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‘हमरंग’ की निरंतरता आश्वस्त करती है ! (प्रो0 विजय शर्मा)

हमरंग का एक वर्ष पूरा होने पर देश भर के कई लेखकों से ‘हमरंग’ का साहित्यिक, वैचारिक मूल्यांकन करती टिपण्णी (लेख) हमें प्राप्त हुए हैं जो बिना किसी काट-छांट के, हर चौथे या पांचवें दिन प्रकाशित होंगे | हमारे इस प्... Read More...
मैं पीछे क्यों रहूँ

प्रेम-गली अति सांकरी…: संपादकीय (अनीता चौधरी)

प्रेम-गली अति सांकरी... बसंत और मधुमास से गुज़रते हुए दृष्टि, वर्तमान समय में राजनैतिक इच्छाशक्ति के चलते पूरे सामाजिक परिवेश में एक ख़ास तरह के बदलाव पर आकर ठहर जाती है | ऐसा महसूस होने लगा है कि चारों तरफ अतार... Read More...
(हनीफ मदार)

पुस्तक मेले से लौटकर…: संपादकीय (हनीफ मदार)

पुस्तक मेले से लौटकर...  हनीफ मदार एक दिन कटता है तो लगता है एक साल कट गया | भले ही यह एक किम्बदंती ही सही लेकिन वर्तमान में सच साबित हो रही है | आधुनिकता के साथ समय जिस तेज गति से आगे बढ़ रहा है उस गति से आध... Read More...
(हनीफ मदार)

ऐसे में लेखक बेचारा करे भी क्या…?: संपादकीय (हनीफ मदार)

ऐसे में लेखक बेचारा करे भी क्या...?  हनीफ मदार इधर हम छियासठवें गणतंत्र में प्रवेश कर रहे हैं | अंकों के लिहाज़ से इस गणतंत्र वर्ष के शुरूआत 1 जनवरी २०१६ से पूरे हफ्ते हमरंग पर एक भी पोस्ट या रचना प्रकाशित नह... Read More...

‘कल्चर ऑफ साइलेंस’: संपादकीय (मज्कूर आलम)

‘कल्चर ऑफ साइलेंस’  मज्कूर आलम तमाम हंगामों और तमाशों के बीच साल 2015 समाप्त हो गया। इस बीच साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक सारोकार की पैरोकारी के लिए बना वेबपोर्टल 'हमरंग डॉट कॉम' ने भी पिछले ही महीने अपना एक ... Read More...
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365 दिन के सफ़र में “हमरंग”: संपादकीय (हनीफ मदार)

365 दिन के सफ़र में “हमरंग”  हनीफ मदार साथियो जहाँ समय का अपनी गति से चलते रहना प्राकृतिक है, वहीँ वक्ती तौर पर चलते हुए अपने निशान छोड़ना इंसानी जूनून है | वक़्त के उन्हीं पदचापों के अनेक खट्टे-मीठे, अहसासों ... Read More...

मउगा: कहानी (कमलेश)

हमारी परम्पराएं जाती धर्म ताकत सभी एक साथ प्यार पर पैहरा बैठाने के या प्यार का गला घोंट देने की कोशिश में इंसानों का ही खून बहाते रहे हैं | प्यार तो इंसानी रूह और आस्था के भगवान की तरह जाति, धर्म, परम्परा और तम... Read More...

ना काहू से दोस्ती न काहू से बैर: व्यंग्य (आरिफा एविस)

नेताजी: "बिना समर्थन के आपको जल, जंगल और जमीन का पुश्तैनी हक़ कैसे मिल सकता है? जब सीधी ऊँगली से घी नहीं निकलता तो ऊँगली टेढ़ी करनी ही पड़ती है फिर तुम्हें तो घी से मतलब है.आम खाओ गुठलियों को मत गिनों. सरकार आये य... Read More...

नवें दसकोत्तर हिंदी उपन्यास और भूमंडलीकरण: आलेख (अनीश कुमार)

सांस्कृतिक तर्क के सहारे पूंजीवाद के साम्राज्यवाद का उत्कर्ष ही भूमंडलीकरण है। भारत में भूमंडलीकरण की शुरुआत नब्बे (1990) के दशक से होती है। इस भूमंडलीकरण के दौर में सबसे ज्यादा कोई परास्त और निराश हुआ हो तो वे... Read More...

ख़तरे में इस्लाम नहीं: एवं अन्य, ‘हबीब ज़ालिब’ की ग़ज़लें

सदियों के रूप में गुजरते समय और देशों के रूप में धरती के हर हिस्से याने दुनिया भर में लेखकों कलाकारों ने सच बयानी की कीमत न केवल शारीरिक, मानसिक संत्रास झेलकर बल्कि अपनी जान देकर भी चुकाई है .... इनकी गवाहियों ... Read More...