humrang

नहीं टूटेगा आपका भरोसा….: संपादकीय (हनीफ मदार)

नहीं टूटेगा आपका भरोसा....  हनीफ मदार किसी भी लेखक की पूँजी उसका रचनाकर्म होता है | अपनी रचनाओं को संजोने के लिए लेखक अपनी जिंदगी के उन क्षणों को अपने लेखन के लिए आहूत करता है जो आम तौर पर अपने निजत्व या अपन... Read More...

बसेरे से दूर: विजन, शिल्प एवं भाषा: आलेख (नितिका गुप्ता)

"डाॅ. हरिवंशराय ने अपनी आत्मकथा का तीसरा खंड ‘बसेरे से दूर‘ 1971 से 1977 के दौरान लिखा। इस खंड में उनके इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विभाग में अध्यापक होने, देश-परिवार से दूर जाकर ईट्स के साहित्य पर शोध ... Read More...

मैं नमाज़ नहीं पढ़ूँगा: कविता (क़ैस जौनपुरी)

भूख, मुफलिसी, वेवशी जैसे शब्दों से गुजरना और यथार्थ रूप में इन परिस्थितियों से गुजरने में एक बड़ा फासला है जिसे शायद असंख्य किताबों से गुज़र कर भी धरातलीय रूप में महसूस करपाना आसान नहीं है | मानव जीवन की इन दारुण... Read More...

दिल के खोह से बाहर आओ प्रेम: कवितायेँ (निवेदिता)

'क्या जुल्मतों के दौर में भी गीत गाये जायेंगे....... हाँ जुल्मतों के दौर में ही गीत गाये जायेंगे' ..... प्रेम गीत, जिसका हर शब्द इंसानियत के भीतर संवेदना बनकर स्पंदन करने की क्षमता रखता हो | यूं तो निवेदिता की ... Read More...

महिला लेखन की वर्तमान पीढ़ी: स्त्री लेखन, एक पुनर्पाठ: समीक्षालेख (संजीव चंदन)

हिंदी की पांच महिला रचनाकारों की कहानियों को पढ़ना और उनके आधार पर युवा पीढ़ी के लेखन के केंद्रीय स्वर और सरोकार को समझना   एक तुलनात्मक आधारभूमि पर सम्भव हो सका है और सुकूनदाई  भी है कि हिंदी की रचनाकार 'स्त्रीव... Read More...

एक ‘मलाल’ यह भी: आलेख (सौरभ शेखर)

"आखिर आत्म-कथाओं में ऐसा क्या होता है कि वे साहित्य ही नहीं साहित्येतर पाठकों को भी आकर्षित करती हैं. क्या दूसरों की ज़ाती ज़िन्दगी में ताक-झाँक और उससे उत्पन्न ‘विकेरिअस प्लेज़र’ इस आकर्षण के मूल में होता है? या ... Read More...

आवारा भीड़ के खतरे: व्यंग्य (हरिशंकर परसाई)

युवक साधारण कुरता पाजामा पहिने था। चेहरा बुझा था जिसकी राख में चिंगारी निकली थी पत्थर फेंकते वक्त। शिक्षित था। बेकार था। नौकरी के लिए भटकता रहा था। धंधा कोई नहीं। घर की हालत खराब। घर में अपमान, बाहर अवहेलना। वह... Read More...

समय के झरोखे से हरिशंकर परसाई… आलेख

हरिशंकर परसाई केवल लेखक कभी नहीं रहे. वे लेखक के साथ-साथ एक्टिविस्ट भी थे. उनका समूचा जीवन आन्दोलनों और यूनियनों से जुड़ा रहा. आन्दोलन छात्रों के, श्रमिकों के, शिक्षकों के, लेखकों के भी. वे लेखक के रूप में अपनी... Read More...

दो नाक वाले लोग: व्यंग्य (हरिशंकर परसाई)

"कुछ नाकें गुलाब के पौधे की तरह होती हैं। कलम कर दो तो और अच्छी शाखा बढ़ती है और फूल भी बढ़िया लगते हैं। मैंने ऐसी फूलवाली खुशबूदार नाकें बहुत देखीं हैं। जब खुशबू कम होने लगती है, ये फिर कलम करा लेते हैं, जैसे ... Read More...

किसने बिगाड़ा मुझे: आत्मकथ्य (प्रो० विजय शर्मा)

यूं तो इंसानी व्यक्तित्व के बनने बिगड़ने में हमारे सामाजिक परिवेश की बड़ी भूमिका होती है किन्तु इस बिगड़ने "इंसान बनने" के लिए सामाजिक असमानताओं और विषमताओं के खिलाफ मन में उठते सवालों को न मार कर उनके जबाव खोजने ... Read More...