जिंदगी के कई जीवंत पहलुओं से सीधे रूबरू करातीं शहनाज़ इमरानीकी कविताएँ …..

क़ातिल जब मसीहा है 

शहनाज़ इमरानी

शहनाज़ इमरानी

सिर्फ़ लात ही तो मारी है
भूखा ही तो रखना चाहते हैं वो तुम्हें
नादान हो तुम भीख मांगते हो
तुम रोटी की बात करते हो
सरकार के रहनुमा के आगे
जो मुग्ध हैं खुद के आत्म सम्मोहन में

न्याय और अन्याय की जंग में
जहाँ सच को गवाह नहीं मिलता
ख़ुदाओं कि इस दुनियां में

तुम्हारे पास है सिर्फ़ दुआ
जो तुम रो कर, चीख़ कर
या हाथ फ़ैला कर करो
कोई भी कुछ नहीं कहेगा

ख़िज़ाँ  

साभार google से

साभार google से

बदरंग आसमान और
चेहरा बदल गया धरती का
हवा ने फैला दिए हैं बाज़ू
दरख्तों के हरे लिबास ने ओढ़ ली है बेलिबासी
पीले पत्तों का नाच होता है अब धरती पर
जले हुए दिन का धुआं फ़ैलता जाता है
शाम और सूरज की बरसों पुरानी जंग में
सूरज अँधेरे ग़ार में छुप गया है
इस लड़ाई मैं हमेशा हारने वाली शाम
उजले दिनों की ख्वाहिश लिए
ज़ख्मों पर धूल उड़ाती है।

एक नज़्म 

तुम्हारे स्वागत में फूल कम पड़ गये हैं

बादलों ने बरसने का प्रोग्राम बदल दिया है
आओ हम ज़िन्दगी की बातें करें
में तुम्हारे साथ बातें करते हुये हँसना चाहती हूँ
हम डट कर उम्दा खाना खाएँगे
और कॉफ़ी भी पियेंगे
इसके बाद तुम मुझे मार देना
अगर तुम यह मौक़ा चूक गये तो
मैं तुम्हें मार दूँगी
माफ़ी चाहती हूँ दोस्त
यही तो हमारा दस्तूर है।

 नींद बे आवाज़ 

अँधेरी रात में बरसता है सहमा सा पानी

अभी हवा दरख्तों को छू कर गुज़री है
कुछ दैर शोर मचाया है पत्तों ने
इतना अँधेरा और तन्हाई
दर्द की बांसुरी के सुराखों पर
रखी हो उँगलियाँ जैसे
कई ज़ख्मों के टाँके खुल गए हों
रात के चहरे पर दो ख़ाली आँखें
दीवार से फ़िसल कर गिरती है
बारिश थम गई है दरख़्त ऊँगने लगे
नींद बे आवाज़ आ कर कहती है
सोना नहीं है क्या ?

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