रंगमंच का बदलता स्वरूप: आलेख (अनीश अंकुर)

नाटक, रंगमंच समाज में जनता की आवाज़ बनकर किसी भी प्रतिरोध के रचनात्मक हस्तक्षेप की दिशा में जरूरी और ताकतवर प्रतीक के रूप में मौजूद रहा है | न केवल आज बल्कि उन्नीसवीं शताब्दी में  1857 का  प्रथम स्वाधीनता संग्रा... Read More...

गद्दार कुत्ते: एवं अन्य कविताएँ (दामिनी यादव)

कविता से हमेशा ही सौन्दर्य टपके ऐसा नहीं होता बल्कि विचलन भी होता है जब कविताई बिम्ब हमें अपनी सामाजिक, राजनैतिक स्थितियों के विकृत हालातों के रूप में नज़र आते हैं | लेखकीय दृष्टि से गुज़रता अपने समय और समाज का क... Read More...

स्त्री आंदोलन-इतिहास और वर्तमान: आलेख ‘दूसरी क़िस्त’ (डॉ0 नमिता सिंह)

स्त्रीवाद या नारीवाद या नारी विमर्श (फेमिनिज़्म) की जब बात की जाती है तो इसका तात्पर्य स्त्रियों के लिये समान अधिकार तथा उनका कानूनी संरक्षण है। प्रारंभिक चरणों में यह संघर्ष समानता और सम्मानजनक जीवन यापन के लि... Read More...

क्या लड़का-लड़की सिर्फ दोस्त नहीं हो सकते?: फिल्म समीक्षा (सैयद एस.तौहीद)

कॉम्पलेक्स किरदारों की कॉम्पलेक्स कहानी में भावनाओं की यात्रा दिखाने की कोशिश हुई है। संगीत व गानों को फिल्म की कथा का हिस्सा देखना सुखद था। लेकिन प्यार व दोस्ती जैसे सरल सुंदर भाव को उलझन बना देना। कभी न ख़त्म... Read More...

सरकारी कलाभवन और तलाक शुदा औरतें: कविताएँ (पंखुरी सिन्हा)

(पंखुरी सिन्हा की कविताओं में कवि की सोच और संवेदना मुखर होकर प्रकट होती है. स्त्री-विमर्श के नये आयाम खुलते हैं. खासकर सरकारी कलाभवन वाली कविता तो ज़बरदस्त है...मैं इन कविताओं से मुतास्सिर हूँ कि आपके पास कथ्य-... Read More...

‘उत्तमी की माँ’ एक विमर्श की माँग: आलेख (साक्षी)

पुरुषसत्तात्मक समाज में लड़की का नैतिकता पूर्ण आचरण व स्वयं को पुरुष के आनंद की वस्तु बनाना स्त्री की नियति है और ऐसा ही उसका मनोविज्ञान भी बनता है। सिमोन द बोउवार कहती है’’ स्त्री बनती नहीं बनाई जाती है’ और ‘‘... Read More...

समकालीन हिन्दी आलोचना और कबीर: आलेख (संजय कुमार पटेल)

कबीर पर आज तक जितने भी आलोचक अपनी आलोचना से दृष्टिपात किए हैं वह आज भी सबको स्वीकार्य नहीं है । सभी लोग अपने-अपने अनुसार कबीर को व्याख्यायित करने का प्रयास किए हैं लेकिन उन्हीं में से कबीर के प्रति कुछ ऐसे भी श... Read More...
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रीयल राष्ट्रवादी पॉलिटिक्स, सवालों में ! आलेख (अभिषेक प्रकाश)

तथाकथित वामपंथी बुद्धिजीवियों के खोखलेपन से उत्पन्न रिक्तता में पाँव पसारते वर्तमान में शेक्सपीयर का वह वाक्य याद आता है जिसमे वह कहतें है कि-- 'अगर आप उसे पराजित करना चाहते हैं तो आपको उसकी यादाश्त को मिटा देन... Read More...