कविता में मानसिक अपंगता का अंत है-लोकराग: समीक्षा

कविता में मानसिक अपंगता का अंत है-लोकराग  -: श्रीराम तिवारी :- जीवन के अंत में ही मुक्तिबोध का एक ढ़ीला-ढ़ाला कविता-संग्रह आया। उनकी एक कविता को पाठ्यक्रम से हटाया गया। मेरे खुद का एकांकी एकत्र संग्रह 78वें वर्... Read More...

घर वापसी : एवं अन्य कवितायेँ

ये कवितायें एक तरफ जीवन से रूप,रंग गंध लेती हैं तो दूसरी तरफ समाज की नब्ज़ पर भी हाथ रखती हैं। पितृसत्ता के आवरण में चलने वाले शोषण और फरेब के अनेक रूपों को अनावृत्त करती हैं, सवाल उठती हैं। 'रूपाली सिन्हा' की  ... Read More...

भूमिका: सिनेमा की भाषा में: आलेख

"पिछली सदी के चालीस और पचास के दशक में मराठी मंच और फ़िल्म की प्रसिद्ध अभिनेत्री हंसा वाडेकर ने पत्रकार अनिल साधु के साथ मिल कर अपनी जीवनी लिखी। मराठी में इस आत्मकथा का शीर्षक ‘सांगत्ये आएका’ (सुनो और मैं कहती ह... Read More...

दलित आन्दोलन को अस्मितावादी कहना एक बड़ा ही विरोधाभास: आलेख

जिस तरह भारत की आज़ादी की तहरीक सिर्फ भारतीय पहचान के लिए आन्दोलन नही थी .यह उपनिवेशवाद के खिलाफ , शोषण उत्पीडन के खिलाफ आन्दोलन था .इसी तरह दलित बहुजन का आन्दोलन शोषण उत्पीडन और राजनीतिक भागीदारी के लिए आन्दोलन... Read More...

खुदा-ए-सुखन, ‘मीर-तकी-मीर: आलेख (एस तौहीद शहबाज़)

यह बात याद रखने योग्य है कि हिन्दी और उर्दू भाषा के निर्माण के इतिहास में अठाहरवीं शताब्दी, जो मीर की शताब्दी है, सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। उस समय तक भाषा का नाम केवल हिन्दी था । कभी-कभी उसे जबान-ए-देहलवी भी क... Read More...

वर्तमान राजनीति का माइक्रोस्कोप नाटक “साइकिल” (हनीफ़ मदार)

साइकिल एक साहित्यिक कृति से आगे एक जीवन की कहानी है | कहानी भी महज़ एक मुन्ना की नहीं अपितु देश दुनिया के हर गरीब मजदूर की कहानी है शायद इसीलिए दृश्य दर दृश्य देखते हुए दर्शक के रूप में यह लगने लगता है कि यह मेर... Read More...

शार्लिट ब्रॉन्टी: आज की स्त्री : आलेख (प्रो० विजय शर्मा)

खासकर साहित्य के संदर्भ में, अभिव्यक्ति में स्त्री स्वर तब से शामिल हो रहे थे जब स्त्रियों का लिखना तो दूर शिक्षा प्राप्त करना भी सामाजिक अपराध था | दरअसल गोल-मोल तरीके से समाज स्वीकृत स्थितियों को लिखना या चित... Read More...

योग के बहाने : व्यंग्य (आरिफा एविस)

पड़ोस में रहने वाले चंदू ने कहा, ‘क्या कभी भोग दिवस भी मनाया जाता है?  रोज कोई न कोई डे हो और लोगों को बदले में कुछ मिले. चाचा अगर भोग दिवस होगा तो लोगो को तरह तरह का खाने को मिलेगा. जिन्हें कभी वो चीजें नसीब न ... Read More...

मोहित बाबू का परिवार: कहानी (प्रेमकुमार मणि)

रोमान्टिज्म के साथ वैचारिक आरोहण वर्गीय चरित्र के उस केंचुल चढ़े सांप की तरह हो जाता है  जो  दलितों, पिछड़ों के सामाजिक और राजनैतिक उत्थान और मानव समानता और जन क्रान्ति की बात करते-करते कब अपना केंचुल उतार अपने अ... Read More...