नज़ीर अकबराबादी के काव्य में चित्रित मानव-समाज: शोध आलेख (सालिम मियां)

"जनसामान्य से जुडे़ होने के कारण नज़ीर ने आर्थिक विपन्नता से ग्रस्त एवं अभिशप्त लोगों की आह और कराह को किसी चैतन्य पुरूष के समान सुना और इसके कठोर आघात को आत्मिक धरातल पर अनुभव किया और उन इंसानी कराह को  ‘रोटिया... Read More...

मानसून सत्र की गलबहियां : व्यंग्य (एम्0 एम्0 चंद्रा)

व्यंग्य, वर्तमान राजनैतिक और सामाजिक स्थितियों पर रचनात्मक तरीके से बात करने का एक बेहतर माद्ध्य्म है .... और यदि व्यंग्य रचना एकदम ताज़ा हो तो रचनात्मक उर्जा पाठक को निश्चित ही आन्नदित करती है ऐसी ही ताजगी से ल... Read More...

मोटेमाल की महिमा: व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

दिनों बहुत उत्साह से लोगों से ‘हाथ धुलवाने’ के प्रयास हो रहे हैं, जब तब किन्ही हाथों से गुलाबी रंग जरूर झरने लगता है मगर यह विकास का समय है. कोयला भी केवल कोयला नहीं रहा, कोयला बहुरूपिया हो गया है. वह हीरा हो स... Read More...

जिस्म की गिरफ़्त : कवितायें (डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा’)

सामाजिक बुनावट से त्रिस्कृत  और अछूत जिन्दगी के मानवीय पहलुओं को रेखांकित करती, कथित सभ्य समाज को खुद का विद्रूप चेहरा दिखाती एवं वर्तमान व्यवस्थाओं पर प्रश्न चिन्ह खडा करती डॉ मोहसिन खान की बेहतरीन कवितायें ..... Read More...

नवउदारवादी भूमण्‍डलीकरण के दौर में मज़दूर संगठन के नये रूप: (प्रो. इमैनुएल नेस )

लखनऊ, 19 जुलाई। यूपी प्रेस क्‍लब में प्रो. एमैनुएल नेस ने 'नवउदारवादी भूमण्‍डलीकरण के दौर में मज़दूर वर्ग के संगठन के नये रूप' विषय पर एक व्‍याख्‍यान दिया। यह कार्यक्रम अरविन्‍द मार्क्‍सवादी अध्‍ययन संस्‍थान द्व... Read More...

विभिन्न सुर-ताल से सजी कविताएं: रिपोर्ट (सुमन कुमारी)

‘ताजमहल’ कविता में मजदूरों के दर्द, पीड़ा और उनकी दुर्दशा पर मुख्य रूप से बात की गई है। लोक प्रचलित धारणा से हटकर कवयित्राी यहां अपने दृष्टिकोण को विस्तार देती है। काव्य-गोष्ठी के तीसरे कवि रमेश प्रजापति रहे। जि... Read More...

चाँद के टुकड़े : कवितायें (ब्रजेश कानूनगो)

अगर जीवन में प्रेम न हो तो जिन्दगी बेज़ार हो जाती है | संसार की उत्पत्ति ही प्रेम की धुरी पर टिकी है | प्रेम के उसी  स्पंदन की खूबसूरत अनुभूति को सहज ही अनुभव कराती हैं  ब्रजेश कानूनगो की कवितायें ..... संपादक  ... Read More...

हिमखंड के बाशिंदे: कहानी (गीताश्री)

सामाजिक, राजनैतिक बदलावों के साथ उद्घाटित होते वर्तमान के ताने बाने में उलझी इंसानी जिंदगी, मानो मकड़ी के जाले में फंसी हुई मक्खी | सतही तौर पर हँसते, गाते, मुस्कराते चेहरे जरूर हैं किन्तु मानव मन का सच क्या यही... Read More...

चुप रहना कविता का धर्मः डॉ0 रामवचन राय

 साहित्यिक गतिविधियों के अंतर्गत पटना से 'प्रभात सरसिज' के काव्य संग्रह ‘लोकराग‘ के लोकार्पण पर 'अरुण नारायण' की रिपोर्ट ......| चुप रहना कविता का धर्मः डॉ0 रामवचन राय  अरुण नारायण 'प्रभात सरसिज' के काव्य... Read More...

टोबा टेक सिंह: ऑडियो कहानी (आवाज़ ‘यूनुस खान’)

हर वक़्त में बेहद प्रासंगिक नज़र आती भारत विभाजन पर मानवीय त्रासदी की संवेदनशील दास्तान सी  'सआदत यूनुस खान हसन मंटो' की कहानी 'टोबा टेक सिंह' को आज सुनते हैं हमरंग पर रेडियो जौकी 'यूनुस खान' की आवाज़ में .... Read More...