स्त्री आंदोलन-इतिहास और वर्तमान: आलेख (डॉ0 नमिता सिंह)

"आदिम समाज से लेकर कबीले या गण समूहों में मातृसत्तात्मक समाज ही था और वंश अथवा संतान की पहचान माता के रूप में होती थी। आदिम समाज के स्वच्छंद यौन संबंध हों या सामाजिक विकास का यह कबीलाई रूप हो जहां एक गण के पुरु... Read More...

माप: कहानी (सृंजय )

"...यह सरकारी नौकरी पाने के पहले मैं प्राइवेट गाड़ी चलाया करता था. एक प्रोफेसर कुमार थे, उनकी गाड़ी. उन्होंने ही बताया था कि उनके गांव तेघरा के चौधरी का दामाद पहली बार ससुराल आया"- रिवाज है कि शादी के बाद दामाद... Read More...

समय के साथ संवाद करतीं ‘भीष्म साहनी’ की कहानी: आलेख (अनीश कुमार)

मानवीय संवेदनाओं और मानव मूल्यों के निरतंर क्षरण होते समय में सामाजिक दृष्टि से मानवीय धरातल से जुड़े साहित्यकारों का स्मरण हो आना सहज और स्वाभाविक ही है | वस्तुतः इनकी कहानियों और उपन्यासों से गुज़रते हुए वर्तमा... Read More...

अनुप्राणित: कहानी (हनीफ मदार)

प्रेम एक खूबसूरत इंसानीय व मानवीय जीवन्तता का एहसास है  जो किसी भी जाति, धर्म, सम्प्रदाय से बढ़कर होता है जिस पर किसी भी तरह की बंदिशे नहीं लगाई जा सकती क्योंकि  बिना प्रेम के मानव जीवन संभव नहीं होता | प्रेम से... Read More...

क़ातिल जब मसीहा है: एवं अन्य कवितायेँ

जिंदगी के कई जीवंत पहलुओं से सीधे रूबरू करातीं 'शहनाज़ इमरानी' की कविताएँ ..... क़ातिल जब मसीहा है  शहनाज़ इमरानी सिर्फ़ लात ही तो मारी है भूखा ही तो रखना चाहते हैं वो तुम्हें नादान हो तुम भीख मांगते हो तु... Read More...

किसी ईश्वर की तरह नहीं: एवं अन्य कवितायेँ (विमलेश त्रिपाठी)

मानवीय प्रेम को रचनात्मक अभिव्यक्ति प्रदान करतीं 'विमलेश त्रिपाठी' की तीं कविताएँ ..... किसी ईश्वर की तरह नहीं  विमलेश त्रिपाठी मेरी देह में सूरज की पहली किरणों का ताप भरो थोड़ा शाम का अंधेरा रात का डर ... Read More...

भगत सिंह से एक मुलाकात: आलेख (स्व० डा० कुंवरपाल सिंह)

कितने शर्म की बात है, देश के 30 करोड़ लोग आधे पेट सोते हैं। कैसी विडंबना है-दुनिया के 20 अमीर लोगों में तीन हिन्दुस्तानी हैं और दूसरी ओर योरोप के कई देशों की कुल आबादी से अधिक लेाग देश में ग़रीबी की रेखा से नीच... Read More...

मीठा कुनैन नहीं स्त्री विमर्श: आलेख (ज्योति कुमारी)

‘‘पुरुष भी विचित्र है। वह अपने छोटे से सुख के लिए स्त्री को बड़ा से बड़ा दुख दे डालता है और ऐसी निश्चिंतता से, मानो वह स्त्री को उसका प्राप्य ही दे रहा है। सभी कर्तव्यों को वह चीनी से ढकी कुनैन के समान मीठे-मीठे ... Read More...

तीन शब्द-चित्र : प्रतिभा

(किसी  लेखक  की भाषा जब भावनाओं को आकार देने लगे और पाठक से संवाद  का  रिश्ता कायम कर ले तब  उस लेखक को और-और लिखना चाहिए...क्योंकि भाषा अपनी ताकत के साथ अभिव्यक्ति को एक नया आयाम देती है. प्रतिभा का लेखन ऐसा ह... Read More...

नई सांस्कृतिक पहल, मनोवेद फिल्म फेस्टिवल: रिपोर्ट

इस नई पहल का उद्देश्य फिल्मों के भीड़ में से सार्थक, सोद्देश्य एवं प्रश्नाकुल करती फिल्मों को आमजन तक पहुँचाना है. वैसी अंतर्राष्ट्रीय एवं भारतीय फिल्मों को प्रदर्शित करने की कोशिश होगी जो भौगौलिक एवं भाषाई कारण... Read More...