हें बहुत दुःख होता है, बेटे और बहू के बीच में दूरी को देखकर। कैसे वह उसे डपट देता है, समय नहीं देता, इतनी हंसने खेलने वाली हिमानी अब कैसे खुद में ही रह गयी है वह न तो बोलना चाहती है और न ही हंसना। बस एक रोबोट की तरह काम में लगी रहती है। ऋषभ की माँ बहुत चाहती है हिमानी का दुःख बांटना पर उसका यह दुःख कौन बांटेगा?” (कहानी से)

हिमखंड के बाशिंदे 

गीताश्री

गीताश्री

”ऋषु बेटा, आ गए” ?” पापा का स्वर आज कुछ ज्यादा ही मुलायम लगा।

“”हां पापा ””

जूते उतारकर रैक पर रखते हुए ऋषभ ने कहा।

“”मां नहीं दिख रही पापा ?”

“”हां, तुम्हारी गर्लफ्रेंड के साथ है””

“” पापा आप भी ना, आप लोग खाना खा चुके?””

“”हां!’”

“”फिर ठीक, मैं भी आज मीटिंग के बाद खाकर आया हूं””

“”चलो, कॉफी लेकर बैठते हैं, टेरेस में””

“”जी पापा””

टेरेस पर चांदनी पसरी हुई थी। उस पर ऋषभ के पापा ने किशोर के गाने चला रखे थे। ऐसा लग रहा था कि मानो कितने दिनों की थकान उतार रहा हो कोई। गुलाबी अंधेरे में रोमांटिक-सा माहौल बना दिया था पापा ने।

नहीं तो ऐसे रोमांटिक माहौल में बैठे हुए न जाने कितना समय हो गया था। उसने टटोलना चाहा, पर टटोल न सका ऐसा लगा कुछ है जिसने उसे रोक दिया! आखिर क्या था जिसने उसे खुद से ही बात करने से रोक दिया। कहीं न कहीं इतने भारी पैकेज ने जैसे उसे बोलने से मना कर दिया हो!

वह अपने में में हंसना तो चाह रहा है, पर गले में आकर हंसी रुक जाती है, न जाने क्यों होंठों पर नहीं आ पाती। चलो इट्स लाइफ यार, अब जो है वो है, इंजॉय करो.

“”वाउ पापा, आपने तो पूरा माहौल बना रखा है। क्या बात है..!”

ऋषभ ने शरारत से पूछा.

“”हां, आज मन हुआ”, तुझे तो कोई शाम मिलेगी नहीं हमारे साथ। सोचा देर रात ही महफिल सजा लें। थोड़ी गपशप हो जाएगी।“

“”सच में, आज तो आपने मूड बना दिया, याद है आपने ऐसे ही मूड बनाकर वाइन के गिलास के साथ हिमानी का राज़ उगलवाया था?””

“”हां, उसे कैसे भूल सकता हूं, तुम भूल सकते हो. तुम्हारे बहाने मेरी भी तो लव स्टोरी ताज़ा हुई थी ””

“पापा, आप देख रहे हैं हमारी हालत, कहां फुर्सत कि आपकी तरह बैठकर पुराने दिनों की याद में डूब जाएं। कल का वर्क प्रेशर इतना ज्यादा दिमाग में कि..”

“”देख रहा हूं…जब से आया हूं…”

पापा संजीदा हो गए। ऋषभ की व्यस्तता की बातें करते रहे।

ऋषभ भी पापा से बात करता रहा और उसे याद आ रही थीं वो रातें जब वो और हिमानी, हाथों में हाथ डाल कर सफर पर कहीं गहरे उतर जाते थे, जब वे हर वीकेंड पर बाहर जाते थे, जब वह शाम को कभी कभी जल्दी आकर उसे सरप्राइज़ कर देता था और हिमानी के चेहरे पर एक मौन समर्पण बिखर जाता था. पर आज जब वह लौटता है तो इतना थका होता है और हिमानी भी लगभग सो चुकी होती है, वह समर्पण के उस रंग से मिल ही नहीं पाता. उसे याद नहीं आ रहा कि आख़िरी बार वह रंग कब उनकी जिंदगी का हिस्सा बना था. उसे नशा चढ़ रहा था और गले से आवाज भी निकलने की कोशिश कर रही थी. पर क्या वह अपने ही दिल की आवाज सुन पाता है? शायद नहीं! वह गुम हो जाता है, टार्गेट में, सेल्स मीटिंग में, प्रेजेंटेशन में!  कभी अपनी लाइफ के लिए उसने  और  हिमानी  ने  प्रेजेंटेशन बनाई थी, टारगेट रखे थे! काश समझ में आ पाता कि जिंदगी टार्गेट और प्रेजेंटेशन से भी परे है! जिन्दगी में समर्पण है, डेडिकेशन है, पर उसे क्या, उसे तो एक मोटी  रकम  मिल रही थी, जिसके कारण वह हिमानी और गोलू की इच्छाएं  पूरी करने का दावा कर सकता था. कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो होता ही है, वह जस्टिफाई हमेशा करता रहता है, खुद को. रात थोड़ी परवान चढ़ रही थी । उधर वह जहां एक रंग में डूबने की कोशिश कर रहा था तो वहीं पापा एकदम रंग में आ गए थे।

“अच्छा ऋषभ, मेरा एक काम करोगे?””

“” हां पापा, बोलिए न ””

अपनी जेब से कुछ निकाला और बेटे के सामने टेबल पर धर दिया।

“”ये बीस हजार रूपए हैं बेटा, कल अपनी मां के लिए एक हीरे की अंगूठी ले आना न!””

“”व्हाट…?? पापा…क्या हो गया है आपको..अब आप मां को हीरे की अंगूठी देंगे, वो लेंगी, उन्हें पता है…”

ऋषभ की आंखें फैल गईं। वह चकित हो उठा। पापा बड़े संयमित किस्म के इनसान हैं। मस्ती करते हैं पर दिखावा पसंद नहीं।

“”हां, वो क्या है न, उसे कल मैसूर लेकर जाऊंगा, वृदांवन गार्डन जाऊंगा और वहीं अंगूठी दूंगा, कितना अच्छा लगेगा न उसे, एक सरप्राइज़!””

“”पापा!””

“”हां, कोई परेशानी है क्या?””

“”नहीं, परेशानी तो कोई नहीं, पर….”

“” ये पर-वर क्या होता है ? मेरी बीवी है, अभी माशाल्लाह, मैं जवान हूं। हैंडसम हूं”…तुम्हारी मां को अच्छा लगेगा, वो क्या है न समय के साथ प्यार को बचाकर रखना चाहिए, पता नहीं कब भाप की तरह उड़ जाए” ”

“”ओह पापा…” वह हंस रहा था।

“”फिर……….., देखो फोन बज रहा है तुम्हारा, फोन सुनो और कल मेरा काम कर देना। बाय गुड नाईट””

“”गुड नाइट पापा”

“ये पापा न जाने क्यों ऐसे हो रहे हैं ? हुंह, पूरा नशा उतार दिया.”

साभार google

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रात के इस पहर में हालांकि ऋषभ के पापा उसके साथ बात करना तो नहीं चाहते थे, पर उनके पास समय ही नहीं था कि अपने बेटे से बात कर सकें। ये कोरपोरेट कल्चर कितना दूर कर देता है सबको। फिर चाहे उनकी बेटी हो जो शादी के नाम से ही कांपती है या ऋषभ, जिसकी शादी का पता नहीं चलता कि शादीशुदा है भी या नहीं। हिमानी की जिंदगी केवल इस समय शॉपिंग और उसके बेटे की केयर करने तक ही सिमट गयी है। उन्हें बहुत दुःख होता है, बेटे और बहू के बीच में दूरी को देखकर। कैसे वह उसे डपट देता है, समय नहीं देता, इतनी हंसने खेलने वाली हिमानी अब कैसे खुद में ही रह गयी है वह न तो बोलना चाहती है और न ही हंसना। बस एक रोबोट की तरह काम में लगी रहती है। ऋषभ की माँ बहुत चाहती है हिमानी का दुःख बांटना पर उसका यह दुःख कौन बांटेगा? वे अपने आपसे बातें करते हैं! और उधर सांभवी, उनकी बेटी ! वह न जाने कब शादी करेगी? उसे शादी से इतने चिढ़ है ! दोनों बहन भाई न जाने क्या खिचड़ी पकाते रहते हैं, न तो उनमें शर्म है, और अब तो माँ बाप का लिहाज़ भी नहीं रहा। पर दिल के बुरे नहीं है दोनों ! बस इस अतिव्यस्तता के मारे हुए है, इस भौतिकतावाद का शिकार भर है! क्या कभी वे अपने अपने दायरों से बाहर निकल पाएंगे? क्या कभी वे दोनों एक इकाई के रूप में मिल पाएंगे? वह बहुत सोचते हैं! पर हर बार वे हार जाते हैं और हिमानी की आंखों में झांकते हुए उन्हें डर लगता है! वह ऐसा दर्द है जो हिमानी के मन के कोने को भर चुका है, उन्हें अब लगता है कि कहीं न कहीं बहुत कुछ गलत है, हिमानी के मन में जम चुकी बर्फ को पिघलाना ही होगा! कैसे भी और कुछ भी करके उसे उस काई से बाहर लाना होगा जिस पर बार बार वह फिसल जाती है!

उधर ऋषभ इतनी रात में फोन आने से हैरान-सा हो रहा था।

अब इतनी रात में किसका फोन आ गया, किशोर के गानों की रूमानियत पापा की बातों से उड़ गयी थी। वह हंस रहा था, मन ही मन, अरे ये तो सांभवी का फोन है। अब उसे क्या हुआ, उसे होगा भी क्या..। मजे में अकेले जिंदगी जी रही है। नो इंट्री फौर एनीवन। उसका ऑफिस ही उसे इतना समय नहीं दे पाता कि वह खाना भी सही से खा पाए, और वह उसे इतनी रात को फोन कर रही है। कोई जरुरी बात होगी।

“”हां, सांभी”

“”भाई….””

“”आराम से, हुसैन बोल्ट की तरह क्यों दौड़ रही है?””

“भाई, जब मुहम्मद अली की तरह मुक्के पड़ रहे हों तो हुसैन बोल्ट ही बनना हो जाता है ””

“”अरे किसकी हिम्मत कि तुम्हें मुक्का मार दे, तेरे इंतजार में बूढ़ा हो रहा बेचारा राहुल पर तुझे तरस आ गया क्या.. हरी झंडी दे दी माई डियर सिस्स ? ”

“”अरे भाई, तेरी भी सुई वहीं अटक गई है। और भी गम हैं जमाने में। मैं तो किसी और वजह से फोन कर रही हूं। कई दिनों से बात करने की सोच रही थी। हर बात बात भूल जाती थी या फोन करना। आज याद आया जब मां का फोन आया। वे मुझे डांट रही थीं।

“””क्यों भई…क्या हो गया? “

“कुछ दिन पहले मां का फोन आया, बोलीं पापा के लिए उनकी तरफ से मैं love कार्ड ले लूं! और उस पर कुछ ओरिजिनल लव मैसेजेज लिखकर भेज दूं! “”

“”मां ने ऐसा कहा?””

““हां””

“ओ त्तेरी ।“

““यकीन नहीं होता ये वही मां है…””

“हां मैंने उनसे कहा कि मैं पापा के लिए उनकी फीलिंग कैसे जान सकती हूं? या मैं किसी भी आदमी के लिए प्यार की फीलिंग कैसे लिखूं?””

“”सही तो कह रही हो, फिर ?””

“नहीं मानी, हा हा, खूब बहस किया, सच में भाई इतना आर्ग्यू तो कोई वकील भी नहीं करता जितना आर्ग्यु मां ने कर दिया !, एकदम दिमाग खराब कर दिया, और फिर पता है, लास्ट में क्या बोलीं ?””

“”क्या?””

वाइन का सिप लेते हुए ऋषभ बोला

“”भाई, यही आदत तुम्हारी पसंद नहीं मुझे!, मुझसे बात करते करते आप पीने लगे””

“”अरे बहना, समय ही कहां मिल पाता है, आज मिल गया, तुम सबके बहाने, जल्दी ख़तम कर बात को, फिर तुम्हें पापा की बात बताता हूं” “

“”हां, फिर बोलीं- कभी किसी से प्यार किया होता तो समझती न ! किसी से प्यार किया होता तब न एक दो लाइन लिख पाती ?”

“” हा हा, सुनकर हँसते हंसते पेट दुःख गया, इस बार तो दोनों को कैसा इश्क का भूत चढ़ गया है””

“”हैं! पापा को भी?””

“”सुन, अभी मैं दिन भर की लम्बी मीटिंग के बाद घर में घुसा तो एज यूज्युअल हिमानी खाना खाकर सो चुकी थी, मां भी। बस पापा जाग रहे थे””

““ह्म्म्म””

“”मुझे उन्होंने मां के लिए अंगूठी खरीदने के लिए बीस हजार रूपए दिए” ”

“”सच में?””

“”बोले, मां को खुशी होगी ! अब बताओ इस उम्र में ये दोनों क्या कर रहे हैं?””

“”सच कह रहे हो!””

“”दोनों ही ऐसे पगला रहे हैं जैसे पहला पहला प्यार हो””

“”हां, इत्ते साल हो गए साथ रहते रहते, अब भी !!””

“”हां बोलो तो, अब बीस हजार रूपए खर्चा कर रहे मां की अंगूठी पर! पता नहीं ये ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं!””

“”हां, और मां को भी ऐसा दौरा पड़ गया है ! दोनों को ही प्रेम का दौरा पड़ गया है””

“सुन सांभी, कोई तो बात होगी। मेरा मन कह रहा है कि इसके पीछे कोई न कोई राज है।

“”भाई तुम कह तो सही रहे हो, पर मैंने अभी तक मां और पापा माने मॉम और पॉप को इन चोंचलों में पड़ते हुए देखा नहीं था ””

“”देखा तो मैंने भी नहीं था सांभी!, पर इस बार ये लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं ? ऐसा लग रहा है, कुछ तो चल रहा है इन लोगों के दिमाग में ””

“”हां, सच कह रहे हैं, पहले तो मुझे नहीं लगा था, पर जब आपने पापा की बात बताई तो मुझे लगा अजीब! ऐसा लग रहा है दोनों के दिमाग में एक खीर पक रही है! या यूं कहें कि ओवन में केक बेक हो रहा है” “

“”हा हा, पर क्या, सोच सांभी सोच” “

“”हां, भाई! “

दोनों ओर से थोड़ी देर के लिए सन्नाटा छा गया। सांभवी ने चुप्पी तोड़ी।  ”

“”भाई, सुनो!, कहीं ऐसा तो नहीं कि ये नाटक हमें सुधारने के लिए हो””

“”मतलब? हमें सुधारने के लिए हम कहां से बिगड़े हैं” ?”

“”भाई, समझा करो, पापा ने क्या कहा कि रिश्तों में पानी दिया जाना जरूरी है, है न! “”

“”हां”” इस हां में अपराध बोध का अहसास भरा हुआ था। जिसे दोनों समझ रहे थे।

“”पानी दिए जाने का मतलब उन्हें पोसना, उसे समय देना, सच कहना आपने भाभी को कब से समय देना बंद कर दिया है?, क्या आपको याद है आपने कब भाभी के साथ आख़िरी बार फ़िल्म देखी थी? या कब आप आख़िरी बार घर से बाहर निकले थे? या कब आपने गोलू को जागते हुए देखा है? सच बताना” ”

“”सांभी, कह तो तुम सही रही हो! अरसा हो गया हिमानी के साथ बाहर गए हुए, उसे ढंग से देखे हुए, गोलू का तो पता ही नहीं है होमवर्क कौन कराता है, उसके साथ आउटिंग पर गए जमाना हो गया। मेरे पास आता भी कम है। रात को सोते हुए मिलता है। सुबह मेरे जागने से पहले स्कूल चला जाता है। न कभी जिद ना कभी कोई डिमांड…नींद में जगाता हूं तो करवट बदल कर मम्मी की तरफ चिपक जाता है।“  ”

“”फिर? पापा तुम्हें यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि रिश्तों को थाम लो, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, है न! “”

“”हां सांभी, और मां तुम्हें कुछ बताने की कोशिश में हैं?””

“”मुझे?, क्या” ? “
“”याद कर, तुम्हें मां ने क्या कहा- किसी से प्यार किया होता तो पता होता? तुम कितना बिजी रहती हो, शादी के लिए और न ही किसी से प्यार करने के लिए समय है?, तुम्हें नहीं लगता कि तुम चिडचिडी इसी वजह से हो गयी हो?””

“”नहीं भाई, मैं एकदम ठीक हूं और मुझे नहीं करनी अभी शादी-वादी! “”

“”नहीं सांभी, हो सकता है तुम कहो भाई को शराब चढ़ गयी है, पर सच यही है कि यू नीड समवन! कोई ऐसा जो तुम्हें प्यार करे, जिसे तुम प्यार करो, जो केवल तुम्हारा हो, तुम्हारे साथ तुम्हारी खुशी और गम बाँटें, तुम्हारे साथ तुम्हारे पल शेयर करे, क्या तुम्हें नहीं लगता?””

“”सच कह रहे हो भाई, तुमने अपने बारे में सोचा है। तुम कितना समय बिता पाते हो परिवार के साथ। साथ रहकर भी कितने दूर रहते हैं हम। पापा पिछली बार कुछ बता रहे थे तुम्हारे बारे में कि ऋषभ हिमानी को समय नहीं देता। वह घर में उदासी ओढे खटती रहती है। तुमने खुद को दफ्तर में इतना झोंक दिया है कि परिवार ओझल। तुम सेट होकर भी कहां परफेक्ट बन पाए हो। खैर…कभी कभी तो मां की वे बातें भी ध्यान आती हैं जिसमें वे कहती थीं शादी कर लो, सेट हो जाओ और मैं उन पर चिल्ला पड़ती थी। अब जब वो ये बात नहीं करतीं तो ऐसा लगता है हार मान चुकी हैं।  भाई, तभी, मां – पापा ने अपने रोमांस के जरिए हमें एक मैसेज दिया है कि हमारे सुधरने का समय आ गया है, अब भी न सुधरे तो रेड अलर्ट हो जाएगी और हम लोग डेंजर जोन में चले जाएंगे।

“”तुम्हारी तो एक्सपायरी डेट बस आने ही वाली है सांभी…”

वह हंसा।

“”हां भाई, रिश्तों का डेंजर ज़ोन। सुनो, मेरा तो जो होगा वह होगा, पर सुनो तुम भी भाभी को समय दो, गोलू को समय दो। देखना कहीं भाभी के कोई अफेयर न हो गया हो “

“हा हा”…चुप पगली! एक तो बेचारी से संभलता नहीं है, दूसरा कैसे संभालेगी?,

इतना बोल तो गया पर उसकी आवाज में संबंधो की दावेदारी मजबूत न थी। वह कुछ छीजता-सा महसूस कर रहा था। वह एक हाथ से समय को पकड़ता तो दूसरे से परिवार छूट रहा था। हिमानी का उतरा हुआ चेहरा याद आने लगा। अब तो वह दिन में फोन भी नहीं करती चाहे कितनी बड़ी बात हो जाए। उसकी शिकायतें भी कम होने लगीं हैं। इसीलिए लड़ाईयां कम। ये सब आज से पहले सोचने की नौबत ही कहां आई। वह डिस्टर्ब हो चला पर सहज होने की कोशिश की–

google से साभार

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“अपनी फिकर करो, मां ने तुम्हारे दिल में घंटी तो बजा ही दी है , पर भाई एक बात समझ में नहीं आई कि ये सब चीजें कल के लिए ही क्यों तय, मतलब कल कौन-सा दिन, मां पापा का एनीर्सरी भी नहीं, कल तारीख क्या है सांभी, कुछ भूल तो नहीं रहे हम “

“ओ त्तेरी…भाई…कल 14 फरवरी है। रविवार है। तेरी छुट्टी होगी। पापा संकेत दे रहे हैं, उन्हें लेकर तुम लोग मैसूर निकल जाओ, म्यूजिकल गार्डन में वैलेंटाइन का दिन और शाम बिताओ भाई…वाह पापा, क्या जोरदार आयडिया निकाला है ठूंठ में जान डालने का..भाई कल वैलेंटाइन डे है…इसी का बहाना लिया दोनों ने। चल सो जा, कल सुबह जल्दी निकल जाना। नो बहाना ओके…हैव ए नाइस टाइम, दोनों कपल्स को..अंगूठी एक नहीं, दो खरीदना…जेब ढ़ीली करो…”

”सांभी ने जोरदार ठहाका लगाया। ठहाके पर अचानक किसी का पैर पड़ गया और फोन कटते ही वह गहरी खामोशी में डूब गई। दो जोड़ी उदास आंखें गुलाब लिए उसके केबिन में खड़ी है।

आखिर कब तक वह उन्हीं दीवारों में खुद को कैद रखेगी? क्या कभी खुद को अतीत की परछाइयों से निकाल पाएगी? सोच रही है उसके केबिन के बाहर उसे ताकती हुई आँखें उससे कई सवाल पूछ रही हैं, पर वह क्या करे, इतनी बार शादी के नाम पर उसे धोखा मिला है, वह अब और धोखा नहीं खाना चाहती। उसे चाहिए भरोसा, यह भरोसा कि शादी के बाद उससे कोई उसकी नौकरी छोड़ने के लिए नहीं कहेगा! शादी के बाद उसे घर में कॉम्पटीटर के रूप में नहीं देखेगा। उसे घर की चारदीवारी में कैद नहीं करेगा! कितनी बार रिश्ते आए, और उसकी नौकरी छोड़ने की शर्त के साथ ही ख़त्म हो गए। या नौकरी तो करे पर शर्ते तमाम! उसे शर्तों पर नौकरी करने का मन नहीं था, प्यार हुआ तो जब तक उसने हां नहीं की तब तक प्यार में कोई शर्त नहीं पर जैसे ही उसने हां की वैसे ही उन्हीं लड़के वालों की तरह तमाम शर्तें कि तुम्हें नौकरी छोडनी होगी, या अगर नौकरी छोड़नी नहीं तो कम से कम ये या वो! शर्तों की फेहरिस्त उसे थमा दी जाती, वह शर्तों के बेस पर न तो शादी चाहती थी और प्यार, क्या वह शर्तों पर होता है? उसे समझ में नहीं आ रहा था क्या करे! माँ उसे इशारा कर रही थी, माँ कह रही है प्यार करो, पर कैसे प्यार करे! उसे भी सुबह उठकर एक शांति चाहिए। पर नौकरी छोड़कर उसे शांति नहीं चाहिए ! वह क्या करे! उसका सर फट जाता है, उसे अकेलापन काटता है, पर शर्तों पर अपनी इच्छाओं को दूर करना ! वह क्या करे? काश! माँ की तरह कोई बिना शर्त प्यार करने वाला होता. क्या वह केबिन के बाहर  झांकती प्रतीक्षारत, आकुल आँखों को हां कर दे? वह समझौता कर ले अपनी जिंदगी से? या खुल कर बात कर ले, साफ साफ. वह क्या करे? बहुत असमंजस में है, बहुत कन्फ्यूज़न है, मां के इशारे पर क्या करे, गौर करे क्या? हां, गौर तो करना ही होगा! उसे किसी रिश्ते में आगे तो बढ़ना ही होगा! केबिन के बाहर गुलाबों की उदास आंखों को वह देख रही है!

देह में रक्त का संचार तेज हो रहा था। धड़कन की लय साफ साफ सुनाई देने लगी। देह और मन का रंग एक साथ बदल रहा था.

दूसरे कमरे में मां और पापा की परछाइयां कल की तैयारी में बिजी थे।

…..

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    By: गीताश्री

    जन्म- 31/12/1965 मुजफ्फरपुर, बिहार
    कृतियाँ –
    प्रार्थना के बाहर और अन्य कहानियां, स्वप्न, साजिश और स्त्री, डाउनलोड होते हैं सपने, कहानी संग्रह |
    औरत की बोली, स्त्री आकांक्षा के मानचित्र, स्त्री विमर्श,
    सपनों की मंडी ( आदिवासी लड़कियों की तस्करी पर आधारित शोध, वाणी प्रकाशन)
    हसीनाबाद ( उपन्यास, शीघ्र प्रकाश्य
    संपादित कृतियाँ –
    नागपाश में स्त्री ( स्त्री विमर्श)
    कल के क़लमकार ( बाल कथा)
    स्त्री को पुकारते हैं स्वप्न, कथा रंगपूर्वी ( कहानी संग्रह )
    हिंदी सिनेमा: दुनिया से अलग दुनिया ( सिनेमा)
    तेईस लेखिकाएँ और राजेन्द्र यादव( व्यक्तित्व)
    पुरस्कार एवं सम्मान –
    वर्ष 2008-09 में पत्रकारिता का सर्वोच्च पुरस्कार रामनाथ गोयनका, बेस्ट हिंदी जर्नलिस्ट ऑफ द इयर समेत अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त.
    राष्ट्रीय स्तर के पांच मीडिया फैलोशिप और उसके तहत विभिन्न सामाजिक सांस्कृतिक विषयो पर गहन शोध.
    कथा साहित्य के लिए इला त्रिवेणी सम्मान-2013
    सृजनगाथा अंतराष्ट्रीय सम्मान
    भारतेंदु हरिश्चंद्र सम्मान, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार
    साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए बिहार सरकार की तरफ से बिहार गौरव सम्मान-2015
    संप्रति- 23 सालों तक सक्रिय पत्रकारिता के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र पत्रकारिता और साहित्य लेखन !
    संपर्क-
    D-1142
    Gaur green avenue
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    आवाज दे कहां है…!: कहानी (गीताश्री)

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