तीसमार खाँ: कहानी (डा० विजय शर्मा)

“अरे भई औरतों को काबू में रखना जरूरी है। बड़े घर की बेटियाँ बड़ी मगरूर होती हैं, उन्हें ठीक करना जरूरी है।” उन्होंने स्त्री संबंधी अपने विचारों का खुलासा किया। मैं कुछ कहूँ उसके पहले उन्होंने कहा, “आप हमे ब... Read More...

जो है, उससे बेहतर चाहिए का नाम है ‘विकास’: संस्मरण (अनीश अंकुर)

भगत सिंह या सफ़दर हाशमी के जाने के बाद सांस्कृतिक या वैचारिक परिक्षेत्र या आन्दोलन रिक्त या विलुप्त हो गया ….या हो जाएगा यह मान लेना निश्चित ही भ्रामक है बल्कि सच तो यह है कि उनकी परम्परा के प्रतिबद्ध संवा... Read More...
(प्रेमचंद)

गोदान: उपन्यास, भाग 9 (प्रेमचंद)

प्रेमचंद गोदान: उपन्यास, भाग 9 पुर चलने लगा। धनिया को होरी ने न आने दिया। रूपा क्यारी बराती थी और सोना मोट ले रही थी। रूपा गीली मिट्टी के चूल्हे और बरतन बना रही थी, और सोना सशंक आँखों से सोनार... Read More...
अम्मी…: कहानी (अवधेश प्रीत)

अम्मी…: कहानी (अवधेश प्रीत)

“माँ” यकीनन “माँ” होती है हिन्दू या मुसलमान नहीं | यह बिडम्बना ही है कि वर्तमान अवसरवादी राजनीति और उसके प्रभाव से प्रभावित समाज द्वारा गढ़ी गई अवधारणाओं ने इंसान को इंसान के प्रति इतना शंकालू बना दिया है ... Read More...
सत्यनारायण पटेल

एक था चिका एक थी चिकी: कहानी (सत्यनारायण पटेल)

        सत्यनारायण पटेल एक था चिका एक थी चिकी आज रूपा का काम जल्दी समेटा गया। रोज़ रात ग्यारह के आसपास बिस्तर लगाती। आज खाना-बासन से क़रीब नौ बजे ही फारिग़ हो गयी।  बिस्तर पर बैठी और रिमोट से टी... Read More...
(प्रेमचंद)

गोदान : उपन्यास, भाग 10 (प्रेमचंद)

गोदान : उपन्यास, भाग 10 शाम को उसके पेट में दर्द होने लगा। समझ गई विपत्ति की घड़ी आ पहुँची। पेट को एक हाथ से पकड़े हुए पसीने से तर उसने चूल्हा जलाया, खिचड़ी डाली और दर्द से व्याकुल हो कर वहीं जमीन पर लेट रही। ... Read More...

भटकुंइयां इनार का खजाना: कहानी (सुभाष चन्द्र कुशवाह)

 हमारी वर्तमान सांकृतिकता की विरासतीय थाती लोक भाषा, बतकही, किस्से-कहानियाँ, मानवीय चेतना की विकास प्रक्रिया का पहला और महत्वपूर्ण पायदान रही है | लोक या दन्त कथाओं, किस्सों में उच्चरित वर्गीय चरित्र और स... Read More...
(प्रेमचंद)

गोदान : उपन्यास भाग 11, (प्रेम चंद)

प्रेमचंद गोदान : उपन्यास भाग 11 शाम को उसके पेट में दर्द होने लगा। समझ गई विपत्ति की घड़ी आ पहुँची। पेट को एक हाथ से पकड़े हुए पसीने से तर उसने चूल्हा जलाया, खिचड़ी डाली और दर्द से व्याकुल हो कर वहीं ... Read More...
‘हरिशंकर परसाई’ से एक पत्र व्यवहार: (संकलन से)

‘हरिशंकर परसाई’ से एक पत्र व्यवहार: (संकलन से)

(“हरिशंकर परसाई: – चर्चा ज़ारी है ….. ”  का दूसरा दिन ……..) २६ अगस्त,१९७३,  देशबन्धु,रायपुर, में प्रकाशित हुआ हरिशंकर परसाई के दोस्त  ‘मायाराम सुरजन’ का खुला पत्र | इसके प्रतिउत्तर में ‘हरिशंकर परसाई’ क... Read More...

गोदान : उपन्यास भाग 12, (प्रेमचंद)

प्रेमचंद गोदान : उपन्यास भाग 12 मेहता उसकी ओर भक्तिपूर्ण नेत्रों से ताक रहे थे, खन्ना सिर झुकाए इसे दैवी प्रेरणा समझने की चेष्टा कर रहे थे और मालती मन में लज्जित थी। गोविंदी के विचार इतने ऊँचे, उसका ह... Read More...