ग़ज़ल: (उपेन्द्र परवाज़)

उपेन्द्र परवाज़

आँख के मौसम जो बरसे, ज़िस्म पत्थर हो गये
अब के सावन बारिशों से, बादल ही तर हो गये |
इस कदर थे मोजज़े, अपने जुनूने इश्क के
क़त्ल करने के बाद, खुद घायल ही ख़ंजर हो गये |
उनके दिल के रास्तों में , इतनी थी दश्त-ए- बे-करां
मंजिलों से भटके तो, रस्ते ही रहबर हो गये |
ख़त्म है आँगन, झरोखों के लिबादे ही बचे
घर कभी जो थे वही अब, आज पिंजर हो गये |
इतनी दस्त-ए-तलब बाद, सनम तुझे अब क्या मिले
लग गयी उनको दुआएं, बंदा-परवर हो गये |
बनने चले थे “परवाज़”,तुम अमीरे-ए- कारवाँ
इस कदर भटके हो, खुद तुम आज बेघर हो गये |

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