सुसाइड नोट: ‘बस मरना ही हमारे हिस्से है..’ (विनय सुल्तान)

सुसाइड नोट: ‘बस मरना ही हमारे हिस्से है..’ (विनय सुल्तान)

कब्रगाह बनते खेतों से ‘विनय सुल्तान’ कि डायरी…. से ..तीसरी क़िस्त  “युद्ध का वर्णन सरल होता है. कुछ लोग युद्ध करते हैं. शेष उनका साथ देते हैं. कितना ही घमासान हो, महाकाव्य उसे शब्दों में बांध लेते हैं. पर... Read More...

सोच रहा हूँ!! नया वर्ष यह, कैसा होगा ? ग़ज़ल (अश्विनी आश्विन)

फोटो गूगल से साभार सोच रहा हूँ!! नया वर्ष यह, कैसा होगा ? सोच रहा हूँ!! नया वर्ष यह, कैसा होगा ? चिंतित हूँ!! क्या विगत वर्ष के जैसा होगा ?? विगत वर्ष का भी यूं ही सत्कार किया था । नूतन विध... Read More...
उनको अपने हुश्न पे है नाज़… ग़ज़ल (उपेन्द्र परवाज़)

उनको अपने हुश्न पे है नाज़… ग़ज़ल (उपेन्द्र परवाज़)

उपेन्द्र परवाज़ उपेन्द्र परवाज़ यूं तो भौतिकी में शोधरत छात्र हैं लेकिन शौकिया तौर पर आप ग़ज़ल लिखते हैं आपकी दो ग़ज़लें यहाँ आपके सम्मुख हैं | विधा के अग्रज साथी उपेन्द्र की इन रचनाओं पर अपनी कीमती ... Read More...
मेरा जूता है जापानी… (लघुकथा)

मेरा जूता है जापानी… (लघुकथा)

धर्मेन्द्र कृष्ण तिवारी धर्मेन्द्र कृष्ण तिवारी पेशे से भले ही पत्रकार हैं लेकिन उनकी सामाजिक और जनवादी सोच उन्हें बाजारवाद के दौर में प्रचलित पत्रकारिता की परिभाषा से अलग करती है | उनकी यह छोटी सी कहानी... Read More...
सहमा शहर: ग़ज़लें (सतेन्द्र कुमार सादिल)

गज़ल: सत्येन्द्र कुमार “सादिल”

सतेन्द्र कुमार “सादिल” गज़ल  कुछ भी नहीं, मैं माँ के चरागों का ख़्वाब हूँ एक दास्तां, कहानी, एक खुली किताब हूँ ख़ुशबू लुटाने की मैं, ख्वाईश लिए हुए काँटों की परवरिश में, खिलता गुलाब हूँ अब तक... Read More...
राहुल गुप्ता की दो ग़ज़लें

राहुल गुप्ता की दो ग़ज़लें

राहुल गुप्ता 1 – ग़ज़ल  कब सुबह होगी, कब निजाम बदलेगा ? इंतहा बदलेगी या अवाम बदलेगा ? भूख, मुफलिसी, ज़ुल्म और बेरोज़गारी, बता ! कैसे ये चहरे तमाम बदलेगा ? सुना है तेरे यार तेरी तरह ही नंगे है... Read More...
लकी सिंह ‘बल’ की लघुकथाएं

लकी सिंह ‘बल’ की लघुकथाएं

लकी सिंह ‘बल’ की छोटी कहानियां बड़ी बात कहती हैं जो उन्हें लघुकथा के उभरते हस्ताक्षर के रूप में एक संभावनाशील लेखक होने का परिचय देतीं हैं | इनकी कलम और धारदार रूप में चलत... Read More...
ग़ज़ल : (डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा’)

मोहसिन ‘तनहा’ की गज़लें

डा0 मोहसिन खान ‘तनहा’ 1- कितनी होशियारी की होशियारों ने। पहनली है खाल शेर की सियारों ने। रोज़ ही चौराहे पर बिक जाता हूँ मैं, तरह-तरह से लूटा मुझे ख़रीदारों ने। बनाया था मंसूबा जहाँ पर ... Read More...

ऐसा क्यों है ?: ग़ज़ल (अश्विनी आश्विन)

अश्विनी आश्विन 1- ऐसा क्यों है ? इस दुनिया में ऐसा क्यों है ? जीवन इतना सस्ता क्यों है?? सब अपनी दुनिया में ग़ुम हैं, सब की हसरत, पैसा क्यों है?? बेशक, भीड़ भरी है दुनिया, इन्सां मगर अकेला ... Read More...

कोख : कहानी (नमिता सिंह)

आदिकाल से आज तक समाज में स्त्रियों की दशाओं में कितना अंतर आ सका है | स्त्री स्वतंत्रता से जुड़े पहलू ख़ासकर आज़ादी, विचार, दृष्टि, इच्छा, अनिच्छा और आत्मसम्मान जैसे पहलू अनसुलझे सवालों कि तरह मौजूद हैं | इन... Read More...