हाँ मैं किन्नर हूँ, ‘मनीषा महंत’ (थर्ड जेंडर) साक्षात्कार

15 अप्रैल 2014 को माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा किन्नरों को थर्ड जेंडर घोषित किए जाने के ऐतिहासिक फैसले के बाद इस समुदाय के प्रति समाज में सथापित कथित धारणाएं फिर से चर्चा के केंद्र में आई और पूर्व सथापित मान्य... Read More...

नव वर्ष पर ‘अश्विनी आश्विन’ की चंद ग़ज़लें…….

एक और वर्ष का गुज़रना यकीनन मानव सभ्यता का एक क़दम आगे बढ़ जाना, ठहरना…. एक बार पीछे मुड़कर देखना, ताज़ा बने अतीत पर एक विहंगम दृष्टि डालकर सोचना, क्या छूटा, क्या है जिसे पूरा होना था और न हुआ, क्या हम निराश ह... Read More...

हाशिये के विमर्श में सशक्त उपस्थिति: समीक्षालेख (डॉ0 रमाकांत राय)

"राही मासूम रज़ा वाले खंड में ही बकलम खुद राही मासूम रज़ा के कई महत्त्वपूर्ण और अप्रकाशित आलेख भी संकलित किये गए हैं। इन आलेखों से राही मासूम रज़ा के रचनाकार व्यक्तित्व का पता चलता है। सबसे महत्त्वपूर्ण है राही मा... Read More...

‘इंसान हैं’ : पुस्तक समीक्षा (अरुण श्री)

आजकल एक आम धारणा है कि जिसके हाथ में झंडा है और जिसके जुबान पर नारे हैं उसी का वैचारिक पक्ष सशक्त है । लेकिन लेखक ने ऐसे झंडाबरदारों को नहीं बल्कि उन्हें नायक कहा है जो झंडे और नारे की राजनीती से अलग जमीन पर गु... Read More...

लकीरें— एवं अन्य कविताएँ (रवि सिंह)

संवेदनाएं किसी सीमा, रेखा, पद, प्रतिष्ठा या क़ानून की बंदिश से ऊपर वह मानवीय गुण है जो इंसानी दृष्टि से शुरू होकर प्रेम और करुणा तक जाता है और सम्पूर्ण समाज जगत को अपने भीतर बसे होने का एहसास जगाता है | रवि सिंह... Read More...

सोशल मीडिया के ‘जीजा जी’: व्यंग्य (अनीता मिश्रा)

"इन जीजाओं की किस्मत उस वक़्त खुल जाती है जब इन्हें कोई इनके जैसी मजेदार साली मिल जाती है. मसलन जीजा ने लिखा ‘बहुत शनदार’ तो साली साहिबा एक आँख बंद वाली इमोजी बनाते हुए लिखेंगी ..’क्या ? मैं या मेरी ड्रेस’ बस फि... Read More...

जिंदा रहना हर आदमी का अधिकार है: आलेख (एस तौहीद शाहवाज़)

"देश की एक बड़ी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जिंदगी काट रही, फुटपाथ के लोगों की तक़दीर पहले से कोई बहुत ज्यादा नहीं बदली। हाशिए के लोगों के हांथ अब भी खाली हैं । महंगाई, भ्रष्टाचार व कालाबाजार का ताप सबसे ज्यादा निच... Read More...

मन की व्यथा कथा: व्यंग्य (नित्यानंद गायेन)

मन की व्यथा कथा  नित्यानंद गायेन योग करने के तुरंत बाद ही इन्द्र, मौनेंद्र से मिले | योग को इतना बड़ा इवेंट बनाने के लिए उन्हें बधाई दी और उसी क्षण फादर्स डे मनाने के लिए अपने निजी पायलट रहित विमान को हांकते ... Read More...

ओस की बूँदें: एवं अन्य कविताएँ (अर्चना कुमारी)

जैसे बीज को तोड़कर निकलता हो कोई अंकुर | 'अर्चना कुमारी' की कविताओं से गुज़रना भी कुछ ऐसी ही अनुभूति से रूबरू होना है, जब, कविता की साहित्य दृष्टि सामाजिक, आर्थिक और मानवीय रिश्तों के बीज की मज़बूत परत तोड़कर आंतरि... Read More...