जिन दिनों: कहानी (संजीव चंदन)

दुनिया की प्रगतिशील चेतना के अग्रणी संवाहक वर्ग को केंद्र में रखकर बुनी गई 'संजीव चंदन' की यह कहानी आधुनिक समय और समाज का एक नया विमर्श रचती है | प्रस्तुति का अनूठापन कहानी विस्तार पर भारी है जो  इस कहानी को मह... Read More...

‘नीलाम्बुज’ की ग़ज़लें: humrang

'नीलाम्बुज' की ग़ज़लें  नीलाम्बुज 1-  नगरी नगरी हम भटके हैं हो कर के बंजारे जी जुगनू-सा कोई दीप जला के बस्ती में मतवारे जी। आहिस्ता आहिस्ता हमने खुद को पढ़ना सीख लिया अभी तलक तो दूजों पर ही किये थे कागद क... Read More...

आज की लड़की, एवं अन्य कविताएँ: (सुलोचना खुराना)

इंसानी ज़ज्बात जब खुद व खुद शब्द ग्रहण कर मानवीय अभिव्यक्ति बनकर फूटते हैं, निसंकोच ऐसी रचनाएं मन के बेहद करीब से गुजरती हैं | कुछ ऐसा ही सुखद एहसास देती हैं 'सुलोचना खुराना' की यह कवितायें .... | - संपादक  आज ... Read More...

डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा’ की गज़लें: humrang

डॉ. मोहसिन ख़ान 'तनहा' की गज़लें  डा0 मोहसिन खान ‘तनहा 1-  ज़्यादा उड़िये मत वर्ना धर लिए जाएंगे। अब हौसलों के पंख कतर लिए जाएंगे। आजकल मौसम है तेज़ाबी बारिश का, तो ख़ुद को बाहर किधर लिए जाएंगे। बेबाक बात... Read More...

राष्ट्रगान की लय से टकराती बिदेसिया की धुन: आलेख (अनीश अंकुर)

राजनीतिक सत्ता समाज के हाशिए पर रहने वाले बहिष्कृत  तबकों केा भले ही पहचान अब मिली हो लेकिन भिखारी ठाकुर ने हमेशा अपने नाटकों के नायक इन तबकों से आने वाले चरित्रों को ही बनाया। उनके नाटकों के पात्रों केा देखने ... Read More...

विदेशी पूंजी निवेश की अनियंत्रित बाढ़ (डब्ल्यू. टी. ओ.) (डॉ0 नमिता सिंह)

'आज़ादी के बाद अपने देश के सुयोग्य वैज्ञानिकों और नयी खोजों में लगी प्रतिभाओं ने विभिन्न क्षेत्रों में नयी तकनीकों का निर्माण कर अपने बलबूते रक्षा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में दुनिया के आगे अपने कारनामे प्रस्त... Read More...

साहित्यिक वैचारिकी को आगे बढ़ाने का सगल, ‘हमरंग’: (डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा’)

हमरंग के दो वर्ष पूरा होने पर देश भर के कई लेखकों से ‘हमरंग’ का साहित्यिक, वैचारिक मूल्यांकन करती टिपण्णी (लेख) हमें प्राप्त हुए हैं जो बिना किसी काट-छांट के, हर चौथे या पांचवें दिन प्रकाशित होंगे | हमारे इस प्... Read More...

‘सीमा आरिफ’ की पांच कवितायें: humrang

आभासी दुनिया में खोये युवाओं में ह्रास होती मानवीय संवेदना और प्रेम को तलाश करती 'सीमा आरिफ' की कवितायें |...... 1 -   सीमा आरिफ यह फेसबुक पर जन्मे मुहब्बत टाइप अफ़साने लम्बी सड़कों से तेज़ दौड़ लगाते ... Read More...

दलित विमर्श की वैचारिकी का घोषणा पत्र: समीक्षा (विनोद विश्वकर्मा)

"आजादी के लगभग 75 वर्षों बाद भी दलितों का मंदिर में प्रवेश, दलितों का देशभर में नंगा घुमाया जाना , दलित का छुआछूत के आधार पर बहिष्कार, दलितों की बेटी - धन सम्पत्ति कों अपनाना, क्यों बंद नही हुआ है; और यदि बंद न... Read More...

शौचालय चिंतन: व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

मोहनजोदाडो और हड्डप्पा की खुदाई में जो तत्कालीन सभ्यता के अवषेश मिले थे। उनमें स्नानागार की पुष्टी तो होती है किंतु मनुष्यों के निवृत्त होने की क्या व्यवस्था रही होगी, इसके बारे में जानकारी अस्पष्ट ही है।  हाँ,... Read More...