नौ साल छोटी पत्नी: कहानी (रविन्द्र कालिया)

हिंदी साहित्य में रवींद्र कालिया की ख्याति उपन्यासकार, कहानीकार  और संस्मरण लेखक के अलावा एक ऐसे बेहतरीन संपादक  के रूप में रही, जो मृतप्राय: पत्रिकाओं में भी जान फूंक देते हैं. रवींद्र कालिया हिंदी के उन गिने-... Read More...

‘शिव प्रकाश त्रिपाठी’ की कविताएँ …

कम शब्दों में बहुत कुछ कहने और समझाने का प्रयास करती 'शिव प्रकाश त्रिपाठी' की कविताएँ .......  'शिव प्रकाश त्रिपाठी' की कविताएँ ...  शिवप्रकाश त्रिपाठी 1- जब भी मै लिखता हूँ भिंची हुई मुट्ठी, भौहें तन जात... Read More...

क्या एडल्ट कॉमेडी वाकई कूल है..? (एस0 तौहीद शहवाज़)

सिर्फ मनोरंजन के उद्देश्य को लेकर बन रही फिल्मों से परहेज नहीं, किन्तु यह जरुरी नहीं कि वो वाकई मनोरंजन करेंगी | मनोरंजन की परिभाषा को दरअसल निर्माता एवं बाज़ार अपने हिसाब से गढ़ रहे | एक जमाना था जब बी आर इशारा ... Read More...

प्यार मेरा : एवं स्त्री: कविता (डॉ0 रज़िया बेग़म)

प्रेम गीत या प्रेम कविता भी आक्रान्ता, सामंती मानसिकता की प्रबल खिलाफत ही है इस लिए भी प्रेम कविताएँ लिखी और पढ़ी जानी चाहिए .....| 'डॉ० रज़िया' की कविता कुछ ऐसा ही एहसास है |....  प्यार मेरा : एवं स्त्री  तु... Read More...

मेहनतकश के सीने में: कविता (अनवर सुहैल)

आप बीती जो जग में देखी..... कोयला खदान मजदूरों के बहाने दुनिया के मजदूरों की कुंठा, विषमता और बिडम्बना को खुद से गुजारकर शब्द देते कवि, लेखक 'अनवर सुहैल' ........| मेहनतकश के सीने में  कितना कम सो पाते हैं ... Read More...

कैसा है इंतिज़ार हुसैन का भारत: साक्षात्कार (मिर्ज़ा ए. बी. बेग)

७ दिसंबर १९२३ को डिवाई बुलंदशहर, भारत में जन्मे इंतज़ार हुसैन पाकिस्तान के अग्रणी कथाकारों में से थे | वे भारत पाकिस्तान के सम्मिलित उर्दू कथा साहित्य में मंटो, कृश्नचंदर और बेदी की पीढ़ी के बाद वाली पीढ़ी के प... Read More...

चकाचौंध, भौतिकवादी जीवन का स्याह पक्ष: समीक्षा

आज की मृगतृष्णा जीवन पद्धति में मानसिक एवं भावनात्मक असामंजस्य से नारकीय होते पारिवारिक जीवन से त्रस्त लोग आभासी दुनिया में सुख-शांति और जन्नत की तलाश कर रहे हैं. फ्रेंडशिप क्लबों आदि के सहारे जिंदगी को नए रूप ... Read More...

अप्रभावी होता ‘सांस्कृतिक आंदोलन’ (हनीफ मदार)

अप्रभावी होता ‘सांस्कृतिक आंदोलन’  हनीफ मदार आज जिस दौर में हम जी रहे हैं वहां सांस्कृतिक आंदोलन की भूमिका पर सोचते हुए इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि एक दूसरे के पूरक दो शब्दों के निहितार्थाें के पुनर... Read More...

दुख-सुख के साझीदार, ‘मुक्तिबोध’: आलेख (नासिरूद्दीन)

मुक्तिबोध की पैदाइश का सौंवा साल चल रहा है. 2017 में वे सौ साल के होते. तीन दशक पहले सामाजिक बदलाव के आंदोलनों से जुड़े हमारे जैसे नौजवान लड़के-लड़कियां भी जिंदगी के इन्‍हीं पैमानों और कशमकश से गुजरे हैं. उन्‍ह... Read More...

मरना कोई हार नहीं होती: संस्मरण (हरिशंकर परसाई)

प्रमोद मैं और शान्ता भाभी तथा रमेश से सलाह करने दूसरे कमरे में चले गये।इधर मुक्तिबोध ज्ञानरंजन से नये प्रकाशनों पर बात करने लगे। तय हुआ कि जल्दी भोपाल ले चलना चाहिये। मित्रों ने कुछ पैसा जहाँ-तहाँ से भेज दिया ... Read More...