आखिर क्या लिखूं…..?: संपादकीय (हनीफ मदार)

आखिर क्या लिखूं.....?  हनीफ मदार कितना तकलीफ़देह होता है उस स्वीकारोक्ति से खुद का साक्षात्कार, जहाँ आपको एहसास हो कि जिस चीज़ की प्राप्ति या तलाश में आप अपना पूरा जीवन और सम्पूर्ण व्यक्तित्व दाँव पर लगाए रहे,... Read More...

ग्लोबल युग का क्रिकेटीय राष्ट्रवाद: संपादकीय (मज्कूर आलम)

ग्लोबल युग का क्रिकेटीय राष्ट्रवाद  मज्कूर आलम हम देशवासियों की तमाम शुभकामनाओं के बावजूद भी भारत टी-20 विश्वकप से बाहर हो गया । हालांकि क्वार्टर फाइनल बन गए आस्ट्रेलिया के साथ हुए कठिन मुकाबले में उसे हरा क... Read More...

डा0 भीमराव अम्बेडकर को पढने की जरूरत है: संपादकीय (हनीफ मदार)

डा0 भीमराव अम्बेडकर को पढने की जरूरत है   हनीफ मदार दलित चिंतन के बिना साहित्य या समाज को पूर्णता न मिल पाना एक व्यावहारिक यथार्थ है कि बिना दलित समाज या उस वर्ग पर बात किये हम अपने समय समाज को गति प्रदान नह... Read More...
(हनीफ मदार)

मई दिवस एक ऑपचारिक चिंतन…!: संपादकीय (हनीफ मदार)

मई दिवस एक ऑपचारिक चिंतन...!   हनीफ मदार कॉल सेंटर, माल्स, प्राइवेट बैंक, प्रिंट या इलैक्ट्रोनिक मीडिया जैसी आदि अन्य निज़ी कम्पनियों, में नौकरी करने वाले लोगों के पास समय नहीं है | मित्रों, रिश्तेदारों, पत्न... Read More...
(हनीफ मदार)

पीछे जाते समय में…. भीष्म साहनी: संपादकीय (हनीफ मदार)

आज यूं अचानक 'भीष्म सहनी' की याद आ जाने के पीछे 'अनहद' के संपादक 'संतोष कुमार चतुर्वेदी' का कुछ महीने पूर्व का आग्रह रहा है ज़ाहिर है यह आलेख विस्तृत रूप से 'अनहद' के ताज़ा अंक फरवरी २०१६ में प्रकाशित हुआ है | तब... Read More...
मैं पीछे क्यों रहूँ

महावारी या महामारी: संपादकीय (अनीता चौधरी)

एक बात जो मुझे बचपन से लेकर आज तक मेरे ही घर में चुभती रही है, जब भी मुझे मासिक धर्म शुरू होता है मेरी माँ मुझे अपने पूजा वाले कमरे में नहीं जाने देती हैं। मुझे बहुत खराब लगता है । मैंने उन्हें बहुत समझाने की क... Read More...

प्रेम, एवं अन्य कवितायें (सुरेन्द्र रघुवंशी)

सामाजिक, राजनैतिक संकीर्णताओं के खतरनाक थपेड़ों से सदियों से जूझती आती प्रेम की अविरल धार को परिभाषित करते हुए उस सामाज के जटिल ताने-बाने में दूध और पानी की तरह घुल रहे बाज़ारी और राजनैतिक दुष्प्रभाव के बीच वर्तम... Read More...

स्‍त्री मन के सूक्ष्म मनोभावों को परत दर परत खोलतीं कहानियां : अमृता ठाकुर

पंखुरी की कहानियां स्त्री विमर्श का हिस्सा हैं, इस बयान को हालांकि खारिज नहीं किया जा सकता, क्यों कि वे स्‍त्री मन के अत्यंत सूक्ष्म मनोभावों को परत दर परत खोलती चली जाती हैं। उनके मनोभावों में  कहीं कोई जटिलता... Read More...

राजनीतिक मुखौटों का दस्तावेज: फिल्म गुलाल

गुलाल में नयी सदी के युवा आंदोलनों को समझने की एक पहल हुई है। फिल्म को देखते वक़्त विश्वविद्यालयों का चुनावी माहौल की फिजाएं याद आती हैं। रैगिंग के भय से नए विद्यार्थियों का नामर्दगी की हद तक सीनिअर्स की हुक्मप... Read More...

बे-सिर-पैर की बातें : कवितायें (सौरभ शेखर)

सौरभ शेखर की कवितायें समाज के वह प्रतिबिम्ब हैं जो समय के साथ चलते हुए अक्सर ही छोटी-बड़ी घटना, विचार और व्यक्तित्व के रूप में सामने आते हैं इन विभिन्न सामाजिक पहलुओं को शब्द और अभिव्यक्ति में पिरोने का कौशल आपक... Read More...