“थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” मानवता की कलात्मक हुंकार!

थिएटर करने के लिए व्यवसायिकता के नाम पर बड़े बड़े औपनिवेशिक संसाधनों या रंग ग्रहों की ज़रूरत नहीं है.थिएटर की बुनियादी ज़रूरत है एक परफ़ॉर्मर और एक दर्शक यहीं हमारी मौलिक और आधारभूत ज़रूरत है. “थिएटर ऑफ़ रेलेवंस”रंग स... Read More...

तारीख के जंगलों से निकलतीं यादें: संस्मरण (निवेदिता)

“बराबरी, समानता और वैचारिक आजादी के पक्ष में काम करने वाले संगठनों की पहली चुनौती थी, अपने भीतर बदलाव लाना। वे खुद अभी इसके लिए तैयार नहीं थे। स्त्री-पुरुषों के संबंधों को लेकर हमारा नजरिया तंग था। साथियों के भ... Read More...

यह बेशर्म हमला हमारी सांस्कृतिक विरासत पर हमला है:

यह बेशर्म हमला हमारी सांस्कृतिक विरासत पर हमला है:   हम इलाहाबाद के नागरिक, लेखक, संस्कृतिकर्मी पिछले दिनों इंदौर में इप्टा के राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान हुए हमले की खबर से क्षुब्ध हैं। दक्षिणपंथियों द्वारा सं... Read More...
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बदचलन, व्यंग्य (हरिशंकर परसाई)

(“हरिशंकर परसाई: – चर्चा ज़ारी है …….” के अंतिम और परसाई के जन्म दिवस पर ……. उनकी की व्यंग्य रचना ‘बदचलन’) डिप्टी साहब को मालूम था कि मेरे बारे में खबर इधर पहुँच चुकी है। वे यह भी जानते थे कि यहाँ सब लोग मुझसे ... Read More...

तारीख पे तारीख…., कविता (तरसेम कौर)

देश के किसी भी नागरिक को समय पर न्याय न मिल पाना भी हमारे सरकारी तंत्र और लचर क़ानून व्यवस्था की पोल तो खोलता ही है, साथ में यह भी दर्शाता है कि  सदियों बीत जाती है पर बेबस और लाचार लोगों को इन्साफ नहीं मिल पाता... Read More...

शाह की कंजरी, कहानी (अमृता प्रीतम)

अमृता प्रीतम के जन्मदिवस ...... आइये पढ़ते है उनकी  कहानी 'शाह की कंजरी'......  शाह की कंजरी  अमृता प्रीतम उसे अब नीलम कोई नहीं कहता था। सब शाह की कंजरी कहते थे। नीलम को लाहौर हीरामंडी के एक चौबारे में जवान... Read More...

‘जपते रहो’ कविता (अनुपम त्रिपाठी)

युवा छात्र, संस्कृत कर्मियों की बनती यह सामाजिक दृष्टि अपने दौर की एक सुखद छाँव की अनिभूति से भर देती है, कुछ यही एहसास कराती हिन्दू कॉलेज में बी.ए.(आनर्स) सैकंड इयर के छात्र ‘अनुपम त्रिपाठी’ की यह कविता …..| –... Read More...

ओह दाना मांझी तुम भी न, एवं अन्य कवितायें (अशोक कुमार)

कम शब्दों में बड़ी बात कहने का सामर्थ्य रखती है कविता | जैसे मिर्ची का एक बीज जो झनझना सकता है दिमाग तक | शब्दों की घनी बुनावट के बिना भी जिंदगी के गहरे रंगों कुछ इसी अंदाज़ के साथ उकेरतीं 'अशोक कुमार' की कविताये... Read More...