मैं भी आती हूं ….! : कहानी (हनीफ मदार)

वर्तमान समय की  उपभोगातावादी व्यवस्था के कारण  हरी भरी भूमि और  पेड़ों को काटकर ईट पत्थर की चन्द दीवारों द्वारा बने मकानों के दर्द को बयाँ करती है  हनीफ मदार की कहानी  ‘ मैं भी आती हूँ ….. ‘ जिसमें धर्म ... Read More...

पति भी मांग सकता है भरण-पोषण: आलेख (कुश कुमार)

आम तौर पर यह धारणा है कि पत्नी ही अपने भरण-पोषण की मांग कर सकती है | दरअसल यह धारणाएं सम्बन्धित और संदर्भित विषय के प्रति जानकारियों के अभाव की परिचायक ही होती हैं क्योंकि हमारे यहां की सामाजिक बुनावट और ... Read More...
यूनुस खान

उफ़ परसाई हाय परसाई: संस्मरण (यूनुस खान)

(“हरिशंकर परसाई: – चर्चा ज़ारी है …….” के आठवें दिन ……. यूनुस खान का आलेख ‘) हिम्‍मत नहीं थी कि आकाशवाणी की कैजुएली वाले उन दिनों में अपनी बेहद प्रिय ‘स्‍ट्रीट-कैट’ साइकिल को परसाई जी के घर की ओर मोड़ द... Read More...
बेटी नहीं है बोझ :आलेख (कुश कुमार)

बेटी नहीं है बोझ :आलेख (कुश कुमार)

लम्बे समय से सभ्य समाज, लैंगिक अनुपात में लगातार बढ़ रही असमानता को लेकर चिंता तो जताता रहा है बावजूद इसके कन्या भ्रूण हत्या वर्तमान समय का बहुत बड़ा संकट बन गया है। इस पर सामाजिक व् मानसिक जागरूक चर्चाएँ भ... Read More...
सुसाइड नोट: हाँ यह सच है, लोग गश खा कर गिर रहे हैं….(विनय सुल्तान)

सुसाइड नोट: हाँ यह सच है, लोग गश खा कर गिर रहे हैं….(विनय सुल्तान)

2-3 और 14-15 मार्च को हुई बेमौसमी बारिश और ओलावृष्टि के बाद देश-भर से किसानों की आत्महत्या की खबरें आने लगी. praxis के साथी पत्रकार विनय सुल्तान  ने तीन राज्यों की यात्रा कर खेती-किसानी के जमीनी हालात पर ... Read More...

पानीदार …, कहानी (मज़कूर आलम)

‘रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून’ क्या हुआ गर रहीम ने कहा था तो,  शहर कोई भी हो क्या फर्क पड़ता है, पानी की समस्या सभी जगह मूलभूत समस्या ही है, फिर चाहे इंसानी आँखों का पानी ही क्यों न हो ….. |  यह त्रास... Read More...
क्या मैं आदमी हूँ….? (अश्विनी ‘आश्विन’ की दो ग़ज़लें)

क्या मैं आदमी हूँ….? (अश्विनी ‘आश्विन’ की दो ग़ज़लें)

अश्विनी ‘आश्विन’ अश्विनी ‘आश्विन’ उन रचनाकारों में से है जिन्हें रचनाओं के रूप में खुद के प्रकाशित होने से कहीं ज्यादा रचनाधर्मिता का नशा रहता है | चुपके से कहीं कोने में बैठ कर समाज का जरूरी व... Read More...
गांव में हम कितनी हस्तियां छोड़ आये (दो ग़ज़ल: माहीमीत)

गांव में हम कितनी हस्तियां छोड़ आये (दो ग़ज़ल: माहीमीत)

महीमीत गांव में हम कितनी हस्तियां छोड़ आये गांव में हम कितनी हस्तियां छोड़ आये परिंदो संग हर मस्तियां छोड़ आये गांव में हम कितनी हस्तियां छोड़ आये यूं तो इक घर की दहलीज छोड़ी थी हमने लगता है... Read More...
सहमा शहर: ग़ज़लें (सतेन्द्र कुमार सादिल)

सहमा शहर: ग़ज़लें (सतेन्द्र कुमार सादिल)

फोटो -हनीफ मदार सतेन्द्र कुमार “सादिल” सतेन्द्र कुमार यूं तो भौतिकी के शोध छात्र हैं लेकिन खुशफहमी है कि वर्तमान में जहाँ युवाओं दृष्टि समाज सापेक्ष कम ही नज़र आती है ऐसे में भी सतेन्द्र की र... Read More...
सुसाइड नोट: ‘बस मरना ही हमारे हिस्से है..’ (विनय सुल्तान)

सुसाइड नोट: ‘बस मरना ही हमारे हिस्से है..’ (विनय सुल्तान)

कब्रगाह बनते खेतों से ‘विनय सुल्तान’ कि डायरी…. से ..तीसरी क़िस्त  “युद्ध का वर्णन सरल होता है. कुछ लोग युद्ध करते हैं. शेष उनका साथ देते हैं. कितना ही घमासान हो, महाकाव्य उसे शब्दों में बांध लेते हैं. पर... Read More...