अच्छा आदमी!!! एवं अन्य कविताएँ: (सुशील उपाध्याय)

वर्तमान समय में समाज से लुप्त होती मानवीय संवेदनाओं के पहलूओं को विभिन्न प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त करती सुशील  उपाध्याय की कविताएँ - सम्पादक  अच्छा आदमी!!!  सुशील उपाध्याय हर किसी की निगाह में ऊंचा ... Read More...

विद्यार्थी को पतन की ओर ले जाती माता पिता की महत्वाकांक्षा: आलेख (पंकज प्रखर)

आज खुशहली के मायने बदल रहे है अभिभावक अपने बच्चे को हर क्षेत्र में अव्वल देखने व सामाजिक दिखावे के चलते उन्हें मार्ग से भटका रहे है। एक प्रतिशत के लिए यह मान लिया जाए कि वे विद्यार्थी कुंठा ग्रस्त होते है जिन प... Read More...

मध्यरात्रि का विषाद: एवं अन्य कवितायेँ (अभिनव निरंजन)

शांत, शिथिल, सोई सी पानी के ऊपर पसरी काई की परत पर जैसे कोई कंकड़ फैंक दिया हो, कुछ इसी तरह वर्तमान समय के साथ पसरती आत्मविस्मृति की परत पर वैचारिक उद्वेलन के रूप में नज़र आती हैं अभिनव निरंजन की कविताएँ .... ... Read More...

रहिमन पानी राखिये…: संपादकीय (अनीता चौधरी)

रहिमन पानी राखिये...  अनीता चौधरी मनुष्य को जीवन जीने के लिए मुख्य रूप से तीन चीजों की जरुरत होती है हवा, पानी और भोजन | जिस तरह से हवा और भोजन के बिना जीवन की परिकल्पना नहीं की जा सकती उसी प्रकार पानी के बि... Read More...

मेरा शहर भोपाल एवं अन्य कवितायेँ : शहनाज़ इमरानी

गहरे प्रतीक संदर्भों में वर्तमान सामाजिक हालात और राजनैतिक व्यवस्था के बनते कथित तांबई परिदृश्य के बीच से बारीक पड़ताल के साथ आम जन और मानव जाति व् उसकी मनः स्थिति को तलाशने का प्रयास करती 'शहनाज़ इमरानी' की यह क... Read More...

डिजिटल के भरोसे में: व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

‘हर अच्छी चीज का विरोध करने की तुमको आदत हो गयी है. जब हमने सेटेलाईट अंतरिक्ष में भेजा था तब भी तुमने विरोध किया था.अब वही देखो कितनी मदद कर रहा है हमारी. हजार चैनल हैं हमारे घर में. मौसम की जानकारी है. सबको ला... Read More...

खो जाते हैं घर : कहानी (सूरज प्रकाश)

यथार्थ से जूझती बेहद मार्मिक और संवेदनशील कहानी ..... वरिष्ठ साहित्यकार सूरज प्रकाश की कलम से ...| खो जाते हैं घर सूरज प्रकाश बब्बू क्लिनिक से रिलीव हो गया है और मिसेज राय उसे अपने साथ ले जा रही हैं। उन्हों... Read More...

अब बनाएँ सदाचार का टीका : व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

अब बनाएँ सदाचार का टीका <a href="http://www.humrang viagra generique doctissimo.com/?attachment_id=1695" rel="attachment wp-att-1695">ब्रजेश कानूनगो साधुरामजी उस दिन बडे परेशान लग रहे थे। कहने लगे ‘द... Read More...

कवि की मौत : कविता (प्रशांत विप्लवी)

आज की बाजारवादी सामाजिक व्यवस्था के कारण कवितातों में से सिमटते ग्रामीण परिवेश को शिद्दत से महसूसती प्रशांत विप्लवी की यह कविता - अनीता चौधरी कवि की मौत  प्रशांत विप्लवी अंतिम कविता में पानी माँगा गाँव ... Read More...

जो है, उससे बेहतर चाहिए का नाम है ‘विकास’ : आलेख (अनीश अंकुर)

भगत सिंह या सफ़दर हाशमी के जाने के बाद सांस्कृतिक या वैचारिक परिक्षेत्र या आन्दोलन रिक्त या विलुप्त हो गया ....या हो जाएगा यह मान लेना निश्चित ही भ्रामक है बल्कि सच तो यह है कि उनकी परम्परा के प्रतिबद्ध संवाहक ह... Read More...