आज ख़ास “माँ” को समर्पित डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा’ की एक ग़ज़ल

ग़ज़ल : (डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा’)

डा0 मोहसिन खान ‘तनहा’

जो बीज था आज वो शजर है।
ऐ माँ बस ये तेरा ही हुनर है।

तेरी रोनक तेरा ही है उजाला,
तू है तो ही ये मकान घर है।

मेहफ़ूज़ रहता हूँ हर जगह मैं,
ये तेरी दुआओं का असर है।

तेरे दामन में हैं लाखों सिफ़हतें,
दिल तेरा रहमत का समंदर है।

‘तन्हा’ पे रहे साया सदा माँ का,
ज़िंदगी का बड़ा लम्बा सफ़र है।

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