वर्तमान के सामाजिक, राजनैतिक तंग हालातों के बीच भविष्य के मानवीय खतरों को देखने का प्रयास करती सीमा आरिफ़की लेखकीय सामाजिक सरोकारी प्रतिबद्धता उनकी रचनाओं की तरह बेहद गहरी होती जान पड़ती है | इन गहराती आशंकाओं के बीच प्रेमारोहण, उस मानवीय स्पर्श सा जान पड़ता है जो घोर अन्धकार और हताशा के क्षणों में भी आदिम को एक नई उर्जा से लबरेज़ कर देता है | कुछ ऐसा ही कोलाज़ है इन कविताओं में ……संपादक 

ज़ुल्म के गलियारों में  

सीमा आरिफ

ज़ुल्म के गलियारों में अभी सन्नाटा है
यह पिछली हिंसा की
गुड़ा-भाग का विश्लेषण है
जीत की रकम का बंटवारा भी हो रहा होगा
तो जहाँ चूक हुई है
उस स्थिति पर गहरा चिन्तन भी होगा
ज़ुल्म के गलियारों में सब थक कर आराम
कर रहे हैं
यह पिछले दंगे के उपरांत का
वाख्फ़ा है,
वो जानते हैं अगले दंगे में
उन्हें ज़्यादा गालियाँ,गोलियाँ,गर्द,
गोश्त बहाना होगा,
इसलिए ज़ुल्म के गलियारों में अभी
सब शांत है,
हमें,इस देश को,आने वाली सुबह को
नए कैलेंडर की नई तारीखों के साथ
एक और दंगे का साक्षी बनना पड़ जाए
इसलिए इस सन्नाटे को ग़ौर से सुनो
क्या मालूम अगले दंगे का
वर्ष तिथि तुम्हारी गली
के नाम के पर होगा?

1 – एक सम्पूर्ण कविता

जी में आता है
जी में आता है रात भर तुम
पर लिखती रहूँ
तुम्हारी तारीफ़ में क़सीदे
गड़ती रहूँ
कभी लिखूँ तुम्हारी खुरदुरी
हथेलियों पर पूरा कलाम
कभी लिखूँ तुम्हारी पीठ
पर लकड़ी के उस क़लम से
जो रोशनाई से है लबरेज़
उससे गिरने को बेताब है शब्द
मेरे मस्तिष्क के ख़ामोश कोने में
कभी लिख डालूँ तुम पर
पूरा एक व्याख्यान
और रात भर जलती रहे
प्रेम की वो डिबिया
जिसकी रौशनी में
दिखाई देती है मुझे
एक सम्पूर्ण कविता तुम्हारे
शरीर लिपटी हुई।

2-

मैं तुमसे विपरीत भी हूँ
मैं ज़िद्दी हूँ
घुन्नी भी हूँ
अपने सपनों
से खेलती
भी हूँ
बोये है कुछ अरमान
मैंने अपने स्वयं के लहू से
आत्मविश्वास से अब
जिन्हें अब सीचती भी हूँ
मुंहफट,बातूनी भी हूँ
गु्स्सैल,बेपरवाह हूँ
क़दमों के निशान
खीचें है आस्मां
पर इस दुनिया के
वैज्ञानिक,विचारक भी हूँ
मैं वो सब हूँ जो तुम नहीं हो
हाँ इसलिए मैं तुमसे विपरीत भी हूँ!

3-

सन्नाटें
यह सन्नाटें
यह मीलों लम्बी
खाली टहलती रातें
स्ट्रीट लम्पों को
घूरते घंटा घर की दीवारों
पर चिपके वो यूनानी दवा
के इश्तिहार
यह दुकानों पर लिखे
विज्ञापनों के भरमार
सड़कों पर फैली उदासी
और उनमें लिपटे
पुराने अख़बार
यह स्याह उजालें
अलसाए वादें
अटक गए हैं
दुनिया के शोर में
आओ निकालो इन्हें बाहर
और बिछा दो इनको
वस्ताविकता के धरातल पर

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