‘किताबों के प्रति दीवानगी’ पटना पुस्तक मेला 2015: (रविशंकर)

एक ऐसे समय में जब चारों तरफ़ बाज़ार का शोर अपने चरम पर है, और एक से बढकर एक मंहगी और विलासी चीज़ों का प्रलोभन दे, लोगों के मन पर हमले कर रहा है ! शहर के हृदय स्थल(गांधी मैदान) पटना, में पुस्तक मेले का आयोजन खासा म... Read More...

समय से संवाद का पर्याय, ‘दिनभर दिन’: पुस्तक समीक्षा (नंदलाल भारती)

समय से संवाद का पर्याय, 'दिनभर दिन  नंदलाल भारती श्री चरणसिंह अमी एक समर्थ रचनाकार है। कविता कर्म को समर्पित इनकी दिनभर दिन पुस्तक आयी है । पुस्तक का पन्ना पलटने से पहले नजर प्रथम फ्लैप पर ठहर जाती है जो एक ... Read More...

‘डिअर जिन्दगी’ व-नाम लव यू ज़िन्दगी..: फिल्म समीक्षा (संध्या नवोदिता)

जिंदगी में प्यार बहुत से रिश्तों से मिलता है लेकिन हमें बचपन से भावनाओं को दबाना सिखाया जाता है. रोओ तो कहा जाता है रोते नहीं, स्ट्रांग बनो. किसी पर गुस्सा आये तो गुस्सा नहीं करो, स्माइल करो. ऐसे अनुकूलन करते ह... Read More...

स्त्री आंदोलन-इतिहास और वर्तमान: आलेख ‘तीसरी क़िस्त’ (डॉ0 नमिता सिंह)

सुसंगठित रूप में स्त्री अधिकारों के लिये आंदोलन उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के शुरूआती दशक से ही माने जा सकते हैं। लैंगिक असमानता की पोषक सामाजिक व्यवस्था के बदलाव और स्त्री अधिकारों के लिये संघर्ष... Read More...

अमृतसर टू कनेडा : लघुकहानी (अमिता महरौलिया)

‘‘मुंडा सिंगापुर दा है ओथे ही एक छोटा जिहालया होया है। मुंडा जाट्ट है, मैं देख लिया है तुसी बस हां करो जी!’’ मनप्रीत लस्सी का गिलास रखते बोली... ‘‘जी गीत ता एकदम गां वरगी है। बस तुसी भी हां करो जी।’’ ...अरे भ... Read More...

पिंकीसिंह की प्रेरक कहानी, उर्फ़ पिक्चर अभी बाकी है..: व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

महात्मा जी ने कभी स्वच्छता का पाठ पढ़ाया था हमें। देश की हर सरकार बापू के विचारों को अपनाने को कृत संकल्पित रहती है, न भी रहती है तो यह विश्वास दिलाने का प्रयास जरूर करती है कि वह गांधीवाद के साथ है.और वह बापू क... Read More...

ईमानदारी का पर्व और वो: व्यंग्य (आरिफा एविस)

बीवी ने समझाया कि तुम काम पर जाओ मैं जाकर लाइन में लग जाऊँगी बच्ची छोटी है तो क्या हुआ? घर में मरीज है तो क्या हुआ ? किसी न किसी को तो बैंक जाना होगा अगर घर का खर्च चलाना है. ईमानदारी का पर्व है पूरा देश मना रह... Read More...

यह चुप्पी: कविता (मज्कूर आलम)

यह कविता किसी कवि की कलम से नहीं निकली और न ही रचनाकार की कवि के रूप में कोई पहचान ही है तब निश्चित ही यह ऐसी अभिव्यक्ति है जो खुद शब्द ग्रहण करके बाहर आई है | मजकूर आलम की यह कविता ....| यह चुप्पी  यह ... Read More...

बदनाम गलियों में सिसकती कहानियां: आलेख (अमृता ठाकुर)

रात के स्याह अँधेरे में कुचली हुई नागिन सी बिछी सड़कें जितनी काली दिखतीं हैं, दिन के उजाले में भी ये उस कालिख को नहीं छोड़ पातीं, मानो ये शर्मशार हों मानवीय दुनिया के उन कृत्यों और व्यवस्थाओं से जिनकी ये सड़कें न ... Read More...

मेरे समय में नेहरू: आलेख (अभिषेक प्रकाश)

नेहरू को हमने किताबों के माध्यम से जाना जरूर पर सबसे शिद्दत से मोदी युग में ही महसूस किया। एक घटना याद आ रही है मुझे जब प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि मैं आपका प्रधानसेवक हूं। तभी मुझे त्रिमूर्ति की याद आई जिसके प... Read More...