जब तक मैं भूख ते मुक्त नाय है जाँगो…. : नाट्य समीक्षा (हनीफ मदार)

13 व् 14 जून को मथुरा में दो दिवसीय नाट्य आयोजन में मंचित हुए 'राजेश कुमार' के नाटक "सुखिया मर गया भूख से" की मंचीय प्रस्तुति पर 'हमरंग' के संपादक "हनीफ मदार" का समीक्षालेख......| - अनीता चौधरी  जब तक मैं भू... Read More...

छोड़छाड़ के अपने सलीम की गली… : आलेख (प्रो० विजय शर्मा)

"प्रेम क्या है? प्रेम में पड़ना क्या होता है? इसे लिख कर व्यक्त नहीं किया जा सकता है फ़िर भी युगों-युगों से प्रेम पर लिखा जाता रहा है, आगे भी लिखा जाता रहेगा। इसे जानने-समझने का एक ही तरीका है आपादमस्तक इसमें डूब... Read More...

बस मैं हूं घूमती हुई पृथ्वी पर बिल्कुल अकेली : कवितायें (अंकिता पंवार)

कविता प्रेम है, प्रकृति है, सौन्दर्य है और सबसे ऊपर एक माध्यम है खुद के प्रतीक बिम्बों में समाज के धूसर यथार्थ को उकेरने का | जैसे खुद से बतियाते हुए मानस को सुनाना या मानस से बतियाते हुए खुद को सुनाना | कुछ ऐस... Read More...

अवचेतन की चेतन से लड़ाई: ‘तमाशा’ (मजकूर आलम)

ऐसे ऊपर से शांत दिखने वाले अशांत समुन्दर में अगर कोई कंकड़ी भी मार दे तो जाहिर है कि उसमें हलचल मचेगी ही। और यही काम करती है तारा। और, अगर समुद्र में हलचल मचेगी तो ज्वारभाटा आएगा ही और ज्वारभाटा आएगा तो महासागर ... Read More...

धर्म: कहानी (सुशील कुमार भारद्वाज)

छोटी छोटी सामाजिक विषमताओं को रचनात्मकता के साथ लघुकथा के रूप में प्रस्तुत करने का कौशल है सुशील कुमार भारद्वाज की कलम में | धार्मिक संकीर्णताओं के ताने बाने में उलझे समाज के बीच से 'इंसानी धर्म' की डोर को तलाश... Read More...

‘पद यात्रा,‘पद’ और ‘अंतिम यात्रा: व्यंग्य (देवेन्द्र सिंह सिसौदिया)

व्यंग्यकार की दृष्टि खुद से लेकर अपने आस-पास, सामाजिक और राजनैतिक क्रिया कलापों और घटनाओं,  जो आम तौर पर सामान्य घटनाओं की तरह ही दिखाती हैं, उनमें से भी बेहतर सामाजिक सरोकारों के लिए सार्थक तर्क खोज ही लेतीं ह... Read More...

आत्महत्या: कविता (नित्यानंद गायेन)

(कभी-कभी अचानक कोई कविता मन-मस्तिष्क में यूं पेवस्त होती है कि बहुत देर तक थरथराता रहता है तन-मन...नित्यानद गायेन ने आत्महत्या जैसे विषय पर भावपूर्ण कविता लिखी है...संपादक) आत्महत्या आत्महत्या पर लिखी गयी ... Read More...

हवाले गणितज्ञों के: एवं अन्य कविताएँ (अभिज्ञात)

अभिज्ञात, मानवीय रिश्तों के सूक्ष्म धागे के साथ सामाजिक,  आर्थिक  विषमताओं की समर्थ सार्थक पड़ताल कर रहे हैं अपनी इन दो कविताओं में , हालांकि आपकी कवितायें अन्य कई रंगों और सरोकारों के साथ गुजरती हैं | हमरंग पर ... Read More...

रात बिखरने लगी है: एवं अन्य कविताएँ (नीता पोरवाल)

जैसे रेगिस्तान की तपती दोपहरी में पानी का दिख भर जाना भी तृषाग्नि को असीम शांति से भरकर थके क़दमों में भी एक अजीब जोश का संचरण कर देता है ......ठीक ऐसे ही जीवन संघर्ष की आपा-धापी, एवं वैचारिक द्वंद्ध की गंभीरता ... Read More...

‘अश्विनी आश्विन’ की ग़ज़लें

शांत पानी में फैंका गया  पत्थर, जो पानी के ऊपर मजबूती से जम रही काई को तोड़ कर पानी की सतह तक जाकर उसमें हलचल पैदा कर देता है ...... अश्विनी आश्विन की ग़ज़लें मस्तिष्क से होकर ह्रदय तक पहुंचकर उसी पानी की तरह विचल... Read More...