परिवर्तनगामी चेतना की संवाहक प्रस्तुति… नाट्य समीक्षा (हनीफ मदार)

 ‘आशिया मदार’ के निर्देशन में भारतेंदु नाट्य अकादमी द्वारा पच्चीस दिवसीय  नाट्य कार्यशाला में ‘राजेश कुमार’ द्वारा लिखत नाटक ‘सपने हर किसी को नहीं आते’ का मंचन 16 दिसम्बर को एच पी एस सभागार में किया गया | इस प्... Read More...

डॉ. जितेंद्र रघुवंशी के ६६वें जन्मदिन पर, ‘कन्यादान’: रिपोर्ट (धीरज मिश्रा)

डॉ. जितेंद्र रघुवंशी के ६६वें जन्मदिन पर समर्पित मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय के सहायोग से रंगलोक सांस्कृतिक संस्थान कीनाट्य प्रस्तुति कन्यादान   धीरज मिश्रा दो माह के अथक परिश्रम के बाद विजय तेंदुलकर कृत नाट... Read More...

‘द वीमेन ऑफ़ क्वेश्चनेबल कैरेक्टर’ “पिंक”: लेख संवाद (अभिषेक प्रकाश)

“हमारे यहां तो लडकियों को जोर से हंसने व छींकने पर भी सोचना पड़ता है। शालीनता का अपना एक सामाजिक पैमाना है। लेकिन अच्छी बात है कि स्त्री विमर्श हमारे घरों के दरवाजों पर दस्तक देने लगा है। पहले सुना करता था जब बज... Read More...

पोखर से नदी बनने की यात्रा है …..’पार्च्ड’: (अनीता मिश्रा)

मेरे पीछे बैठे दो लड़कों में से किसी की आवाज आयी ‘बहुत सही’ । शायद उसके हिसाब जो औरत जो पति की मार का विरोध कर रही है मार खाने लायक है । परदे पर एक सामंती चरित्र का साथ देता वो आदमी जो हाल में मौजूद था ‘बहुत सही... Read More...

त्रिशंकु पर दातादीन : आलेख (कमलेश पाण्डेय)

(“हरिशंकर परसाई: – चर्चा ज़ारी है ……. ” का चौथा दिन ……… ‘कमलेश पाण्डेय’ का आलेख ) त्रिशंकु अधुनातन और पुरातन के क्षितिजों के बीच लटका एक सुन्दर-सा ग्रह है. गणतंत्र को उसके आदर्शतम स्वरूप में कायम रखने की कवायद ... Read More...

हिंदी व्यंग्य की धर्मिक पुस्तक- परसाई: आलेख (प्रेम जनमेजय)

(“हरिशंकर परसाई: – चर्चा ज़ारी है ….. ”  का तीसरा दिन ……..’प्रेम जनमेजय’ का आलेख ) हिंदी व्यंग्य साहित्य में यह निरंतर होता आया है और हो रहा है कि हास्य-व्यंग्य को एक हाईफन से जोड़ देने के कारण उसे भाई-बहन सा मा... Read More...
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क्या समय है…? परसाई के पुनर्मुल्यांकन का : आलेख (एम्0 एम्0 चंद्रा)

(“हरिशंकर परसाई:–चर्चा ज़ारी है……” के अंतिम और परसाई के जन्म दिन पर…….‘एम० एम० चंद्रा’  का आलेख’) “इस बात को हम अच्छी तरह से जानते है की परसाई अपने युगबोध को साथ लेकर चल रहे थे. जब हम परसाई का मूल्यांकन करेंगे ... Read More...

समलैंगिकः ‘मैं भी हूँ’ : आलेख (अमिता महरौलिया)

साहित्य भी समलैंगिक संबंधो से अछूता नहीं। सर्वप्रथम इस्मत चुगतई ने 1941 में अपनी कहानी ‘लिहाफ’ में समलैंगिकता को रूपांतरित किया था जिसके कारण चुगतई को समाज तथा कई संस्थाओ की आलोचना का शिकार होना पड़ा था। इसके त... Read More...
मुआवज़ा: कहानी (फरीदा ज़माल)

क्यों अखरती हैं मुखर स्त्रियाँ…: आलेख (अनीता मिश्रा)

“शायद दुनिया में अधिकतर जगह ऐसा है कि ज्यादा तर्क – वितर्क करती स्त्री को उस तरह से सम्मान नहीं मिल पाता है जिस तरह पुरुष को मिलता है । ऐसा करने वाला पुरुष जहाँ सबकी नज़रों में महान बन जाता है ,बुद्धिमान समझा जा... Read More...