शाकिर उर्फ़…… : कहानी (अनवर सुहैल)

शाकिर उर्फ़…… : कहानी (अनवर सुहैल)

‘राजू ने कहा – ”हम खुद अपने गांव में हर साल दुर्गा-पूजा में खुबसूरत ढंग से पंडाल सजाते हैं साब, भले से दाढ़ी-टोपी वाले गुस्सा करते हैं लेकिन कितना अच्छा लगता है कि लोग कितनी श्रद्धा से पूजा करते हैं और ... Read More...

लाईट हाउस सिनेमा: कहानी (शेखर मल्लिक)

पूंजीवादी सिद्धांतों के आधार पर विकास या सामाजिक बदलाव की प्रिक्रिया में हमेशा ही एक बड़े वर्ग की मूल आवश्यकताओं उसके सपने, आकांक्षा, बल्कि उसका सम्पूर्ण जीवन ही हाशिये का शिकार हुआ है | तकनीकी दृष्टि से सामाजिक... Read More...

मोटेराम जी शास्त्री: कहानी (प्रेमचंद)

भिषगाचार्य पण्डित मोटेराम जी शास्त्री की लखनऊ मे घूम मच गई। अलंकारों का ज्ञान तो उन्हे था ही, कुछ गा-बजा भी लेते थे। उस पर गुप्त रोगो के विशेषज्ञ, रसिको के भाग्य जागें। पण्डित जी उन्हें कवित सुनाते, हंसाते, और ... Read More...

फलितार्थ: कहानी (अवधेश प्रीत)

कथाकार ‘अवधेश प्रीत’ मानवीय जिंदगियों के साथ इंसानी जिजीविषा के संघर्षों से उत्पन्न छोटी से छोटी घटनाओं को ऐसे सहेजते हैं जैसे समय की गुल्लक मानवीय इतिहास समेत रही हो | कहानी के सहज कहन में इंसानी संघर्षो... Read More...

ठाकुर का कुआँ: कहानी (मुंशी प्रेमचंद)

मुंशी प्रेमचंद के लेखन काल को एक सदी से ज्यादा वक़्त हो गया | हमारी सभ्यता प्रेमचंद के तत्कालीन समय और समाज से सौ साल और आगे निकल आई | सामाजिक, सांस्कृतिक सभ्यताई विकास के इन वर्षों का एक बड़ा हिस्सा हमारी ... Read More...

मुहब्बत ही दीन-औ-ईमां मेरा: कहानी (शेखर मल्लिक)

“वसंत और तबस्सुम की अंतरजातीय शादी, इस औद्योगिक शहर के एक छोटे से हिस्से में, जहाँ ये लोग बसर कर रहे थे, एक किस्म के लोगों को पसंद नहीं आई थी… बल्कि नागवार दुस्सहासिकता लगी थी. मेरा पत्रकार मित्र विजय ब... Read More...

टुअर होते वक्त में: कहानी (सुभाष चन्द्र कुशवाहा)

समाज, स्थितियों, परिस्थितियों या राजनीति में समय के साथ क्या वाकई कुछ बदलाव हुआ …… या महज़ नाम और स्वरूप ही बदले यह तो देखना और सोचना हमें खुद को…….. | ‘कभी’ सामंती व्यवस्था ‘थी’ और आज……कॉर्पोरेट या कॉ... Read More...