मैं, उस नगर की कविता (संस्मरण -भाग एक), पद्मनाभ गौतम

बदलते और आधुनिक तकनीक में निरंतर बदलते वक़्त में साहित्यिक शुरूआती समय को ऐतिहासिक रूप में संजोना और रचनात्मक र्रोप में सामने आना एक अवसर देता है अपने साहित्यिक, मानवीय अतीत को वर्तमान समय के साथ मूल्यांकन करने ... Read More...

वारिस: कहानी (प्रो० विजय शर्मा)

"एक बार के हुए दंगों ने जब उन्हें जड़ से उखाड़ दिया तो वे आकर इस मोहल्ले में बस गए। दंगों में उन्हीं जैसे गरीब लोगों का नुकसान हुआ था। उन्हीं जैसे गरीब लोगों के घर में आग लगी थी। उन्हीं जैसे गरीब लोग मारे गए थे। ... Read More...

एक संस्कृति के उत्थान और पतन की कहानी, ‘कोठागोई’ (सुशील कुमार भारद्वाज)

इन दिनों चर्चा में 'प्रभात रंजन' की किताब "कोठागोई" पर एक समीक्षात्मक आलेख ...... एक संस्कृति के उत्थान और पतन की कहानी, 'कोठागोई' सुशील कुमार भारद्वाज प्रभात रंजन की नयी किताब “कोठागोई” के आने की खबर मात्र... Read More...

स्मार्ट सिटी: एवं अन्य कविता (जिजीविषा)

चैनल, टी आर पी, विज्ञापन, शोशल मीडिया, इंटरनेट, बाज़ार और चकाचौंध से बनते स्मार्ट सिटी की आबो-हवा को साँसों से अपने अन्दर खींचते हुए यह याद रख पाना कि, यह सब कितने ही मजबूर और वेवश इंसानों की जान की कीमत पर हासि... Read More...

तब तुम क्या करोगे: कविता (ओमप्रकाश वाल्मीकि)

थोड़ी सी बारिश से देश भर के नगर, कस्बों, गांवों की सड़कें व् आम रास्ते कीचड़ और गन्दगी से भर गए हैं ..... उन्ही कीचड़ भरे रास्तों से निकलते हुए बिना किसी सवाल के लोगों की नाक भोंह सिकुड़ी हुईं हैं ..... इस हालात को ... Read More...

सुखिया मर गया भूख से: नाटक (राजेश कुमार)

बेहद प्रासंगिक नाटक 'सुखिया मर गया भूख से' के पूर्ण नाट्यालेख को हमरंग पर प्रकाशित करने का उद्देश्य  देश भर के नाट्यकर्मियों को इस नाटक की सहज उपलब्धता है | बावजूद इसके मंचन से पूर्व लेखकीय अनुमति लेना नैतिक जि... Read More...

सज्जाद ज़हीर: तरक्कीपसंद तहरीक के रूहेरवां: आलेख (जाहिद खान)

"मेरी यह छोटी सी किताब प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े उन तमाम कलमकारों, फनकारों, और संस्कृतिकर्मियों के नाम, जिन्होंने अपने लेखन और कला से कभी समझौता नहीं किया और आज भी अपने फन से देशवासियों में प्रगतिशील, जनवादी, लो... Read More...

ड्रामा क्वीन: कहानी (अनीता मिश्रा) kahani in hindi

"सरिता ने हाथ की रस्सी को झटक कर फेंका और घूरकर लखन को देखने लगी। वह इतनी कसकर हिचकी लेकर रो रही थी कि उससे कुछ बोला नहीं जा रहा था। सास ने लानत भरी आवाज में कहा, ‘’दुल्हिन ! तुम दुई कौड़ी की निकली। अरे, धीरे –ध... Read More...

जीवन में बसती हैं कविताएँ: समीक्षा (सुरेश उपाध्याय)

ब्रजेश कानूनगो की कविताओं पर बात करने के लिए कवि के अपने परिवेश और क्रमिक विकास को समझना एक बेहतर उपाय हो सकता है। कविताओं में उनकी सरल भाषा, सहज सम्प्रेषणीयता, अपने आस-पास के सन्दर्भों से उठाई विषय वस्तु और प्... Read More...

“चल रे मन दूर कहीं.” एवं अन्य कविताएँ (नीलम स्वर्णकार)

मानव जीवन की संवेदनाओं एवं कोमल भावों को रचनात्मक अभिव्यक्ति देती पूरे आत्मविश्वास से भरी 'नीलम स्वर्णकार' की कुछ कविताएँ ......| - संपादक  "चल रे मन दूर कहीं."  नीलम स्वर्णकार कभी कभी जब थक जाती हूँ च... Read More...